Tuesday, June 5, 2018

तकब ४/१८



#तकब ४/१८
मित्रों नमस्कार।

इस बार प्रतियोगिता नए रूप में। 
१. जैसा कि तस्वीर में लिखा है "आपका चित्र आपका सृजन"- आपने अपनी पसंद की तस्वीर के साथ ही उस पर केंद्रित अपने शब्द भाव रूप में लिखने है। 
२. रचना नई, कम से कम १० पंक्तियां शीर्षक सहित (साथ ही टिप्पणी में आपकी रचना का उद्देश्य या कारण) प्रस्तुत करनी है। 
३. चित्र व रचना इसी पोस्ट में टिप्पणी रूप में प्रस्तुत करनी है। 
४. केवल और केवल प्रतियोगिता सम्बन्धित टिप्पणी ही अंत में पोस्ट पर रहेगी। कोई प्रश्न प्रतियोगिता से जुड़ा होगा उसे भी उत्तर देने के बाद हटा लिया जाएगा। 
५. प्रतियोगिता की अंतिम तिथि २२ मई २०१८ है। 
६. प्रोत्साहन हेतु रचनाये - कृपया अंतिम दिन न लिखे बल्कि जितना जल्दी हो प्रस्तुत कीजिये। 
७. आपकी रचनाये पूर्व प्रकाशित न हो साथ ही जब तक प्रतियोगिता पूर्ण नही होती व ब्लॉग में नहीं प्रकाशित न हो तब तक कहीं सांझा न करे।
८. सभी सदस्यों को शुभकामनाएं।

इस प्रतियोगिता की विजेता है सुश्री जशोदा कोटनाला बुड़ाकोटी 



Deepchand Shankarlal Mahavar 
शीर्षक:~ असहनीय

असह्य प्रसव पीड़ा सहकर
हर रोज़ खबर एक जनता हूँ।
हर रोज़ खबर मैं बनता हूँ।
हर रोज़ खबर मैं गढ़ता हूँ।

जात नात के चक्रव्यूह में
तलवारों सा तनता हूँ।
साम्प्रदायिक दंगे हुल्लड़ की
हर रोज़ खबर मैं बनता हूँ।
असह्य प्रसव पीड़ा सहकर
हर रोज़ खबर एक जनता हूँ।

दुःख से सारोकार नहीं
सुख का कोई सहकार नहीं
राजकीय चाणक्य नीति में
मैं साधारण जनता हूँ।
असह्य प्रसव पीड़ा सहकर
हर रोज़ खबर एक जनता हूँ।

सरकारी कागज पत्तर पे
पट्ठा उल्लू का बनता हूँ
चाटुकार पाटों की चक्की
हर दिन पिसता छनता हूँ
असह्य प्रसव पीड़ा सहकर
हर रोज़ खबर एक जनता हूँ।
{ये मेरी स्वरचित/मौलिक रचना है।}



ब्रह्माणी वीणा हिन्दी साहित्यकार 
आधारछंद--- पीयूष पर्व  2122,2122,212(मापनी)
सीमांत-आना
पदांत-सीख लें,,,
गीतिका " ज़िंदगी "
&&&&&
🌷🌷🍀🌷🌷🍀🌷🌷🍀🌷
****************************
जिंदगी में ,,,जीत जाना सीख लें !
मुश्किलों से,, पार पाना सीख लें !!
**
जब मिले काँटों सरीखी जिन्दगी,
हम गुलाबों सा,,,, हँसाना सीख लें !!
**
जीत भी है,,,,, हार भी है जिंदगी,
गम भुला के खिलखिलाना सीख लें !!
**
लक्ष्य भी जागृत जगा ले आदमी,
ले कसम वादा निभाना ,,,,सीख लें!!
**
प्रात भी है,,, शाम भी है जिंदगी,
हर कदम सूरज उगाना सीख लें !!
***
प्रेम-"वीणा "भी,,यही सुर गा रही,
प्रेम से जीवन बिताना ,,,सीख लें !!
***
****************************
संदर्भ--ज़िंदगी सुख-दुख का स्वरूप है,,,हमको सदा हँस के गुज़ारना चाहिए,,साथ मे प्रेम जीवन की संजीवनी है,,व प्रकृति भी यही सीख देती है



Madan Mohan Thapliyal

सफरनामा
🏞️🏞️🏞️
जीवन एक सफर है
मंजिल दूर या नजदीक
कह नहीं सकता
एक बुनियाद रखी तो थी
जो अधूरी रह गई
उस पर मंजिल बनी ही नहीं
जितनी बार पत्थर गांठे
वे बेतरतीब ही दिखे
लुढ़कते रहे, खिसकते रहे
मेरी जिंदगी की तरह
मैं टूटा , पर झुका नहीं
मैं थका, पर रुका नहीं
भाग्य का बनना अपने हाथ में है
सच !
मुझे नहीं लगता
जिंदगी में-
कितने सावन बीत गए
हरियाली कभी देखी नहीं
पतझड़ आए, वसन्त आया ही नहीं
इन सब से मैं त्रस्त हूं
अपना काम छोड़कर
मैं ठहर सा गया हूं
अमावस के चांद की तरह !!

टिप्पणी - जीवन क्या है समझने के लिए उमर बीत जाती है लेकिन हर बुनियाद पर मंजिल नहीं बनती, मानव किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है।


जशोदा कोटनाला बुड़ाकोटी 

~जीने की आशा~

टूटे दालान में पड़ी हुई
टूटी चारपाई पर
टूटी-बिखरी हुई
वो साढ़े छः बालिश्त के देह.....
जरा सी आहट पर
उचक जाती है.....

उसका मटमैला रेशमी बिछौना
उसके अतीत की
चुगलियाँ कर रहा है
जिसपर बदसूरत सूती पैबन्द
अकुशल, कच्चे हाथों की
कहानी बयां कर रहे हैं.....

पास रखी चिलमची में
अक्सर वो देह
खंखार कर थूक देती है
और गटक लेती है
लोटे में रखे पानी के दो घूँट.....

सुबह की छनती धूप की लकीरें
जब पड़ती हैं
उसके ललाट पर.....

वह मिचमिचाती आँखों से
हाथ जोड़
शुक्रगुज़ार हो जाती है
एक और सुबह की.....

जीवन जीने की आस
सच में,
सुन्दर है
जीवन जितनी ही.....

टिप्पणी :----आंखों में पोता की बहू देखने तक के ख्वाब पलते हैं ... जब कि पता है अगला सूरज मेरा हो या न हो

Ajai Agarwal 
क्षितिज के उस पार-प्रोत्साहन के लिये ---
=============

अपनी साँसें मुझको देकर
तू मुझमें ही छिप जाता है।
पपीहे सी प्यासी रह जाती
सुधियों का अमृत पीने को।
जब तू मेरा होता है ,
मैं भी अपनी होती हूँ।
जुगों जुगों की रीत यहां
बस प्यार और अधिकार की है।
तुझको पाना तुझको जीना
तेरी ही राहों पे चलना -
तिनका -तिनका जोड़ यहां
निर्मित अपना संसार किया -
अब पंछी कैद हुआ तड़पे
चाहे ऊँची उड़ान प्रिये।
अधखुली पलकों का उन्मीलन
सुधियाँ लेती आकार प्रिये।
तू भी अंक में सागर की
नित आता थकन मिटाने को।
मैं भी लहरों में मिलकर के
फिर लेती हूँ आकार प्रिये।।आभा।।-

हर बार उजला होने की आस में आत्मा लिहाफ बदलती है ,कुछ भूली बिसरी सुधियों संग -"पुनरपि जननं पुनरपि मरणं' -- साँसों का हवन है जीवन फिर - फिर से सागर के अंक में समाना -जैसे प्रतिदिन सूरज समाता है ,आत्मा की थकन उतारने को -पर अवसान मनभावन हो,रंगभरा हो , ये भी सीख देता है क्षितिज का सूरज --आखिर जीवन तो क्षितिज के उस पार ही है।



प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

~एकला चलो रे ~

इच्छा और उद्देश्य के बीच
हाड़ मांस का तन
कभी मन से और
कभी मन से विपरीत
अपनों के साथ प्रेम और स्नेह
की झूठी शान पर इतराता हुआ
शब्दों और भावों का बना गुलदस्ता
अर्पण करता रहता है
विश्वास और वादों की मरीचिका पर
आजीवन चलने का अनुबंधन कर
दर्द हस्ताक्षर कर देता है

जब वक्त की आड़ में
प्रहार होता तन मन पर
तब सारा संसार
ही पराया लगने लगता है
हर अनुभव गर्म रेत सा
शरीर को झुलसाता है
हर रिश्ता दूर खड़े होकर
अहंकार की भाषा बोलता है
और विवशता खुद को ही
दोषी समझने का ज्ञान देती है
कटु अनुभव बुद्धिमान बना देता है
और सत्य को अपनाते हुए
जीवन को गतिमान मानते हुए
निरंतर चलने रहने की समझ ले
एकला चलो के राग को
खुद में स्थापित कर देता है

टिप्पणी: रिश्तो में मनुष्य कभी स्वार्थवश खुद अलग होता है या फिर किसी के स्वार्थ के कारण उसे कोई अलग कर देता है और अंत में उसे यही दर्द अपनों से अलग चलने की सच्ची सलाह देता है चाहे अनचाहे। #रिश्तोंकाकहाअनकहासच



अलका गुप्ता 

नारी ये जीवन
***********
घायल हो कर जब...
टूट कर बिखर जाती हूँ !
असहाय सी घबरा जाती हूँ !
कोने में किसी एकांत...
विचलित कंपित सहमी सी ...
असंख्य अश्रु...
आद्र या शुष्क बहाती हूँ !
अस्तित्व पर स्वयं ही...
अपने ईश्वर से...
अंबार गिले के...
खूब लगाती हूँ !
इसी उठा पटक में उद्वेगों के !
कब निढाल हो गिर जाती हूँ !
फ़िर...!!!
फ़िर.. उसी की अनुकंपा से...
एक प्रेरणा ..आस किरन सी...
मन में सुलगाती हूँ !
टूटने बिखरने के...
इसी क्रम में ...
नारी ये जीवन...
पुनः संगवाने को...
उत्साहित सी कभी... हतोत्साहित सी !
तमाम उद्योग जतन में जुट जाती हूँ !
नारी अबला या फ़िर जोशीले दम में ...
ललकार सबला सी...
बन जाती हूँ !
क्यों कहते हो फ़िर...
ऐ ..दुनियाँ वालों !!!
भूल गई गहने...
लाज लज़ीले !
नारी से वो पद...
सुकोमल आज लचीले !
इसी से कहती हूँ
जियो और जीने दो !
इंसान है उसको...
वही..जो रहने दो !
तोडो न ..सँभल जाओ !!!
घायल फन.. न होने दो !
आँचल में ममता..माँ सी।
प्यारी ही ...रहने दो ॥
प्यारी ही ...रहने दो ॥

_________अलका गुप्ता_


नैनी ग्रोवर 

~बेटी के सवाल~

गाँव की गौरी, लज्जा की मारी,
अनपढ़ ग्वारन, परन्तु संस्कारी.
पिता का साया, सब भाइयों का रोब,
अनजाने पुरुष से, जुड़ गया संजोग..
छूट गई जब, उसके बाबुल की गली,
घबरा गई वो मासूम सी कच्ची कली...

ये कैसा प्यार दुलार माय री था तिहारा,
छोटी सी उम्र में, किया मुझसे किनारा...
बोझ क्या इतना, भारी थी मैं सब पर,
काट दिए मुझ उड़ती चिड़िया के पर..
बड़ी बन गई, देख आज बिटिया तिहारी,
फिर भी मन का बोझ है, इस घूंघट से भारी..
काहे ना भाइयों को, तुमने दिया देश निकाला,
एक बेटी को क्यों बापू, गया ना सम्भाला..
ना ना पूछूँगी ना तुमसे, कभी ये सवाल,
इत्ती भी गंवार ना हूँ, जानूँ हूँ तेरा हाल..
तूने भी तो, जगत की है रीत ही निभाई,
एक दिन में ही बिटिया कर दी पराई...
पर मैं ना करूंगी, अपनी बिटिया संग ऐसा,
पढ़ाऊंगी-लिखाउंगी, बेटों के ही जैसा..
माना के है मेरा, बड़ा मुश्किल सफर,
फिर भी चलूंगी इसपे ही, हो धूप या बदर...


टिप्पणी:- अगर बेटियों को हक़ दिलवाना है तो ये काम भी बेटियों को ही करना होगा, माँ को करना होगा, बहुओं को करना होगा, जब तक नारी उठ कर बेटी के लिए आवाज़ नहीं उठाएगी, ये सड़ीगली परम्पराएं पीछा नहीं छोड़ेंगी ।


किरण श्रीवास्तव

 "निर्धनता"
-------------------------
अनकही बातें
कुछ फरियादें,
सब बयां करती है...!!
कुछ इच्छाऐं
कुछ अभिलाषाऐं,
दम तोड़ देती है....!!
पशु तुल्य जीवन
निरीह नजरें,
सब बयां करती है...!!
गरीबी का ग्रहण
निगल लेता,
फूल सा बचपन...!!
कमी नहीं ताकत की
हिम्मत और साहस की
पर बेबस और लाचार
पेट की आग ही खास
नहीं कर पाती दुस्साहस
कुछ ख्वाब देखने की....!!

टिप्पणी- इंसान की गरीबी उसकी सारी योग्यताओं को नाकाम कर देती है.....!!!!


Mita Chakraborty  

"मज़दूर औरत "

तन पर मैले कपड़े और
मन पर खुद्दारी का बोझ लिए,
भागती रहती है दिन रात
फ़कत दो रोटी के लिए ।

कभी तन को बचाती,
कभी मन को समझाती हुई।
जीवन के ऊँची निची सड़कों पर,
कभी गिरती कभी संभलती हुई।

खुद की परवाह नही उसे ,
फिक्र अपनों की सताती है।
आग पेट की बुझाने सबके
वो खुद को जलाती जाती है।

सर्दी की ठिठुरती शाम है,
चाहे जेठ की लू भरी दोपहर है
काम करती वो पूरे ईमान से,
उसके लिए न कोई तीज न त्योहार है।

लगन और सहयोग से ही उसके,
महल खड़ा हो पाता है ।
पर उसे ही सर छुपाने के लिए,
छत एक नसीब नही हो पाता है।

फिर भी हार कहाँ मानती है
बाँधकर कलेजे को पीठ से अपने
झाँसी की रानी सी वो
किस्मत से अपने रोज लड़ती है ।।

टिप्पणी : अपने परिवार को चलाने के लिए एक मज़दूर औरत को हर परीस्थिती मे काम करना होता है , उसके लिए हर दिन समान होता है। वह औरों के लिए घर बनाती है पर खुद बेघर रह जाती है।


मीनाक्षी कपूर मीनू 

दर्द
~~~
है दर्द में डूबा हर शब्द हमारा
अब तो है हमें बस इन्ही का सहारा
~~~~~~~~~~~~~~~~~
रोयेगा जब भी ये दिल हमारा
उतारेंगे कागज़ पर हम दर्द सारा
~~~~~~~~~~~~~~~~~
गरजते है बादल तो बरसती है आँखे
चुभते है दिल में फिर यादों के काँटे
~~~~~~~~~~~~~~~~~
समय की धारा तो बहती रहेगी
कुछ न कुछ हमसे वो कहती रहेगी
~~~~~~~~~~~~~~~~~
मगर दर्द दिल का तो बढ़ता ही जायेगा
कागज़ को यूं ही वो रंगता ही जायेगा
~~~~~~~~~~~~~~~~~
फिर एक दिन *मनस्वी*ऐसा भी आएगा
जब दर्द ये हमें इस जहाँ से ले जाएगा
~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उस दिन का है हमें अब इतना इंतज़ार
कि,, ख्याल एक यही अब आता है बार बार
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
ऐ खुदा ! हमारी वफ़ा का कुछ सिला दे
इस दर्द से हमें अब तू मुक्ति दिला दे ,,,
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
टिप्पणी ~~ एक नारी की व्यथा गाथा जिससे उसकी व्यथित मनोदशा का पता चलता है कि कोई इंसान नहीं है जो उसको समझ सके सिवाय उसकी डायरी के जो उसके दर्द की हमनवाज़ है।



डॉली अग्रवाल 

~मुझे इश्क हुआ~

पहले में तुम्हारा दीवाना बना
फिर तुम मेरी जरूरत बन गयी
ओर आज ---
आज मुझे इश्क है तुमसे
तुम्हारे बालों में उतरती चांदी से
मुझे इश्क है उन कजरारी आँखों से ,
जो चश्मे के पीछे से मुझे देखती है ,
बहुत से सवाल पूछती है ,
जीने का हौसला देती है !
मुझे इश्क है ---
चेहरे पे पड़ी झुर्रियों से ,
जो सबूत है -- मेरे साथ हर पल चलने के लिए !
मुझे इश्क है --
उन कमजोर से काँपते हुए हाथो से
जो मेरे हाथ पर अपना हाथ रख कर कहती हो -- में हूँ ना !
मुझे इश्क है ---
घुटनो के दर्द से जो दर्द में भी मेरे लिए चाय बनाने की हिम्मत रखते है !
सुनो
मुझे आदत हो गयी है तुम्हारी , अपनी इन बोझिल सी सासों को जीने के लिए !
मुझे इश्क हुआ
सच मुझे इश्क हुआ !

टिप्पणी --- उम्र दराज होने पर ही अपने साथी के साथ ज़िन्दगी के मायने समझ आते है ! अनजाने में बंधे रिश्ते दायित्व तो पूरे करते है पर इश्क उम्र ढले ही होता है !



Meenakshi Bhatnagar 

~लो सूरज को मैंने हाथों में थाम लिया ~

नक्षत्र ग्रह सब पीछे छोड़े
जन्म मरण के डर के घेरे तोड़े
कर्मभूमि पर आ
मैंने अपने पंखों का आग़ाज़ किया
लो सूरज को मैंने हाथों में थाम लिया

भय हलचल लालच के हर पल को
हराना मैंने सीख लिया
खुद पर विश्वास किया
तू साथ रहा मेरे
मैंने संघर्षों से जीना सीख लिया
लो सूरज को मैंने हाथों में थाम लिया

अहंकार विलाप के फंदों को
आशा के घेरों में बांध लिया
नन्ही-नन्ही आशाओं के बीजों को
अंकुरित करना सीख लिया
लो सूरज को मैंने हाथों में थाम लिया

*सूर्य को हाथों में थामना * कविता में यह प्रतीक ले कर असम्भव और कठिन कार्य करने की चुनौती स्वीकार करने को प्रेरित किया है साथ ही आत्मविश्वास और ईश्वर के साथ का सम्बल लिया गया है ।


प्रभा मित्तल


~~ ये वृक्ष ~~
सुदूर रास्तों पर खड़े
धूप में भी रहे अड़े
मरे नहीं, झुलस गए​
प्रकृति की मार से
बर्फ की बौछार से
ये वृक्ष।

हर पल संघर्ष किया
तूफाँ भी रीत गया
टूटे नहीं,फलते रहे
राही की छाँव बने
दीनों की ठाँव बने
ये वृक्ष।

साँसों की डोर सँभाले
गहन शीत के बीच
हारे नहीं,अनुशासित से
रग रग में जीवन भरते
सूरज की राह तकते
ये वृक्ष।

संकट से लोहा लेकर
लक्ष्य पर अडिग रहें,
पथ-कंटक मिट जाएगा
मग मंजिल तक ले जाएगा
सीख नवजीवन की दे रहे
ये वृक्ष।
...प्रभा मित्तल.

(कितनी भी विषम परिस्थिति हो,मनुष्य को साहस नहीं छोड़ना चाहिए।आशा और विश्वास नवजीवन की राह दिखाते हैं ।जैसे कि ये वृक्ष हरियाली की प्रतीक्षा में घनी बर्फ के बीच भी खड़े तो हैं।)



किरण आर्य 

~हाँ मैंने खुदा को है जाना~


कहते है हम सभी
कि
परमेश्वर एक है
हाँ
वो एक है जिसने
रचा है
इस सृष्टि को
और
बो दिया कण कण में
इसके
अथाह प्यार
प्यार का एक बीज
रोप दिया
मन में उसने
थाम
हाथ मेरा
यकीन जानिये
अभी
जाना है मैंने
पहचाना है उसे
उसके
आपके जीवन में
होने का
चिन्ह है यहीं
वो
बदलता है आपको
बना देता है नम्र
फलदार
वृक्षों के समान
भर देता है
दिल में
प्यार इतना
कि
प्यार का सागर आँखों में
लेने लगता है
हिलोरे
आप नहीं कर पाते
किसी से
घृणा क्रोध या फिर नफरत
बस
हाथ उठा अपने
करते उससे प्रार्थना
कि
खुदा मेरे
भर दे
हर जीवन में
रोशनाई अपनी
भर दे
हर मन के घट को
प्यार से अथाह
कि
पीड़ा दूसरों की
आँखों से
रिसने लगे आपकी
लगा गले सबको
कह पाओ आप
कि
बंधू मेरे मैं खड़ा हूँ
तेरे साथ
और
मेरा खड़े होना यूँ
कर पाना बेहद प्यार
नहीं है
मेरी अच्छाई
क्युकि
पापों का पुतला हूँ मैं
यह
सामर्थ्य है
मेरे परमेश्वर का
हाँ
वो पिता है मेरा
मेरे जीवन का है
वो आधार
और है
मन की यहीं आस
तू बढे मैं घटु
मेरे जीवन से महिमा तुझे मिले *******

टिप्पणी :- खुदा को जान लेने समझ लेने की एक भटकन एक प्यास थी उसे राह मिली जब खुदा को जान लिया उसके प्यार उसके सामर्थ्य को समझा तो जाना उसका प्यार कितना बड़ा ह


कुसुम शर्मा 

माँ की पिटाई
—————-

बहुत याद आती है तेरी पिटाई !
वो बेलन की मार और जूते से धुलाई
चिमटे के पड़ते ही नानी याद आई
झाड़ू से भी तूने की धुलाई !

जब बड़ती शरारत तो होती पिटाई
कभी नम्बरों ने भी हमारी बजवाई
कभी प्यार करती कभी मारती तू
कभी डाँट के कभी आँखें दिखाती
हमे सही राह मे ले कर तू आती

जब से बड़े हुऐ छूट गई तेरी पिटाई
कमाई के चक्कर मे दुनिया भुलाई
अब न तू हमको रोके न टोके
क्यो माँ बड़े होते ही तू हो गई पराई

वो तेरा मारना
मार के फिर आँसू बहाना
गले से लगा कर हमे पुचकारना
बहुत याद आता है बचपन
और बचपन की वो पिटाई !!

टिप्पणी :- जब हम छोटे थे और माँ को बहुत परेशान करते थे तो माँ कभी बेलन से कभी झाड़ू कभी जूता कभी चिमटा ले कर हमे मारने आती थी और मार कर ख़ुद ही रोने लग जाती थी माँ के इन हथियारों से सभी को तो मार पड़ी ही होगी माँ के मार मे भी बच्चे के लिए प्यार छुपा होता है लेकिन जब हम बड़े हो जाते है को माँ की मार और लाड़ से भी दूर हो जाते है फिर हमे रोकने और टोकने वाला कोई नही होता !!



सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Tuesday, May 1, 2018

तकब – ३/१८



तकब – ३/१८ 
मित्रो नमस्कार ! चलिए इस नए चित्र पर अपने भाव कुरेदिए.
नियम :
·         आपके भाव नएशीर्षक के साथ व् टिप्पणी रूप में अपनी सोच को संक्षिप्त रूप में लिखिए.
·         किसी भी काव्य विधा में कम से कम १०- १२ और अधिकतम २४ पंक्तियों में आपको अपने भावों को रखना है. अगर आप किसी नई विधा में लिख रहे हैं तो अवश्य उसका जिक्र करे.
·         कृपया किसी भी सदस्य की रचना पर टिप्पणी रूप में अपनी टिप्पणी न लिखे. यदि आप पोस्ट के संबंध में कोई बात पूछना चाहते है तो अवश्य पूछे लेकिन समाधान के बाद टिप्पणी को हटा लिया जायेगा.
·         निर्णायक मंडल के सदस्य केवल प्रोत्साहन रूप में लिख सकते है.
·         आप अपनी रचना को परिणाम घोषित होने व ब्लॉग में पोस्ट होने के बाद ही अन्य स्थानों पर पोस्ट कर सकते है.
·         रचना प्रेषित करने की अंतिम तारीख २२ अप्रैल २०१८ है.


यही सच्चाई है

सोच ज़रा तू ध्यान से
इसी बात में तेरी भलाई है,
ये जग तो पराया ठहरा,
काया भी साथ ना दे पाई है..

बेफिक्र हो लहराना तेरा यूँ,
किसी भी काम ना आएगा
करले कुछ भले कर्म बन्दे,
वरना पछताता रह जायेगा,
सुंदरता पे अकड़ना छोड़ दे,
देख मुझको, यही सच्चाई है..

कर्मों का हिसाब जब होगा,
जवाब ना फिर सूझेगा तुझे,
गोरा रंग, नीली नीली आंखे
पहचान कौन बुझेगा तुझे
त्याग अब इन इच्छाओं को
आखिर यहां से होनी विदाई है..!! 

नैनी 

टिप्पणी.. कूड़ बुध्दि हूँ, बस इतना समझ आया के इंसान का अंजाम आखिर यही होता है, अपना शरीर भी साथ छोड़ देता है, बस कर्मों का निशान रह जाता है ..!!


एक प्रबोध गीत 
****************************************
ये दुनिया है रैन बसेरा,,,,अंत समय छुट जाएगा !
जिसको तूने अपना समझा,सब यही रह जाएगा !
न तेरा न मेरा, साथी,,,,,,,,,,खाली हाथों जाएगा !!
चाहे जितना, जाल विछाले
चाहे कितना,,,,माल कमाले
रूप रंग सब ,,,,,,,नश्वर जानें 
अंत समय पछताएगा,,,,,,,,,,,,,,,,,,
न तेरा न मेरा, साथी,,,,,, ,,,,खाली हाथों जाएगा !
जिसको तूने अपना समझा,सब यहीं रह जाएगा !! 
भाई बहन ,,;व कुटुंब कबीले
मतलब के सब यार ,,,,रंगीले
लपट झपट कर भइय्या रोवे,
मलता हाथ रह जाएगा,,,,,,,,,,,,,,,
न तेरा न मेरा साथी,,,,,,,,,, खाली हाथों जाएगा !
जिसको तूने अपना समझा, सब यहीं रह जाएगा !!
माटी का ,,,,ये बना हिंडोला
जिसमें सोता, प्राण अकेला 
जिस दिन टूटा ,माटी खोला
प्राण-विहग उड़ जाएगा, ,,,,,,,,,,,,,,,
न तेरा न मेरा साथी,,,,,,,,,,,,, खाली हाथों जाएगा !
जिसको तूने अपना समझा,सब यहीं रह जाएगा !!
*********************************
साहित्यकार

टिप्पणी.. ~~~शरीर नश्वर है मृत्यु सत्य है मनुष्य इस सच्चाई को जान नही पाता !,,,,ये कंकाल इसी सत्य का उद्घाटन कर रहा है,,,,,

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल   प्रोत्साहन हेतु

सुन इंसान ..

देख नहीं सोच 
आधुनिकता की दौड़ में 
वक्त से 
आगे निकलने की होड़ में 
खुद को तूने 
कितना उलझा लिया है 

मैंने भी 
अपने से ही और 
हर रिश्ते से 
कर लिया था किनारा 
कल और कल के लिए 
आज को जीना छोड़ दिया था 

आज कंकाल बन कर जाना 
तब भी हाड़ मास का पुतला था 
मौत ने जिसे दिया झुठला 
बस आज यही कहना है 
खुद भी जी और अपनों को भी 
जीने दो बन कर इंसान 

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

टिप्पणी : इंसान को आज में जीना और अपने लिए और अपनों के साथ जरूरी है न कि बीते कल और आने वाले कल के लिए.


ज़िन्दगी

सवालों के कटघरे में 
जवाबों को तलाशती ज़िन्दगी 
मुर्दा सी अधखुली आंखों में 
एहसास ढूढ़ती ज़िन्दगी 
शतरंज की बिसात पर 
नाकाम हसरतों को दांव पर लगाती ज़िन्दगी 
आधी - अधूरी कहानी के 
किरदारों सी उलझती ज़िन्दगी 
और क्या
कहा है ज़िन्दगी !! 

टिप्पणी : मायूस ज़िन्दगी से उठते कुछ सवालों को लिए ज़िन्दगी , जिसकी मौत निश्चित है फिर भी उलझा हुआ है हर एक !!


अलका गुप्ता 
***********
"कंकाली मुक्तक "
^^^^^^^^^^^^^^
~~(1)~~

देख लो..कंकाल..ये पड़े..बेताल से !
जीर्ण शीर्ण रुंड मुण्ड काय बेहाल से !
गाएं अब ये क्या भला गीत जिंदगी के !
शेष..निःशेष कंकड़ ये कल्वित काल से !!

~~(2)~~

भूल पाते क्यों नहीं पुरातन कलंकित बातों को ! 
याद रखना ही उचित है स्वर्ण सी सिर्फ यादों को !
उखाड़ कर गढ़े मुर्दे कोइ लाभ तो होता नही.. 
सार्थक करलो हौसलों से पूर्ण नेक इरादों को !!

~~(3)~~

सकारात्मक..मन जैसा ।
करें ..हम ..सत्कर्म वैसा।
बोझ न जीवन बन जाए ...
करें सुमंगल.. कुछ ऐसा !!


नोट _
कंकाल को देख कर विचार आया कभी यह भी एक इंसान होगा ! यानि एक मनुष्य का जो आज है कल उसी की तरह व्यर्थ हो जाएगा ...
दूसरे मुक्तक में...यही विचार प्रेषित करना चाहा है इस जीवन काल में आज समाज और देश के लिए इतिहास की गौरव शाली बातों से सबक लेकर हितकारी करें ..न कि अपने पूर्वजों की गलतियों को याद कर उन्हे कुरेद कर आज की पीढयों को उनके दोषारोपण से लाँच्छित करें !
तीसरे में यही कि आज कुछ अच्छा उचित करें जिसको हमारी आत्मा स्वीकार करे सच्चे मन से ।


"जीवन- मृत्यु"
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देखके मुझको क्यों घबराया,
जीवन क्या है.?समझ में आया,
सबकी गति यही है प्यारे,
जिंदा तब तक वारे न्यारे...!

खाया पीया जमा किया,
मेरा- मेरा यही किया,
इतना तो तू सोच ले प्यारे
आया था तू खाली हाथ-
खाली हाथ ही जायेगा,
आन बान और शान 
तुम्हारा यही धरा रह जायेगा...!!

बीत गया गर समय तुम्हारा,
पीछे फिर पछतायेगा,
कुछ भी जुगत लगाओगे
पर वापस ना वो आयेगा,
सद्गुण और सत्कर्म 
तुम्हारा ही जिंदा रह पायेगा....!!!

टिप्पणी-
शरीर नश्वर है सर्व विदित है।इंसान को अच्छे कर्म जरूर करनें चाहिए ताकि लोगों के दिलों में जिंदा रहे....।


अटल सत्य

सब देख मुझे क्यूं डरते है,
डर तो जिन्दा इन्सानों से।
जो अपना-पराया करते है,
हर बात पे सौदा करते है।
मैं तो बस एक निरा कंकाल,
भीतर-बाहर सब एक समान।
ना जीव जगत से मोह मुझे,
ना लोभ लाभ का मुझे ज्ञान।
ना मेरा कोई धर्म यहां,
ना जात पात ना वर्ण कोई।
ये तो बस महज खिलौने है,
है जिनमें उलझा हर कोई।
रे मानव! तू क्या देखता है?
तेरे अन्दर भी मैं ही हूं।
बाहर से कितना भी सज ले,
अन्दर का पंजर मैं ही हूं।
है नहीं सत्य का ज्ञान तुझे,
बस बना बावरा फिरता है।
मैं अटल सत्य पहचान मुझे,
जो पहचाने वो तिरता है।

टिप्पणीः आज का मानव सांसारिक चकाचैंध में इतना उलझ गया है कि उसे वास्तविकता का कोई ज्ञान ही नहीं है। धर्म, जाति, पैसों के चक्कर में वो यह भूल गया है कि अन्त सभी का एक ही है।

पिंजर -वज्र या कंकाल ;
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देह नहीं विदेह नहीं ,हूँ तेरा ही पिंजर मैं। 
मोह- मद में डूबी जो ,उस देह का अवलम्बन मैं।।
मानुस तू मिटटी का लोंदा ,मोह जलधि से घिरा हुआ।
पिंजर मैं आलंब न होता ,तेरा कुछ आकार न होता।।
एक ही झिरमिर में बरखा की ,मिट्टी गल कीचड़ बन जाती।
मैं -मेरा सब घट का पर्दा ,अंदर खाली -मीन पियासी।।
देह तुझे यह मृगतृष्णा सी , भटकाती कह मैं और मेरा। 
नाव फंसी है बीच भंवर में ,क्या होगा ये भान नहीं कुछ।।
ये तन विष की वल्लरी है रे ,माखी सम गुड़ में लिपटा तू। 
आत्मा मुक्ति को ही तरसे , 'मैं ' लालच भंवर में घूमे।।
पिंजर भी कब साथ रहेगा ,ये भी तो क्षण-भंगुर रे। 
चाबुक जम (यम ) की जब पड़ेगी ,पिंजर भी मिट जाएगा।।
अंतिम सत्य वो ज्वाल रथ है ,ख़ाक बचेगी बाकी रे। 
अनदेखी आत्मा जायेगी ले कर्मों की थाती रे।
सच्चा मन हो ,सच्चे करमा ,सच्चा यदि अंतर् होगा। 
जाननहारा सब जानेगा ,बाहर नहीं कहना होगा।।
पिंजर से तू ना डर मानुष ,भूत - भविष्य तो मैं ही हूँ। 
दधीचि सम मेरा वज्र बनाले

कंकाल मान न डर तू रे ।। आभा।।
टिप्पणी :- -----"कंकाल" हमारी असलियत -इसे मैं मेरा की देह का रोगी शरीर दे विटामिन डी की कमी वाला भुरभुरा कंकाल बना लें या फिर दधीचि की सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय तपस्या देकर -आसुरी शक्तियों के लिए आयुध बना लें -ये हम पे निर्भर है-


प्रभा मित्तल ~~~~~~
~~
झूठी माया ~~
~~~~~~~~~~~~~
झूठे जग के बन्धन सारे,
निश्चय झूठी जग की माया।

सत्त्व अमर अन्तर का तजकर,
पोष रहे क्षण भंगुर काया।

मानस चञ्चल औ अस्थिर धी,
तिस पर भी कुछ काम न आया।

पाप निरत निर्लज्ज निपट बन,
शुद्ध सनातन सत्य गँवाया।

लुप्त हो गई मन की शान्ति,
तिस पर भी क्लान्ति की छाया। 

जो कुछ पाया था धरणी पर,
छोड़ चला कुछ हाथ न आया।

ये तेरा ये मेरा रटते - रटते,
यौं सारा जीवन व्यर्थ गँवाया। 

प्राण - पखेरू उड़ जाएगा
विस्मृत होगी कञ्चन काया।

अस्थि - पंजर जल जाएगा
संग न देगा अपना भी साया।

किस मद में डूबा है बन्दे !
क्यों तूने पुरुषार्थ भुलाया।

कब अन्तर में तूने करुणा का 
पावन निर्मल स्रोत बहाया।

अवलम्बन ले प्रभु का जागो,
विस्तृत जिसने विश्व बनाया।

मूक-बधिर सा क्या लख रहा पगले !
कण-कण में व्याप रही उसी की छाया।

श्रद्धा से सद्धर्म वरण करें सब, सत्कर्म करें,
तब ही समझो जीवन सफल बनाया।

टिप्पणी :- (तेरा- मेरा करते करते मोह माया के जाल में फँसकर मनुष्य सारा जीवन व्यर्थ ही गंवा देता है।जो कुछ सञ्चय किया यहीं रह जाता है,साथ जाता है केवल पुरुषार्थ,सद्धर्म और सत्कर्म।जिस दिन प्राणी ये समझ जाएगा जीवन तर जाएगा।)


कंकाल रूपी आदमियत
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देख तुझे यूँ 
सहम सा गया ..
फिर अचानक 
कुछ स्मृत कर 
ठहर सा गया ..
कभी देखूं तुम्हे 
तो कभी निहारूं 
मैं खुद को..
मैं भी तो तू 
आज हो नही गया..
क्यों डरूँ मैं 
हाँ , क्यों डरूँ मैं तुमसे
मैं भी तू आज
तू भी तो मैं आज
हो सा गया ....
हाँ ,,, मनस्वी ,,, हाँ
बस नज़र गहराने
की देर है ,,,
फिर अंदर की
चमड़ी गलाने की
फिर क्यों डरूँ मैं
हाँ ,क्यों डरूँ मैं
मैं अब तू ,,
तू मैं हो गया
सबकी नजर 
पारखी नज़र
घर संसार में
दुनियादारी में
पिसता मैं ^आदमी^
आज कंकाल सा
हो तो गया ... ( मनस्वी )


टिप्पणी ...आज का मानव अपनी भागदौड़ भरी ज़िंदगी बहुत से अभावो में , प्रभावों में और मुश्किलो से गुज़ार रहा है कि चाहे अमीर हो या गरीब सबकी अपनी अपनी दोहरी ज़िंदगी है जो कहीं उसकी असलियत को कोट पैंट में तो कहीं सादा कपडों में ढकने की कोशिश करती है और कामयाब भी होती है लेकिन इस मानव मन का क्या करें वह दूसरों से तो ढके मगर खुद की नज़रों से कैसे बचें जो उसे देख रही है कंकाल की शक्ल में गलता सड़ता हुआ .. https://static.xx.fbcdn.net/images/emoji.php/v9/fe/1/16/1f622.png😢फिर भी है सभ्य शालीन मुस्कान से लिपटा हुआ ।


तेरा ही साया हूँ मै 
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देख के मेरी परछाईं ,क्यो मानव भयभीत हुआ !
तेरा ही तो साया हूँ मै, मुझसे क्यो अंजान हुआ ! 
हाड़ मास का पुतला बन कर, इस जग मे तू आया !
भरा अग्न और नीर जब तुझमें, तब ही तो तू इंसान कहलाया !
पहना के चोला मानव का , तू इस जग मे भरमा गया !
तेरे मेरे के चक्कर मे, पड़ कर ख़ुद को ख़ुद से भूल गया !
पंच तत्व का तेरा शरीर, पंच तत्व मे मिल जायेंगा !
नाते रिश्ते छूट जायेंगे, कोई काम न आयेगा !
क्या लाया था, क्या ले जाये ,
साथ तेरे इस जग से कुछ न जाये ,
अब भी समय बचा है प्यारे, छोड इस मोह माया को !
जप ले राम नाम अब तू , गर भव सागर से तरना हो !
न कर अभिमान अब ख़ुद पर , गर परमात्मा से मिलना हो ! 
मोक्ष मिलेगा तुझको मै मिट्टी बन जाऊँगा !
कंकाल हूँ तेरा तेरे साथ ही जाऊँगा !

टिप्पणी :- मनुष्य जब तेरे मेरे के चक्कर मे पड़कर अपने वास्तविकता को भूल जाता है तो उसका कंकाल उसे वास्तविकता का भान करवाता है कि वो क्या है जिसे वो अपना समझ रहा है वो उसका है ही नही , पंच तत्व का शरीर पंच तत्व मे विलीन हो जायेगा केवल उसके अच्छे या बुरे कर्म ही उसके साथ जायेंगे ! परमात्मा के नाम लेने से ही उसको इस जीवन से मुक्ति मिल सकती है !


खनकती सभ्यता में आदमी
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हाड़ मास का पुतला से कंकाल बनने तक
जितना भी समय रहा
लगाया खुब दौड़
अपने लिऐ
और इस खनकती सभ्यता में
डूबा रहा इतना
कि ले न सका था कभी खबर अपनो की
कभी नही गुनगुना पाया प्रेम गीत
.

मेरे बन्धु !
मेरे कंकाल बनने के ठीक पहले
मुझे पता चला कि
जो दुसरों के लिऐ कुछ नही कर सकता
वह कंकाल ही तो है
आज मै कंकाल बन चुका हुँ .

मेरे बन्धु !
इस खनकती सभ्यता में
तुम भी मत उलझ जाना .


(
टिप्पणी :- - इस खनकती सभ्यता में आदमी उलझ कर अपना कर्त्तब्य भुल जाता है | अपने सगे सम्बन्धियों को भुल जाता है |)


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