Thursday, May 23, 2013

20 मई 2013 का चित्र और भाव





Rohini Shailendra Negi 
"रिक्त हथेली"
ये स्पर्श बूंदों का,
टिप-टिप कर,
मेरे हाथों पर गिरना,
कभी तीव्र तो,
कभी मद्धम-मद्धम,
मेरी हथेलियों पर,
टपकना |

मुट्ठी मे,
बंद कर लेने को,
अब तो जी चाहता है,
हरदम,
आज नाचने को,
जाने क्यों,
फिर करता है,
ये मेरा मन |

खिड़की पर,
बैठे-बैठे मुझको,
कितना इंतज़ार,
कराती हैं ये,
देख नहीं सकता,
इनको मैं,
तभी शायद,
रुलाती हैं ये |

देखूँ तो सही,
इनमे ऐसा क्या है,
छू कर तो,
महसूस करूँ,
अन्यथा सर्र से,
फिसल जाएंगी,
जल्द ही,
फिर रिक्त हथेली,
सँवारता रहूँ |


भगवान सिंह जयाड़ा 
रिम झिम रिम झिम बरसा सावन ,
ठंडी फुवार यह अति मन भावन ,

मिट गई अब, धरती की तपन ,
उमड़ घुमड़ कर अब आया सावन ,

इसे देख करता है ,मेरा भी मन ,
इन फुहारों से भिगा लूं सारा तन ,

गरमी से अकुलाये धरती के जन ,
भीग कर सकुन पायेगा यह मन ,

धरती में अब छाएगी हरयाली ,
झूम उठेंगी अब सब डाली डाली ,


नैनी ग्रोवर 
ठंडी-ठंडी सावन की बूंदे
लो धरती पे आईं
चरों और महकी सृष्टि
मौसम ने ली अंगड़ाई ..

भीगी-भीगी हर डाली है
भीगा है हर आँगन
जाने कब घर आयेगा
मेरा भी मनभावन
पपीहे की भी प्यास बुझी
ना मेरी बारी आई..

कोयल कूकी, मयूर भी नाचे
कलकल बहने लगीं है नदियाँ
इन्द्रधनुष की ओड़ के चूनर
खिल गई अम्बर की बगिया
घन घन करती शोर मचाती
काली घटा है छाई....!!


जगदीश पांडेय 
प्यास धरा की है बुझा रहा देखो ये बादल
समेट हथेली में बूँदे हो जाउँ मैं भी पागल
यूँ बिलखनाँ आसमाँ का धरा सह न सकी
बोल दी बात दिल की जो वो कह न सकी
कि-
अपनी आँखो से अश्कों को बरसनें न दो
मोती अनमोल हैं ये इन्हें बिखरनें न दो
जब कभी बिखरे तो मुझे याद कर
थाम लुंगी हथेली पे न इंकार कर


डॉ. सरोज गुप्ता ...
एक हथेली मोतियों से भरी
~~~~~~~~~~~~~~~~
ठंडी-ठंडी ये बूंदे ,मेरी हथेली पर कूदे !
मुट्ठी बंद कर लूँ ,तुझे अंग अंग में भर लूँ !!

मचल-मचल गिरे बूंदे,पीहू पी-पी की रट बांधे !
आँखों-आँखों रात पार की,फिर आई बरसाते !!

ठंडी-ठंडी ये बूंदे , मेरी हथेली पर कूदे !
मुट्ठी बंद कर लूँ ,तुझे अंग अंग में भर लूँ !!

छम-छम ये बूंदें ,अटखेली भर कूदें !
प्रकृति का देख राग-रंग उड़े मन परिंदे !!

ठंडी-ठंडी ये बूंदे , मेरी हथेली पर कूदे !
मुट्ठी बंद कर लूँ ,तुझे अंग अंग में भर लूँ !!

नन्ही-नन्ही ये बूंदे, अम्बर का रास्ता फांदे !
तपती धरा कर शीतल दिखाए अपने फायदे !!

ठंडी-ठंडी ये बूंदे ,मेरी हथेली पर कूदे !
मुट्ठी बंद कर लूँ ,तुझे अंग अंग में भर लूँ !!

गीली-गीली ये बूंदे , भीगे- भीगे सारे बंदे !
भीगी धानी चुनरिया,उलझ गए सारे फंदे !!

ठंडी -ठंडी ये बूंदे ,मेरी हथेली पर कूदे !
मुट्ठी बंद कर लूँ ,तुझे अंग -अंग में भर लूँ !!

हँसी-हंसी सी ये बूंदे,मचल-मचल कर बरसें !
कागज की कश्ती बिठाया,आँख-मिचौनी खेले जैसे!!

ठंडी -ठंडी ये बूंदे , मेरी हथेली पर कूदे !
मुट्ठी बंद कर लूँ ,तुझे अंग अंग में भर लूँ !!


अलका गुप्ता 
समेट लूँ बूंदों को इन बारिस की |
उमड़ी अभिलाषा अंतर-शिशु की ||

बचैन आह ! उमस की मर जाय |
बारिश की बूंदों से हर मन हर्षाए ||

काले-काले .....बदरा आये |
झीनी-झीनी .....वर्षा लाए ||

भीज-भीज हर मन अकुलाए |
पीया मिलन को आस जगाए ||

गंध भीगी मिट्टी की सोंधी सी
दिशा -दिशा को .... महकाए ||

पवन पुरवाई मधुर संगीत सुनाए |
धुली-धुली सी हरियाली मुस्काए ||

हर मन हर्षित नृत्य उल्लास भरे हैं |
कागज के भी... देखो ! ..जहाज चले हैं ||

नवांकुर से फूटे ...नदी-ताल भरे हैं |
नव गीतों से धरती के हर प्रान भरे हैं ||


Garima Kanskar 
पहली बारिश की बूंदों
को हथेली में लेकर
खेलने का करता है मन
कुछ बूंदे बड़ी कुछ छोटी
जैसे ही पड़ती है हथेली पर
होती है अजीब सी ख़ुशी
इस ख़ुशी का कैसे
लफ्जों में इजहार करू
मन करता है
इन बूंदों को अपनी
मुट्ठी में भरकर
रख लू अपने पास
पर ये बूंदे
छूकर हथेली को
चुपके से चली जाती है
लाख करो समेटने
की कोशिश
हर कोशिश व्यर्थ
चली जाती है
जैसे ही पड़ती है नजर
खाली मुट्ठी की तरफ
सारी ख़ुशी मुझसे
दूर चली जाती है
गरिमा कान्सकार


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
~बरखा की बूंदे ~
बरखा की ये बूंदे
हथेली पर पड़ते ही
तेरा अहसास दे गई
तन मन मे मेरे
राग प्रेम का छेड़ गई

रिमझिम बरखा मे भीग रहा
तेरे ही ख्याल मे जी रहा
रोम रोम जैसे महक रहा
हर भाव तेरा गुदगुदाता रहा
तन मेरा हर बात सुन रहा

नाच उठा मेरा अंग अंग
मानो तुम तुम संग संग
अहसासों की होने लगी जंग
प्रीत के सिमटने लगे फिर रंग


किरण आर्य
बारिश की फुहार
तप्त हथेली पे पड़ते ही
अहसासों से तेरे गई भीग
हाँ वैसे ही जैसे मन मेरा
भिगो जाता तेरा नेह और क़रार
रूह मेरी थी बेक़रार और
तेरा प्यार फुहार सा जब
रूह के रेगिस्तान को भिगो गया
एक सौंधी सी खुशबू
बस गई रूह में जो
आज भी है मदमाती
मेरे तन मन को और
अहसासों में भी जी लेती हूँ
एक जिंदगी संग तेरे आज भी
और तन मन मेरा भीग
पुलक उठता है प्रेम फुहार मे
सिमट जाती अंक में तेरे
वैसे ही जैसे सिमट गई
बरखा की बूंदे हथेली पे
भिगो गई तन बदन और अंतर्मन
बरखा की फुहार से बसे
प्रिय तुम मन में मेरे आज भी


सुनीता शर्मा
धरती हो रही लहुलुहान निसदिन ,
बढ़ रहा कत्लेआम दिन ब दिन ,
आसमान का ह्रदय फट गया
रो रहा अब उसका भी अंतर्मन !

लाल लाल धरती को धोने बरखा आई ,
बारिश नहीं ये तो वक्त के नयन भर आई ,
इस हिंसात्मक संसार में जीवन मात्र खिलौना भर ,
इस धरा पर कभी टिकने वाली ख़ुशी की घड़ी न आई !

इस धरा पर खाली हाथ आये सब ,
इस संसार से खाली हाथ जायेंगे सब ,
पल पल बरसती बूंदों में ,
पढ़ सको तो पढ़ लो जीवन सार सब !


बालकृष्ण डी ध्यानी 
बूंदा बूंदी

बूंदा बूंदी बरसातों की
एक बूंद पड़ी मेरे हाथों पे

पड़ते पड़ते वो कह गयी
नम सी लगी वो बूंदा बूंदी पानी की

छम छम छम गयी
दिल पर जम गयी बूंदा बूंदी पानी की

हाथों पर लपकी वो ऐसे
छपकी हो झपकी हो जैसे बूंदा बूंदी पानी की

हथेली पर और वो अश्रू की धार
गिरी वो आकाश से कुछ ऐसे आज बूंदा बूंदी पानी की

कोई राह देखे मन बिरहा जैसे
रिम झिम राहों पर कतार बूंदा बूंदी पानी की

बूंदा बूंदी बरसातों की
एक बूंद पड़ी मेरे हाथों पे



सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Monday, May 20, 2013

11 मई 2013 का चित्र और भाव




नैनी ग्रोवर
क्या करूँ मैं बैठा -बैठा,
फेसबुक ही अपडेट करूँ ..
कुछ अपने यार दोस्तों से,
थोडा मैं भी डिबेट करूँ ..

एक फ्लेवर नया नया,
पेडीगिरी का आया है ,
कंपनी कह रही है देखो,
आम उसमें मिलाया है,
मैं तो मिनट भर में ही ,
सफाचट अपनी प्लेट करूँ ..

कुछ अपने यार दोस्तों से,
थोडा मैं भी डिबेट करूँ ..

गर्मी का मौसम है आया,
बाहर जाना मुझे सुहाता नहीं,
बिना कूलर और ए सी के ,
कुछ भी मुझको भाता नहीं ,
कर कर के मैं लाइक कमेन्ट,
बार बार उन्हें डिलेट करूँ ..

कुछ अपने यार दोस्तों से,
थोडा मैं भी डिबेट करूँ .....!!


केदार जोशी एक भारतीय 
सारा चक्कर है लैपटॉप और कंप्यूटर का ,
में भला कैसे इस से दूर रहू .

में हु लोहा ये है चुम्बक ,
कब तक इस से दूर रहू

लोग घंटे बिजी रहते है इस में ,
सौचता हु एक आध घंटे में भी पास रहू ..

आखिर ये पूरा खेल है टेक्नोलॉजी का ,
में भला कैसे इस से दूर रहू .


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~गाली मत देना~
हे इन्सान! कुत्ता कह कर गाली मत देना
नज़र उठा आँखों में चढ़ा चस्मा देख लेना
तेरे कर्म से वाकिफ है आजमा कर देख लेना
स्वामीभक्त कैसे होते है, ये हमसे सीख लेना

हर भाषा जानते पर एक जुबान में उतर देते है
जंग हो या अभिनय हम तुम सा हौसला रखते है
प्यार करो या दुश्मनी हम भी निभाना जानते है
वफदारी फितरत है दुश्मन को खदेड़ना जानते है

इन्सान तो अब मिलना छोड़ कंप्यूटर से चिपके है
अच्छा बुरा प्यार दुश्मनी सब कम्यूटर पर करते है
बतलाए तुम्हे हमने भी अब कंप्यूटर गुर सीख लिए है
तुमसे मिलने फेसबुक पर रोज स्टेट्स अपडेट करते है


Govind Prasad Bahuguna 
अब डॉग पर ब्लॉग लिखने का जमाना है
डॉग की महिमा अपार है
घर से लेकर स्वर्ग के द्वार तक
पितृपक्ष में भी आमंत्रण के योग्य
स्वामिभक्ति के लिए स्मरण किये जाने योग्य
अपने कर्तव्य पर चौकन्ना
कहते है कि आप संबिधान के "वाचडॉग" हो
कोई गलत करेगा तो आप उस पर भोंकोगे
नहीं मानेगा तो उसको काटोगे
आप विद्यार्थी हैं तो आपकी निद्रा डॉग की तरह होनी चाहिए
आप जासूस हैं तो डॉग की तरह सूंघिये
चोर की नब्ज ढूंढिए
अब आदमी से भरोसा उठ गया
और डॉग पर भरोसा बढ़ गया I
फैशन में एक ज़माना था डॉग कालर का
"स्वामी की आवाज' में बोलने वाला डॉग
संगीत की दुनिया में चर्चित हुआ-अब स्लम डॉग नाम से पुरस्कृत हुआ
और क्या क्या कहें हम डॉग की तारीफ़ में ...


प्रभा मित्तल 
भई वाह ! आज ये मेरे हाथ लगा है
जब मालिक घर से चला गया है
रोज देखता हूँ..बूढ़े बच्चे और जवान
इसी से चिपके रहते हैं दिन तमाम
गली-क्रिकेट ,कँचे, गुल्ली-डंडा,
पिट्ठू-गरम ,खो-खो और लँगड़ी-टाँग
भूल गए सब कहाँ रहे अब इनके नाम।

ऐसा क्या है इस डिब्बे में,
जिससे मैं हूँ अब तक अनजान,
ये क्या घूम रहा है गोल गोल
क्या ढूँढ रहा है इसका काम।

बिन तनख्वाह के रहता हूं
नाइट ड्यूटी भी करता हूँ
एलटीसी,होम टाऊन नहीं मिलता
स्वामीभक्त हूँ,
कुछ तो सुविधा मिले मुझे भी
लैपटाप लिए बैठा हूँ,
फ्रैंड्स सर्च कर लेता हूँ।

दुनिया आगे बढ़ी जा रही
अब मैं भी पीछे नहीं रहूँगा
डब्बू भोटू चिंकी डिंकी हैप्पी
सबसे मिल इसपर चैट करूँगा

मेरे भी संगी साथी बनकर मॉड
बंद हो गए ए सी वाले महलों में,
तरह-तरह की ड्रैस पहनकर
पैडिग्री खाँए सुन्दर प्यालों में।

मैं करूँगा ऑनलाइन शॉपिंग आज,
टी-शर्ट जींस जेबॉन्ग से ऑर्डर कर
फ्लिपकार्ट से ए.सी. भी मँगवाऊँगा
धूप से तपते दड़बे में ठंडक कर
कुछ तो गर्मी से राहत पाऊँगा।


दीपक अरोड़ा 
वाह, ये है फेसबुक फंडा,
अब तक था मैं इससे अनजान
अब मेरे भी होंगे मित्र
सबसे होगी यहां पहचान... दीपक


भगवान सिंह जयाड़ा 
लैपटॉप पर देख अपनी फोटो ,
कुत्ता मन में कुछ यूँ चौंका ,

पहले तो देखा गौर से उसको ,
फिर वह जोर जोर से भौंका ,

निकाल कर अपना चश्मा ,
खूब रगड़ कर उसको पोंछा ,

पहन कर नजर का चश्मा ,
फिर मन में गहराई से सोचा ,

दोस्त बना लूं अपने भी आज ,
क्या खूब मिला है यह मौका ,

देख ढेरों नस्लों को वह अपनी ,
अनेकों रंग रूप देख फिर चौका ,

सोचा हम तो अच्छे है इन्शान से ,
नहीं देते कभी किसी को धोखा ,

देश भेष अलग है हम सब का ,
बोली गुण दोष एक हैं सब का .

बफादरी की मिशाल हम से है ,
जो इन्शान भी नहीं निभा पाता ,

लैपटॉप पर देख अपनी फोटो ,
कुत्ता मन में कुछ यूँ चौंका ,


जगदीश पांडेय 
मैं भी अब प्यार करुंगा अपनीं चाहत का
इजहार करुँगा
बस मिल जाये कोई मुझे भी आँखें उससे
दो चार करुंगा
फेसबुक है निराली दुनियाँ मित्र निवेदन
हर बार करुंगा
चाहे न अपनाए कोई मुझको लेकिन सब पे
ऐतबार करुंगा
मैं भी अब प्यार करुंगा अपनीं चाहत का
इजहार करुँगा
मासुम जानवर मैं हूँ इंसान पर तेरे जैसा
मैं फेक नही
सूरत नही प्यारी मेरी पर मेरे जैसा कोई
नेक नही
मित्र निवेदन करे स्वीकार कोई संग वादा
सौ बार करुंगा
मैं भी अब प्यार करुंगा अपनीं चाहत का
इजहार करुँगा


Rohini Shailendra Negi
"टायसन"
अब ये दौर कितना प्रसिद्ध हो चला है,
तस्वीर देख कर तो ये सिद्ध हो चला है,
आँखों मे चश्मा, पंजों पर "की-पैड" है,
"डौगी" को देखो करता ये "चैट" है |

मेरा "टायसन" इतना एडवांस है,
"फ़ेस-बुक" पर लेता चान्स है,
"फिमेल फ्रेंड्स" से करता "रोमांस" है,
तभी तो इसका अपना "ग्लान्स" है |

न जाने आजतक कितनों को पटाया है,
"फ्रेंड-रिक्वेस्ट" भेज कर कितनों को सताया है,
"कनफर्म" किया तो समझो बात बन जाएगी,
गर नहीं किया तो कोई दूसरी "लाइन" पर आएगी |

दिन मे उसके पास फुर्सत के यही पल खाली हैं,
क्योंकि......रात "घर" की करनी भी तो रखवाली है,
अपना काम निभाना वो बख़ूबी जानता है,
तभी तो सारा "ब्लौक" उससे थर-थर काँपता है |


उदय ममगाईं राठी 
देख स्टेटस ऑनलाइन मालिक का रह गया कुत्ता दंग
बीस बरस से बने तपस्वी फेसबुक ने कर दिया भंग
तकनिकी की इस दौड़ में हम भी किस्मत आजमायेंगे
बफादारी के इस बंधन तोड़ के कब हम खुद को जगायेंगे


ममता जोशी 
बहुत कर ली है चौकीदारी ,
मैं भी सीखूंगा अब दुनियादारी,
अब अपनाऊंगा ये नया ट्रेंड,
बनाऊंगा मैं भी ऑनलाइन फ्रेंड ,
पहले दरवाजे पर लेता था अजनबियों को रोक ,
लेकिन अब फेसबुक में करूँगा दोस्तों को पोक,
सुबह हो शाम या फिर दिन हो या रात,
अब तो फेसबुक में ही लिखूंगा अपने दिल की बात ....


अलका गुप्ता .........................
मैंने भी अब बना लिया है फेसबुक पे एकाउंट |
आओ मित्रों भेजो मुझे अपनी-अपनी रिक्वेस्ट |
देखो मैंने अपना चश्मा भी अब चढा लिया है ...
मैं भी जानू तुममें है वफा की कितनी अमाउंट ||


Neelima Sharrma 
कुछ महीने पहले की बात हैं
फेस बुक हमारा हम पर चिल्लया
की एक आग्रह मित्र का आया
मुझे भी मित्र बनालो
सन्देश इन बॉक्स खिसकाया
बच्चो की फोटो से सजा था था प्रोफाइल
हमने भी स्वीकारी उनकी गुहार कह कर भाई
हर स्टेटस में लाइक था उनका आता
हर कविता उनको हमारा लिखा था भाता

कुछ ही दिनों में अपना रंग देखाया
हम हैरान कुछ समझ नही आया
अजीब सी उनकी बाते थी
बात करने की जिद भी होने लगी
फ़ोन नंबर दे दो अपना की रट पर
अपना संयम मैं खोने लगी

जब एक दिन हमने उनके अबाउट पर गौर फ़रमाया
लिखे पेज देख के उनके हमारा सर चकराया
ऐसे ऐसे पेज उनके अच्छे अच्छे शरमा जाये
अब हमारे दीमाग में कुछ विचार आये

उनके प्रोफाइल का लिंक हमने सहेलियों कोबतलाया
देखो एक कुत्ता फेक प्रोफाइल बनाकर कुंठा शांत करने आया

सबने मिलकर उसको रिपोर्ट किया फिर ब्लाक किया
कम से कम यहाँ से एक कुत्ता तो कम किया
तो भाई और बहनों अब मित्र शामिल करो तो देखभाल कर करना
शा मिल हो जायेगा आपकी लिस्ट में एक कुत्ता वरना


Garima Kanskar 
सबको देखता हूँ मै
बस में ट्रेन में
ऑफिस में घर में
सब लेपटाप में
नजरे जमाये होते है
ऐसा क्या है इसमे
सोचता हूँ
मै भी तो देखू
एक बार
तो क्या था
चढ़ा लिया चश्मा
और बैठ गया
लेपटोप लेके
इसे ओन किया
और देखा
कितनी सुंदर है
इन्टरनेट की दुनिया
सच यहाँ आ जाओ तो
किसी को किसी की
सुध नही
सब कुछ मिल
जाता है यहाँ
ज्ञान के साथ
दोस्त भी
सचमुच इंटरनेट
की दुनिया बहुत
ही प्यारी है
आपको भी अच्छी
लगती है न
मुझे भी भा गई
इन्टरनेट की दुनिया



Bahukhandi Nautiyal Rameshwari 
इंसानी संगत का असर देखिये ..
कंप्यूटर चला रहा हूँ ..
रह गयी कितनी कसर देखिये ...
इंसानी नमूने साँझा कर रहा हूँ ..
पसंद आये तो क्लिक कीजिये ..
होम डिलीवरी करवा रहा हूँ ..
पसंदगी पर मोहर कीजिये ..
इनकी दूम नदारद है हुजुर !
मेरी वफादारी पर शक न कीजिये ..
कहो तो ....
सौ में निनानवे बेईमान ..
फिर भी मेरा भारत महान ..
का नारा इनकी जुबानी सुन लीजिये ....
टैग कर इंसानी तसवीरें भेज रहा हूँ ..
भिन्न२ जाति के इंसान सहेज रहा हूँ ...
..

कुसुम शर्मा 
चश्मे पहन कर टौमी आया
आते ही कंप्यूटर खोला
कंप्यूटर खोलते सोच रहा वो
खोलनी है कितनो की पोल
कंप्यूटर राजा तू ही बोल

पहले सुने देश विदेश का हाल
फिर लगाके उसमे विराम
फेसबुक का खोल के पेज
लिखने बैठा मन का भेद

बैठे बैठे सोच रहा वो
क्या कलयुग है आया
जिसने इन्सान को भी
जानवर है बनाया

कोई किसी को काट रहा है
कोई किसी पे भोंक रहा है
इनसे तो अच्छे है हम
जिस घर का खाते है हम
उस पर जान लुटाते हम
कभी पीछे से वार न करते
रहेगे हम सदा वफादार
यही है हमारा विचार


किरण आर्य .
इंसानी फितरत का असर
कुछ मुझपे भी छाया है
आज मैंने भी लैपटॉप पर
फेसबुक चलाया है
वाह ये दुनिया
अज़ब निराली है
यहाँ के रंग है न्यारे
अज़ब यहाँ की माया है
भांति भांति के लोग यहाँ पर
सोच गज़ब सी छाया है
चकाचौंध हूँ भैया मैं भी
चस्मा आँखों पे चडाया है
फेसबुक की रौनक से चेहरा
मेरा भी चमक पाया है
मालिक ही नहीं मेरा भी
जिया अब इसपर आया है
सुबह उठते ही अब मुझे भी
याद इसी की आती है
स्टेटस नित नए डालने को
जिया मोरा भरमाया है
इंसानी फितरत का असर
कुछ मुझपे भी छाया है
आज मैंने भी लैपटॉप पर
फेसबुक चलाया है


अलका गुप्ता .............
अभी तक लिए बैठा हूँ लैपटाप |
अधिकार से पूरे डटा हूँ टीपटाप |
पंजा ना हटाऊं ब्लॉग एक बनाउं ..
भाव लिखना यारों ...क्लास टाप ||


प्रजापति शेष .....
स्वीकार/करूं/या/ नकार/दुं
इसको/काट/लुं/या/मार/दुं
एक/आदमी/नें/टेग/कर/दिया/मुझे
सोचता/हूं/शेष/फेसबुक/ही/फाड/दुं


अलका गुप्ता 
माना प्रतिबिम्ब ! तुम्हारे बाद मैं इतना छा गया हूँ |
अब लेकिन मैं ! इस जिम्मेदारी से घबरा गया हूँ |
फंसा के यहाँ...वफादारी का मेरी ये सिला दिया है ..
बैठ कर इस लैपटाप पर ..... अब मैं उकता गया हूँ ||

माना बल पर इनके ही चलता तुम्हारा पागलखाना है |
अब मुश्किल मगर ..तुम्हारे इन मित्रों को झेल पाना है |
ऐंडे-वेंडे भाव इनके ...अजब -गजब तश्वीरों पर जो उभरें ..
ब्लॉग अपना लो सम्भालो ..बस ना भेजा और पकवाना है |


सुनीता शर्मा 
इतने महीनो से मैं अपना साथी ढूंढ ढूंढ कर हार गया ,
अब इस लैपटॉप पर मैंने भी अपना प्रोफाइल खोल लिया ,
मालिक अक्सर कहता है यहाँ सब कुछ मिलता है ,
चल रे टॉमी तूने भी आज अपने दिल का बंद दरवाजा खोल दिया !


बालकृष्ण डी ध्यानी 
जम गया हूँ

लैपटॉप और ऐनक संग
टंग गया हूँ मै
इन्टरनेट और मन संग
जम गया हूँ

खोज राहों मै सहेज राहों मै
अपना अस्तिव अपने से
गूगल मै उपलोड कर राहों मै
खो ना जाऊं मै लुप्त होना जाओं मै कभी
जम गया हूँ

मै भी हूँ लगा हुआ
इंसानों के संग अड़ा हुआ
हार ना मानूंगा मै भी
आँखों पर शीशा चढ़ा हुआ
जम गया हूँ

लप लप रही जीभ मेरी
रंगों भरी ये दुनिया देख के
आयत भरा ये पिटारा भी
बन गया वो सहारा अभी
जम गया हूँ

अपनी जाति को बचाऊँगा
क्रांती एक नई यंहा उभारूंगा
सब कुत्तों का साथ लाऊँगा
अपनों की यंहा दुनिया बसाऊँगा
जम गया हूँ

लैपटॉप और ऐनक संग
टंग गया हूँ मै
इन्टरनेट और मन संग
जम गया हूँ


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Friday, May 10, 2013

8 मई 2013 का चित्र और भाव




दीपक अरोड़ा 
इन वीरान रास्तों की तरह
तन्हाई ही अब मेरा साया है
अनमोल जिंदगी गंवाकर
यही कुछ तो मैंने पाया है...


जगदीश पांडेय 
आ गया वही राह फिर
पीछे जो छोड आया मैं
याद नही है अब मुझको
क्या खोया क्या पाया मैं
आ गया वही राह फिर
पीछे जो छोड आया मैं

आसमाँ भी धुमिल हुवा है
रास्तें भी हैं पथरीली सी
याद है इसी राह पर मुझे
आती वो लडकी पगली सी
देखे सपनें इन दरख्तों के संग
जिंन्हें सच न कर पाया मैं
आ गया वही राह फिर
पीछे जो छोड आया मैं

.
वादे किये थे संग चलनें के
साथ सदियों हम रहनें के
नही सोचा था कभी हमनें
उम्मीदों की शाम ढलनें के
बदला मौसम हुवा पराया
लौट के वापस फिर न आया
फिर भी तोड सारे बंधन को
तुझको ही तो था अपनाया मैं
आ गया वही राह फिर
पीछे जो छोड आया मैं


डॉ. सरोज गुप्ता 
झड गए सब पते !
धुंधलके रह गए मेरे मत्थे !!

न जा साथी न जा यूँ राह में अकेला छोड़ ,
काटे न कटेंगे जीवन के घुमावदार मोड़ !
तेरे ही नजरों से देखे मैंने स्वप्ने सुनहरे ,
अकेले न छांट पाऊँगी ये बादल हैं घनेरे !
झड गए सब पते !
धुंधलके रह गए मेरे मत्थे !!

तेरे बिना क्या बहारें देखी मैंने कभी ,
अलख भोर का उगता सूरज बैगाना हुआ अभी !
उजड़े हुए शहर बस जाएँ चाहें अब सभी ,
दिल की ड्योढी का कोरा दिया बलेगा तभी ,
तेरी सूरत का दीदार करूंगी मैं जभी !
झड गए सब पते !
धुंधलके रह गए मेरे मत्थे !!


विजय गौड़ 
मैं इस राह में अपने कदमों के निशाँ ढूंढता हूँ,
किस तरफ चला था मैं, वो दिशा ढूंढता हूँ।
कुछ यादगार पल, कुछ खूबसूरत शामें,
चला था जिसके साथ, वो मेहरुनिशाँ ढूँढता हूँ।।

दूर उस धुंध से इक तस्वीर सी उभरती है,
मैं उसमे अपना कोई हिस्सा ढूंढता हूँ,
सूखे पत्तों की एक परत सी ज़मीं है जिसपे,
मैं इस ज़िन्दगी का वो किस्सा ढूंढता हूँ।


Bahukhandi Nautiyal Rameshwari 
इन सर्द धुंधली राहो में ..
देखो कैसे ये वृक्ष तने से हैं ..
झड चुके हैं पात, शाखों से इनकी ..
उग रहे ख्वाब, कोमल टहनियों में ...
आएगा सावन फिर से .
पड़ेंगी बूँदें, प्यासी धरा पर ..
उड़ेगी मृत्तिका श्वास फिर से ..
लिए मंद मंद खुशबू मटैली ..
फिर नाचेगी, प्रकृति फैला छटा नखरेली ..

मिट रहे शाख, राहों से फिर बंट जायेंगे ..
सब्र करना सीखो मानुष, मुफलिसी के दिन भी ..
बदलते मौसम से कट जायेंगे ..
धुंध से आगे भी जीवन है ..
ना इसको ठहराव कहो ..
समय की अविरल धारा .
सदैव संग बहो ......

किरण आर्य .
शाम का धुंधलका
और रूत है सुहानी
धुंध सी यादों के सायें
कहे प्रेम की कहानी

याद आ गई दिल को
भूली बिसरी सी रवानी
थाम हाथ तेरा चली मैं
डगर थी ये अनजानी

तू नहीं है साथ रह गया
प्यार बन कर निशानी
गम के सागर अश्कों में
ना डुबो दें मुझको जानी

याद हर जो वजूद को कर
जाए छलनी है मिटानी
तू रहा दिलबर मेरा ही
मैं रहूँ बन तेरी ही दीवानी

यादो के धुंधलके घनेरे
अमिट भयावह है मगर
हँसते हँसते ही हमें
प्रीत की रीत है निभानी


Rohini Shailendra Negi 
"पतझड़"

ये रस्ते चले जा रहे हैं,
जाने कहाँ हताश से..?
शायद ये भी मसरूफ़ हैं,
मंज़िलों की तलाश मे |

कोई भी तो नज़र न आए,
कैसा ये अंधड़ है.........?
डरे हुये, सिमटे हुये से,
लोग सभी नदारद हैं, |

इस धुंधलके मे गुम होकर,
पथिक हजारों भटक गए,
कामनाओं और लालसाओं के,
त्रिशंकु मे लटक गए |

पतझड़ जाये तो सावन,
अपना सुंदर मुख दिखलाए,
देख कोंपलें फूटें,
बंजर ज़मीं भी अंकुर ले आए |

काश ये सूखा मंज़र हो तब्दील,
घटाएँ छा जाएँ,
हो ऐसा सौभाग्य सभी का,
मस्त बहारें लौट आयें |


अलका गुप्ता
खो गईं है राहें.. कहीं ..दूर वीरान होकर |
धुंधलका घना छा रहा है...मगरूर होकर |
राहों में खड़े हैं वृक्ष पंक्तिवद्ध वाहें फैलाए ..
दिखता नहीं पथिक कहीं कुहासों में फंसकर ||

यही तो जिन्दगी का हाल है ! हाल है या बेहाल है |
मकसद सारे खो गए हैं ..जिम्मेदारियों के बोझ हैं |
कुछ करेंगे !..या रचेंगे नया...बदल देंगे हर मोड़ को ...
कुछ ना हम कर सके..यूँ ही खोई ..बचपने कीसोंच हैं ||


Garima Kanskar 
आया पतझड़
साख से सारे
पत्तो को उड़ा
ले गया
हर एक पत्ता
डाली से जुदा
हो गया
हवा के शोर
में पत्तो का
दर्द सुनाई
पड़ रहा था
पेड तन्हा खड़े थे
सुनसान रास्तो में
उनके दर्द को बाटने
वाला दूर दूर
तक कोई था
रात का घनघोर अँधेरा
या हो सुबह का कोहरा
सब कुछ पेड़
अकेले सह रहे थे
गरिमा


Virendra Sinha Ajnabi .
वही रास्ते और वही आसमान, पर वो हमसफ़र नहीं,
उजड़ा-उजड़ा, वीराना सा है, हरा भरा वो मंज़र नहीं,
मंजिल पीछे रह गई, सामने तो धुंध है और कुछ नहीं,
क्यों न रोक लूं कदम, जब रहा मकसदे-सफर नहीं. ...

Himanshu Kharabanda 
चुप चाप सिमटती राहो को,इँतजार तुम्हारा रहता है,
दरख्तो की सूखती बाहो को,इँतजार तुम्हारा रहता है।
उदास दिखे जर्रा जर्रा, हर पहर उदासी का पहरा,
टूटे पत्तो की आहो को, इँतजार तुम्हारा रहता है।

Bahukhandi Nautiyal Rameshwari 
सर्द दिन, सन्नाटा गहन पसरा है ।
चल पथिक, पथ कितना संकरा है ।
गहन है धुंध, तू पथिक वखरा है ।
ज़र्र पत्तियाँ , तूने पग धीमे धरा है ।
जाने किसका दामन, राह में बिखरा है ।
भय क्यूँ, ये ऋतु का चौमासी नखरा है ।
बढेगा, पायेगा तभी, जहाँ हलाहल बिखरा है ...


बालकृष्ण डी ध्यानी 
खामोश इन राहों में

खामोश इन राहों में
मन और मै यूँ ही अकेला
दूर इन निगाहों से
कोहरा घटने बड़ने लगा
खामोश इन राहों में

सर्द रातों की बात है
ठिठुरन वाली आगे रात है
दो घड़ी का संधी प्रकाश
कदम बढ़ रहा अब साथ है
खामोश इन राहों में

एक राह सीधी जाती हुयी
पेड़ों की कतारों को घेरती हुयी
स्तभ ये नजारा है दो घड़ी का
बस अब अँधेरा की शुरवात है
खामोश इन राहों में

पतझड़ का वो मौसम है
बिरहा छायी ये मधुबन है
रात को तड़पे मोरा जिया
कैसी दिल मची हलचल है
खामोश इन राहों में

खामोश इन राहों में
मन और मै यूँ ही अकेला
दूर इन निगाहों से
कोहरा घटने बड़ने लगा
खामोश इन राहों में


कुसुम शर्मा 
जब तुम हम से मिले तो ऐसा लगा
मानो जीवन में बाहार आ गई
जैसे कलि खिल कर फूल बन गई
चारो ओर खुशियों की हरियाली थी
आकाश में छाई लाली थी

हम मदहोश थे तेरी आहोश में
न खबर थी दिन और रात की
चारो ओर प्यार ही प्यार का डेरा था

तुम क्या गए कि मानो जिंदगी वीरान हो गई
बहारो कि जगह ली पतझड़ ने
कलि फूल बन कर बिखर गई
चारो और छाया दुखो का कोहरा

कभी सोचते है कि तुम हमारे जीवन में न आते
न ही बाहार आती न ही पतझड़ लाती
फिर भी पतझड़ में सावन का दीदार करते है
हर घड़ी सिर्फ तेरा इंतज़ार करते है


भगवान सिंह जयाड़ा 
वो शर्दियों वाली ठिठुरती सुबह ,
वही एकांत जंगलों वाली जगह ,
बादियों में घिरा वह घुप कोहरा ,
नहीं दिखता जब किसी का चेहरा ,
वह सूरज की अठखेलियों संग ,
कभी सप्तरंगी इन्द्र धनुष के रंग ,
बचपन के वह हशीन लह्में के संग ,
इन्हीं राहों पर जब चलते थे संग ,
वो हशीन यादें कुदेरती है मुझे ,
जब इन्हीं राहों पर ढूडते थे तुझे ,
वो शर्दियों वाली ठिठुरती सुबह ,
वही एकांत जंगलों वाली जगह ,


नैनी ग्रोवर 
ये वीरान रास्तों के धुंधले-धुंधले साए,
हम भी चुपचाप से, इनमें जा समाए..

गुमसुम सी इन वादियों में, कोई नहीं,
पत्थर हुई हैं निगाहें, देखो तो , रोई नहीं,
तस्वीर कोई ख़ुशी की, मैंने भी संजोई नहीं,
बीते हुए चमकीले लम्हे, ना कोई याद दिलाए..

हम भी चुपचाप से, इनमें जा समाए..

सर्द हो गए हैं क्यूँकर, ये सारे ही जज़्बात,
ख़तम हो गए सारे किस्से, छूट गए जो हाथ,
फर्क अब पड़ता नहीं, हो गर्मी, सर्दी, या बरसात,
मौसमों के सुहानेपन, अब दिल ने दिए भुलाए ..

हम भी चुपचाप से, इनमें जा समाए...!!



प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
~आज में जीना सही~

देख दृश्य मन कुछ उदास हुआ
कल पर पडी काली छाया देखी
मन को अनेको सवाल करते पाया
लेकिन इसी तस्वीर से जबाब पाया

सावन देखा, पतझड़ देखा
फूल पत्तों को फिर जीते देखा
गिरते कटते वृक्षों को देखा
प्रकृति की मार सहते देखा

हरे भरे संसार में भी कभी
पतझड़ का मौसम आता है
रोशन हुई दुनिया में भी कभी
अन्धकार बरबस छा जाता है

जो आज है वो कल शायद न हो
जो कल था, शायद वो आज नही
जीना तो हमें आज है 'प्रतिबिम्ब'
फिर जो मिले उसमें जीना ही सही




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Tuesday, May 7, 2013

6 अप्रैल 2013 का चित्र और भाव




अशोक राठी 
सुनो सुनो ऐ भारत वालों
राह नई बतलाता हूँ
भाई भतीजा सुना था अब तक
मामा भांजा की बतलाता हूँ
लूट सको तुम जितना लूटो
नोटों की अब रेल चली है
हिस्सा अपना लूटो तुम भी
अंधे के हाथ बटेर लगी है

दीपक अरोड़ा 
उस मंच पर क्या सुन रहे साथियों,
इस मंच से सुनो वास्तविकता बतलाता हूं
सब भ्रष्टाचारियों का बोलबाला है वहां,
यहां आपको हकीकत दिखलाता हूं
खुद भी समझो दूसरों को समझाओ
देश को इन भ्रष्टाचारियों से खोखला होने से बचाओ
इनकी ना मा है, न बहन है न भाई कोई,
पैसा ही सुबह इनकी आंखों के द्वार खोलता है
कुछ भी नहीं बोलते ये अपने मुख से कभी
पैसा ही सदा इनके मुख से बोलता है...


Neelima Sharrma 
सुनो ! सुनो! सुनो!!!

मेरे देश की बहनों
ध्यान से सुनो !!

देश में लिंग अनुपात बिगड़ रहा हैं
और व्यभिचार ज्यादा बढ़ रहा हैं
४-५ लडको पर हो रही हैं एक लड़की
भविष्य में होगी विवाह के लिय कडकी

तुम हो सूत्रधार हो सृष्टि की
तुम ही प्रजनन का आधार भी
तो अब सब तुम्हारे हाथो में है
मुह दिखाई मैं अब गहने नलो
कन्या जन्म का अधिकार लो

तुम्हारीअपनी पहली पीढ़ी ने
अपनी ही जात को बदनाम किया
बहु ने जो पोती को जन्म दिया
सास ने उसका अपमान किया
अब आयी तुम्हारी बारी हैं

कन्या भ्रूण को जन्म दो
जन्म देने वाली को मान भी
नारी हो नारी को सम्मान दो
पुरुषो को दो पैगाम भी

परिवार दिवस हैं आने वाला
परिवार अपना तुम बनाओ
बेटे बेटी का भेद मिटा कर
खुशहाल समाज तुम बनाओ .


विजय गौड़ 
मैंने तंग गलियों से,
खुले मैदानों तक,
शासन की दहलीजों से,
मंदिर के पायदानों तक,
सिसकती आवाज से,
चीख-पुकार की आवाजों तलक,
न जाने कितनी कोसिसें की,
लेकिन ये आवाज इतनी तेज ना हो पायी,
आखिर एक 'आम इंसान' ही तो था मैं,
लाखों-हज़ारों अनसुनी आवाजों में से एक,
जो फिर अपने अंजाम तक ना पहुँच पायी।
अब यूँ हि चुपचाप समय का राह नहीं देखनी,
समय को बदलना है, कसम है खाई,
जात-पात, छेत्र, धर्म से नहीं बंटूगा अब,
लड़ने को हूँ तैयार, एक नई लड़ाई।।


Himanshu Kharabanda 
खुदाया गौर से देखो बिगडता दौर कैसा है,
जमाना हो गया बहरा कि इसका ठौर कैसा है।
किसी की आह तडपन से कोई गाफिल यहाँ कोई,
जहर उगता है बगिया मैं, कि उनका बौर ऎसा है।


बालकृष्ण डी ध्यानी 
चिला-चिलाकर

चिल्ला-चिल्लाकर
गला फाड़कर तेरा यूँ चिल्लाना
महाशय कंहा से ये हुनर सीखा आपने

कंठ लंगोट
कोट बुट और सूट
सर जी कौनसी चीज पर मिल रही है अब छूट

लुट लुट कर मिली है लगता ये अब छूट
या फिर लगता है मुझको श्रीमान
इस छूट में भी छुपी है कोई बड़ी लूट

हम तो लुटे हैं कितना और लूटोगे
देख तुम्हरा तमाशा दो घड़ी रोक कर
सर जी हम भी तो यंह से अब खिसकेंगे

चिला चिलाकर
गला फाड़कर चिल्लाना
महाशय कंहा से ये हुनर सीखा आपने


Rohini Shailendra Negi
"नव-निर्माण"...
शांत खड़ी मैं देख रही थी एक लोभी का लोभ,
चीख-चीख कर सब को बुलाये देता था प्रलोभ |

उसकी शक्कर जैसी बातें रक्त-चाप को बढ़ाती,
कभी वो मुझको कभी मैं उसको कंखियों से बुलाती |

बातें बनावटी कर-कर के जाने क्या रस घोला,
जितने भी थे आस-पास उन सब का मन था डोला |

झूठी अफवाहों के पीछे "सच" बेचारा सिमट गया,
अपना कफन वो खुद पे लपेटे जा के ज़मीं से लिपट गया |

दफन हुआ गहरायी मे फिर कभी न ऊपर वो आया,
झूठ अब यारों राज कर रहा सच का तो साम्राज्य गया |

मेरी विनति है सब से क्यों हम ऐसों का साथ निभाएँ,
जो सच को पर्दे मे रखते और झूठों का मुकुट लगाए |

वापिस फिर से वही दौर हो दूर हो सारी अटकलें,
कपट, निराशा, झूठ नहीं हो हर कोई सच्ची राह चले |

आओ हम सब मिलकर प्रण लें ऐसा नव-निर्माण करें,
बस आदमी....आदमी न हो.......एक अच्छा इंसान बने |


भगवान सिंह जयाड़ा 
आवो आवो !लूट मची है लूट ,
मौका यह न जाए तुम से छूट ,
आवो इधर ,मंच सजा है यहाँ ,
देश के तारण हार बैठे हैं जहाँ ,
देश की देखो लग रही है बोली ,
लुटा रहे देश को, नियत डोली ,
जल्दी आवो ,जल्दी आजावो ,
देश रखवालों से देश बचावो ,
इन को अब सबक सिखावो ,
जनशक्ति अब इन को दिखावो ,
स्वच्छ सरकार अब है बनाना ,
दलालों को है सबक सिखाना ,
आवो आवो !लूट मची है लूट ,
मौका यह न जाए तुम से छूट ,

Govind Prasad Bahuguna 
भाइयों और बहिनों
देश प्रेम थिएटर में
आज का नाटक
"बिकवाली जारी है "
देखिये हर रोज देखिये
अपना भाव दीजिये
ईमानदारी लीजिये
यहाँ सब कुछ उपलब्ध है
जब तक जनता स्तब्ध है
स्वतंत्रता का आनंद लूटिये
उदारीकरण में यहाँ सब कुछ
बिकता है
खरीदिये सब कुछ
अस्त्र शस्त्र और निर्वस्त्र
हाव भाव और अभाव
रीती नीति और अनीति
आज बिकवाली का आखरी दिन है
क्या पता कल ये जनता जाग जाए
और बिकवाली वाले सब भाग जाएँ II

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
मैं चिल्ला चिल्ला कर थक गया हूँ
लेकिन कोई सुनने को तैयार नही है
सरकार तो बनी जनता की दुश्मन है
जनता का हित भ्रष्ट तंत्र की चढा बलि है
बार - बार जनता को यूं मरना नही है
इस बार जनता को जगाना जरुरी है
किसी बहकावे में न हमको आना है
अपनी शक्ति की पहचान करवानी है


अलका गुप्ता 
तुम यूँ ही बोलते रहो|
चीखते चिल्लाते रहो|
विरोध भ्रष्टाचार का ...
करने के अलावा कहो |
तुम करोगे क्या ?
कमाने का समय है|
जरा चुप रहो !
आओ देखो.... इधर. |
घोटालों का चढा क्या रंग है |
हर नेता कितना हुनरमंद है |
जनता देख देख दंग है |


कवि बलदाऊ गोस्वामी 
अचानक एक आवाज आई,
लगा कि
बम्ब विस्फोट हुआ।
हुआ भी वैसा,
पर आदमी नही मरे,
केवल बात मर गई है।
जिनके कान खुले हैं,
वे सुन सके हैं।
और फिर...............
बम्ब विस्फोट झेत्रफल से
क्या?
भ्रष्टनिति के मकड़जाल
से भी,
उभर गए हैं।
इन निकम्मों ने,
जिनकी होंठो पर
सर्प का विष है,
जिनका गला खुली कब्र है,
आडम्बर और झूठे वादे देकर,
आदमी को
तबाही की गर्भ में धकेलकर,
जनता पर अत्याचार कर रहे हैं।
आज रण भूमि में,
कमर कस कर
तबाही के गर्भ को नष्टकर,
भ्रष्टनीति के मकड़जाल से निकलना है।


जगदीश पांडेय 
देखों आज कैसा शोर चारो ओर हो रहा है
बदनाम ये देश अब चारों ओर हो रहा है
सुनों गौर से हिंदुस्तानी
बात न गर तुमने मानी
दोस्त बन बैठा दुश्मन
करनें को वो मनमानी
जुल्म अत्याचार क्यूँ घनघोर हो रहा है
बदनाम ये देश अब चारों ओर हो रहा है

रातें हो रही हैं अब देखो काली
डरती लडकियाँ भोली भाली
घूम रहे हैं देखो अपनें ही अब
पहन मुखौटा रिश्तों का जाली
कमजोर क्यूँ अपनों का अब डोर हो रहा है
बदनाम ये देश अब चारों ओर हो रहा है

खडा हूँ कब से अकेले मैं
झुक रही कमर अब मेरी
होनें नही दूंगा कमजोर
बुलंद आवाज ये मेरी
इंसानियत पे हैवानियत का जोर हो रहा है
बदनाम ये देश अब चारों ओर हो रहा है


नैनी ग्रोवर 
सुनो-सुनो भाई-बहनों एक पते की बात बताता हूँ,
छोड़ो सारे भेद-भाव, मैं रोज़ गला फाड़ चिल्लाता हूँ ..

अब भी ना माने तो, अंजाम इसका बड़ा बुरा होगा,
आयेगा समय तो कोई भी ना, साथ तुम्हारे खड़ा होगा,
जात-पात को देख कर, मत दो अपने कीमती वोट,
देखो पहले समझो ज़रा, नीयत में इनकी क्या है खोट,
बार-बार में दोनों हाथ जोड़ कर, बात यही दोहराता हूँ ...

छोड़ो सारे भेद-भाव, मैं रोज़ गला फाड़ चिल्लाता हूँ ..

अब तो अपने को हम सुधारें, अपने काम खुद संवारें,
चुनो उसे जो समय आये तो, काम आये तुम्हारे-हमारे,
लूट रहे जो देश हमारा, नज़र उनपे अपनी सख्त करो,
मत दो वोट अपने इनको, मत इनकी भूमिका सशक्त करो,
बना के गीत इस दर्द को मैं, तुम्हें हर रोज़ मैं सुनाता हूँ ...

छोड़ो सारे भेद-भाव, मैं रोज़ गला फाड़ चिल्लाता हूँ ....!!


अलका गुप्ता 
उफ़ .....कितना शोर है |
ये लाउड स्पीकर वाले |
हर जगह शोर ही शोर है |
सडक पर लगा जाम है |
गाड़ियों के हार्न का शोर है |
कहीं जगराता ...
कहीं शादी-बरात है |
कहीं धरना प्रदर्शन ...
कहीं नारे लगाता जलूस है |
घर में भी तो टी.वी.का शोर है |
कहीं लड़ रहा आस-पडोस है |
यह क्या कम था ...
दिवाली में धमाकों शोर ...
या फिर डिस्को या कान फोडू संगीत |
कोई तो लिमिट हो डेसिबल का |
आखिर यही तो ध्वनि प्रदुषण है |
सृष्टि के लिए ....सारी ...
हर प्राणी के लिए घातक है |
आज मन तरस रहा ...
वातावरण शांत हो |
तन-मन भी शांत हों ||


कौशल उप्रेती 
वो पूछता है मुझसे
ज़िन्दगी क्योँ इतनी अनजान सी हो गयी है ,
की हर तरफ बस
अधेरा और वीरानी सी हो गयी है
वो पूछता है मुझसे.........
क्योँ वफ़ा का बदला
वफ़ा न होकर कुछ और ही है
ज़िन्दगी नाम से ज्यादा कुछ और है
वो पूछता है मुझसे.........
क्योँ हर तरफ़ हाहाकार है
ज़माने में क्योँ हर तरफ संघार है
हर तरफ हुंकार है
वो पूछता है मुझसे.........
क्योँ हो गया है आदमी-आदमी का दुश्मन
हर जगह है नफरत
क्योँ खो गए मोहोबत
वो पूछता है मुझसे.........
की तू इतना उदास क्योँ है
ज़िन्दगी एक छुपा हुआ राज़ क्योँ है
हर समय बनवास क्योँ है
वो पूछता है मुझसे......
राम की इस दुनिया मे
क्योँ आराम नहीं मिलता
हर तरफ़ रावण है क्योँ राम नहीं मिलता
वो पूछता है मुझसे..........



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Sunday, May 5, 2013

2 मई 2013 का चित्र और भाव




दीपक अरोड़ा 
तेरा जुदा होना सह ना पाऊंगा,
क्यों तुम दुनिया में यूं अकेला छोड़ गये,
हर गम तुम्हारे हंस कर सह लेता मैं,
न जाने क्यों यूं नाता तोड़ गये...दीपक


बालकृष्ण डी ध्यानी
ये शाम

उदासी भरी
है ये शाम
कुछ पल है
कुछ गम है
जो आज कल है
उदासी भरी
है ये शाम ..२

मै हूँ
साथ ये पेड़ है
घास चुप है
अंधेर कुछ कम है
जो आज कल है
उदासी भरी
है ये शाम ..२

नील रंग
ओढ़ा है ये अंबर
काला रंग
छाया अब इस मन है
जो आज कल है
उदासी भरी
है ये शाम ..२

टहनियों की तरहं
अझोल बोझल सा
ये अकेला खड़ा
बस एक तन है
उदासी भरी
है ये शाम ..२

उदासी भरी
है ये शाम
कुछ पल है
कुछ गम है
जो आज कल है
उदासी भरी
है ये शाम ..२


भगवान सिंह जयाड़ा
तन्हाइयों भरी यह जिंदगी ,
दो पल यहाँ अक्सर सुस्थता हूँ ,
इस लिए शाझ ढलते ही सदा ,
मै अक्सर यहाँ आ जाता हूँ,
यह एकांत सुन्शान जगह ,
मन को कितनी सकूँन देती है ,
कभी ख्यालों में डूबू उनके ,
जो अक्सर यहाँ बुलाती है ,
वह और कोई नहीं है यहाँ ,
बस मै और मेरी तन्हाई है ,
निहारू कुछ मनमोहक दृश्य ,
मन को शान्ति मिल जाती है,
तन्हाइयों भरी यह जिंदगी ,
दो पल यहाँ अक्सर सुस्थता हूँ


नैनी ग्रोवर 
इन शाम के धुंधले सायों में, कोई चेहरा ना नज़र आये,
हमने ना जाने कितने पहर, तेरे इंतज़ार में यूँ ही बिताये..

गुजरता रहा हौले-हौले, ये वक़्त का पहिया रुका ना रोके से,
ना तुम आये ना पैगाम कोई, ना जाने कितने अश्क बहाये..!!


Rohini Shailendra Negi 
"गुज़रा पल"
ये सुहानी रात चाँदनी लिए साथ,
कितनी शांत और खुश-नसीब लगती है,
पर मेरी तनहाई मेरे जिस्म से लिपटी,
यादों की सौगात लिए बैठी है |

उसके शब्दों का,
मुरली की धुन की तरह,
मेरे कानों मे रस घोलना,
उस की आहट से मेरी साँसों का,
अपने दिल को टटोलना |

उसकी एक झलक पाने को आतुर,
मेरी नज़रों का बौखलाना,
पलकों की पंखुड़ियों से,
अनमोल मोतियों का बार-बार टपकना |

न जाने आज कहीं छूट-सा गया है,
हाय ! मेरा प्रियतम..........!!
मुझसे रूठ-सा गया है.......!!


किरण आर्य 
शाम का धुंधलका और सोच में डूबा मन
वो दरखत और मन का मेरे एकांकीपन
इंतज़ार जो कल भी आज भी नयन बसा
तुझ बिन जीवन मेरा लागे मुझको सज़ा

अहसासों में खुशबु सा तेरा प्यार महके है
जज़्बात कुछ अनमने भाव कुछ बहके से है
तेरे एक दीद की आस का नैनों में दीप जला
अँखियाँ मोरी चातक छवि देख तोरी चहके है

तू आया तो बसंत के गुल जीवन में खिल जाए
तुझ बिन मन बावरा मोरा पतझड़ सा मुरझा जाए
तू समझ ले हाल मोरा तुझ बिन रतिया कैसे कटे
रह अहसासों में खुशबु बन ख़ुशी दो जहां की मिल जाए


उषा रतूड़ी शर्मा 
यूँ ही कब तलक हर शाम तेरे इंतजार में ही गुजर जाएगी
ताउम्र साथ रहने की जो कसमे खायी थी हमने
उन्हें निभाने का वक़्त आया है, अब तो आजाओ प्रिय
वरना जुदाई में तेरी न जाने कब जिंदगी की शाम भी ढल जाएगी


Bahukhandi Nautiyal Rameshwari 
ये सन्नाटे को चीर कौन बोलता है ?
क्यूँ गडगडाहट इनमे ..
क्यूँ इन बदलियों का खून खोलता है ?
क्यूँ अशांत मन, वीरानियों में डोलता है ?
पूछा कई बार, इस शाख की पत्तियों से ..
क्या राज़ है, क्यूँ तुझमे अँधेरे में भी फड़फड़ाहट है ?
क्यूँ तुझमे मिठास, मुझमे कड़वाहट है ?
बोला मुस्कुराकर खड़ा पेड़ ..
सब जड़ काटे मेरी, कौन मेरा दिल तोड़ता है ?
फल, फूल, त्वचा मेरी नोचते तुम ..
मेरा मन कहाँ तुम्हारे स्वार्थ के पीछे दौड़ता है ...
फिर भी इंसान, कहाँ छोड़ता है ..
मेरा भला तुझसे क्या बैर ..
मैं चाहूँ सबकी खैर ..
मेरा रोम रोम इंसानियत के लिए ..
श्वास छोड़ता है।
ये तेरा स्वार्थ है, जो सबसे पहले तेरा दिल तोड़ता है ?


Jagdish Pandey .
रात सुहानी धवल चाँदनी में याद तुम्हारी आती है
जितनी याद आती है मुझको उतनी ही तडपाती है
जब आये रात पूनम की और पहर तिसरी बीत जाती है
सच कहता हूँ मेरे दिलवर नींद नही मुझे तब आती है
रात सुहानी धवल चाँदनी में याद तुम्हारी आती है
भला हो उन दरख्तों का जो मुझे सहारा देतें हैं
तन्हा नहीं केवल मैं ही हूँ इशारा मुझको देते हैं
एक दूजे से बाते कर के रात हमारी गुजर जाती है
गम की काली रातों में दीश रात हमारी सुधर जाती है
रात सुहानी धवल चाँदनी में याद तुम्हारी आती है


Bahukhandi Nautiyal Rameshwari 
वो गए जब से, जीवन से मेरे ..
मेरा तन्हाईयों में बसेरा हो गया ..
नूर था चेहरे में, इस कदर ..
जीवन बिन उनके, अँधेरा हो गया ..
बसर करते हैं जिस आँगन वो ..
अमावास में ज्यूँ, सैंकड़ों जुगनुओं का ..
फेरा हो गया ...
मानो चाँद भी रूठा हो मुझसे ..
क्यूँ निशा का रंगरूप गहरा हो गया ..
अब चांदनी पर भी पहरा हो गया ..
सोचता हूँ !
ये क्यूँ अकेला ..
क्या वृक्ष भी फरेब पाते हैं ..
आ आपबीती सुनाकर ..
मैं और वृक्ष दोनों सो जाते हैं


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ....
~ अंधेरो से दोस्ती~
रुका सा हर लम्हा
रुकी रुकी से साँसे
तुम पास नही मेरे
वीरान सा जहां लगता है

कब सुबह हुई
कब शाम हुई
मुझे मालूम नहीं
अब वक्त यूं गुजरता है

कभी ये वृक्ष
तो कभी वो वृक्ष
मेरी कहानी सुनते है
तब खामोशी देती गवाही है

कभी मेरे आंसू टपके
कभी साख से पत्ता टूटा
दर्द को साथी मान कर
अब अँधेरो से दोस्ती की है



कुसुम शर्मा 
तेरी विरह की अग्नि में जल रही हूँ मै,
फिर भी तेरे आने का इंतज़ार कर रही हूँ मै,
मुझे यकी है एक न एक दिन तुम जरुर आऊंगे,
मुझे मेरे पुराने दिन फिर से लौटाओगे,
इसी आस में जीती हूँ मै, फिर तेरा इंतज़ार करती हूँ मै
जब सूरज ढलता है शाम होती है,
उस समय तेरे आने की आस होती है,
तुम हकीकत में न सही ख्वाब में ही आ जाओ,
मेरी बढती हुई मिलन की तृष्णा को तो मिटा जाओ
जब हर रोज शाम आती है, न जाने क्यों तेरे आने का पैगाम लाती है,
अब न जाने कितने घंटे, कितने दिन, कितने साल गुजर गए,
जाने कितनी शामें आ कर भी चली गई,
फिर भी हम न जाने क्यूँ तेरा इंतज़ार करते है,
हम बस तुम्ही से प्यार करते है,
हम यूँही शाम को तेरा इंतज़ार करते रहेगे,
तुम आओ या न आओ हम तुमसे प्यार करते रहेगे !!!!


किरण आर्य 
दरख्त और मैं
दोनों अपने हिस्से के
एकांकीपन से जूझते
जब तुम आये जीवन में
जीवन खुशगवार हुआ....

अहसासों भावो संग
चलते हाथ को थाम
मैं और तुम
खोये रहते एक दूजे में
रूह से रूह का मिलन हुआ....

फिर जाने कहाँ से झोंका वो
निर्मम वक़्त का आया हाय
मायने दोनों क्यों देने लगे
अनकही कही सी बातों को
बातों तकरारो संग
समझ का अलगाव हुआ...

आज नदी की दो धारा से
हम तुम है साथ चले
मिलन के सपने बह चले
दुखो का कारोबार हुआ....

जैसे हर मौसम संग
दरख्त ये खड़ा मौन सा
वैसे ही मन मेरा आज
खड़ा एकांकी सा
पर आस का दीप है
आज भी मन में जलता हुआ...

नदी होगी कहीं तो
भावो की संकरी
जहाँ फिर से मिलेंगे
मैं और तू
अस्तित्व एक है एक रहा
अहसासों भावो संग
तू मेरा था मेरा ही रहा


Neelima Sharrma 
शाम का वक़्त हैं
और मैं यहाँ तनहा
तुम्हारी यादो के संग हूँ
आलू के पराठो की सोंधी सुगंध
तुम्हारा जल्दी से आना
लंच टाइम हैं
जल्दी जाना होगा
शाम को मिलती हूँ
कहकर मुझे बहलाना

शाम को तुम्हारी सहेली का इर्द- गिर्द होना
विपरीत रास्ता होने पर भी
भीड़ में बस पर तुम्हारे साथ चढ़ जाना
उस रस्ते भर तुम्हारी खुशबू
भर लेता था अंतर्मन में
रात गुजर जाती थी
सुबह के इंतज़ार में

अब तुम दूर देश में
अपने अपने के साथ
जब बनाती होगी आलू के पराठे
और लगाती होगी ठहाके
तो कही न कही
जरुर कसकता होगा
मेरा प्यार

मजबुरिया क्या नही करवाती सजनी
जानती हो सामने वाली बेंच पर
एक जोड़ा खा रहा हैं लंच बॉक्स से
आज आलू के पराठे
फिर से एक नया इतिहास लिखा जायेगा
और कोई मेरी तरह इसी तरह
पेड़ के नीचे यादो में खो जायेगा

तुम खुश हो न सोना


Upasna Siag 
सब खामोश हैं
मैं , यह दरख्त ,
मेरी तन्हाई भी ...

मैं खामोश हूँ ,
लेकिन
अंतर्मन में एक शोर
मचा है ...

मचा है
एक कोलाहल सा ,
सुनता कौन इसे लेकिन
दबाए खड़ा हूँ मौन ...

मौन तो यह दरख्त
भी नहीं
बस खड़ा है ना जाने कितने
कोलाहल
बसाये अपने भीतर
मुझ जैसों का मौन ...


अलका गुप्ता 
इस जीवन पथ पर...साथी ना गमों के मिले |
हमसफर तो सुखों के .... हर तरफ ही मिले |
दर्द अकेले ही झेला है कोई हमदर्द ना मिला |
कैसा है बेगानापन जो दिल के रिश्ते ना मिले ||

सांझ की बेला है... मैं क्यूँ वीरान...अकेला हूँ |
क्यूँ मैं आज ...गुम्फन का ....बना झमेला हूँ |
कोई तो मुझे बचा लो... इस उलझन निकालो...
रिश्तों में विशवास के बांधो कि मैं ना आज अकेला हूँ ||


कौशल उप्रेती 
कुछ पल जो मिटाए नहीं जाते ,
भुलाये नहीं जाते ,गंवाए नहीं जाते
उन पलों को याद करते हुए ,
ज़िन्दगी को याद करते हुए ,
हम भी हँसते है रोते है ,
उन यादो के सायों मे समय खोते हैं
पर फिर भी न जाने क्यों लगता है,
कि वे पल अब लौट नहीं सकते ,
पल-पल उन पलों की याद में सोचते हुए ,
ज़िंदगी के अँधेरों मे घिर जाते हैं ,
मौत को भी, अब कुछ अधिक ही करीब पाते हैं
इससे आगे कहने को क्या बचता है ,
इस तन्हा सफ़र मे यूँ हीं चले जाते हैं.


Deepak Shukla
मन की एक कहानी अपनी..
हमें याद हो आई है..
दूर क्षितिज पर चाँद है जैसे..
तेरी ही परछाई है..
इतना दूर गई हो मुझसे..
जाने क्यों तुम रुठ गईं..
तुम्हें सितारों में भी ढूँढा.
आस ही मेरी टूट गई..
जन्म जन्म का नाता जिसको
हम दोनों ने माना था
इतनी जल्दी वोह टूटेगा
कभी नही यह जाना था
कहती थी एक रोज मैं उनको
ढूढ़ कभी न पाऊँगा
इतनी दूर व्वोह जाएँगी
पहुँच कभी न पाऊंगा
एक दिन ऐसा भी आया कि
वोह सच थी दूर हुए
.एक शब्द भी कहा न मुझसे
ऐसे वोह मजबूर हुए
अब तक याद हैं आती हमको
दर्द भरी वोह आँखे दो
जैसे कहती हों मुझसेकि
दूर हमें न ना जाने दो
अब भी मन में आते मेरे
ऐसे ही कुच्छ मेरे अहसास
जैसे तुम हो साथ में मेरे
आकर बैठे मेरे पास
पर तुम गयी वह जा बैठी
जहाँ से कोई आये ना
आँखे चाहे बहे कितनी .
दर्द सहा भी जाये ना
तुम पर मरने का दम भरता
पर मैं सच मैं मर न पाया
तेरी याद में तिल तिल मरता
रहा , नही मैं जी पाया
सूनी रातो में मेरे अब
भी चूड़ी खनकती हैं
पायल की छम छम हैं बजती
नजर कहीं न आती है............


ममता जोशी 
इतनी उदास शाम पहले कभी न थी ,
बहारों के रहते ये वीरानी कभी न थी,
सूरज के डूबते ही उभर आये दिल के गम,
वफ़ा की बात पर क्यों हो गयी हैं आँखे नम,
तेरे जाने के बाद मैंने चिरागों को रोशन नहीं किया ,
मेरी जिंदगी भी अब इस शाम जैसी ही हो गयी ......


बालकृष्ण डी ध्यानी 
अकेला मन

अकेला मन अकेला मन क्या ये बुझे
क्या ये देखे इस निर्जन
मन ही मन से बात की
ठहर थोड़ा यंहा फिर चल कंही और चल

एकमात्र तू है यंहा
ना तेरा ना तेरे कोई संग
अकेला मन ..२
इकलौता है तू इस गम का
दीर्घकालीन रोग है ये ना इसके अंत का ....अकेला मन..२

अकेला मन अकेला मन क्या ये बुझे
क्या ये देखे इस निर्जन
मन ही मन से बात की
ठहर थोड़ा यंहा फिर चल कंही और चल

बस वक्ता है की वो अकेले चला जा रहा
सुनसान एकांगी असहाय समय बस पास रहा
...अकेला मन ..२
मन है की मन बस साथ,उदास रहा
सामान सफर का यूँ ही अकेला साथ चला
...अकेला मन ..२

अकेला मन अकेला मन क्या ये बुझे
क्या ये देखे इस निर्जन
मन ही मन से बात की
ठहर थोड़ा यंहा फिर चल कंही और चल


कौशल उप्रेती 
अरमानो की इस कश्ती को मिलते न कहीं भी राह नयी,
आशाये धूमिल हो जाती मंजील की है पहचान नहीं ,
दुनिया की देखा देखी कर बुन लिए नए सपने हंस कर ,
फिर भी मन को है भरमाती ये कही सुनी बाते अक्सर .




सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Wednesday, May 1, 2013

1 मई 2013 का चित्र और भाव



बालकृष्ण डी ध्यानी 
वो मेरी नींद

देख कर ये चित्र याद आ गया
वो फिर इन आँखों के सामने

वो मेरा दर्पण
वो मेरा छुटपन वो बालपन

कंहा छूट गया वो तकिया
वो मेरी नींद वो मेरा बचपन की

वो मन की तरंग हर पल
वो चैन सकुन मेरे दिन रात के

ना कुछ चिंता आज की थी
ना कुछ फ़िक्र कल की थी तब

बस ऊंघ वाली वो नींद मेरे सपनों की
कहनी जैसे थी कोई वो परी लोक की

निद्रालुता झलकती थी उस मन की
तन्द्रा आराम के मेरे उस पल की

झपकी वाली नींद
अब वो नींद कंहा रह गयी है बाकी

बस याद आ रहे
वो गुजरे दिन वो गुजरे पल आईने की तरंह

देख कर ये चित्र याद आ गया
वो फिर इन आँखों के सामने


दीपक अरोड़ा
अलमस्त होकर सोएं अभी हम बच्चे हैं
कभी हंसें कभी रोएं अभी हम बच्चे हैं
ना दुनिया की फिक्र न किसी का डर
शरारते करते हैं पर मन के सच्चे हैं..

कहते हैं हम हैं भगवान का रूप,
ना फटके छलकपट पास न लगे धूप
ना मारना कोख में हमें मा।
अभी हम कलियों से कच्चे हैं...
अलमस्त होकर सोएं अभी हम बच्चे हैं
कभी हंसें कभी रोएं अभी हम बच्चे हैं...

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
~एक हकीकत~
बीते दिन ...
ये दिन फिर न आ पाएंगे
चैन की नीद न सो पाएंगे
खिलौने संग न खेल पायंगे
क्या ये दिन फिर लौट पाएंगे?

आज......
बीते कल का 'रिजल्ट' आज में
आज की भाग - दौड़ 'अजेंडे' में
कल की 'टेंशन' दिलो दिमाग में
अपनों को छोड़ दूसरे 'लिस्ट' में

पाया - खोया....
बीते कल में आज को खोया
आने वाले कल में आज खोया
आज के लिए आज को खोया
आज को पाया आज को खोया


Jagdish Pandey
बचपन की कविता मेरी सरिता

याद आ रहा है आज वो बचपन का जमाना
दादा दादी की कहानी माँ का लोरी सुनाना
गइयों को चराना ताल - तलैयों में नहाना
याद आ रहा है आज वो बचपन का जमाना

.
खो गया हूँ आज बचपन की हसीं यादों से
गुजरे हुवे कल की उन सुनहरी ख्वाबों से
आओ मिल कर गाएँ लडकपन का तराना
याद आ रहा है आज वो बचपन का जमाना
.
साथ में सबके सोना और तकिये से लडना
भइया को चिढाना और दीदी से झगडना
बिस्तर ठीक करना और माँ का चिल्लाना
याद आ रहा है आज वो बचपन का जमाना
.
काश फिर आ जाये बचपन की जिंदगानी
कागज की मेरी कश्ती वो सावन का पानी
खेतों की बालियाँ दिखाती थी मेरी नानी
कितनी हसीं लगती है बचपन की कहानी

याद आ रहा है अपनें शेरू का वो याराना
कैसे भूल गया मूक प्राणियों को जमाना
काश लौट आये फिर गुजरा हुवा जमाना
याद आ रहा है आज वो बचपन का जमाना


अलका गुप्ता
हमें ना कुछ पता था |
दोस्त मेरा स्कूबी यहीं था |
मैं बचपन साथ उसके जी भर खेला |
प्यार की भाषा .......प्यार का भूखा |
जानूँ ..मैं भी ...और वह भी बस यही ||

कहना मत कुत्ता उसको |
दोस्त है मेरा .... स्कूबी वह |
थक कर सोया कभी वह कभी मैं |
ऊपर एक दूजे के ... बेखबर मस्त |
रखे ख्याल मेरा वह...मैं भी उसका ||

काम बहुत हैं |
व्यस्त हैं पापा-मम्मा तो |
दीदी तो गई है स्कूल पढने अपने |
मेरा स्कूबी और मैं..जी भर खेले हैं खूब |
मैंने फेंकी चीजें खूब ...दौड़ के लाया वह |
सो जाएं अब अलमस्त ये बचपन के दिन ||

Rohini Shailendra Negi
माँ ऐसा तु खिलौना ला दे,
सुख की नींद मैं सो पाऊँ,
आने वाला कल कैसा है...?
क्यों सोचूँ और घबराऊँ |

जीवन क्या है, क्या नहीं,
इस दौड़-भाग से परे रहूँ,
अपने नरम-नरम तकिये संग,
मीठी-मीठी बात करूँ |

जब सब कुछ मिथ्या है....फिर क्यों,
व्यर्थ मे चिंता वहन करूँ,
कल जो आए कल देखूँगा,
उसमें आज क्यों नष्ट करूँ |


कुसुम शर्मा
सो जा मेरे राजदुलारे, तुम हो मेरी आँखों के तारे
माना तेरे पास नहीं मै, पर तुझसे भी दूर नहीं मै
हरदम तेरे साथ रहूंगी, चारो पल में पास रहूंगी
निदिया रानी आएँगी, तुझको वो सुलायेंगी
चंदा मामा आएगा, झुला वो झुलायेगा
परियां रानी आएँगी, लोरी तुझे सुनाएंगी
मेरा राजा सो जायेंगा, निदिया में वो खो जायेंगा !

उस समय मै तेरे सपने में आकर, तुझ पर प्यार लुटाओंगी
तेरे नन्हे हाथो को छु कर, तुझसे लड़ लड़ाऊँगी
तुझ पर प्यार लुटाऊगी, तुझ को ये समझाऊगी
माना तुम मुझको देख न पाओ, लेकिन ये एहसास कराऊगी
चलते हुए तुम गिर जाओ, तो आकर तुम्हे उठाऊँगी

टौमी तेरे साथ रहेगा, तुम सोओगे वो सोएंगा, तुम खेलोगे वो खेलेगा
तुम दोनों की मस्ती देख कर, मै भी मस्त हो जाऊँगी
सो जा मेरे राजदुलारे, कल फिर मिलने आऊँगी
परियों के साथ मिलकर, तुझको तारो की सैर करवाऊँगी
सो जा मेरे राजदुलारे तुम हो मेरी आँखों के तारे !

भगवान सिंह जयाड़ा
कैसे भोला कितना मासूम यह बचपन ,
निश्चिंत निर्भय ,बेखौफ प्यारा बचपन ,
खेलना और खाना सदा खिलौनों संग ,
सोना ,जागना सदा इन खिलौनों संग ,
मन मर्जी का मालिक, होता बचपन ,
उसको जो चाहे वह सब पाता बचपन ,
कभी मम्मी के आँचल लिपटा बचपन ,
कभी पाप्पा की गोदी में खेले बचपन ,
कुछ खोने पाने की चिंता नहीं मन में ,
क्या करना है कल ,चिंता नहीं मन में ,
खेलना खाना और सदा रहे मस्ती में ,
हमें क्या चिंता ,चाहे लगे आग बस्ती में ,
भूख लगे तो चिल्ला चिल्ला कर रोऊँ ,
पेट भर गया तो पॊपि के संग भी सोऊँ,
कैसे भोला कितना मासूम यह बचपन ,
निश्चिंत निर्भय ,बेखौफ प्यारा बचपन ,



Bahukhandi Nautiyal Rameshwari 
इस भौतिकता के दौर में
माँ को प्यारा धन हो गया ।
बिलखता, सिसकता मासूम ..
इंतज़ार में माँ की सो गया ..
माँ की फटकार, अपनों का दुलार,
क्यूँ अंधी दौड़ में शुमार हो गया ?..
संतान इंसान की ही हैं देखो जरा !
क्यूँ फिर जानवर से गहन लगाव हो गया ।
दो कदम, दहलीज़ लांगते ..
वही दो कदम दिल की सीमा लांगते गर ..
रिश्तों में दूरी न होती ..
ज़िन्दगी हर इंसान की अधूरी ना होती ..
छुपा बैठा भगवान् कहीं भीतर मेरे ..माँ ..
कब से शैतान तुम्हारा भगवान् हो गया ।
अब यही जानवर मेरा बागवान हो गया ....


Himanshu Kharabanda
प्यार का जज्बा खुदा है, तोड देता दूरियाँ
माँ सी ममता जीव देवे, है नहीं मजबूरियाँ।
है अगर मासूम बचपन,मासूम ही जानवर का जीवन
पा लिया उसने खुदा को, प्यार मैं खोया जो तनमन।
********
ये जो उम्रे बचपन है बहुत मासूम सूरत है,
नहीं दरकार दौलत की,मुहब्बत की जरूरत है।
रुपयै की दौड मैं बेशक यहाँ इँसान है अँधा,
बेहतर हो गये जन्तु,जहाँ ममता की मूरत है।


किरण आर्य .
बचपन हाँ अल्हड
मासूमियत की
कहता ये कहानी ...

सोता है लाड़ला
ममतामई आँचल में
चेहरे पे एक मुस्कान मृदुल
खुशियों की है रवानी ...

माँ का स्नेह स्निग्ध सा
ममता हो रही विभोर
लोरी की जुबानी ....

ना खोना बचपन को
स्वार्थ के अँधेरे में
रहना प्रेम से लबरेज़
कहती मेरी नानी ......

बचपन हाँ अल्हड
मासूमियत की
कहता ये कहानी ...

Garima Kanskar 
बचपन होता है
चिंता परेशनी
से कोशो दूर
बस उसमे होता
आनंद भरपूर
जब हम थक
जाते है खेलते खेलते
तो कही भी
सो जाते है
आराम से
कर लेते है
अपनी नींद
पूरी
- गरिमा



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