Tuesday, July 30, 2013

27 जुलाई 2013 का चित्र और भाव



प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
~मेरे दोस्त - मेरे दुश्मन~
मित्र बन कर पीठ पर वार करते है
देकर फूल कांटे राह में बिछा देते है
बात अपनी लेकिन दूसरो से करते है
बन दोस्त दुशमनी का व्यापार करते है
मुंह में राम - राम बगल में छुरी रखते है
कल बीता बदल गया, हम आज में रहते है
जीत कर विश्वास मित्रो को अलग करते है
जानते है लेकिन भरोसे पर ही एतबार करते है
संभल जाना 'प्रतिबिंब', ये अब बनी रिवायत है
देता जख्म जमाना, जमाना ही करता शिकायत है


भगवान सिंह जयाड़ा 
बना के दोस्त ,पीठ पर बार न करना कभी ,
दे कर फूल दोस्ती का,कांटे न बिछाना कभी,

ऐतवार करते है तुम पर,धोखा न देना कभी ,
दोस्ती को दुश्मनी में न, ऐसे बदलना कभी ,

दोस्ती की तो,दिल दोस्त का न तोड़ना कभी ,
सुख दुःख में दोस्त से ,मुख ना मोड़ना कभी ,

अगर दोस्ती में ऐसा मुकाम, गर आये कभी ,
दिल पर हाथ रख ,एक बार सोच लेना सभी ,

बना के दोस्त ,पीठ पर बार न करना कभी ,
दे कर फूल दोस्ती का,कांटे न बिछाना कभी ,



बालकृष्ण डी ध्यानी
बेवफा दोस्त

दोस्त ने किया ऐसा काम
दोस्ती को किया बदनाम

देता रहा मै दुहाई
दोस्त, साथी मेरे भाई

गुल दोस्ती का मुरझा सा गया
पीठ पर दोस्ती का खंजर भोंका गया

अजनबी बना रहा वो सहचर
अगवा हुआ मै दोस्त हर मौड़ पर

सारांश दोस्ती का इतना हुआ
धोखा ही दोस्ती पर जख्म हुआ

जज्ब अब दोस्ती का सिमटा जाता है
हर कोई अब अनजाना नजर आता है

भेदिया, जासूस वो लंगोटिया यार निकला
बेवफाई का वो तो सौदागर निकला

दोस्त ने किया ऐसा काम
दोस्ती को किया बदनाम

देता रहा मै दुहाई
दोस्त, साथी मेरे भाई


डॉ. सरोज गुप्ता 
दोस्त !
याद है वो दिन
जब तुमने दिए थे
गुलाब के फूल
मुझे चुभे थे तब भी
बहुत शूल ,
तुम्हारे सहलाने से
हो गयी थी मैं कूल
समझ गई थी
दोस्ती का मूल-
प्यार ......प्यार !

दोस्त !
तुम हो क्या वो ही
चला आज खंजर
खून्नम-खून किया
देखो प्यार का मंजर
कर रहे दोस्ती की जमीं
बंजर .......बंजर !

दोस्त !
सामने से ली होती जान
यह जमीं यह आसमाँ
होकर तुझ पर मेहरबान
करते फूलों की वर्षा !
सुदामा और कृष्ण के किस्से
दोहराए जाते आज पुन:
एक मुट्ठी चावल जो दिए थे
उस पर कर देती अपनी जान
कुर्बान ........कुर्बान !

दोस्त !
तुम्हारे कहने से पहले
झाँक रही हूँ मैं भी
अपने ही गिरेबान
तुझे कहकर शैतान
मैं बन रही हूँ भगवान !
ताली एक हाथ से कभी
नहीं बजा करती ,
मैं रखूंगी तेरे ताप को सम्भाल
जब तक बर्फ सा तेरा मन
नहीं हो जाता -
पानी .........पानी !!


K Shankar Soumya .
धोखा प्यार फरेब के, अपने-अपने रंग।
आज सभी किरदार में, मिलते हैं ये संग।।
मिलते हैं ये संग, हुआ अचरज है भारी।
सत्य लगे अब झूठ, बनावट दिखती प्यारी।।
कहते हैं कवि 'सौम्य', मिला उसको ही मौका।
जिसने पल-पल छला, दिया अपनों को धोखा।।


नैनी ग्रोवर
मैंने दिए थे फूल तुझे, तू वार मेरी पीठ पे करता रहा,
मैंने पल-पल दिया साथ तेरा, तू चालें दुश्मन सी गड़ता रहा..

हैराँ हूँ मैं, हैराँ है दिल मेरा, ये तू ही है या और कोई,
मैंने दी दोस्ती की खुशबु तुझको, तू ज़हर बन के बिखरता रहा..

मैं बुनती गई दिन रात, प्यार के धागों से हमारी दुनियाँ, ,
ना जाने कब और क्यूँ, ये विश्वास का रिश्ता उधड़ता रहा ..!!


अलका गुप्ता 
बढ़ चले कदम यूँ ही वीरानों की तरफ |
खो रही थीं राहें अंधेरों में ....हर तरफ ||

डराते रहे साए से हादसों के फलसफे ...
बेबस सी खौफ में डूबी रही इक तडफ ||

बरगलाते हैं स्याह ये ...शैतानी आगाज़ |
मचाते रहे कत्ले आम बेरहम हर तरफ ||

बचा कर... इंसानियत को ...ऐ खुदा !
दिखा दे किरन..आस की.. हर तरफ ||

आवाद कर... 'अलका ' ... इक हौसला |
चेहरा.. अमन का ..मुस्करा दे हर तरफ ||

जगदीश पांडेय 
किया दोस्ती को तुमनें हलाल
फिर भी है क्यूँ मन में मलाल
मिली ये शोहरत कैसे तुम्हे
ता उम्र खुद से करोगे सवाल
हर मोड पे है दोस्ती निभाया हमने
जिसे आज तक न समझ पाया तुमनें
किया वही तुमनें जो कहा है सब नें
ये कैसी सजा आज दिया है रब नें

Chander Mohan Singla 
सोचता हूँ खोल लूं ,मैं भी तमंचों की दुकान ,
फूल मेरे शहर में बिकते नहीं हैं अब जनाब |
सुर्ख रंग अब फूल का लोगों को भाता ही नहीं ,
खून के रंगों से ही अब खेलते नित होलियाँ |
किस कदर था प्यार भाइयों में दीवारें थी कहां ,
तू है हिन्दू ,ये इसाई, वो है सिख ,मै मुसल्मा ||


सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Friday, July 26, 2013

25 जुलाई 2013 का चित्र और भाव




Janak M Desai .
हाँ, एहसास है अब, यह जीवन भी एक यंत्र है ,
तालमेल से चलता है तो लगता है एक तंत्र है ;
आधुनिक से जर्जरित होकर चला भी जाएगा ,
जाने से पह्ले जीना कैसे, वो जैसे एक मंत्र है |

Pushpa Tripathi 
- एक था टेलिग्राम .....

था एक टेलिग्राम कोई
वह बातूनी सा यंत्र है
संदेश आखर भर
त्वरित खबर भर
मानव अविष्कारी मंत्र है l

छोटी बातों में
नयाब असर है
इक जादू सा ढंग है
ब्रटिश जमाना था
एक खजाना था
तार तुरंत का अंत है l

जमाना बदला
ढंग सब बदले
रंग नए प्रचलित हुए
मोबाईल ने ले ली
जगह है बदली
हाथों हाथों में तंत्र है l


Chander Mohan Singla 
तार तार हो गयी तार ,
सुख -दुःख वो बतलाती थी |
मन घबराता देख तार को,
पर खुशियाँ दे जाती थी ||


अलका गुप्ता 
बीत गया ... वह लम्हा हूँ |
कभी ख़ुशी ... कभी गम हूँ |
मैं तार था .. बेतार कभी ..
आज ऐतहासिक संचार हूँ ||


जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
तार....

आता है वो जाता है,
जहां है उसका धाम,
आया था और चला गया,
तार कहो या टेलीग्राम...

मोबाईल ही बन गया,
कैसे उसका काल,
जब किसी का मन करे,
पूछो परिजनों का हाल.....

लाता था डाकिया जब,
घबराता था मन,
हो गया अल्विदा आज,
हृदय से उसे नमन....


भगवान सिंह जयाड़ा
तार हो गया अब बेतार ,
यादो में रहेगा बेसुमार ,

लाता था कभी खुशिया,
कभी दुख दर्द की खबर,

नयाँ दौर नई तकनीकी ,
क्यों पल का इन्तजार,

इस लिए अलबिदा अब ,
आज तार का इन्तजार,

फिर भी इतिहास कहेगा ,
तार था कभी एक आधार ,

अपनों के दुःख दर्द में जब,
जानने हम रहते थे बेकरार,

तार हो गया अब बेतार ,
यादो में रहेगा बेसुमार ,


किरण आर्य 
टेलीग्राम है आया
आया आज एक तार

सुनते ही दिल लगता था
बल्लियों उछलने हज़ार

कभी लाता था खुशियाँ अपार
कभी सुनाता दुख का समाचार

आह वो तार अब हुआ है बेतार
बीते ज़माने सा वो साधन संचार

लील गई उसे विकास की बहार
पहना दिया उसे फूलो का हार

मोबाइल इंटरनेट का है बाज़ार
मिनटों में पहुचे हर समाचार

पर भूल ना पायेंगे तुम्हे ए तार
तुम्ही तो थे पहले साधन संचार


बालकृष्ण डी ध्यानी 
टेलीग्राम

बस आज तक
जो था कल तक
उस १६० साल की सेवा को
मेरा सलाम

अंतिम तार
राहुल के नाम
यू.पी.ये. के दिन
अब रह गये चार

तू भी ना सह पाया
अपनों का ये साथ
अकेला ही पड़ा रहा
तू कितने साल

याद जब आयेगा
खुशी और गम में तू
कभी हंसायेगा
कभी रुलायेगा

अलविदा ..अलविदा
वो टेलीग्राम
आखीर तूने भी
साथ छोड़ दिया आज


जगदीश पांडेय 
गुजर गया वो हसीन लम्हा
जब तार आया करता था
कभी लाते संग गम के आँसू
कभी मुस्कान समाया करता था

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~सलाम टेलीग्राम~

सेम्यूल मोर्श की सोच ने विश्व को दी थी ये नई सौगात
दूर संचार में हुई क्रांति, जब टेलीग्राम का हुआ अविष्कार
२४ मई १८४४ को पहला टेलीग्राम वासिंगटन से बाल्टीमोर
संक्षिप्त में हर खबर पहुँचाने का फिर देश में हुआ विस्तार

छुट्टी आना हो, नौकरी मिलना हो या फिर हो कोई भी अवसर
टेलीग्राम से ही मिलता था तुरंत ही खुशी गम का हर समाचार
१६३ साल की संस्कृति को अब सदा के लिए लग गया विराम
इतिहास हुए अब मशीन की वो टूक-टूक-ट्रा, तारबाबू और तारघर

नई तकनीक का आना और फिर उसका यूं हमें विदा कहना
समझा गया हमें, जिन्दगी और रिश्तो का भी हाल यही होगा
चला गया उसे जाना था 'प्रतिबिंब', नई सोच को स्थान दे गया
अब म्यूजियम की शान बनेगा, टेलीग्राम तू हमें सदा याद रहेगा



नैनी ग्रोवर 
क्या ज़माना था,
बड़ जाती थी धड़कन दिल की,
जब आता था तार,

इक्कठा हो जाता था,
सारा मौहल्ला, जब आता था तार,
अरे क्या हुआ,क्या हुआ,
गूंजती थीं आवाज़े,
लगते थे सभी अपने,
जब आता था तार,

अब तो किसी को,
किसी से मतलब ही नहीं,
हर किसी की जेब में,
दो दो मोबाइल पड़े रहते हैं,
अपने ही अपनों से बात करने को,
तरसते रहते हैं,

अब हो गए बेमानी रिश्ते,
खो गए वो संस्कार,
अब नज़र ना आयेगा,
देख बदलती दुनियाँ ने,
रुखसत कर दिया है तार__!! 


सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Thursday, July 25, 2013

23 जुलाई 2013 का चित्र और भाव



सुनीता पुष्पराज पान्डेय 
सुन मेरी मुन्नी सुन मेरे मुन्ना
ना खाना तुम आँगन वाड़ी का खाना ,
कही बाद में पडे न पछताना ,
मै दे न पाउंगी भर पेट खाना ,
मेरे आँख के तारो कम खाना
पर नही पडेगा जान गंवाना ।


जगदीश पांडेय 
खाई जब ठोकर जमानें की
तो समझ में आई बात एक
असहज सी लगनें वाली तू
जिंदगी तेरे रूप हैं अनेंक

कभी तू हँसती कभी तू रोती
कभी अचरज में हो जाती तू
पल में दिखा के ख्वाब अनेंक
मन को लुभा जाती है तू

कुछ भी हो कैसी भी हो
हो एक अद्भुत पहेली तू
हर एक रूप में सजनें वाली
मेरी एक सहेली है तू


Pushpa Tripathi
 - हंस ले जरा .....

उदास होता है तू
रे मन, कुछ बोल भी देता है तू
फिर उसका असर
चुप हो जाता है तू
मन तू
काहे धीर न धरता
मन को मारता
जीता है तू
हँस ले
बोल ले
कहकर देख
अपनी बात जरा
कुछ बनेगा
क्या बिगड़ेगा
जो होगा
सो होगा
देखा जाएगा
रे मन ... तू चला चल
स्वयं को झांक
क्या मिला है
क्या मिलेगा
क्या खोएगा
क्या पाएगा
मन को जीत
जीतकर जी ले
सुख सभी
यही पायेगा
रे मन .... तू हंस ले जरा l


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
तू चाहे तो
रो कर गम भुला
तू चाहे तो
चुप रह खुद को सता
तू चाहे तो
मुस्करा कर आगे बढ़

जानते है
हर पल एक सा नही रहता
सुख दुःख
का साया साथ है चलता
जीने के लिए
मुस्करा कर आगे बढ़


किरण आर्य 
ए मन तू ना भरमा
सुख दुःख आते जाते
रोकर ग़मों को ना बढ़ा

रोना है क्यूकर
कर ग़मों का सामना
ए मन तू डटकर

शांत कर चित को
हाँ वैसे ही
जैसे बारिश के बाद
शांत सा होता है गगन

देख खुशियाँ अनगिनत
बिखरी पड़ी चहुँ और
उनके संग तू मुस्कुरा

जरा हाथ तो बढ़ा
इनके संग हंस
थोडा सा ले गुनगुना

ए मन तू ना भरमा
सुख दुःख आते जाते
रोकर ग़मों को ना बढ़ा



बालकृष्ण डी ध्यानी 
रंगरेज मेरे

उदास भरी राह है
मंजील यंहा है
डगर कंहा है
ये उष्ण रंग
ये लाल रंग
ना तेरे कोई संग

स्तभ है
अचंभित है तू
देख ज़माने के रंग
हरा आज हैरान है
ये शांत रंग
परेशानी हरदम तेरे संग

खिल खिला तू
मिल मिला तू
अपनों में रचा तू
गैरों में सजा तू
ये पीला रंग
सिलसिला जुडा तेरे संग


कुसुम शर्मा 
ज़िन्दगी को ऐसे जियो जो भी हो हंस कर जियो
ये मिलती नहीं है बार बार तो क्यों किसे रो कर जियो
सुख हो या दुःख मान लो एक समान
ये ही तो ज़िन्दगी के दो पहलु हैं
तो क्यों इसे अलग अलग जियो
जो भी हो हंस कर जियो
जो ज़िन्दगी में आये दुःख के पल
तो उसे न ज्यादा दुःख से जियो
जो ज़िन्दगी में आये सुख के पल
तो उसे न ज्यादा ख़ुशी से जियो
हर हाल में उसे एक समान जियो
ज़िन्दगी तो जिन्दादिली का नाम है
ये सोच कर जियो
जो भी हो हंस कर जियो


Pushpa Tripathi 
- रे मन .....

दुःख में बावला
बना क्यूँ गुब्बारा
तू मन हार
दूर चला
पल में दुःख
पल में सुख
तू द्वंदों में फंसा हुआ l
करनी तेरी
पार उतरनी
जैसा भी तू
सोच रहा
बुद्धि चातुर
सब में आतुर
अधिक आनंद घबराया हुआ l


डॉ. सरोज गुप्ता 
रंग जा गौरी
~~~~~~~~
रंग में भी हैं रंग ,
नाच रहा मन कुरंग,
देख, क्यों है दंग,
यह नहीं है कोई जंग ,
न ही कोई उड़दंग ,
बेरंग जीवन है नंग,
रंग से है जीवन यंग ,
रंगों से सजा ले गौरी ,
तू अपना अंग -अंग !

राग का रंग -
गर्म खून का रंग-
हिंसा का रंग -
लाल -लाल -लाल !
सीमाओं का उल्लंघन
करता हलाल
न कर मलाल
जब तक रहे सिग्नल
लाल -लाल -लाल !
न हो उदास
समझो खतरा
चलो पेंतरा
रुको ,रहो सचेत
बचे रहोगे -
बाल -बाल -बाल !!

रंग में भी हैं रंग ,
नाच रहा मन कुरंग।
देख, क्यों है दंग,
यह नहीं है कोई जंग ,
न ही कोई उड़दंग ,
बेरंग जीवन है नंग,
रंग से है जीवन यंग ,
रंगों से सजा ले गौरी ,
तू अपना अंग -अंग !

लाल रंग में है आग
आग का ईंधन मैं हूँ गौरी
हरे रंग में रंग जा कोरी
सरपट दौड़ पार कर पौढ़ी
मुझमें रंग बदल दूँ ढंग
प्रकृति के ये सतरंगी रंग
पी ले मुझे गटक -गटक
चल नाक की सीधी सडक
मुझसे पायेगी ठंडक !
हरा -हरा -हरा !

शान्ति का दूत हूँ मैं ,
आँखों का सकून हूँ मैं,
प्रकृति का प्रतिरूप हूँ मैं ,
रंग भरा हरा भरा हूँ मैं ,
खून बनाता,बढाता हूँ मैं ,
हर मर्ज की दवा हूँ मैं ,
भरा -भरा -भरा !!

रंग में भी हैं रंग ,
नाच रहा मन कुरंग,
देख, क्यों है दंग,
यह नहीं है कोई जंग,
न ही कोई उड़दंग ,
बेरंग जीवन है नंग,
रंग से है जीवन यंग ,
रंगों से सजा ले गौरी ,
तू अपना अंग -अंग !

पहन लाल-हरी चूड़ियाँ
रंग ले गौरी पीले हाथ
गगन के पार है तेरे नाथ
तेरे मुख मंडल की ऊर्जा
दे रही शुभ -संकेत
सूरज से पाया तूने तेज
तेरा बना रहे यह क्रेज
पीला -पीला -पीला !

चोट पर करने से चोट
निकलते हैं रंग
लोहा काला सही
गर्म लोहे पर करोगे चोट
रंग करेंगे चकाचौंध
नया होगा तुमको बोध
विश्व में फैलेगा
आमोद -प्रमोद
न करना गौरी आँचल
गीला -गीला -गीला !!

रंग में भी हैं रंग ,
नाच रहा मन कुरंग,
देख, क्यों है दंग,
यह नहीं है कोई जंग ,
न ही कोई उड़दंग ,
बेरंग जीवन है नंग,
रंग से है जीवन यंग ,
रंगों से सजा ले गौरी ,
तू अपना अंग -अंग !


सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Tuesday, July 23, 2013

22 जुलाई 2013 का चित्र और भाव



दीपक अरोड़ा 
जय हो गुरू जी
आशीर्वाद दो कि सच्चाई पर चलें
बुराई का करें डट कर सामना
हर पल हम अच्छाई पर चले
मुश्किलों से न घबराएं
किसी काम से न शरमाएं
आप ही हमारा हाथ थामना
हर पल आपका ध्यान धरें,
शब हो, सहर या फिर शाम ढले
जय हो गुरू जी
आशीर्वाद दो कि सच्चाई पर चलें


Chander Mohan Singla 
राह दिखाए कौन गुरु बिन,
आओ मनाये ये पावन दिन ,
ज्ञान गुरु बिन नहीं है पाता ,
गुरु ही सच्चा पाठ पढ़ाता ||


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल .....
कर्म - धर्म का हमें जो है पाठ पढाता
संस्कृति और संस्कार है जो सिखाता
शिक्षित समाज का निर्माण है जो करता
ज्ञान से अपने, इंसान को है जो तराशता
सच्चाई इमानदारी से हमें है जो मिलवाता
सही मानो यही है जो सच्चा गुरु कहलाता
गुरु शिष्य परंपरा बनी रहे, है प्रार्थना जो करता
समस्त गुरुओ को ये शिष्य है जो प्रणाम करता


Pushpa Tripathi 
- अन्धकार सब हरते है .....

जीतकर हार या
हारकर जीत
सब मुक्कदर
का खेल चला
जाना हुआ
सिकंदर को भी
जो जीतकर दुनिया चला l
पल में राख
पल में खाक
सब रिश्तों
में बैर चला
पाया न कुछ
अंत हाथ में
देह मानव छोड़ चला l
गुरु का ज्ञान
ज्ञान महान
सब जन्मों का
साथी है
दशा बदलते
राह दर्शाते
जीव सक्षम हो जाते है l
पेड़ की छाया
छाया ही सुख
कृपा गुरु
सब करते है
मनोबल फल
तत्व का ज्ञान
अन्धकार गुरु ही हरते है l


भगवान सिंह जयाड़ा 
आवो गुरु पर्व पर ,ज्ञान का दीप जलाएं ,
सच्ची श्रधा से ,गुरु जनों को शीश नवाएं ,

दूर करें मिल कर ,अज्ञान का अंधियारा ,
गुरु कृपा से हो ,जग में ज्ञान का उजियारा,

सदगुरु की महिमा जग में है ,अपरम्पार ,
गुरु चरणों का बंदन करते, हम बारम्बार,

गुरु कृपा से ही जग में, ज्ञान की गंगा बहे,
जले ज्ञान का दीपक,कहीं न अन्धकार रहे ,

आवो गुरु पर्व पर ,ज्ञान का दीप जलाएं ,
सच्ची श्रधा से ,गुरु जनों को शीश नवाएं ,


भरत शर्मा 
जीवन में जरूरत है . . . एक गुरु की ... ,,

एक मार्गदर्शक की .. एक परम ज्ञानी की ..
एक पथ प्रदर्शक की .. एक आत्मज्ञानी की ..

एक शुभ दायक की .. एक सत्य राही की ..
एक शुभचिंतक की .. एक सच्चे साथी की ..

जो मोक्ष दायक है .. सच्चा सहायक है ..
अज्ञान के अंधकार में ज्ञान का प्रकाशक है ..


अलका गुप्ता .
गुरु कृपा से
मिटे अज्ञान सारा
जीवन धारा |

ज्ञान ज्योति ..
पथ प्रदर्शक वो
आलोकित हो |

गुरु पर्व है
महिमा मंडित वो
वंदना करें |



जगदीश पांडेय
गुरु की महिमा अब क्या कहूँ शब्द नही मिलि पाए
बरस जाये कृपा जो गुरु की तो सारा जहाँ मिलि जाए

हीरा मोती सोना चाँदी करि लाख जतन तू भर
बिन गुरु कृपा खाक समान है कुछ मनन तू कर

जब रही जवानी किया मौज तू अब रहा बुढापा ढोय
जान सके तो जान ले बिनु गुरु कृपा न कछु घटि होय


बालकृष्ण डी ध्यानी 
मेरे गुरु

प्रथम गुरु चरण
में शीश नवावों
जिह्वा से अब मै
गुरु बखान कराओं

गुरु मेरे मुझे
अक्षर ज्ञान करायें
इस भव सागर से
मेरी नौका पार करा ये

भीमकाय वट वृक्ष
गुरु का अंतर कर्ण
आचार्य मेरे है
उपदेशों का ग्रंथ

वज़नी है उनकी शिक्षा
उनके हाथों मिली मुझे दीक्षा
शत शत नमन गुरु को
आशीष मिले सदा इस भिक्षु को

ज्ञान कटोरा मेरा
रहा हरदम खाली
गुरु की किर्पा से अब
लबालब है सवाली

श्रदा पुष्प सुमन
गुरु चरण में चढाओं
रहे नमन मेरे मन
उस में रहे गुरु चरण

सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Sunday, July 21, 2013

19 जुलाई 2013 का चित्र और भाव



भगवान सिंह जयाड़ा
भाव भीनी श्रदांजलि हमारी उन सब को ,
सदा के लिए छोड़ कर चले गए जो हम को,

जो कभी न लौट सकेंगे वापस अब यहाँ ,
आपदा में छोड़ चले गए है जो यह जहाँ ,

दुःखी और रोते बिलखते परिजन उनके ,
सदा के लिए बिछुड़ गए ,अपने जिनके ,

आत्म शान्ति की ,उनकी दुवा करते है ,
परिजनों को धैर्य दे,प्रभु से दुवा करते है

जला के कैंडल ,श्रदांजलि अर्पण करते है ,
मिर्तकों की आत्मशान्ति की दुवा करते है ,

प्रभो अब न कभी ,इस तरह तांडव करना ,
हाथ जोड़ बिनती हमारी ,अब ध्यान धरना ,

विनाश का यह खेल अब कभी न खेलना ,
जो भूल हुई हो इन्शान से ,वो माफ़ करना ,

भाव भीनी श्रदांजलि हमारी उन सब को ,
सदा के लिए छोड़ कर चले गए जो हम को,

Chander Mohan Singla 
आओ ! दीप से दीप जलाएं ,
अंधियारों को दूर भगाएं |
पीड़ित ,शोषित दुखियारी के ,
दु:खों पर मरहम लगायें ||


भरत शर्मा
श्रद्धांजली स्वीकार करो
है शूर-विर बलवानो .. ,
'भरत' करे सलाम तुम्हेँ
मेरे भारत के रखवालों .. !!


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
...... बहुत जला ली मोमबत्ती ---
हम हर घटना पर
मोमबतिया जला
सडको पर उतर आते है
लेकिन, दोषी फिर भी बैखोफ
मुस्कराते नज़र आते है
कुटिल हंसी उनकी
खुद को शाबासी देती है
जानते है जनता का मिज़ाज
दो दिन है करती शोर
फिर गुम कहीं हो जाती है

सच है मोमबतिया जला
अपना फर्ज पूरा समझते है
फिर घर बैठ खर्राटे भरते है
दूसरी घटना के लिए फिर
हम खुद को तैयार पाते है

कोस कर सरकार को
नारों से अलंकृत करते है
आती जब बदलने की बारी
वोट देते नही छुट्टी का मज़ा लेते है

बहुत जला ली मोमबती
जला दो अब उस सोच को
आप बदलाव है अब दिखा दो
पहचानो लो वोट की शक्ति को
भ्रष्टाचार या हो अत्याचार
आओ सबक सिखाये
इसके जिम्मेदारो को



बालकृष्ण डी ध्यानी 
मोमबतीयाँ बुझा दो..

फिर जला और
वो बुझ गई
जागा था वो
फिर सो गया
फिर जला और
वो बुझ गई .......

उठी थी आवाज कंही
अब कंही दब गयी
चले थे कदम साथ साथ
अब अलग से वो हो गये
फिर जला और
वो बुझ गई .......

इंसाफ इंसाफ
पुकार था वंहा सब ने
वो डगर अब वंहा पर
चुप और शांत हो गई
फिर जला और
वो बुझ गई .......

जली थी वंहा वो मोमबती
पिघली थी वंहा वो मोमबती
बस कुछ देर कुछ पल
सिसक सिसक कर
वो बुझ गई......वो बुझ गई.....वो बुझ गई


कुसुम शर्मा
मोमबत्तियां जला कर हम श्रधांजलि तो देते हैं
पर क्या उनके घरो को उजालो से भर पाते हैं
जो सपने कभी देखे थे उनके माँ बाप ने
क्या हम उन्हें वो सपने दे पाते है
रोज लुटती है आबरू किसी न किसी की
किसी न किसी रूप में
क्या हम उन्हें बचा पाते है
सच्ची श्रधांजलि तो तब होगी
जब होगा उनके घर में उजाला
जब मिल कर हम लेगे ये प्रण
न लुटने देगे किसी को हम
मिलेगा उनका अधिकार
चाहे ज्यादा हो या कम
वन्देमातरम



Janak M Desai .
लो, आज मैं ऐसा दीप जलाऊं
जिसे बाहर से भीतर ले जाऊं
जो अंधियारा छाया है मुझ में
वो अंधियारे कि आग जलाऊं

बारबार हम सब ने है जलाई
मोमबत्ती, जो सड़क तक आई
दो पल हमने जो दो आंसू बहाए
उन आदतों को भस्म कर पाऊं

लो, आज मैं ऐसा दीप जलाऊं
जिसे बाहर से भीतर ले जाऊं



Pushpa Tripathi 
..... हम मोमबत्तियां जलाते है .....

धरा की ऊँची ऊँची रेखा पर
पर्वतों के ऊपर
लहरों से उठ उठकर
टंकार मचाते ... चितकार धमनियों से
बहते चपल वेग में
ये कौन निकलता है ?
मौत को ग्रास बनाने
नैसर्गिग स्वर्ग विनाश करने
आपदा दंड .. कष्ट उड़ेलने
विपदा के हलाहल में
भूमि पर बाढ़ l
बह निकले कई ऐसे लोग
जो दर्शन हेतु आये थे
नहीं बचा उनका भी संसार
जो रहिवाशी रह जाते थे
श्रद्धांजलि कई ऐसे अपनों को
हम याद उनको करते
बेकसूर कई जानों पर
हम मोमबत्तियां जलाते है
शांत आत्मा को समर्पित
दीप हम जलाते है
रौशनी हो उनके रूहों में
हम मोमबत्तियां जलाते
हम मोमबत्तियां जलाते है ...!!!



अलका गुप्ता 
जलती है जब साथ मिलकर
मोमबत्तियाँ ये ज्वालाओं सी |
एक साथ प्रज्वलित होती हैं ...
सीनों में जैसे ज्वालाएँ सबके ...
आघातों से प्रतिघातों की ...
वेदनाओं से संवेदनाओं की....
मिलकर रोती हैं पिघल-पिघल |
बढ़ते हैं हाथ थामने को विकल |
परिवार एक ही है ..ये इंसान |
कुचल देंगे समाज का हर हैवान |
भूल न जाना बस ये आगाज |
आग लगी है जो सीने में आज |
मिटा देंगे कालिमा ये समाज की |
तत्परता से ...अब पुरुषार्थ की |
हर मन में जागा हो विशवास |
अँधेरा दूर.. करेंगे मिल प्रकाश |


डॉ. सरोज गुप्ता 
एक काम करोगे
~~~~~~~~~`
मुझ पर थोड़ा-सा रहम करोगे !
मुझे कोसना कुछ कम करोगे !!

नन्ही चींटी ने किया हाथी को बेदम !
अपने टेसुए बहाने कुछ कम करोगे !!

अंधेरो से लडनी है उजालो ने जंग !
तारों की गिनती गिननी न कम करोगे !!

कुछ तो पतंगे गिरेंगे उनके भी घर !
मुझे जलाना देखो न कम करोगे !!

एक चिंगारी ही बन जाती है अंगार !
अपने हौंसलों को देखो न कम करोगे !!

रोंदी हुई मिटटी से बनती है मीनार !
मेरी कीमत आंकनी कैसे कम करोगे !!


जगदीश पांडेय
बहुत निकाली जुलुस हमनें
निकाला न हमनें मन का बैर
आओ चलें इक राह पर
हम भूल कर मन का बैर
यहाँ वहाँ न जाइये
न रोशनीं जलाइये
कर सको तो इतना करो
नफरत को भगाइये

किरण आर्य 

जब आक्रोश दिल का देता है रुला
मोमबतियां जला लेते है
कुछ इस तरह ग़म को अपने
आँखों में पनाह देते है

आक्रोश जब ना पाए राह
शब्दों में बसा लेते है
उतरकर सडको पे निकल घर से
दुःख को अपने नशा देते है

रुदन जो हलक में फंस गया कहीं
इस तरह उसको सहला देते है
संगठित हो निकलेगा कोई हल जरुर
आस का एक दीया जला देते है

ठोकरें खा मिलता नहीं मुकाम कोई
रोकर दिल को बहला लेते है
जब आक्रोश दिल का देता है रुला
मोमबतियां जला लेते है



सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Thursday, July 18, 2013

15 जुलाई 2013 का चित्र और भाव



ममता जोशी 
आकाश में केवल शब्द था,
फिर वायु ने स्पर्श दिया,
जल ने रस का भान कराया ,
फिर अग्नि रूप का आगाज़ हुआ,
पृथ्वी सुगंध के साथ आई ,
और बर्ह्माण्ड का निर्माण हुआ,
पञ्चतत्व और पञ्चसंवेदनाओं से ,
एक तरंग उठी उत्पत्ति की,
सृष्टि मुखर हो उठी ,
तब जीवन का आह्वान हुआ |


अलका गुप्ता .
जीवन चक्र है यही ...
जन्म के बाद ...
रेंगता ...
चलता ...
बढ़ता ...
चढ़ता ...
जीवन के सोपान अनेक !
कैटरपिलर सा ...
धारता चोले अनेक !
रंग-रंग के रंग भरे ...
दुनिया देखे रोज !
देख-देख के दुनिया सारी ...
रंग बदलता ...अनेक !
भांति -भांति के सपने पाले ...
भांति-भांति के फूलों वाले ...
मंडराता माया माहीं ...
तरह-तरह के भोग -भोगके
जीवन के दिन चार !
यूँ ही उड़ जाता ...
तितली के ..
मानिंद !
दुनिया के उस पार !!


Pushpa Tripathi ..... 
पृथ्वी के गंध से कितने जीव उभरते है
जीवन की तलाश में रेंगते चलते उड़ते है
कीट पतंग कितने स्वाभाविक जन्म आकर बदलते है
जीविका के कारण वो भी परभक्षी बन जाते है
सृष्टि है जीवन दायनी सृजन पालन करती है
हरियाली के रंगों पर ही भोजन प्रदान देती है
सरक रही है नन्ही सी 'लारवा' कदम दर कदम बढाती है
समय में ढल कर थोड़ी और बढ़कर, तितली बन फिर उड़ जाती है
समय सबके समान ही चलते चाहे कर लो कितने ही रोक
जीवन चक्र है घूमता रहेगा एक के बाद दूसरा उम्र आकार l



Bahukhandi Nautiyal Rameshwari 
था क़ैद गर्भ में ..
अब अस्तित्व स्वछंद हुआ ..
कभी गिरा ..
कभी संभला ..
यूँ बढ़ना जीवन की ओर ..
मंद मंद हुआ ..

देखी दुनिया ..
देखे दुनिया के अनेको रंग ..
उड़ने को जी आतुर हुआ ..
पर लगे मेरे ..
तमन्नाओं के ...
बाल सुलभ ह्रदय ..
बगिया बगिया फुर्र हुआ ..

कहती दुनिया पर निकल आये ..
जीवन इन्द्रधनुषी बिता ..
इक छोर जीवन ..
दूजी छोर मृत्यु ..
यूँ शनै शनै जीवन चक्र ...
पूर्ण कर आये ...

बीज गिरा धरा पर।।
बीज से नन्हे पौध ..
पौध पे खिले कली ..
कली बने महकता फूल ..
फूल गिरे फिर धरा पर…
जीवन का चक्र यही ..
काहे मानुष, जिह्वा रखे शूल ?
अंत तय सभी का ..
अहंकारी तू ना भूल



बालकृष्ण डी ध्यानी 
वो तितली

रेंगता हुआ
कंहा चला
कुछ पल बाद
वो उड़ चला............

सोच ना था
उड़ान पंख की
पहचान बस
उस उमंग की
वो उड़ चला............

रंग बिरंगी
रंग लगाकर
सपनो के वो
पंख लगाकर
वो उड़ चला............

नये विचार
नये आयाम
नये ख्याल लेके
करने वो आगाज
वो उड़ चला............

रेंगता हुआ
कंहा चला
कुछ पल बाद
वो उड़ चला............



जगदीश पांडेय 
मैं भी जग में नाम करुंगा

निज सारे काम करुंगा
आज अवस्था बालपन की
कल सपनें सब साकार करुंगा
मैं भी जग में नाम करुंगा

ये दुनियाँ रंगबिरंगी है
सपनें सब सतरंगी है
तमन्ना है आकाश छूनें की
पोंर की अभी जरा कुछ तंगी है
.
समय का पहिया चल रहा है
आकार मेरा अब बदल रहा है
दुनियाँ होगी मेरे दायरे में
मन मेरा ये कह रहा है


Janak M Desai .
मालुम न था, मैं उड़ पाऊंगा,
मालुम न था कि मैं बदलूँगा,
चलता था बस, फिर उड़ पाया
कल क्या लाए, मैं अब बदलूँगा |


भगवान सिंह जयाड़ा
कुदरत ने भी क्या जीवन चक्र बनाया ,
आँख मूंद कर हर प्राणी जग में आया ,

आँख खुली जब ,रेंघ कर चलना सीखा,
दुनिया कितनी है ,तब आँखों से देखा ,

ख्वाइस लिए सुन्दर पंखों की तन पर ,
वह नित पल पल पढ़ता ही चला गया ,

एक दिन ,सुन्दर पंखों से सुसज्जित ,
स्वछन्द आसमान में वह उड़ गया ,

चाहतों की राह पर संघर्स बहुत है यहाँ ,
लेकिन बिना संघर्स,कुछ नहीं इस जहां ,

कुछ पाना है जीवन में,तो चाहत जगावो ,
तितली की तरह , चाहत के पंख लगावो ,



प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
..... जीवन चक्र ....

जीवन का अस्तित्व है जीवन चक्र
जन्म से लेकर ये मौत तक का क्रम
ये सांस से साँस उखड़ने तक का चक्र
रोज पालते फिर भी अमर होने का भ्रम

भूल जाते है हर पल, अंतिम सच जीवन का
कर्म धर्म होते स्वार्थ से, बहाना होता जीने का
दुसरे का मन टटोले, भेद न खोले अपने मन का
समाज के प्रति भाव नही, दोष बताते दुसरे का

साँस आज आई है जीवन नया मिला है
बचपन बीता बिना परवाह सब खेला है
जवानी में तो लगता किस्मत का मेला है
किसी को सुख तो किसी ने दुःख झेला है
बीते जैसे भी पल फिर बुढ़ापे से मिलना है
वक्त पर फिर हमें अंत का सामना करना है

जीवन में हमारा कर्म - धर्म हो केवल सच्चा
पाया है जो जीवन, कर जाए हम कुछ अच्छा
प्रेम विश्वास संग 'प्रतिबिम्ब, ईमान हो सच्चा
शिक्षित व् स्वस्थ हो देश का हर बच्चा बच्चा


किरण आर्य 
जीवन चक्र और उससे बंधे हम
जीवन और मृत्यु
सिक्के के पहलु दो
दो शाश्वत सत्य
ख़ुशी और ग़म
आंसू में है बंधे
ख़ुशी के आंसू
मातम के आंसू
आंसू हँसते
कभी रोते से
सत्कर्म और दुष्कर्म
पाप और पुण्य
अच्छाई और बुराई
मानव या अमानुष
सब सोच पर निर्भर
हाँ सोचना है तुम्हे
कैसे पूरा हो ये
जीवन का चक्र


सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Sunday, July 14, 2013

11 जुलाई 2013 का चित्र और भाव


भगवान सिंह जयाड़ा 
आस्था में कहां भूल हुई, हमसे हे भगवान।
इस तरह जो यहाँ आज तवाह हुवा इन्शान॥
आस्था पर आज कैसे टूटी है यह आपदा।
किस भूल का नतीजा ,दे गयी यह आपदा॥
दर पर तेरे आये थे,लेने खुशियों की चाहत।
क्या पता था ,भावनाए होंगी आज आहत॥
कोप कुदरत का टूटा यहां यूँ पहाड़ बन कर।
आज बिवश है सब ,अपनों को यूँ भूलने पर॥
आस्था में कुछ न कुछ ,अब कमी आ जायेगी।
डर और खौफ से इस तरह यह, डगमगायेगी ॥
वह बिश्वाश फिर से हे प्रभु ,सब में लौटा देना ।
भूल का अहशाश हो,और श्रधा फिर लौटा देना
आस्था में कहां भूल हुई, हमसे हे भगवान।
इस तरह जो यहाँ आज तवाह हुवा इन्शान ॥


जगदीश पांडेय 
देखो तबाही का ये मंजर न समझो इसे अब
अन्यथा
आस्था विपदा का ये मिलन अब सोचनीय
रहे सर्वथा

कुछ तो भूल हुई ही होगी जो विधाता हमसे
रूठ गया
आस्था विपदा के मिलन में अपनों से नाता
टूट गया

मानस पटल पर अंकित है यहाँ देवों के सब
धाम
नाम मात्र से बन जाते हैं जहाँ सब बिगडे
काम

लेकिन -
दुनियाँ रचनें वाले के संग मानव तूनें ढोंग
रचाया है
इसलिये जगत में दीश उसनें अपना प्रलय
रुप दिखाया है

वक्त है अभी सम्हल जाओ न छेडो कानून
कुदरत का
आस्था यूँ रह जायेगी बनोगे कारण उसकी
नफरत का


बालकृष्ण डी ध्यानी 
मै बह गया

आस्था
बह गयी

धारणा
बस रह गयी

श्रद्धा ने
झकझोर दिया

मत मेरा
अब कमजोर हुआ

ईमान अब
डामाडोल हुआ

प्रत्यय ही
ये सब मेरे साथ हुआ

दोषसिद्धि की
खाईयों में मै डूबा

धारणा ने मन
ऊँचाईयों को सुना

मैंने खुद तानाबाना बुना
आस्था विपदा के बीच चुना

अब वो भी धराशायी हुई
प्रतीति से रुसवाई हुई

विश्वास ने
मेरा भरोसा तोड़ा

निष्ठा ने
आस्था का मार्ग छोड़ा

सहारा बस
बहते बहाव का था

विपदा ने
वो भी किनार ना छोड़ा

दुःख ने घेर
इस तरहा मुझ को

संकट ने
उस मार्ग का डेरा ना छुड़ा

आपद्‍ की
हाई हाई मची

यूँ भयंकर
मेरा बुरा हाल हुआ

गांठ ही नही रही
गट्ठा कंहा छुट गया

आस्था और विपदा में
मै बह गया



अलका गुप्ता 
दुहता प्रकृति को ..क्यूँ हैवान है |
रहेगी प्रसन्न .. वह ..तो वरदान है |
आस्था ...बन गई विपदा.. तब |
होने लगे संसाधनों के विकास जब |
देवभूमि ..धाम चारों हुए पास अब |
वान्यप्रस्थ था पड़ाव अंतिम
जीवन का शान्ति स्थल तब |
आसमान छूतीं थीं वह पगडंडियाँ ...
पल-पल बिगड़ता मिजाज मौसम का जब |
चुनौतियों का ..वह सफर ..कठिन था तब |
आस्था का केंद्र था.. मन वहाँ ...तब |
विलीन होना चाहती थी आत्मा वह !
परम् शान्ति में उसकी तब |
चाह नहीं थी मन में लौटने की..
भौतिक इस संसार में...तब |
मुँह की तरह सुरसा सी...
बढ़ गयीं हैं लालसाएँ अब |
बढ़ते जा रहे हैं सुख साधन सब |
आस्थाएँ हो रहीं निरंतर कम ...
लाभ पर्यटन का सुख अत्यधिक अब |
जप-तप की जगह मौज-मस्ती अब |
हो चुका है बोलबाला ...
विलासिता का हर जगह अब |
बढ़ गई भीड़ भी बेपनाह अब |
भूल गया मानव पवित्र स्थल सब |
याद रहता है अधिक मनोरंजन ही अब |
आस्थाएँ धार्मिक ...छूट गईं ...पीछे सब |
तीर्थ-धाम बने हैं ...हिल-स्टेशन ही अब |
अति-प्रदूषण...ले उमड़ा ये जन सैलाब है |
ढाँचे से प्रकृति के बढ़ रही छेड़छाड़ है |
दरवार आस्था के बेरौनक से पड़े हैं अब |
बिक रहा दौलत की बेशुमार ...
लोलूप लालसा के मोल...
आकर्षण पहाड़ों का सौन्दर्य अब |
खींचता भीड़ को अनियंत्रित जब ..
रौद्र हो रौंदती उसी तरह प्रकृति जब |
दोष फिर..नियन्ता का नियन्त्रण नहीं |
प्रकृति का यही तो हिसाब है ... अब |
दण्ड उसी का आपदाओं में बहाल है |
चेत जाए इंसान ...तू भी तो महान है !
सहज पूज ! प्रकृति को वह भगवान् है |
रहेगी प्रसन्न ...वह ...तो वरदान है ||


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
मेरा पहाड़

आस्था मन का विश्वास,
कर्म धर्म का ये अनूठा नाता
आस्था है बनती ढाल
सुरक्षा का जब इससे नाता जुड़ता

विपदा आज हम पर आई
आस्था का जब किया तिरस्कार
शक्ति और विश्वास को लगी चोट
विपदाओ का हुआ फिर संचार

उत्तराखंड की इस त्रासदी में
शायद सीख लेगा मेरा पहाड़
प्रकृति और आस्था से 'प्रतिबिम्ब'
ना करना कभी तुम खिलवाड़


Pushpa Tripathi 
..... मांगे तुमसे कृपा का दान .....

धरती पेड़ पत्थर
नदी शिवालय औ पर्वत शिखर
सब हुए है डावाडोल
कैसी विपदा आन पड़ी
त्रासदी विपदा आन पड़ी
सतयुग की मंदाकिनी
भागीरथी की अटल तपस्या
गंगा में सब विलीन हुई l
मानव जीवन देखा रहा
त्राहि त्राहिमाम् कर रहा
भारत भूमि के आँचल में
उत्तराखंड नगर डूब रहा l
भोले शिवजी, आओ शिवजी
जन भक्ति शक्ति आस्था बह रही
आँखों से झर झर बह निकले है
खारे पानी की जलती आग
कितने ही प्राण दबे पड़े है
भीतर मंदिर के आँगन में
ये रौद्र रूप प्रलय भयंकर
अमर देश के कलजुग में l
बांधना होगा जटाजूट को
सरल प्रकृति के भूमि से
देना होगा आशीष का दान
आशुतोष का महादान
मृत्यु मृतुंजय के जपतप से ही
देना होगा तुम्हे शुभ प्रदान
मानव जीवन के जीवंत स्वभाव में
नंदी भृंगी भूत पिचास
सब मांगे तुमसे कृपा का दान
मांगे तुमसे कृपा का दान l





सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

24 जून 2013 का चित्र और भाव



बालाजी साहनी 
माँ तुम्हारे गले लगकर,,,,
आज महसूस हो रहा है,,,,
कि जीवन में रिश्तो की सोंधी महक क्या होती है............!
ममता की आँचल में
कितना सुकूनदायक अहसास है !
और सारे जहाँ से सुरक्षित जगह तेरी ही पनाहों में होती है !!!


जगदीश पांडेय 
तुमसे ही तो मैनें जीवन पाया
तुमनें ही तो माँ जीना सिखाया
उंगली पकड कर माँ तुमनें ही
जीवन पथ पर चलना सिखाया


बालकृष्ण डी ध्यानी 
माँ

तेरे आँचल
मे सुख ही सुख है माँ
दुःख तेरे से
कोसों कोसों दूर है माँ

आऊं तेरे पास में
खो जाऊं सपनो की गोद में
सुंदर सुंदर तेरी कहनीयाँ
माँ वो मीठी मीठे तेरी लोरीयाँ

तेरे आँचल
मे सुख ही सुख है माँ
दुःख तेरे से
कोसों कोसों दूर है माँ

तू है सबसे जुदा
तू ही तो माँ मेरा खुदा
रह जाऊं किस छोर में
रहूंगा सदा तेरी आँखों की कोर में

तेरे आँचल
मे सुख ही सुख है माँ
दुःख तेरे से
कोसों कोसों दूर है माँ

दिन हो रात हो
माँ बस तू मेरे पास हो
जन्नत की नही चाहों डोर मै
तेरे साथ ही माँ मेरी भोर हो

तेरे आँचल
मे सुख ही सुख है माँ
दुःख तेरे से
कोसों कोसों दूर है माँ


अलका गुप्ता 
सृष्टि का वरदान !प्रथम तू ही है....मेरी माँ !
इस सृष्टि से पहले,तुझे ही जाना है मेरी माँ !
प्रथम तेरे स्वार्थ की अंतिम चाह भी...मैं हूँ |
हर दर्द...हर आह के साथ याद आती है माँ !!


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
माँ
माँ की ममता को, लफ्जो में तू मत तोल लेना
दूध और खून रग रग में तेरे, बस ये समझ लेना
है वो भगवान, भूल से भी निरादर मत कर देना
परिभाषित होती नहीं माँ, उसे हर पल पूज लेना

भूख - प्यास अपनी तुझ पर न्यौछावर करती है
तेरे सुख की खातिर, माँ खुद दुःख सब सहती है
ममता त्याग की मूरत, अर्चना भगवान से करती है
लम्बी उम्र हो तेरी, अपनी उम्र तुझे देने को कहती है

बच्चा चाहे कल हो जाए बूढा, माँ के लिए सदा बच्चा रहता है
हो संतान कैसी भी, माँ की जुबान में दुआओं का सागर बसता है
माँ के आँचल में छिपा है ब्रह्मांड, 'प्रतिबिम्ब' का इतना कहना है
कर्ज मातृत्व का चुका सकते नही, मान सम्मान जिन्दा रखना है


किरण आर्य 
माँ और ममता
ईश्वर की कृति ऐसी
जो है खुद ईश्वर जैसी

आँचल में है प्यार भरा
मन उसका सोने से खरा
कपट नहीं उसमे है जरा

प्रेम का दूजा नाम है माँ
त्याग प्रेम की मूरत माँ
सुख की घनेरी छाव है माँ

माँ की महिमा अपरम्पार
आँखों में उसकी स्नेह संसार
गुना ना जाए उसका प्यार
माँ का दूजा नाम दुलार


Pushpa Tripathi 
माँ को अर्पित सारा जीवन ..

माँ ही मन
माँ ही तन
माँ ही सृजन
माँ ही ईश्वर स्वरूपा l

माँ ही भक्ति
माँ ही शक्ति
माँ ही जीवन का आधार l

जीवन का अर्थ है क्या ?
क्या भला है और क्या बुरा
जिंदगी का अर्थ तुमसे ही जाना
मिसरी सी बोल तुमसे ही पाया
सोपानों की गिनती बतलाकर
माँ तुमने ही तो चलना सिखाया l

बहुत प्यार है माँ के आँचल में
स्नेह सुगन्धित बसंत बहार
चाहे उमरिया ढल भी जाए
माँ की ममता सदा महान


कुसुम शर्मा 
माँ वो ममता का आँचल है
जिस पर रह कर बच्चा
अपने आप निश्चित रहता है
जिसके आगे दुनिया के सारे सुख भी
एक झूठा सपना लगता है

सोते उठते चलते खाते
बच्चा माँ ही माँ कहता है
माँ ही तो है जो बच्चे को
अपने आँचल में लेकर
दुनिया के धुप छाव से बचाती है
खुद गिले में सो कर उसे सूखे में सुलाती है

माँ का जैसा इस दुनिया में ओर नहीं है कोई
वो ही ममता की मूरत है
वो ही स्नेह की देवी
वो ही सृष्टि की रचना है
वो ही ईश्वर की कृति है
वो न होती तो कुछ भी न होता
न हम होते न तुम होते !!



सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/