Friday, December 5, 2014

25 सितम्बर 2014 का चित्र और भाव




रोहिणी एस नेगी 
जीवन-चक्र
"""""""""
जीवन का हर-एक 'पड़ाव',
कुछ न कुछ तो सिखलाता है,
संघर्षों से जूझ, अवस्था,
कितनी पार कर जाता है,
जन्मकाल से मरणासन्न तक,
चक्र एेसा चलवाता है,
उलझा रहे मनुष्य इसी में,
बाहर निकल न पाता है ।।



कुसुम शर्मा 
जीवन की सच्चाई
*****^***********
बचपन बिता आई जवानी
और बुडापा आयेगा
आख़री मंज़िल जब आयेगी
बता अब कहाँ जाएगा
तेरा मेरा अपना पराया सभी यहाँ रह जाएगा
क्या लाया जो साथ ले जाएगा
ख़ाली आया ख़ाली यहाँ से जाएगा
तू तू मैं मैं के चक्कर में क्यूँ फँसाये जान रे
माटी का है तन ये तेरा माटी में मिल जाएगा
बता अब तू क्या पायेगा
जैसा क्रम करेगा साथ वही ले जाएगा
कर ले तू कुछ ऐसा जो याद करें संसार रे
फिर देख मरने के बाद भी तू अमर हो जाएगा !!



अलका गुप्ता 

~~जीवन चक्र~~

जीवन चक्र !
आत्मा और जीव का !
जन्म मृत्यु का !

महाप्रयाण !
अंतहीन प्रवास !
अंतिम यात्रा !

भव-सागर !
महा माया जंजाल !
यात्रा कागार !

पुनर्जन्म है !
नव यात्रा आगाज !
मृत्यु विश्राम !


बालकृष्ण डी ध्यानी 
एक वो मौसम आया और चला गया

एक वो मौसम आया और चला गया
दे आवाज दे दूजे को कर दे खुद को अलविदा
एक वो मौसम आया और चला गया

देता रहा वो बस तू लेता रहा
संभला कितना उसने मुझे ,पर कुछ ना संभला सका
एक वो मौसम आया और चला गया

एक उम्र थी वो बस बहती रही
बहते बहते कहती रही समझा रही थी मै समझ ना सका
एक वो मौसम आया और चला गया

हर एक मोड़ा आया वो मोड़ती रही
हर छोर छोड़ने से पहले सोचती रही जो सोचना था सोच ना पाया
एक वो मौसम आया और चला गया

सपने जगाये कुछ तोड़े उसने कुछ पुरे किये
आस का दमन पकड़ा था जो आखिर गंगा में बहा
एक वो मौसम आया और चला गया

घूमता ही रहा उस घुमाव के संग संग
उस चक्कर को आखिर अंत तक साथ अपने ना ले पाया
एक वो मौसम आया और चला गया

एक वो मौसम आया और चला गया
दे आवाज दे दूजे को कर दे खुद को अलविदा
एक वो मौसम आया और चला गया


जगदीश पांडेय 
इंसान तेरी यही कहानी

बीत गया जो पल जीवन का
वापस फिर न कभी आयेगा
दुनियाँ में आनें वाला इंसान
एक दिन लौट तू जायेगा

लिया जन्म जब दुनियाँ में
खुशियाँ चारो ओर हुई
वक्त के साथ बदल गया तू
मन में माया की है शोर हुई
जीवन भर तू रहेगा भागता
साथ न कुछ तेरे जायेगा

बीत गया जो पल जीवन का
वापस फिर न कभी आयेगा


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25 अगस्त 2014 का चित्र और भाव



प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~भाग जिन्दगी भाग ~
दौड़ती भागती जिन्दगी
फंसा जिन्दगी के चक्रव्यूह में
कब रोक पाया खुद को
जिन्दगी की हर जद्दोजहद से
पहिया जिन्दगी को घूमता रहा
अंत में खुद को पाया उसी जगह में


ममता जोशी 
~~भागम -भाग~~

असीमित इच्छाओं की त्वरित पूर्ति के लिए,
दिन-रात खपती ,भागती ,दौड़ती ये जिंदगी ,

भीड़ से आगे निकलने की हमेशा जल्दी रही ,
कामयाबी और नाकामी के बीच झूलती ये जिंदगी ,

कुछ सुख हैं कुछ दुःख थोडी हंसी थोड़े आंसू ,
रिश्ते नाते,प्यार दोस्ती कुल जमा यही है जिंदगी ...



दीपक अरोड़ा 
आओ प्यार बसा लें...

यूं ही न गुजर जाये ये जिंदगी
आओ हर पल को यादगार बना लें
कुछ ऐसा करें भागदौड़ कर कि
अपना नया इक हसीं संसार बना लें
कोशिश करें नफरत को दूर भगाने की
हर दिल में हम आओ प्यार बसा लें.. दीपक



कुसुम शर्मा 
क्या है़ ये ज़िन्दगी

मनुष्य जीवन की धारा का प्रवाह है ज़िन्दगी,
बूँद भर पानी की प्यास है ज़िन्दगी,
लाचार बेवस करहाती है ज़िन्दगी ,
इस प्रकृति की चेतना,
प्राणियों के प्राण की श्वास है ज़िन्दगी
जो कभी ख़त्म न हो संसार में
एसी आस है ज़िन्दगी,
क्षण क्षण हरक्षण दौड़ती भागती है ज़िन्दगी,
इस पर भी कुछ फ़ुरसत के पलों की
मोहताज है ज़िन्दगी,
मनुष्य की बदलती आकांक्षाओं में
ख़ुशी के लिए तरसती सिसकती है ज़िन्दगी,
मनुष्य के ह्रदय के कोने में दवी
ख़ुशी की आस है ज़िन्दगी,
आदि अंत को पलड़ों में तौलती है ज़िन्दगी,
अंधेरों में रोशनी की एक किरण है ज़िन्दगी,
वक़्त के पहियों के थपेड़ों को
आजमाती है ज़िन्दगी !!



बालकृष्ण डी ध्यानी 
भागता रहा

भागता रहा
यूँ मैं भागता रहा
ना जाने क्यों
किसके लिये यूँ
जागता रहा
भागता रहा
यूँ मैं भागता रहा

अपने घिरे घेरे में
मन के उस फेरे में
अपने को यूँ
हरपल बंधता रहा
भागता रहा
यूँ मैं भागता रहा

क्या छूट रहा है
क्या पाना चाहता है वो
अपने को इस समय साथ
क्यों ढलता रहा
भागता रहा
यूँ मैं भागता रहा

कैसी दौड़ा है
जाना किस ओर है
बिना सोचे समझे वो
उसकी दौड़ किस ओर है
भागता रहा
यूँ मैं भागता रहा

भागता रहा
यूँ मैं भागता रहा
ना जाने क्यों
किसके लिये यूँ
जागता रहा
भागता रहा
यूँ मैं भागता रहा


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1 जुलाई 2014 का चित्र और भाव



जगदीश पांडेय
------ कालेज का दौर -----

सुनसान इन गलियारों से
गुजर रहा है यादों का दौर

हर जगह था शोर शराबा
आनंद ही आनंद चारो ओर
सुनसान इन गलियारों से
गुजर रहा है यादों का दौर


कालेज में होना लेक्चर
लेक्चर में जाना पिक्चर
कैंटीन में लडकियों का
हमें कह देना फटीचर
जहाँ देखो सुनाई देता
हर जगह लेक्चर्स के शोर

सुनसान इन गलियारों से
गुजर रहा है यादों का दौर



बालकृष्ण डी ध्यानी 
मीनारों में दबे मेरे जवाब

हँसते हँसते रह गये
वो जजबात मेरे दिल में मचले हुये
उड़ना चाह मेरे परवाज
रह गयी चिला वो आवाज दब के
मेरे दिल में ही कंही

मीनारों में छुपे यंत्रों
में से देखे छूटे क़दमों के निशां
बेकल बेपरवाह भटकते भटकते
शीशे जा पूछे वो सवाल भूले हुये
मीनारों में दबे मेरे जवाब कंही

फिर क्यों शांत है चुपचाप
वो तूफ़ान उम्र के साथ ढलते ढलते
ताज के इस मकबरे में फंसी जान
आखरी पड़वा का वो इंतजार
डर रही सांस क्यों कर रही ऐसे

हँसते हँसते रह गये
वो जजबात मेरे दिल में मचले हुये
उड़ना चाह मेरे परवाज
रह गयी चिला वो आवाज दब के
मेरे दिल में ही कंही


नैनी ग्रोवर 
--इंतज़ार--

कांच की खिडकियों के
ना इस पार कोई,
ना उस पार कोई..
बस इक खामोशी है
जो चीखती है
चिल्लाती है
किसी के कदमों की
आहट को तरस जाती है..
ये मुंह उठाये तकती
पथ्थर की दीवारें
सरसर करती हवा से
लरज जाती हैं
गुमसुम खड़ी बेवा की तरह
ये तन्हाई सहम जाती है ..
यकबायक सीने में चुभन सी
तेरी रंगीन यादें
चारो और मानिंद खुशबु सी
बिखर जाती हैं
तब दूर कहीं से कोई
आवाज़ आती है
इंतज़ार और अभी और अभी !!



प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~ खामोश गलियारे ~

खामोश गलियारे देते गवाही

इन पर चलते, भागते - दौड़ते
कदमो की
इन पर बुने सच्चे, टूटे - बिखरे
सपनो की
इन पर सुलझे, बनते - बिगड़ते
रिश्तो की
इन पर लिखी पूरी, आधी - अधूरी
कहानियो की

'प्रतिबिंब' फिर भी आज खामोश है
ये गलियारे


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23 मई 2014 का चित्र और भाव




Pushpa Tripathi 
- कोई ऊपर कोई नीचे --

कोई ऊपर .. कोई नीचे
पीछे ... अच्छे अच्छे
आपा धापी जीवन राह पर
सच्चे झूठे गिरे बेचारे !!
हार से जीत ... जीत के हारे
राजनीति का खेल ... वाह रे वाह रे ......

कठिन मुलायम ... हाथी से बन्दर
उजाला लालटेन ... अंधकार है अंदर
अबकी झोली कोई भर न पाया
एक से एक धुरंधर ...पलटा खाया ......

अबकी बार फूल पहनी है ताज
ऊपर उठकर बनी सरकार
नीचे गिरे महाबली बेचारे
हारे बिखरे 'आप ' हमारे ....

किसी के सर ताज .. किसी की हार
कोई हँसता ... कोई उदास ...

अबकी बार यह भी देंखें
भविष्य में आगे
कितना , बढ़ेगा देश ....!!!!


भगवान सिंह जयाड़ा 

-----ताज की शक्ति-----

जिस के सर पर सजता ताज ,
नहीं होता किसी का मोहताज,
बजन हो जाता उस का भारी ,
उछाले वह सब को पटखी मारी ,
ताज की रही सदा महिमा न्यारी ,
इसको पहिने कद हो जाता भारी,
बस सभी करें उस का गुणगान ,
जो पहनें ,वह कहलाये महान ,
बिकट परिस्थिति जो यह पहने ,
बस उस का तो क्या है कहने ,
सुधार गया तो बन गया हीरो ,
नहीं सुधरा तो फिर से ज़ीरो ,
जिस के सर पर सजता ताज ,
नहीं होता किसी का मोहताज,


बालकृष्ण डी ध्यानी 

~देख जिंदगी खेलती रहती~

देख जिंदगी खेलती रहती
पल पल खेल नया , हर पल खेल नया

कोई इस पल राजा कोई रंक यंहा
दूजे पल तोल देती है राज खोल देती है भेद नया

देख जिंदगी खेलती रहती
पल पल खेल नया , हर पल खेल नया

इस उठक पठक में झोंक देती है
उस चौराहे में अकेले छोड़ देती नही जंहा कौन वँहा

देख जिंदगी खेलती रहती
पल पल खेल नया , हर पल खेल नया

रखना ना भरोसा तोड़ देती है वो साथ तेरा वो पास तेरा
अपने वजूद पर बस तू रख वो हाथ तेरा

देख जिंदगी खेलती रहती
पल पल खेल नया , हर पल खेल नया


नैनी ग्रोवर -
~ क्यों उदास ~
ऊपर बैठा क्यूँ हुआ उदास
नीचे के सर पे आया ताज
ये समय का पहिया है भैया
इसके दामन में छुपे सब राज़ ..

जैसी करनी वैसी भरनी
कहावत ये है बिलकुल सही
कब तक बंद करे आँखे जनता
लों कह दिया अब तुझको नहीं
अब होगा भारत लाजवाब ...

छीन ली रोटी बच्चों से तुमने
हर घर में हाहाकार मचा
हो जवान ये किसान कोई
नहीं तुम्हारी महंगाई से बचा
देख दिया कितना करारा जवाब ...

समय का पहिया .........!


किरण आर्य 
~पलड़ा सुख दुःख का ~

दुःख है सिसके
आँखों में नीर लिए
अनजान राहों में
भटके है अज्ञानी मन
दुःख से पानी
उसे निजात
जीवन सत्य से परे
दुःख से हो विकल
मन है कलपता
जार जार है रोता
दुःख का घनेरा
बुझा देता आस का दीप
उसी क्षण हौसला मन का
दिखाता उम्मीद की रौशनी
दुःख अनायास ही लगता
क्षुद्र सूक्षम सरल सा
तब सतत प्रयास
और मन की आस
दिखाते है राह मन को
और खुशियाँ पहन
सर पे ताज
मुस्कुराती है
दुःख की तपिश में
बारिश की फुहार सी
मन के आंगन में बरस जाती है



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24 अप्रैल का चित्र और भाव



रोहिणी एस नेगी 
"समय की सीढ़ी"

समय की सुइयों के,
बढ़ते अंतराल पर,
छलाँग लगाने का प्रक्रम,
अभी जारी है,
उम्मीदों में क़दमों को,
अागे बढ़ाने की बारी है,

मंज़िल मिले न मिले,
स्वयम् को एहसास दिलाना है,
प्रिष्ठ-भूमि ऐसी न थी हमारी,
किधर जा रहा ये ज़माना है ?

निरंतर कर्मठता जीवन में,
अग्रसरता लाती है,
सिर्फ़ एक सकारात्मक सोच ही,
मनुष्य को आइना दिखाती है,

तू चलता चल,
अपनी राह बनाता चल,
कुरीतियों का नाश करके,
अग्रिम दिशा में बढ़ता चल,

मैं ये जानती हूँ............!!
छलाँग लगाना ही,
किसी कर्म का उद्देश्य नहीं,
फिर भी संभव है.........!!
पर.....समय के पहिये को,
सीढ़ी बनाकर,
दिशा-निर्देश देना,
बिल्कुल असम्भव है....!!



बालकृष्ण डी ध्यानी 
भागती दौड़ती

भागती दौड़ती रही
वो तो घड़ी ....... दिल की घड़ी
धक धक ....... दिल की घड़ी
भागती दौड़ती रही
वो तो घड़ी .......

कुछ अपने से
कुछ पराये से .... बेगाने धागे
कुछ पिरो कर कुछ दे कर
कुछ ले कर वो तो चली ....... दिल की घड़ी
धक धक ....... दिल की घड़ी
भागती दौड़ती रही
वो तो घड़ी .......

कुछ फलक पर
कुछ जमीन पर …… अरमानों दिये
कुछ जलाकर कुछ बुझकर
सब कुछ साथ लेकर वो तो चली
धक धक ....... दिल की घड़ी
भागती दौड़ती रही
वो तो घड़ी .......

भागती दौड़ती रही
वो तो घड़ी ....... दिल की घड़ी
धक धक ....... दिल की घड़ी
भागती दौड़ती रही
वो तो घड़ी .......


जगदीश पांडेय सादर 

********* समय के चलते ********

.
समय के चलते चलते
हालात बदलते बदलते
ये कहाँ आ गये हम

शाम यूँ ढलते ढलते
गई कुछ कहते कहते
छा गये कहाँ से इतनें गम

वक्त कल अजीब था
माना कि तू गरीब था
पर खुशियाँ न थी तेरे कम

.
वक्त जो छूट गया
कोई क्यूँ रूठ गया
हो गई क्यूँ आँखे आज नम
समय के चलते चलते
हालात बदलते बदलते
ये कहाँ आ गये हम


नैनी ग्रोवर 
----समय----

समय की तेज़ बहती धारा
और मेरे थके कदम
जिंदगी के आँचल से
मुँह निकालते कुछ वहम
बहकाते हैं मुझे --

पराई देहरी लगता है
अपना ही अब आँगन
जैसे के अधूरी अधूरी
दरवाज़े पे खड़ी सुहागन
रुलाते हैं मुझे --

थम थम के चल
ज़रा सांस तो आने दे
आप्खो के आंसूं
छलक तो जाने दे
जो बहलाते हैं मुझे --

क्या पता उसके हाथ
फिर से थाम ले दामन
महक उठे फिर से
उजड़ता हुआ चमन
यूँ ही दिल को मनाते हैं ---!!



Pushpa Tripathi 
----- भली भली सी ये ज़िंदगी ----

सुबह का पंछी
दौड़ लगाये
उड़ उड़ पंछी
थक मर जाये ....

हारे भटके
निज काम है करते
घड़ियाँ सुई
सब घूम फ़िर जाये …

समय से चलना
समय के साथ
समय के हाथ
दिन भर के काम …

दौड़े भागे
पैर चक्का लागे
टाई - कोट
सूटकेस है हाथ ....


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
~सफर~
घड़ी की रुके न रफ़्तार
हर कोई इसमें गिरफ्तार
सूरज - चाँद बदलते वक्त
अच्छे का करते हम इंतजार
कही सवेरा, कही है अँधेरा
वक्त संग किस्मत का पहरा
कर्म यज्ञ चलता जाए निरंतर
कटता जाए जिन्दगी का सफ़र


Pushpa Tripathi
--- यही है कार्य ----

कर्मठ है जीवन
सतत चलना है काम
रुकना नहीं
यह उसूल है जीने का l

रात दिन का चक्र
दिनभर का वक्र
आलेख सा समय
घटते - बढ़ते शुक्र l

इतवार की छुट्टी
सोमवार कर मुटठी
हफ्तेभर भरमार
मंगल शनिच्चर की गठरी l


अलका गुप्ता
~~चल दौड़ लगा ले!~~
---------------------------
चल दौड़ लगा ले!
सूइयों से घड़ी की..
बंधा ये जीवन है |
पहियों बीच समय के...
दौड़ता हर पल है
कभी कुछ पया ...
कभी कुछ खोया ..
यही तो जीवन है |
कभी खुशी कभी गम है |
यही तो जीवन है |
जीते सब हैं जीवन अपना |
जिए जो औरों के लिए |
हर काल उन्हें पूजा जाता है |
समय उनके लिए बंध जाता है |
नहीं तो समय...यूँ ही
निर्थक बीत जाता है |
कोई आता है कोई जाता है |
समय का पहिया....
यूँ ही चलता जाता है |
चल दौड़ लगा ले !अब तो ..
नहीं तो .......
ये समय ..निकला जाता है |
कुछ सार्थक करके जाना |
हर लम्हा अपना करके जाना |
समय कम है ...
सत -कर्मों की दौड़ लगाना |
हर लम्हा अपना करके जाना ||

अलका गुप्ता 
समय तो जा रहा है

देखो घड़ी वो जा रहा है |
साथ घड़ी के जीवन भी...
ये ..तो सरका जा रहा है |
दौड़ता ये हर पल ...
कुछ पाता कुछ खोता है |
हर लम्हा कभी ख़ुशी ...
कभी ग़म का होता है |
सतत दौड़ते जाना है |
कुछ करके सार्थक जाना है |



किरण आर्य 
~समय का पहिया~

समय का पहिया
दौड़े है
दौडती जिन्दगी
हांफती सिसकती
गिरती संभलती
संग उसके
एक तलाश हो
मुकम्मल
चातक की प्यास सी
दिल में ये आरजू है लिए............


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10 जून का चित्र आयर भाव



बालकृष्ण डी ध्यानी 

~देख तराजू में दिल तौला~

देख तराजू में दिल तौला
वो भी टूट गया ,वो भी टूट गया
क्या गुन्हा किया था मैंने मौला
तू भी रूठ गया , तू भी रूठ गया

इंसाफ झुक जो मेरी तरफ
उसको ना झुका सका
एक तरफा प्यार मेरा जीत कर भी
तू हार गया, तू हार गया

हर लह्मा गया मेरा जो
तेरी ओर बस तेरी ओर गया
वो किसी और का फैसला
क्यों ना मेरा हो सका ,क्यों ना मेरा हो सका

अब तो बस तन्हाई रुसवाई है
मीलों दूर उसकी सूरत नजर आयी है
वाह रबा क्या तेरी खुदाई
दुनिया जीत कर भी मै हार गया

देख तराजू में दिल तौला
वो भी टूट गया ,वो भी टूट गया
क्या गुन्हा किया था मैंने मौला
तू भी रूठ गया , तू भी रूठ गया



जगदीश पांडेय 
----------- दिल का पलडा --------------

टूटे हुवे दिल का भी पलडा भारी होता है
दिल तोडनें वाला रात को अक्सर रोता है

आह सुनाई देती है जब टूटे हुवे दिल की
नींद हो जाती है दूर रात जब वो सोता है

दीश दुनियाँ की हर खुशी अधूरी होती है
जब किसी का होके कोई किसी को खोता है


अलका गुप्ता 
~~~~~~ना तोलो तराजू पर ~~~~~~~

सैंया दिल है मेरा ना तोलो तराजू पर |
टूट गया दिल मेरा यह लो तराजू पर |
होते नहीं.. सस्ते...ये बंधन प्यार के ..
दिल सच्चा तोले कौन बोलो तराजू पर ||

माना सब कुछ आज बिक जाता यहाँ |
युग है बाज़ारू खरीदार ही आता यहाँ |
कौड़ियों में तुल जाते रिश्ते नाते सभी ..
बेदिल ही होगा रिश्तों को बेच पाता यहाँ ||



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3 मई २०१४ का चित्र और भाव



प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
~मन~

मन...
चल उड़ चले
लेकर भावो की गठरी
सुबह और शाम
मन कर तू भी सवारी

अरे मन .....
कहाँ चला तू
जहाँ तुझे कोई जानता नही
क्यों भाग रहा तू
सत्य को अब भी पहचान सही

लौट आ मन ...
अब तुझसे वहां
किसी का वास्ता नही
जानते तो है सभी
लेकिन पहचानता कोई नहीं


बालकृष्ण डी ध्यानी

~बैठा हूँ परदेश में~

देखों जब भी तुझे गगन में उड़ते हुये
सोचों बस इतना कब बैठों कब पहुँचो अपने घर पे

पंख पसारे तू उड़ उड़ जाये
साथ अपने मुझे कल्पना के कौन से गगन ले जाये

नीले आकश सफेद बादलों बहतीे हवा संग उड़ता जाता
मेरे मन पटल चक्षु में कई सुखद भाव जगाता

हर एक उस प्यारे मिलन के अनुभूति दे जाता
ये उड़न खोटले तू इतना कर जाना
ये सुख अनुभूति मेरे अपनो को भी दिलाना

देखों जब भी तुझे गगन में उड़ते हुये
सोचों बस इतना कब बैठों कब पहुँचो अपने घर पे


भगवान सिंह जयाड़ा 

----मन की उड़ान ----

काश आज यह हवाई जहाज न होता ,
इन्शान किसी का बिछोह न सहता ,
इन्शान अपनों के आस पास होता ,
कभी भी बुछुड़न के आंशू न रोता ,
सदा अपनों से यह सदा दूर ले जाये ,
मिलन की आश में सदा तरसाये ,
दूर प्रदेश , गगन में जब नजर आये ,
अपनों से मिलने की आश जगाये ,
सोचता तब कभी यह मन दुखियारा,
लौट चल अब बतन तू, मन मतवारा,
मन की उलझन में फिर सोचता हूँ ,
मन ही मन में अपने को कोसता हूँ ,
इसकी बजह से दुनिया सिमट गयी ,
यह सारी दुनिया एक शहर हो गयी ,
पंख फैलाये सदा यूँ ही उड़ते रहना ,
अपनों से सदा हमको मिलाते रहना ,



अलका गुप्ता 
~~उड़ान ~~


ये आसमान तो...
इस धरती पर...
सबका ही है ||

छूने की हो...
तमन्ना ..
दिल में...
वही तो उड़ता है ||

पंखों से नहीं...
उड़ान तो ...
हौसलों से...
ही होती है ||

हों हौंसले...
बुलंद..जिसके...
मंजिल भी ...
उसी की होती हैं ||


जगदीश पांडेय 

~~~~~~~~ न जानें कहाँ ~~~~~~~~

न जानें कहाँ उड चला है
ये भावनाओं के गगन में
ख्वाबों के लेकर पंख ये
होकर अपनें मगन में
न जानें कहाँ उड चला है
ये भावनाओं के गगन में

न रास्तों का है ठिकाना
न हकीकत का पैमाना
पाकर रहुंगा मंजिल मैं
एक दिन इसनें है ठाना
खुशनुमा होगा वो पल
अपनें अमन के चमन में
न जानें कहाँ उड चला है

ये भावनाओं के गगन में


Pushpa Tripathi 
इस दिल का क्या कसूर

इच्छाएँ जब आती है
पंखो की तरह उड़ती है
सोच परेशानियों को
ऊंचाई तक उड़ा जाती है …

दिल क्या करता
दिल ही तो है
कसूर किसका दे
मन भी तो है
मन के आकाश में
विचरता दिल का विमान
कई बातों को साथ लेकर
दिनभर की यात्रा 'पुष्प ' विमान
मानव मन ,शरीर और ये दिल !



Pushpa Tripathi
मन उड़ता है .......

चाहत है आसमान छू लूँ
ऊंचाई पर झूला झूल लूँ
छोटे छोटे घर घनी आबादी
खिलौने सा शहर देख लूँ !!

अमीरों के तरह सवारी
एक बार चढ़कर सफर देख लूँ
रुपयों से आसमान का नगर
इन्द्र देव का महल देख लूँ …

कहते है रहते भगवान ऊपर
'पुष्प 'परियों का संसार ऊपर
मानव का उच्च शरीर लेकर
इच्छा है की भगववान देख लूँ !!


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