Friday, March 2, 2018

#तकब फरवरी 2018








तस्वीर क्या बोले #तकब फरवरी 2018

इस बार आप हाइकु विधा या मुक्तक के रूप में अपनी रचनायें रखेंगे. मुख्य आप हाइकु पर लिखेंगे तो ज्यादा अच्छा रहेगा ... हाइकु कैसे इस विवरण के साथ पुन: विधा पर प्रकाश डाल रहा हूँ.• भाव नए व स्वरचित।• शीर्षक अवश्य दें।• हालाँकि हाइकु कविता तीन पंक्तियों की होती है लेकिन इस रूप में आप कम से कम ९ पंक्तिया ३-३-३ की अवश्य लिखें
• टिप्पणी द्वारा काव्य विधा अन्य मुक्तक - तो अवश्य लिखे। रचना लिखने में आपकी सोच क्या है अवश्य लिखें।• एक ही रचना मान्य है।• रचना के अतिरिक्त कुछ न लिखें यदि कोई बात प्रशंसा आप उसी रचना या सदस्य की रचना में करे। कुछ पूछना चाहते है तो पूछे समाधान होने पर टिपण्णी को और रचनाओं से अलग टिप्पणी को भी हटा लिया जाएगा।• अंतिम तिथि २१ फरवरी २०१८ है है।शुभम• हाइकु सत्रह (१७) अक्षर में लिखी जाने वाली सबसे छोटी कविता है। इसमें तीन पंक्तियाँ रहती हैं।• प्रथम पंक्ति में ५ अक्षर,
• दूसरी में ७ और• तीसरी में ५ अक्षर रहते हैं।• संयुक्त अक्षर को एक अक्षर गिना जाता है, जैसे "प्रबन्ध" में तीन अक्षर हैं - प्र -१, ब-१, न्ध-१ तीनों वाक्य अलग-अलग होने चाहिए। अर्थात एक ही वाक्य को ५,७,५ के क्रम में तोड़कर नहीं लिखना है। बल्कि तीन पूर्ण पंक्तियाँ हों।प्रो. सत्यभूषण वर्मा जी का कहना है"आकार की लघुता हाइकु का गुण भी है और यही इसकी सीमा भी। अनुभूति के क्षण की अवधि एक निमिष, एक पल अथवा एक प्रश्वास भी हो सकता है। अत: अभिव्यक्ति की सीमा उतने ही शब्दों तक है जो उस क्षण को उतार पाने के लिए आवश्यक है। हाइकु में एक भी शब्द व्यर्थ नहीं होना चाहिए। हाइकु का प्रत्येक शब्द अपने क्रम में विशिष्ट अर्थ का द्योतक होकर एक समन्वित प्रभाव की सृष्टि में समर्थ होता है। किसी शब्द को उसके स्थान से च्युत कर अन्यत्र रख देने से भाव-बोध नष्ट हो जाएगा। हाइकु का प्रत्येक शब्द एक साक्षात अनुभव है। कविता के अंतिम शब्द तक पहुँचते ही एक पूर्ण बिंब सजीव हो उठता है।"तो कीजिये शुरआत - शुभकामनाएं

 

इस बार विजेता है सुश्री किरण श्रीवास्तव व श्री गोपेश दोशरा जी 


ब्रह्माणी वीणा हिन्दी साहित्यकार
 " कई मुखौटे "

देश के नेता
बदलते मुखौटा
बहुरुपिया//
****
रंगविरंगे
कई कई चेहरे
चढ़ाए नेता//
****
बदलें रंग
गिरगिट आदमी
छलते लोग //
*****
स्वर्ण कलश
भरा हुआ है विष
किस काम का ?
*****
स्वर्ण पालिश
सिक्का अंदर खोटा
सिर्फ दिखावा//
*****
हँसें जोकर
मुखौटे लगाकर
दुख पीकर//
*****
बिकें मुखौटे
सच्चाई का चेहरा
कोई ना लेता //
*****
बानर-मुखी
ज्यों बजरंगबली
नाम के धनी //
*****
एक चेहरा
बस सिर्फ अपना
सच का शीशा //
*****
श्रेष्ठ चेहरा
भले चितकबरा
काम हो खरा //
****

संदर्भ व टिप्पणी
*****
प्रस्तुत "कई मुखौटे "हाइकु में कई-कई चेहरों में छिपे अन्तर व वाह्य तन मन को , प्रतीकात्मक शैली के माध्यम उकेरने का भरसक प्रयास किया है,,कुछ मुखौटों का प्रतीक वीभत्स नेता भाव में है,कुछ मजबूरी में दुख सहकर जोकर मुखड़े लगाते हैं और कुछ दिखावा में,,,एक हाइकु,,सच्चाई का चेहरा कोई नहीं खरीदता ,,,




प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल   - प्रोत्साहन हेतु

~ जीवन रंग ~

वानर वंश
आज रूप इंसान
हृदय क्षार
-----------------------
सुख व दुःख
जीवन सुसज्जित
सत्य अटल
-----------------------
चेहरा मौन
होंठ आलापप्रिय
साफ संदेश
-----------------------
बोलती आँखे
नकाब में उद्देश्य
विषेले होंठ
-----------------------
उपहासक
जिंदगी रंगमंच
मिश्रित भाव
-----------------------
जीवन रंग
विभिन्नता से पूर्ण
हँसना रोना

टिप्पणी :
पूर्वज वानर थे – विदित है ..आज इंसान बन कर भी इंसान इंसानियत से दूर और जीवन के रंग तो है ही ख़ुशी गम, हँसना रोना ... इन्ही से जिन्दगी हमारी सजी है – प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल



किरण श्रीवास्तव
"जीविकोपार्जन"
-----------------------------------

खुश मदारी,
वानर बेजुबान
जीव महान ।।
-----------------------
खेल बाजार,
पेट का है सवाल
इंसा लाचार ।।
-----------------------
कृत दिखाते,
अजब गजब के
बहुरूपिये ।।
-----------------------
जगमगाये,
असली या नकली
जान ना पाये ।।
-----------------------
लगा मुखौटा,
हँसे और हँसाये
दर्द छिपाये ।।

टिप्पणी--
तरह-तरह की भाव-भंगिमायें,मुखौटे लोगों का मनोरंजन करती है।बच्चे-बड़े खुश होतें हैं। पर इसके पीछे पापी पेट का ही सवाल होता है...!!!




रोहिणी शैलेन्द्र नेगी

"छलावा"
'""""""""
चेहरा खोटा,
तार-तार जीवन,
घर न लौटा ।
-----------------------
लगा मुखौटा,
है दो रंग दुनिया,
देखे हमेशा ।
-----------------------
वानर-मुख,
लगाकर के चश्मा,
बैठे सम्मुख ।
-----------------------
करे छलावा,
श्वेत-श्याम ये मन,
वर्ण समान ।
-----------------------
साँझ-सवेरा,
अब स्वर्णिम सा,
ये जग सारा।

टिप्पणी:
ये जीवन आशा और निराशा के समान है जहाँ मनुष्य सब जानते-बूझते छल-कपट का सहारा लेकर अच्छाई का ढोंग करता है और स्वयं को धोखा देता रहता है कि सब ठीक है।




Prerna Mittal

ढोंग
~~
सत्य दिखता
क्या ? सत्य ही है वह
या आडम्बर?
-----------------------
चेहरे पर
भरपूर है हँसी
अंतर रोता
-----------------------

नयन बीच
हैं घड़ियाली आँसू
मन में लड्डू
-----------------------
मुखौटा चढ़ा
नैतिक अनैतिक
बचा न कोई
-----------------------
रो रहा सच
बिलख रहा क्यों?
ऐसा विह्वल

टिप्पणी:
अपने अलग-अलग कारणों से प्रत्येक व्यक्ति अपनी असलियत जग जाहिर नहीं करता। हम सब एक ढोंग की दुनिया में जीते हैं।




गोपेश दशोरा

शीर्षकः नकाब का सच।

...............1...............
नर या पशु,
पहचान मुश्किल,
नकाब जो है।

...............2...............
हँसी रूदन,
है साथ मुमकिन,
मुखौटा दे दो।

...............3...............
नकाब ओढ़,
इंसानियत गुम,
लाचार सब।

...............4...............
बुरी दुनिया,
नित बदले रंग,
सम्भल जाओ।

...............5...............
नकाब पोश,
नित नये इन्सान,
लगता डर।

...............6...............
हटा नकाब,
भौचक्के सब देख,
असल रंग।

...............7...............
मुस्कान दिखे,
जमाने के सम्मुख,
रोना भीतर।

टिप्पणीः
भीतर कितना ही दर्द क्यूं ना हो चेहरे पर एक मुस्कान लिये फिरना पड़ता है। हंसी का ये नकाब आज लगभग सभी लगाये फिरते है। कोई नहीं देखता इस मुस्कान के पीछे छिपे दर्द को। कभी-कभी तो इन नकाबों के चलते इन्सान की अपनी असली पहचान ही गुम हो जाती है।



नैनी ग्रोवर
 ( कैसे )

एक पे दूजा
चेहरा हैं लगाए
जानो ये कैसे..
-----------------------
मन में छुपा
विष का है गरल
मानो ये कैसे...
-----------------------
भोली सी आँखें
जिबह मधु सी है
बचो तो कैसे..
-----------------------
होठों पे हँसी
हाथों में है खंजर
जियो तो कैसे...!!


टिप्पणी :-
आज के दौर में जीवन में कोई ना कोई ऐसा मिल ही जाता है जिसे जानना व पहचानना अत्यंत कठिन होता है, ऐसे लोगों से सरल व्यक्तित्व का धोखा खा जाना अब अचंभित नहीं करता . !!




आभा  Ajai Agarwal

"हाइकू उत्सव"

१-
बातें हैं सच्ची

पसंद न किसी को

सच्चा मुखौटा।

२-
विदूषक है

सभी को है हंसाता

प्यारा मुखौटा।

३-
मैंने है ओढ़ा

श्वेत रंग मुखौटा

शिव को भाया।

४-
न खेलूं होली

तू नहीं हमजोली

स्वर्ण मुखौटा

५-
बादल आये

मेरे मन को भाये

बरसेंगे भी।

६-
सूरज हारे

कोहरे का प्रण ये

हारा स्वयं वो।

७-
रूठती उम्र

उपहार में देती

सर पे चाँद।

८-
हजारों रत्न

जौहरी की झोली में

मैं खाली झोली।

९-
जूड़े बालों के

हवाओं ने हैं खोले

घटा शर्मायी।

१०-
सभ्य समाज

ओढा छद्म मुखौटा

-खेलता-खेल।

११-
निःशब्द मन

मुखौटा रहा हंस

संसारी माया।

१२-
मेले में घूमें

पहन के मुखौटे

हँसते- रोते।

१३-
बसंत आया

मौसिम मतवाला

कोयल कूकी।

१४-
वन्दनीय हो

जगमगाये हिंदी

हिन्दुस्थान में।

१५-
फगुनायें क्यूँ ?

फागुन की ऋतु है

टेसू महकें।

१६-
मुख मुखौटा

हंसोड़ या रोतड़ा

मैं मेरा मन।

१७-
होली की टोली

डालों पे खट्टी कैरी

बाँट के खायें।

१८-
वाष्पित दृग

नयन में अंजन

मुखौटा हँसे।

१९-
बुजुर्गियत

लय सांसों की धीमी

मैं चांदी बाला।

२०-
नदी की धारा

मन अटका तीरे

सेतु बनाओ।

21 –
पंछी का नीड़

मेरा न कोई जहां

सपना जीना।

टिप्पणी
----हाइकु आधिकारिक रूप से (ऑफिसियली )पहली बार छाप रही हूँ किसी समूह में ,हाइकु मुख्यत:प्रकृति के रूपों पे ही लिखे जाते हैं पर भारत में आके कोई भी विधा किसी एक विचार से बंध के नहीं रह सकती ,शायद मैं न्याय कर पायी हूँ। ---------



कुसुम शर्मा

छल
**

दिन या रात
नेताओं को न काज
घोटाला राज !!
-----------------------
झूठा चहरा
नक़ाब का पहरा
भेद गहरा !!
-----------------------
स्वर्ण पीत
छल के संग प्रीत
कुटिल नीत !!
-----------------------
रोते हँसते
जोकर है बनते
फिर ठगते !!

टिप्पणी :-
अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए नेता जनता की भावनाओं के साथ खेल कर उन्हें ठगते है
जनता उनके नक़ाब के भीतर छुपे स्वार्थ को नहीं पहचान पाती और उनकी बातों में आ जाती है !!





प्रभा मित्तल
~ मनुज महान ~

ये हैं इंसान
या नकली चेहरे
कपि हैरान ।
-----------------------
झूठ कहते
दुःख सुख की बातें
सब छुपाते ।
-----------------------
व्याकुल मन
भयभीत स्वरूप
हँसे सम्मुख ।
-----------------------
कटु परोसे
जिह्वा निरी बावरी
राम भरोसे ।
-----------------------
छल ही छल
मुखौटों का बाज़ार
दाँव प्रबल ।
-----------------------
नयनाभिराम
आडम्बर के दाम
जीना तमाम ।
-----------------------
हँसना रोना
विधना ही लिखता
भाव सलोना ।
-----------------------
मन शैतान
मनुज है महान
कपि हैरान ।

टिप्पणी
( यहाँ हर व्यक्ति अपनी वास्तविकता से दूर भागता है।जो है वो नहीं दिखना चाहता।होड़ सी लगी है साम दाम दंड भेद अपनाकर आगे बढ़ने की।वानर इंसान का ये स्वरूप देखकर हैरान है कि इतने पर भी मनुष्य महान कैसे है)



अलका गुप्ता

मुखर मेल
****

नाट्यकार सा !
जीवन रंग मंच !
शाज मुखौटा !
-----------------------
मुखर मेल !
सुख-दुखिया खेल !
नकाब पोशी !
-----------------------
धुनी रमाए !
साधु भए सियार !
छले मुखौटा !
-----------------------
मांजे चेहरे !
पहन शराफ़त !
डाले ये डाँके !
-----------------------
साजें तन क्या !
माटी घट ये चोला !
रूह..बुहारें !
-----------------------
लेने दो साँस !
आत्मा को संस्कार की !
नश्वर तन !
-----------------------
श्वास लेआत्मा !
अक्षय..अमर वो !
तन ये चोला !

टिप्पणी में एक ताँका__

रंग रंग के !
रूप-कुरूप मास्क !
शुभ-अशुभ !
घाव..घने..या हास !!

जीवंत जिएं विलास !!


सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Thursday, February 1, 2018

तकब2018





तस्वीर क्या बोले #तकब2018 शुरुआत

मित्रों पहली तस्वीर - ये प्रतियोगिता नहीं। आप अपनी रचना इस तस्वीर पर आधारित किसी भी विधा में लिख सकते है। हाँ जो आप लिख रहे है (यदि काव्य के किसी नियम के द्वारा) उसका जिक्र जरूर करे। 
१ भाव नए व स्वरचित।
२ शीर्षक अवश्य दें। 
३ कम से कम १० पंक्तियां अवश्य हों।
४ टिप्पणी द्वारा काव्य विधा यदि कोई है तो अवश्य लिखे। रचना लिखने में आपकी सोच क्या है अवश्य लिखें। 
५ एक ही रचना मान्य है।
६ रचना के अतिरिक्त कुछ न लिखें यदि कोई बात प्रशंसा आप उसी रचना या सदस्य की रचना में करे। कुछ पूछना चाहते है तो पूछे समाधान होने पर टिपण्णी को और रचनाओं से अलग टिप्पणी को भी हटा लिया जाएगा।
७ अंतिम तिथि २२ जनवरी २०१८ है।

शुभम




बालकृष्ण डी ध्यानी ..
*******
बदल रहा है

बदल रहा है ऐ पल
पल पल आज और कल
कोहरा है धुंध है या...वो
प्रदूषण का बढ़ता असर

असर डला रहा है वो
हम पर अब रह रहकर
अब भी बेफिक्र है आंगतुक
जा रहा है वो किधर

किधर है पर्यावरण
और किधर को चले हम
ना समझ है हम अब भी
जो अकेले पड़े हम





ब्रह्माणी वीणा हिन्दी साहित्यकार

 हाइकु विधा ( तांका ) में चित्र अभिव्यक्ति,,,,इसमें पाँच पँक्ति होती हैं,,हाइकु में ही 77 वर्ण तुकान्त के साथ बढ़ जाते हैं,,,
चित्र अभिव्यक्ति
" शीत लहर"
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
********
शीत ने छीना
खुशी चैन- पत्तों की
उदास तरु
हरियाली खोकर
किया है पतझर //
******
******
वृक्ष सहमे
कोहरे का कहर
जीवन हुआ
ठहरा ठहरा सा
छाई बर्फ-चादर //
******
******
शीत लहर
छा गया है कहर
हर प्रहर
वृक्ष हरे पत्तों में
काँपते थर-थर //
******



बलदाऊ गोस्वामी
 हम जिससे प्रेम करते हैं
_______

प्रेम का अटूट रिश्ता
होता है पूजनीय
अगर इसमें अंधविश्वास
किया जाय
तो हम जिससे प्रेम करते हैं
वह उपयोग की चीज बनकर
रह जाती है
और फिर परिणाम
भयंकर खतरनाक होता है |

अक्सर सोचता हूँ
वर्षों पहले
जिस पेड़ से
जिस नदी से
प्रेम के अटूट रिश्ते खातिर
बनाऐ जिसे पूजनीय हम
और अपनी संस्कृती बताये
क्या आज
उस रिश्ता में
अंधविश्वास करने का परिणाम
बंजर भूमी है |

--------------------------



किरण श्रीवास्तव
 "ऋतु परिवर्तन"
-----------------------

धुंध विकराल ,
प्रकृति बेहाल!
क्षीण हरियाली है,
शीतलहर मतवाली है।

राहें वीरान ,
व्यथित इंसान !
मन में विश्वास है,
धुंध छटने की आस है ।

दिल में उल्लास .
नव ऋतु आगाज !
मनज मद मस्त है,
आने वाला जो बसन्त है।

टिप्पणी-- प्रकृति परिवर्तन शील है। माघ मास की शीत लहर से पूरी प्रकृति बेहाल हो जाती है ।पेड़ो के पत्ते गिर जातें है । मानव जीवन शैली भी प्रभावित हो जाती है। पर बसन्त आगमन मन को ऊष्मा प्रदान करता है।


Prerna Mittal 
|| मनोदशा||

मौसम के साथ-साथ जूझ रहा हृदय
क्या मौसम दिल का दर्पण है?
कभी खिल उठा धूप की तरह
चहकता, दिन रात गुनगुनाता
सुकून से बाँहो में भरता ज़िंदगी को

तो कभी मुरझा गया विषाद से
यह कैसा कोहरा सा छा रहा ?
खोया हुआ सा, अंधा-बहरा सा उदासीन
ज़िन्दगी से उखड़ा-उखड़ा सा।

पल-पल में रंग बदल लेता है।
रोशनी थी अभी, अभी बादल लहराया काला
घर की बत्ती जलानी पड़ेगी शायद ?
घबराहट सी, अंधेरा है कुछ हो न जाए!

बिजली कौंधने लगी क्रोधित
भय-मृत्यु क्या-क्या लाएगी?
एक पागल विचार की तरह अचानक
क्या ये दिल संभल पाएगा?

अरे! बारिश, एक शीतल हवा का झोंका
एक उलझन, पानी, जिंदगी, रोमांस
एक दुविधा, एक संघर्ष, कैसी अनुभूति
कौन जीतेगा ?

समझौता हो गया, बर्फ गिरने लगी
एक खालीपन या एकांत,
नहीं, एक अपनापन कहीं गर्म रज़ाई में
अच्छा लग रहा है।

फिर एक तूफान
समुद्र की लहरें सीमाएँ तोड़तीं
दिल में उमड़ते भाव, कैसी भ्रांति,
सुनामी या सैलाब
प्रकृति बाहर या अंदर
बात एक ही है।

टिप्पणी: बाहर का मौसम मनोदशा पर बहुत प्रभाव डालता है और कभी हम अपनी मनोदशा के अनुसार मौसम की व्याख्या करते हैं। जैसे "आज मौसम ही ऐसा है कि बहुत आलस्य आ रहा है" ☺


मीनाक्षी कपूर मीनू 
आज फिर
****
आज फिर ....
अचानक
मन भर आया
चली फिर
तुम संग
बन हरियाली छाया
हाँ.... तुम ही तो हो
जो वर्षों से मुझे
देते आये संबल
कभी अपनी काया से
कभी मीठी छाया से
अपने आगोश में
छुपा के ...
पोंछ मेरे आंसू
अपनी आर्द्रता से
मेरे सूखे मन को
हल्के से सहला देते
और.. और.. मैं...
सुबक उठती
तुम्हारी हरित कांति में
फिर ..फिर..
तुम धुंध की गहरी चादर में
मानो ... छुपा देते मुझे
प्रकृति की गोद में
तत्पश्चात ....
प्रकृति की कोख से
पुनर्जीवित सी ' मैं '
' मनस्वी ' ....
खिल उठती
नवजीवन पा
दुआ को उठते
हाथ ज्यूँ
मुस्कुराने लगते
पात यूँ....

टिप्पणी .... आज के वातावरण में मानव मन और तन शिथिल हो चुका है और प्रकृति से विमुख भी ... फिर भी जब मानव मन भीड में भी अकेलापन महसूस करता है तो प्रकृति माँ बन उसे अपने आगोश में छुपा कर उसको शीतलता देकर उसके अंदर एक नई ऊर्जा भर कर नवजीवन प्रदान करती है ।


Madan Mohan Thapliyal 
आवर्तन
🔮🔮🔮

क्या कहूं
कुहासा या धुंध
आलौकिक है
आर्जव है, आमंत्रण है
आरंभ है जीवन का
मेरी मनस्थिति की तरह
धुंधला और
आद्रता से भरपूर
पार देखना
सरल भी नहीं
अघोषित स्वप्न की तरह
कभी आल्हाद, कभी आर्तनाद
आरस पर आरूढ़
रवि किरणों पर टिका भविष्य
कब अंतर्धान हो जाएगा
आसा और निराशा का संगम
यही दस्तूर है
नियति भी यही
इसी उधेड़बुन में कट जाती है
एक उम्र
कब उदय हुआ, कब अस्त
गहराया था पलभर के लिए
मेरी कहानी मुझे ही सुना गया




डॉली अग्रवाल 
कोहरा

लबादा ओढे ओस का
निमंत्रण देता भोर को
रात की कालिमा विसरित करता
अपने होने का एहसास दिलाता
सहला देता मेरे ख्वाबो को
नई किरणों की आस लिए
नयी राहो का आयाम खोल
मुझे मजबूती से जकड़े हुए
रूबरू मंज़िलो से कराते हुए
जीवन का संचार लिए
मुझे से मुझे मिलाते हुए
ओस का लबादा ओढे



नैनी ग्रोवर 
राह

कुहासे से टुकटुक झांकती है,
पगडंडियों पे गाती जाती है,
यूँ ही पेड़ों से ये लटकती है,
सबके पैरों पे सर पटकती है,
इक अकेली राह...
युगों-युगों तक, खड़ी रहती है,
पर किसी से कुछ ना कहती है,
गुमसुम से इस सर्द मौसम में ये,
जाने किसकी बाट तकती है,
इक अकेली राह...
आ-आ के चले गए मुसाफ़िर,
कोई भी तो ना ठहरा पलभर,
रोज़ अपनी मुट्ठी में सुबह भर,
अपनी ही ओट में आप सिमटती है,
इक अकेली राह....!!

टिपण्णी... लोग कहते हैं राहें चलती हैं, मेरा मानना है के राहें तो वहीं रहती हैं, लोग आते जाते रहते हैं, कोई रुकता नहीं बस गुज़र जाते हैं ।



Ajai आभा अग्रवाल 
अंजन रंग रंगी वसुधा

===========

प्रभाती में निशा का भान
लुप्त हैं आज अरुण के बाण।
फैला कोहरे का केश जाल
भ्रांत है आज सूर्य विशाल।
अश्रु संग बहा आज अंजन
कपोल रंगे धुऐं के रंग।
विस्मित मैं ! यादों के संग
रंगा इंद्रधनुष ,सलेटी रंग।
किरणें खेलें आंखमिचौली
हवा में खुनक बड़ी मतवाली।
जागृत वसुधा यूँ ! स्वप्नीली
ज्यूँ अलसायी दुल्हन नवेली।
आज न ओढ़ूँ , इंगूरी साड़ी
अभ्रक सा धूम्र रंग ; मन भाया।
"पी" के नयनों का आलोक
मद भरे नयनों से संजोग।
आज मैं रंगी नयनों के रंग
मानिनी हिम ठिठुरन सी मौन।
अंजन फिर , लिया नयन में डार
पुलिन में करती मुक्त विहार।
निमिष भर चलती जब बयार
सिहर जाता दुल्हिन का गात।
तुहिन कण पलकों पर वार
दिया अंजन ने , अलकों को उपहार।
कुहर का ये स्वप्निल संसार
प्रकृति का है अनुपम श्रृंगार।
उच्छ्वासें यादों की बयार
मूर्छित सपनों का संसार
विरति ये चांदी रंग परिधान
सृष्टि की आभा है साकार।।

टिप्पणी: अभ्रक के सलेटी रंग से - अंजन भरे नयनों का रंग -जब क्षितिज के इंगूरी कुमकुम से बातें करता है -तो प्रकृति कोहरे की चादर पहन श्रृंगार के संयोग- वियोग दोनों भावों में डोलती है- धुवें रंग का झीना आँचल ओढ़ !---कोहरा मेरे जीवन को ऊर्जा देता है।


प्रभा मित्तल
...सुबह होने को है...
---------------------------------
पौ फटने को है
या साँझ ढली है
धुंध हर जगह है
घुटन गली-गली है।

ओस में नहाए पौधे
हरे - भरे खड़े, कहीं
मुरझाए से जल रहे
पाले की मार पड़ी है।

धुआँ-धुँआ सा छा रहा
दृष्टि बाधित हो रही
श्वासों में आते जाते
हवा दूषित घुल रही है।

कंक्रीट के जंगल भी
कोहरे की बारिशों में
भीग रहे उदास से औ
राहें सूनी दिख रही हैं।

सूरज के आते ही
कुहासा छँट जाएगा
प्रकृति नटी मुस्काएगी
पेड़ों में खलबली है।

होगी चहल-पहल
धूप भी लगेगी भली,
मन पर पड़ी बर्फ भी
मानो पिघल रही है।

मधुमास की प्रतीक्षा में
मौसम ठिठुर रहा है।
सुबह होने को है
अभी तो रात ढली है
विश्वास की डोर से
यौं हर आस बंधी है।


टिप्पणी: (अन्तस् में कितना भी कोहरा घना हो, घोर निराशा में भी कहीं न कहीं उजाले की किरण मनुष्य में विश्वास बनाए रखती है ...सूरज निकलेगा...फिर सुबह होगी।)



प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~ परिवर्तन ~

समय परिवर्तन का पक्षधर है
कभी वसंत तो कभी पतझड़ है
जानता हूँ तुम अंगुली उठा रहे हो
मेरे अस्तित्व पर, मेरी आस्था पर
लेकिन
तुम और केवल तुम ही जिम्मेदार हो
प्रकृति से सदा तुम खिलवाड़ करते हो
तुम केवल मतलबी स्वार्थी हो, हत्यारे हो
पहचानों अपने कृत्यों को, अपने स्वार्थ को
शायद
समझ जाओ तुम, आज कल का भविष्य है
वर्तमान में अपनी आवश्यकताओ की खातिर
कितने पाप तुम बड़ी निर्दयता से करते हो
परिवर्तन के नाम पर मेरा शोषण करते हो
हाँ
तुम्हे संभलना होगा अपनी पीढ़ी कि खातिर
प्रकृति को समझ और उसे प्यार देना होगा
पेड़ पौधों सहित धरती को मान देना होगा
जल, थल, नभ को समझ कर्म करना होगा

टिप्पणी: अकेला होना, मौसम कि मार - यह दर्द इन्सान तो झेलता है लेकिन पेड़ पौधे से हमारी अनदेखी उन्हें आज बिन मौसम उनके अस्तित्व को हिला देती है




सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Wednesday, August 2, 2017

जुलाई तस्वीर #तकब जुलाई





नमस्कार मित्रों 
पुन: आपके समक्ष एक चित्र रख रहा हूँ. नियम व् शर्ते उसी रूप में होंगी, चयन प्रक्रिया भी उसी रूप में रहेगी. निर्णायक मंडल की दृष्टी से श्रेष्ठ रचना को सम्मान पत्र से पुरस्कृत किया जाएगा.
निम्नलिखित बातो को अवश्य पढ़िए.
१. अपने भावों को कम से कम ८ - १० पंक्तियों की काव्य रचना शीर्षक सहित लिखिए. एक सदस्य एक ही रचना लिख सकता है. 
२. यह हिन्दी को समर्पित मंच है तो हिन्दी के शब्दों का हीप्रयोग करिए जहाँ तक संभव हो. चयन में इसे महत्व दिया जाएगा.
[एक निवेदन- टाइपिंग के कारण शब्द गलत न पोस्ट हों यह ध्यान रखिये. अपनी रचना को पोस्ट करने से पहले एक दो बार अवश्य पढ़े]
३. रचना के अंत में कम से कम दो पंक्तियाँ लिखनी है जिसमे आपने रचना में उदृत भाव के विषय में सोच को स्थान देना है. 
४. आपके भाव अपने और नए होने चाहिए. [ पुरानी रचनाओं को शामिल न कीजिये ]
५. इस चित्र पर भाव लिखने की अंतिम तिथि २१ जुलाई, २०१७ है.
६. अन्य रचनाओं को पसंद कीजिये, कोई अन्य बात न लिखी जाए, हाँ कोई शंका/प्रश्न हो तो लिखिए जिसे समाधान होते ही हटा लीजियेगा. साथ ही कोई भी ऐसी बात न लिखे जिससे निर्णय प्रभावित हो.
७. आपकी रचित रचना को कहीं सांझा न कीजिये जब तक समाप्ति की विद्धिवत घोषणा न हो तथा ब्लॉग में प्रकशित न हो.
८. विशेष : यह समूह सभी सदस्य हेतू है और निर्णायक दल के सदस्य भी एक सदस्य की भांति अपनी रचनाये लिखते रहेंगे. हाँ अब उनकी रचनाये केवल प्रोत्साहन हेतू ही होंगी.
धन्यवाद !

विजेता सुश्री ब्रह्माणी वीणा 


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल केवल प्रोत्साहन हेतू 

नियति ...



समय की 
उदासी लिए
किसी 
अनजान सड़क से 
गुजरते हुए 
तेरा मिलना 
समय का ही 
उपहार था 

अंसख्य भावों ने
तेरे ही दिए हए 
शब्दों से रूबरू होकर 
एक राह थाम ली 
साथ चलने का 
हौसला लिए 
वो बचपन सी नादानी 
और शरारत लिए 
निस्वार्थ मन 
तेरा हाथ थामे 
बिना पते की मंजिल 
की ओर 
कब चल दिया
आभास ही नही हुआ 

न आते जाते मौसम 
न ऊँची नीची सड़के 
न कोई निगाह 
न कोई शोर ही 
हमारे चलते हुए 
कदमो को रोक पाया 
कुछ तूफ़ान आये जरुर 
लेकिन बिछड़ कर भी 
मिल ही गए हाथ 
और कदम चले साथ 

लेकिन नियति 
उस बचपने से गुजार कर 
नई राह पर ले आई है 
टूटता स्वपन बिखर कर 
हमारे बीच की दूरी को 
आर पार कर गया 
शायद मुड़कर देखना 
अब बेईमानी होगा 
तुम्हारी इच्छा 
मेरी कई इच्छाओ पर 
भरी पड़ गई 
नियति को अपनाकर 
हारकर 
कदम बढ़ा लिए है 
जो मेरा नही 
उसपर 
मेरा अधिकार भी कहाँ 


टिप्पणी जीवन में चलते जाना नियति को अंगीकार करना ही है. पास दूर अपनी भावनाओ के साथ नियति का परिणाम है .. कुछ ख्याल जो चित्र पर सहजता से उभर आये ....


रोहिणी शैलेन्द्र नेगी "ग़लतफ़हमी"
*********
स्पर्श तेरे हाथों का,

जो पहले कभी,
मरहम का काम, 
किया करता था...!!

मासूमियत में लिपटा,
चेहरे का हर भाव,
आँखों से इज़हार-ए-बयाँ, 
किया करता था...!!

आज यौवन की, 
चकाचौंध ने उसे,
किस कगार पर लाकर, 
खड़ा कर दिया...??

कि....................
मैं भी वही, तू भी वही,
पर...................
दुनिया-वालों की निगाहें,
पीछा छोड़ने का नाम ही नहीं लेती ।

दिल जो तेरी, 
बातों को,
होंठों पर आने से पहले,
समझ जाया करता था...!!

समय का बंधन भी,
उस अटूट रिश्ते को, 
चाहकर भी,
न तोड़ पाता था...!!

आज मज़हब की,
बेड़ियों ने उसे,
कितना जकड़ लिया...??

कि..........................
मैं भी वही, तू भी वही,
पर...........................
ग़लतफ़हमी की दीवारें,
टूटने का नाम ही नहीं लेती ।।

सीने की तड़प,
मिलने की कशिश,
बिछड़ने का ग़म, 
हर पल सताया करता था...!!

चाहत क्या होती है, 
किसे जाकर बताएँ, 
ये दिल को, 
समझाया करता था..!!

बदल दी,
दो दिलों की राहें,
क़िस्मत के ठेकेदारों ने,
ऐसे फ़ना किया...?? 

कि...................... 
मैं भी वहीं, तू भी वहीं,
पर.....................
ये काल-कोठरी आज भी,
हमें मिलाने का नाम नहीं लेती ।

(कभी-कभी परिस्थिति और विवशताएँ व्यक्ति को इतना कमज़ोर बना देती है कि हम सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि जो हुआ उसमें किसका दोष था.....??)




ब्रह्माणी वीणा हिन्दी साहित्यकार प्रेम- परिवर्तन 
***********
गीत

जीवन-वीणा हर पल झंकृत,
जीवन के बदले से सरगम,,,,,,,
बचपन,,, आया
भोला-भोला मन
बालक खेल रहा ,
ज्यों मस्त पवन /
कितना प्यारा निश्छल सा मन ?
चहका- चहका जीवन-सरगम,,,,,
यौवन, आया जब,
मधुमय सा जीवन 
अधिकारों ने छेड़ा ,
व तोड़ दिया मधुबन /
दो प्रेमी दिल में वियोग तड़फन 
अब टूट गई,,,वीणा - सरगम,,,,
वक़्त कहाँ रुकता है?
यही,मन-वीणा क्रंदन 
जो चाहा नही मिलता है,
ये समय का है,, बंधन /
अब टूट चले रिश्ते नाते,विश्वास,प्रेम का अवमूल्यन
वो निश्छल प्रेमी अब कहाँ ,खो गया प्यारा सा बचपन/
जीवन वीणा हरपल झंकृत,जीवन के बदले सरगम 
वो रूठना फिर मान जाना
सब बचपन के रूप सुहाना
अहंकार के बोझ तले अब,
प्रेम का , अनायास खो जाना
किंतु भूल पाता ना प्रेमी ,बचपन का सच्चा मधुवन /
जीवन वीणा हर पल झंकृत ,जीवन के बदले सरगम //
*****************
ब्रह्माणी वीणा 
संदर्भ 
****
समय के साथ मानव मन बदल गया है बचपन का भोला पन ,चला गया है,,,साथी मे प्रेम विश्वास नहीं रह गया है,,,,




जशोदा कोटनाला बुड़ाकोटी ***क्षितिज ये नही**
चलो आसमां के पार
एक साथ बहुत साथ...

झाँके वहां से
ये हंसी सितारे 
किसकी चुगली 
अक्सर किया करते हैं......?
ये आवारा चाँद
क्यों रोज पोशाकें बदल
चोरी करने
निकल पड़ता है.....?
क्यों ये सदियों से 
विरह में जलता सूरज
सबको अपनी तपिश से
जलाता है.....?

आओ जता दें...बता दें
झुठे हो तुम सब
सुबूत दे दें इन्हें
अपने रेशमी जज़्बातों का .....
आओ बरसा दें....
फुहार इनपर
अपने जुनूनी इश्क़ की.....
दिखा दें अपना
'अज़ल' का रिश्ता .....
जब न आदम था
और न हव्वा .....।

........... परिस्थितियां कुछ भी हो प्रेम अमर है



किरण आर्य ......तय है ..........(प्रोत्साहन हेतु )

वर्षा की प्रथम बेला से 

आयें तुम जीवन में मेरे 
संवर गया जीवन 
जब हाथ थाम तुम 
साँसों एहसासों में हो गए मेरे 
महकने लगी साँसे 
एक हो गए तन मन 
जिया प्रेम में तुम्हारे 
हो समर्पित हर पल मैंने....

समय का चक्र था जालिम 
तुम कसते गए अपना शिकंजा 
मैं टूटती गई 
और एक दिन रेत के मानिंद 
तुम्हारी कसी पकड़ से फिसल गई मैं......

तुमने हमेशा समझा वहीँ 
जो चाहते थे तुम समझना 
अपनें मुताबिक दियें तुमने 
शब्दों को अर्थ 
और अर्थ अनर्थ हो 
जाने कब अपना वजूद खोते चले गए 
तुमने लियें निर्णय 
और बिना मेरा मन टटोलें 
थोप दिया उन्हें मुझपर......

मैं कहाँ थी ? 
शायद मैं नहीं थी 
थे तो केवल तुम 
तुम्हारी सोच तुम्हारे निर्णय 
तुम्हारा शिकंजा 
और मेरा रेत होता वजूद 
एहसास सिमटने लगे 
मूक होने लगे शब्द 
एक गहरी अंधी खाई 
जिसके एक तरफ खड़े थे तुम 
और दूसरी तरफ मैं 
अपनी बैचैनी को थामे.......

हम दोनों ही एक दूजे को 
कर कटघरे में खड़ा 
लगाने लगे थे तोहमतें 
दोनों व्याकुल मन मान बैठे थे 
के दूजा मन 
नहीं समझ रहा बैचैनी 
प्रेम इस मन का 
और इस तरह जाने कब 
रीत गया साथ 
छूटने लगे हाथों से हाथ

शिकायतों का एक दौर चला 
और जाने कब चल दियें हम 
विपरीत दिशा में 
हम हो गये नदी के दो पाट 
सामानांतर चलते हुए भी दूर दूर से....

लेकिन आस एक बाकी कहीं 
कि होगी संकरी नदी 
और दोनों पाट 
फिर आयेंगे करीब 
बिछड़ना नियति सही 
लेकिन मिलना तय है एक दिन 
एकाकार हो सागर में 
विलय होना यहीं तो है प्रेम.........है न 

नोट : दो मन बंधते जब प्रीत में तो होता अक्सर के हक मान दूजे पर अपना पूर्ण, कुछ मन स्पेस नहीं है देना चाहते और वहीँ से दूरी पनपती है....समझ दो दिलो के बीच की रीत जाती है और शिकायतों के ढेर कटघरे में खड़े दो मन चल देते विपरीत दिशा में लेकिन आशावादी हूँ तो उस दूरी में कहीं पास आने की चाह के लोभ से मुक्त नहीं हो पाई............और इसीलिए अंत आशावादी है मेरी रचना का.......





नैनी ग्रोवर मुझे याद है

पानी मे छप-छप करते,

पाँव का तराना, मुझे याद है..

हाथों में हाथ तुम्हारा थामे,
तट पे दौड़ते चले जाना,
दुनियां से अनजान रह के,
सृष्टि का नज़राना, मुझे याद है...

रेतीले घरोंदों के वो दरवाज़े, उसपे नाखूनों से लिखे नाम,
और सीपियों से उसे सजाना,
वो आशियाना, मुझे याद है...

बीते बरस, जाने कहाँ गया,
समय की धारा में बहकर
वो अल्हड़ से बचपन का, 
रेतीला जीवन सुहाना, मुझे याद है...!! 

नैनी ग्रोवर 

टिप्पणी: बचपन की चंद यादें ऐसी होती हैं जो भुलाए नहीं भूलती, उनमे से ही एक ये भी 




किरण श्रीवास्तव "परिवर्तन"
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जीवन के अद्भुत हैं
रंग..
पर सबसे ,प्यारा बचपन,
चाह अलग -ना राह अलग,
भोला सा संसार अलग,
द्वेष भाव ना 
तेरा-मेरा,
निश्छल सा सद्भाव अलग..!!

पर समय - चक्र 
रूक ना पाया
बदला रूप ,
बदली काया..
जीवन का विस्तार बढ़ा,
ख्वाहिशें अंबार चढ़ा,
बदली दिशा और तकदीर
फिर बदली जीवन की तस्वीर...!!!
-----------------------------------
टिप्पणी-
जीवन के विभिन्न अवस्थाओं में बचपन सबसे श्रेष्ठ और उत्तम है। प्रेम से परिपूर्ण निश्छल मन..।जैसे-जैसे इंसान परिपक्वता को प्राप्त करता है तमाम असमानतायें आती हैं जिसके परिणाम स्वरूप जीवन की दशा और दिशा दोनों बदल जाती है...।



कुसुम शर्मा कोई लौटा दे वो प्यारे बचपन के दिन 
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कोई लौटा दे वो प्यारे बचपन के दिन 
वो अल्हड़ सी मस्तियाँ 
वो मासूमियत के दिन 
वो स्वछन्द घूमना वो लड़ना झगड़ना 
कभी रूठ जाना कभी मान जाना 
न दुनिया की चिन्ता न कोई डर 
वो बचपन की नादानियाँ वो प्यारे दिन 
कोई लौटा दे वो प्यारे बचपन के दिन 
जवानी जो आई छीना प्यारा बचपन 
उसकी हर बात ने लूटा सारा बचपन 
अब कैरियर की चिन्ता रीति रिवाजों का डर 
छीनी जिसने मासूमियत छीना बचपन का संग 
बन गई ज़िन्दगी बस अब रंगमंच 
कोई लौटा दे वो प्यारे बचपन के दिन !!

टिप्पणी :- बचपन कितना प्यारा होता है जिसमें हमको किसी बात की कोई चिन्ता नही रहती लेकिन जैसे ही जवानी आती है वैसे ही हर चिन्ता व डर हमको घेर लेती है !



Ajai Agarwal मिलना बिछुड़ना रीत जगत की -प्रोत्साहन हेतु -
ऊपर वाले; तेरी ,छतरी के नीचे ,
क्यूँ बचपन के ;

मासूम -प्यार के बन्धन टूटे ?
जन्मों से जन्मों तक कसमे
बचपन पर ये सब क्या जाने
हाथ पकड़ हम इक दूजे का 
दो जन एक प्राण ही तो थे 
प्रीत प्यार का बंधन क्या है 
हम तो बस खेला करते थे 
एक दूजे के सखा बने 
इक दूजे की आदत-साधन थे। 
बड़े हुए तो क्यूँ हम बिछड़े ?
क्यों मासूम प्यार के बंधन टूटे ?
सूखी आँखें सागर महसूसें
अधरों पे अहसास प्रणय का
जीवन अमावसों की गठरी 
सच सपने मन की बाहों में
प्राण मुखर, हाँ ना की दुविधा
कर्म भाग्य की परिधि सीमित
बरखा बून्दें लड़ियां साँसें
टूट -टूट धरा पे बिखरें
सागर की लहरों सी मचलें।
वो लज्जा वो संकोच पलों का
मिलन !या - मिलने की चाहत ?
कभी तीर पे वो होता
या ; खड़ी तीरे ''मैं'' नापूं दूरी
गूँगे पल , प्राण पियासा 
आतुर चाह समर्पण चाहे
मृग छौनों सा चंचल मन
बादल सजल भावों के लेकर
रिमझिम -रिमझिम बरस- बरस के
तन- मन- प्राण भिगोता क्यूँ है ?
मन अंगारों की फुलझड़ियों से
एकाकीपन क्यूँ अभिसारित ?
प्राणों का ही हवन प्राण में
मौन समर्पण, कम्पित तन मन
साँसों में साँसों का गोपन
फिर भी --
ऊपर वाले तेरी छतरी के नीचे --
प्रणय -प्यार के बन्धन टूटे --क्यूँ टूटे ? ----
====================
चित्र को देख कुछ लिखने की कोशिश 
मैं बचपन से ही अंतर्मुखी रही सो 
कोई भी ऐसा मित्र नहीं रहा जिसके जाने का इतना दुःख हुआ हो --॥ आभा।।





गोपेश दशोरा शीर्षकः प्यार की कसम
बचपन का वो साथ हमारा,
क्यों तुमने बिसराया है,

जीवन सफर में सिवा हमारे,
क्या दूजा कोई आया है?
बचपन के दिन वो याद करो,
जब दूर खेलने जाते थे,
मैं रेत के महल बनाती थी,
तुम तोड़ उन्हें इतराते थे।
झूठ मूठ के रूठने पर,
व्याकुल से तुम हो जाते थे,
और मुझे मनाने की खातिर,
तुम खुद ही महल बनाते थे।
वो महल तो महज खिलौनें थे,
वो टूट गए कोई बात नहीं,
पर रिश्ते को यूं तोड़ रहे,
इसका काई अवसाद नहीं?
जीवन भर संग चलेंगे हम,
यह वादा तुमने बोला था।
संग जीना है संग मरना है,
यह राज दिलों का खोला था।
माना अब बचपन नहीं रहा,
पर प्रेम अभी भी है मन में।
कैसे तुमको ना याद करू,
जब तक है जीवन इस तन में।
एक बार मैं फिर से रूठी हूँं,
आकर के मना लो फिर मुझको।
ऐसा ना हो वक़्त गूज़र जाए,
और मिल ना पाऊँ फिर तुमको।
है प्यार की कसम तुम्हें,
न जाओं ऐसे छोड़ कर।
हम जीते जी मर जाएगें,
जो जाओगें मुंह मोड़कर।
-गोपेश दशोरा
टिप्पणीः चाहते है कि बचपन का साथी जीवन भर साथ रहे। पर एक दिन वो मुंह मोड कर चल देता है। उस स्थिति में जीवन ना चाहते हुए भी जीना पड़ता है। और उसे रोकने की भरसक कोशिश भी की जाती है।



Madan Mohan Thapliyal (प्रोत्साहन हेतु)
वो, समाज और मैं


उसकी कृपादृष्टि
जन्म धरा पर
सुअंग, सुकुमार 
सुकेत, सुबोध
सा बचपन
चंचल, चपल
सुरदान , समीर
सा बचपन
अभय, अनघ
चितचोर, नयशील
सा बचपन
उसका था प्रतिरूप
परिभाषित करने खुद को
भेजा उसने बचपन
ठुमक -2, चलना
हंसना, रोना
औ रूठना
रजकण में लिपटा
सा बचपन
भानु की तपिश सा
गंगा जल सा निर्मल
ऐसा मधुमय
सा बचपन
खींचा हाथ 
उसने जब
बिखर गए
सारे सपने
उम्र बढ़ी
काया बदली
संस्कारित करने लगे सब अपने
ऊंच-नीच, छोटा-बड़ा,
ईर्ष्या, जलन
सिखा गए सब
जो थे अपने
कर दी दीवार
खड़ी माया की
संस्कार कह
सींचे सपने
राह बदली
जीवन बदला
नफरत में ढकेल गए सारे अपने
मैं अब एक 
पुतला हूं माटी का
रोज ढलता और बिखरता हूं
भाग्य है प्रवीण
समझ यह चलता हूं !!!

नोट : हमारे अपनों की महत्वकांक्षा हमारे जीवन में कुहासे की चादर सी छा जाती है और फिर हम समाज का हिस्सा बनकर वही करते हैं जो समाज को अच्छा लगता है।




अलका गुप्ता __बदलते प्रतिरूप __
***************** 


चले थे..साथ हम...
नन्हें नन्हें से क़दम !
साथ ही खुशियाँ भी !
निच्छ्ल था तन-मन !!
वह निराला था बचपन !

समय में ऐसे आँजे !
चूर हुए सपने साँझे !

बड़ा हुआ कद साया 
अहं आकर टकरया !
अंतर्मन को उलझाया !
राहें विषम..समझाया !!

छतरी अपनी अलग हुई !
भिगो भीतर मलिन हुई !
कीचड़ सी बरसात हुई !
सुथरी तस्वीर खराब हुई !

उबर न पाए प्रतिवाद हुए !
घात प्रतिघात संवाद हुए !!
जीवन घाव अलगाव हुए !
बद ये भव फ़िर बदनाम हुए!!

भूल निष्पाप वह भाव सारे !
छल प्रपंच सरि-सार बहे !
जीवंत कटु ये छल-छार हुए !
गिर गर्त विकट अंधियार हुए !!

____________अलका गुप्ता___

नोट _बचपन के मासूम भाव समय के अंतराल में किस प्रकार बदल जाते हैं ..और क्या हश्र हो जाता हमारा ...बस यही प्रस्तुत चित्र में मुझे दिखा जिसे उकेरने का मेरा प्रयास रहा है !



मीनाक्षी कपूर मीनू मिलन ... क्षितिज सा...
*******************
छोटे छोटे 

नन्हे कदम
मिल के चले 
बन दोस्त.....
वो घुल मिल गए 
मासूमियत की 
पहचान बन गये 
साथ पढ़ते खेलते 
न जाने कब 
एक दूजे की 
जान बन गए 
अचानक...
वक्त बदला
किस्मत भी
बदल गए 
प्रेम तराने
दिल बदले 
हाथ छूटे 
टूटे रिश्ते 
नए पुराने
बह गया सब 
आंसुओं की धार में
छुप गया सब 
बरखा की बौछार से
मनस्वी....
मिलते कदम 
अब यूँ लगा कि
क्षितिज हो गए 
नदी के दो पाट
आज हमारे
कदम बन गए....
टिप्पणी... बचपन मासूम होता है निश्छल प्रेम होता है मगर उम्र के बढ़ते हर पड़ाव में दोस्ती का इम्तिहान होता है और उसी कशमकश में कई बार दोस्ती प्रेम मिलन का मात्र प्रतिबिम्ब बन कर रह जाता है क्षितिज की तरह जहां मिलन दिखता तो है मगर होता नही ... मीनाक्षी कपूर मीनू 
* मनस्वी*



प्रभा मित्तल ~~~~~
~~लौट के फिर ना आए~~
~~~~~~~~~~~~~

नहीं किसी की याद मुझे 
बस तुम ही याद आए
बीती बातें खोेए सपने
नयनों में तिर आए।

देखो काग़ज़ की नाव 
लहरों पर इतराती जाए
खेल खेल में बने जहाज 
तो हवा उड़ा ले जाए।

छतरी लेकर बारिश में
छप छप करते चलते थे
सगरे भीगे तन मन में
कितने अरमां मचलते थे।

हाथों में हाथ संभाले​,
बचपन पीछे छोड़ आए
मीलों रस्ता तय कर भी,
पिछला ना बिसरा पाए।

साथ हमारा छूट गया
देखा सपना टूट गया
ओझल होकर आँखों से 
वक़्त अपना रूठ गया।

बचपन के साथी तुम थे
खुशियों की थाती तुम थे
बिछुड़े जीवन से ऐसे
लौट के फिर ना आए।

कितनी ही बातें करनी थीं
यौं जाने की क्या जल्दी थी
ऐसे भी कोई जाता है क्या
तुम तो जाकर फिर ना आए,
जो चले गए जगती से
क्यों लौट के फिर ना आए।

~ प्रभा मित्तल.

( मेरे बचपन की यादों में कोई संगी साथी नहीं रहा,जिसे मैं लिख पाती। इसलिए इन चित्रों में भाई के अलावा किसी को नहीं बाँध सकी, उस वक़्त की वही सुनहरी यादें रहीं,वो भी नियति लील गई।चित्र पर खरी नहीं हूँ जानती हूँ फिर भी आज बस इतना ही कह पाई)


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