Wednesday, December 16, 2020

तकब ०३ /२०





प्रिय स्नेही मित्रों
सप्रेम नमस्कार!
पिछली प्रतियोगिता का परिणाम आने ही वाला है। तब तक आप इस नई प्रतियोगिता के लिए सोचना शुरू कीजिये। आप सभी से आग्रह है कि नियमों का पालन अवश्य करें, जिसके लिए उन्हें पढ़ना भी जरूरी है।

तकब ०३ /२०
१. दिए गए चित्र / तस्वीर पर कम से कम १० पंक्तियां व अधिक से अधिक २० पंक्तियां किसी भी विधा में लिखिये और साथ ही उसका शीर्षक व अंत मे एक टिप्पणी अपने उदृत भावों पर अवश्य लिखिये।
२. चित्र पर रचना नई, मौलिक व अप्रकाशित होनी चाहिए। एक निवेदन है कि जितना संभव हो रचनाओं मे हिंदी के शब्द ही प्रयोग मे लाएँ।
३. प्रतियोगिता के वक्त लिखी हुई रचना/पंक्तियों पर पसंद के अलावा कोई टिप्पणी न हो। हां यदि किसी प्रकार का संशय हो तो पूछ सकते है। निवारण होते ही उन टिप्पणियों को हटा दिया जाएगा।
४. आप अपनी रचना किसी अन्य स्थान पर पोस्ट तभी कर सकते हैं जब प्रतियोगिता का परिणाम आ जाये और आपकी रचना को ब्लॉग में शामिल कर लिया गया हो।
५. प्रतियोगिता हेतु रचना भेजने की अंतिम तिथि २५ नवंबर २०२० है।
६. निर्णायक मंडल के सदस्य केवल प्रोत्साहन हेतु अपनी रचनाएं भेज सकते हैं। आग्रह है कि वे समय से पहले भेजे अन्यथा प्रोत्साहन का कोई औचित्य नहीं रह जाता।

धन्यवाद, शुभम !!!!
प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

इस प्रतियोगिता की विजेता हैं

सुश्री कुसुम शर्मा


कुसुम शर्मा
~लोगों के मस्तिष्क में बैठी यह बीमारी हैं~

उभर सके न जिससे हम ऐसी यह महामारी है !
लोगों के मस्तिष्क में बैठी यह बीमारी है !!
बीमारी से बच भी जाए आर्थिक मार भी भारी है !
लॉक डाउन के चक्कर में निकली जान हमारी है!!
महामारी व घर काम के चक्कर में अटकी जान हमारी है !
सोच समझ भी शून्य हो गई ऐसी स्थिति हमारी है !!
शुरू हुई यह चायना से विश्व भर में फैल गई !
मौत का तांडव मचाया हर व्यक्ति को बन्दी बनाया !!
डबल्यूएचओ ने भी क्या ख़ूब साथ निभाया!
दे कर न सही ख़बर विश्व में तांडव करवाया !!
मुँह में मास्क, छह फुट की दूरी !
बार बार हाथों को धोना है ज़रूरी !!
जाने कितने बेघर हुए सड़कों पर वह सोते है !
इस बीमारी के डर से नही आर्थिक तंगी से वो रोते है!!
कई डर से पागल हो गए खुद से बातें करते है !
देख कर यह स्थिति हम मन ही मन रोते है !!
कहते है जाको राखे साईंया मार सके ना कोई!
आया जो संसार में एक दिन तो उसको जाना !!
मान लें इस सत्य को मानव!
तो फिर क्यूँ इस बीमारी से घबराना !!

टिप्पणी: यह हमारे यहाँ की स्थिति है इस बीमारी के देश में प्रवेश करते ही जाने कितने लोग बेघर हो कर सड़कों पर अभी तक रह रहे हैं लाँकडाउन में जाने कितने घरों में चूल्हा तक नहीं जला ! जाने कितने लोग इसके डर से ही मर गये जाने कितने इस चिन्ता में पागल हो गए घर का बिल कैसे भरेंगे ! सही बात है बीमारी से इन्सान लड़ सकता है पर आर्थिक तंगी से कैसे लड़े !


पुष्पा त्रिपाठी
~कोरोना के युद्ध में विश्व जितेगा~

कोलाहल जीवन का थमा थमा सा है
चिकित्सकीय संसाधन अब गिरफ़्त सा है
दम तोड़ते लोग निरंतर संक्रमित संख्या
मौतों का बढ़ता आंकड़ा अब रफ़्तार सा है।
मजदूर दूर-दूर से भूखे-प्यासे घरों को लौट रहे
कितने खौफ़नाक मंज़र यहां तबाही ने कमर तोडे
मंदी की यह जबर्दस्त मार अब उभरा उभरा है
विकास औ कामकाज की गति अब अवरुद्ध सा है।
इसके हजारों पाँव, लाखों बाहें मौत की मंजिल थामे
कौन कहाँ कब कैसे चला जाये कौन जाने ?
पांसों में एक वायरस टहल रहा सांसों में अवरोधक
आवाज में खौफ़नाक मंज़र अब दिखा -दिखा सा हैं।
सुरक्षित हम जीवनरसमास्क पहन कर घूम रहे
अस्त्र शस्त्र के बिना निरंतरजारी यह विश्वयुद्ध जीत रहे
ख़त्म होगा यह कहर हम जानते है मगर फिर भी तो
यह हिटलरी शासन हर तरफ अब दिखा - दिखा सा है।

टिप्पणी : पूरी दुनिया कोरोना वायरस के खिलाफ जंग लड़ रही हैं। इस संक्रमण ने सम्पूर्ण विश्व की आर्थिक व्यवस्था को चरमरा दिया है। भारत में इसे रोकने के लिए बहुत प्रयास किए जा रहे हैं यह किसी हिटलरी शासन और युद्ध से कम नहीं है।



प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
~संस्कृति संस्कार से मिलन~
(प्रोत्साहन हेतु)


भूल गए थे हम कुछ
नहीं, भूल गए थे बहुत कुछ
हमारी पहचान खोने लगी थी
पाश्चात्य संस्कृति का मुखौटा ओढ़
हम जंक फूड के शौकीन हो गए थे
हाँ ये है कड़वा सच
हम भूल गए थे
प्रवेश करते ही हाथ मुंह धोना
भूल गए हाथ जोड़ करना नमस्ते
छूट रहा था
सयुंक्त परिवार, स्वयं का परिवार
बढ़ रही थी दूरियाँ, गुम हो रहा था प्यार
छूट रहा था
एक दूजे का साथ व विचार विमर्श
लेकिन
वक्त का खेल, पुन: किया स्वीकार सहर्ष
कोरोना की महामारी से चाहे घबराकर
अपना लिये फिर हमने अपनी संस्कृति-संस्कार
कोरोना से डरना न अब, खुद से करना प्यार

टिप्पणी: मानता हूँ कि कोरोना कि महामारी ने जान के नुकसान के साथ जीवन जीना दुर्लभ कर दिया लेकिन इस बीमारी का यह असर दुनिया भर में हुआ या हो रहा है। लेकिन इसमें मुझे सकारत्मक पहलू भी दिखाई दिया कि कुछ संस्कृति संस्कार से जुड़ाव जो छूट रहा था उसे हम पुन: जीवन में उतार रहे है। शायद समझ जाये हम लोग।


प्रगति मिश्रा
~दैव! दैव! कोरोना-समस्या ने पुकारा~


दैव! दैव! कोरोना-समस्या ने पुकारा
'मास्क' और सामाजिक दूरी का प्रण लोगों ने स्वीकारा।
'हेल्थ-हाइजीन' एवं 'सैनिटाइजर' को बार-बार निहारा।।
पर साहब! यहाँ समस्या
कोरोना से उत्पन्न समस्या से है,
इस 'लॉकडाउन' में गए रोज़गार से है।
बचपन से सहेजी डिग्रियाँ और प्रशस्ति पत्र
उस प्रतिभा के गवाह हैं
जिनके एवज में कभी नौकरी पाई थी,
लेकिन वे एक संदूक में कैद हो कर रह गए है।
इस वैश्विक महामारी से, तब भी लगता था डर,
पर, अब तो बेरोजगारी ने ही बना लिया है घर।
योग्यता अब भी उन्मुक्त आकाश में है
पर लगता है कि जैसे आय पर ताला जड़ गया है।
एक तो कोरोना का कहर, दूसरे बेरोजगारी की मार
मध्यवर्गीय परिवार तो मानो जद्दोजहद से भर गया हैं ।
खैर, समस्याएँ आती हैं तो आए
घिरे गड़गड़ाती घोर घटाएं, अंतरद्वंद को न भरने देंगे,
'कोविड' को भगाकर ही हम दम लेंगे।
स्वस्थ व समृद्ध देश बना कर ही हम दम लेंगे।।

टिप्पणी: हम भारतवासी कोरोनावायरस की सामान्य समस्या या ज्ञान पर ही ध्यान देते हैं,पर इन सामान्य समस्याओं के अतिरिक्त व्यक्ति विशेष समस्याएँ भी हैं जो कि लोगों को जद्दोजहद में डाले हुए हैं । उनमें से एक है - बेरोजगारी की समस्या। आज करीब ढ़ाई करोड़ अतिरिक्त लोग बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहे हैं जिनकी पारिवारिक स्थिति दयनीय है । इस कविता के माध्यम से मैं आप सबका ध्यान उसी ओर आकृष्ट करना चाहती हूँ। धन्यवाद। आभार। सादर।



यशोदा दिग्विजय अग्रवाल
~सीठा त्यौहार~

बीत गई
फीकी दीपावली
उत्साहविहीन
सुविधा विहीन
यंत्रवत जीवन जिया ..
एक मशीन की तरह
सुबह से शाम तक
रात में भी सोने के पहले
एक चिंतन कि
कल की कल-कल
मन में असंतोष
खुशियाँ सारी समाप्त,
मास्क पहनने
और हाथ धोने में
बची खुची कसर
चढ़ गई बनकर भेंट
इस कहर भरी
विदेशी विषाणुओं रचित
महामारी कोरोना की भेट
घर पर रहकर मानव
महज निसहाय 'औ'
किस्से -कहानी तक
रह गया सीमित
यह महोत्सव दीपावली का
रस्म अदाई हो गई है..

टिप्पणीः चित्र के आधार पर आत्मिक अवलोकन सिखा गई हमें अल्प सुविधा में जीना है और अपने आपको स्वस्थ रखना है...।


किरण श्रीवास्तव
"करोना"

रक्तबीज सा है विस्तार
नहीं समझ आए निस्तार..
कितनों को तू लील गई
होठों को भी सील गई,
दिल दूरी ना अब सह पाए
मन मचले रिश्ते तड़पाए ...!
ना मिलना तो मजबूरी थी
ऐसे ही क्या कम दूरी थी...
काम धंधे चौपट कर डाला
शादी पार्टी ना मिर्च मसाला,
माफ करो तुम अब हम सब को
लौट जाओ अब अपने घर को।


टिप्पणी: विज्ञान के विभिन्न चमत्कारों से दुनिया चकित थी, लोग चंद्रमा पर पहुंचने का ख्वाब देख रहे थे परंतु ,एक वायरस ने सबको धरातल पर ला दिया| जिस नियम संस्कार को लोग भूल चुके थे वही एकमात्र बचाव का कारण बना......!!!!


विजय लक्ष्मी भट्ट शर्मा
~करो ‘ना’~

वक्त की चाल,बड़ी बलवान यहाँ
हम मद में चूर,अहम मे गुम
वक्त चलता,अपनी चाल
दिखाता तमाशा ,एक वायरस
मुँह चिड़ाता,रोज तेरी उम्र चुराता
तेरे शान से ,ऊँचे घमंडी
मस्तक पर ,एक छोटी सी
लकीर छोड़ ,आइना दिखाता
तुझको ही तेरी,असलियत बताता
क्या पाया तूने,इतना कमाया तूने
गरीब की रोटी छीनी
मुँह बंद अब ,खोल चड़ा
तेरा कमाया ,काम ना आया
तू भी तो चैन से ,खा ना पाया
करोना नाम ले,यमराज खड़ा
अब तो हे मनु ,अपने अहम को
करो ‘ना’
मिल मिल रहो ,अब तेरा मेरा को
करो ‘ना’
भाग ही जाएगा ,एक दिन फिर
सबक सिखाता
ये करोना।

टिप्पणी: मेरी कविता करो ‘ना’ याद दिलाती है की हम कितने स्वार्थी हो गये, सिर्फ़ अपना फ़ायदा सोचने लगे और इस बीमारी कारोना ने दिखा दिया की कोई भी वस्तु जरुरी नहीं , आपका पैसा रुतबा किसी काम का नहीं , ये बीमारी ना अमीरी ग़रीबी देखती है ना ही कोई रुतबा फिर किस बात का घमंड जब जाना ख़ाली हाथ।



मीता चक्रवर्ती
~कोरोना~


बदलने चले थे हम प्रकृति को
मानव की मानवीय प्रवृत्ति को
माडर्न कहलाने चले थे , भूलाकर
अपने संस्कार और संस्कृति को
बहती नदियों को हमने रोक दिया
पेड़ पौधे लगाना छोड़ दिया
ईंट कांक्रीट रुपी इन दानवों ने
अरण्य को हमारे लील लिया
किया खिलवाड़ जो प्रकृति से
खामियाजा उसका ही भर रहे
नही दोष केवल ही कोरोना का
हम भी इस महामारी के जिम्मेदार रहे
अब हमे ही इसे भगाना होगा
संस्कार अपना अपनाना होगा
दूर दूर रहकर ही सही
साथ अपनों का निभाना होगा ।

टिप्पणी: ये जो महामारी फैली हुई है विश्व भर में, इसका वाहक भले ही कोई वायरस हो पर हम मानव भी कहीं न कहीं इसके जिम्मेदार हैं। हमने अपने स्वार्थ के लिए प्रकृति के साथ बहोत खिलवाड़ किया है शायद इसी का परिणाम हम चुका रहे हैं ।


सूर्यदीप अंकित त्रिपाठी
~सुना तुमने? ~

सुना तुमने ?
सुना ही होगा, इसी धरती के जो हो,
गुलजार साहेब ने भी बता दिया अब तो...
“महामारी लगी है”
और वो महानायक जो रोज़, आपको चेता रहा है कब से,
दूध का जला है साहेब, सुन लो उसकी भी..
पर ये भूलने भी नहीं देता... ये बुरा लगता है..
क्यूंकि भूलने की आदत जो है हमारी,
बस यही बात पसंद नहीं आती हमें...
ये भूलने नहीं देता..
पर कुछ तो है जो हमें नहीं भूलना चाहिए था,
उन त्रिशंकु मजदूरों का पलायन, रूदन, रोदन, मर्दन,
इनको सड़क पर भूखे, पैदल चलते हुए देख ऐसा लगा,
इनसे इनका घर छीन लिया हो,
और कह दिया हो...कि यहाँ रहना है कि वहाँ, ये तुम पर है..
बस फर्क ये था कि ये बंटवारे की घड़ी नहीं थी..
गुलजार साहेब, प्लग निकाल चल तो दिए थे सब,
पर भूख धूप-पानी खाकर नहीं बुझती,
कुछ पहुंच पाए, कुछ रास्ते में ही रह गए थे, डिस्चार्ज होकर,
ये कैसे भूल गए हम..
कोई महानायक नहीं आएगा ये याद दिलाने...
सुना तुमने ??

टिप्पणी: मेरी ये कविता सिर्फ और सिर्फ मेरी भड़ास है.. इसलिए यहाँ प्रतियोगिता के लिए नहीं है.. विषय आपने दिया...तो मन किया की यहाँ अपनी कुछ मन की कह दूँ... धन्यवाद...



प्रभा मित्तल
~ कोरोना-काल ~

प्रगति प्रयोग के अतिक्रमण पर
कुपित प्रकृति का प्रकोप बरपाया
कोरोना ने आ धमकाया,रे मानव!
ठहर जरा,धीमी कर अपनी चाल।
तभी संक्रमण की दहशत फैली ..
अपनों से मिलने की आज़ादी गई-
अब कोविड प्रकोप से कैसे बच पाएँगे.
सोचा न था ऐसे भी दिन आएँगे
आगे बढ़ते - बढ़ते अचानक
सब पीछे को सिकुड़ जाएँगे।
सूनी सड़कों पर विचरेंगे पशु,
घरों में बंद रहेंगे हम,
बागों में पंछी चहचहाएँगे।
कोयल-कौेए,चिड़िया तोते
हमको पिंजरे में बंद देख, हँसेंगे
और हम भीतर रहकर भी डरपाएँगे।
मास्क बिना न जीवन होगा,
खुली हवा में होकर उन्मुक्त
साँस लेने को भी तरस जाएँगे।
बाज़ारों में सूनापन पसरा
और त्यौहारों में धूम नहीं,
स्वजनों बिन कैसे खुशी मनाएँगे...।
कैसी ये महामारी फैली..
स्कूलों की हो गई छुट्टी,अब
बच्चे सब कैसे पढ़ पाएँगे।
ये वक़्त की हुंकार है--
मौत का सौदा करने आया है कोरोना!
सो जरूरी है हमारा संस्कारों में लौटना,
सादगी और सभ्यता ही हमें बचाएँगे
तभी देश-काल-वातावरण शुद्ध हो पाएँगे!
मास्क और दूरी अपनाकर कोरोना को भगाएँगे।
शीघ्र ही हम सब फिर से हिल-मिल जी पाएँगे।

टिप्पणी: आज प्रगति प्रयोग और आधुनिकता का अतिक्रमण हो रहा है। इसीलिए कोरोना -काल ने मनुष्य को समझा दिया कि इतना तेज न भाग.. चाल कुछ धीमी कर। अब प्रकृति बदला लेगी। क्योंकि मनुष्य ने प्रकृति की स्वाभाविकता नष्ट कर दी है। वापिस अपनी जड़ों को पहचान...उन्हें अपनाने का समय आ गया है, तभी कोरोना से मुक्ति मिलेगी।
 








सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Thursday, October 22, 2020

तकब २ / २०







१. दिए गए चित्र / तस्वीर पर कम से कम १० पंक्तियां व अधिक से अधिक १६ पंक्तियां किसी भी विधा में लिखिये और साथ ही उसका शीर्षक व अंत मे एक टिप्पणी अपने उदृत भावों पर अवश्य लिखिये।
२. चित्र पर रचना नई, मौलिक व अप्रकाशित होनी चाहिए।
३. प्रतियोगिता के वक्त लिखी हुई रचना/पंक्तियों पर पसंद के अलावा कोई टिप्पणी न हो। हां यदि किसी प्रकार का संशय हो तो पूछ सकते है। निवारण होते ही उन टिप्पणियों को हटा दिया जाएगा।
४. आप अपनी रचना किसी अन्य माध्यम में पोस्ट तभी कर सकते हैं जब प्रतियोगिता का परिणाम आ जाये और ब्लॉग में शामिल कर लिया गया हो।
५. प्रतियोगिता हेतु रचना भेजने की अंतिम तिथि २२ अक्तूबर २०२० है।
६. निर्णायक मंडल के सदस्य केवल प्रोत्साहन हेतु अपनी रचनाएं भेज सकते हैं। आग्रह है कि वे समय से पहले भेजे अन्यथा प्रोत्साहन का कोई औचित्य नहीं रह जाता।
धन्यवाद, शुभम !!!!

इस प्रतियोगिता के विजेता है  "सूर्यदीप अंकित त्रिपाठी" 
हार्दिक शुभकामनायें 

प्रजापति शेष
व्यंजन

कहाँ भटकी है
कहाँ अटकी है
कहाँ लटकी है
किस की लटकन।
कुछ उलझा सा
कुछ सुलझा सा
कुछ अलगा सा
उसका चितवन।
कहीं बिखरा है
कहीं सुथरा है
कहीं निखरा है
मन का उपवन।
कोई पढ़ता है
कोई लिखता है
कोई गुणता है
भाषा का व्यंजन ।

टिप्पणी: कितने भी शब्द हों, चित्र को पूर्ण परिभाषित नहीं कर सकते। वैसे ही श्री (स्त्री) को शब्दों में, काव्य में, साहित्य में लिखना असम्भव है। हर शब्द कभी कम या कभी अधिक भारी पड़ता है, बिना तुला के ही स्पष्टतः। व ये आव्हान, ये ललकार ! एक रेगिस्तानी कैसे दृष्टिगौण कर सकता है? निःस्वाद निरर्थक ही सही व्यंजन परोस दिया है शब्दो का।


Pushpa Mishra Tripathi
ख़ामोशी


कई बार चीखती है खामोशी
ह्रदय में चुभ रहे दर्द के कांटे
सहचर बन जाती दोनों आंखें
नीरसता उर की पीड़ा जानती है ....
सब कुछ होते हुए भी कुछ तो कमी
तभी तो मेरी आंखों में नमी सी है
समाज की क्रूरता को लेकर
उस वक़्त मैंने बहुत कुछ खोया था
नहीं मिला जो खो दिया मन का चैन
कहीं छिपे उस मर्मभेद को
या फिर दब जाती मेरी आवाज़
दुनियादारी के शोर में ,
आपाधापी के होड़ में ;
और खामोश हो जाती है
चीखती , बोलती , रोती खामोशी ।

टिप्पणी : चित्र में स्त्री मन को दर्शाते भाव पर केंद्रित कविता लिखी गई है। जब एक स्त्री सामाजिक रूढ़िवादी परंपरा की जंजीरों को तोड़ आगे बढती है तो चरों ओर से कई हाथ उसे रोकने को तत्पर रहते हैं उस समय वह कितनी वेदनाओं से गुजरती है इसी पर आधारित मन के भाव कविता के रूप में प्रेषित है।
 

विश्वेश्वर प्रसाद सिलस्वाल
अबला

भ्रम था वो,
पूजी जाती नारी जहाँ
देव करते वास वहाँ ।।
भ्रम था वो
उठे हाथ मुझे पूजने को
थे उठे मुझे नोचने को ।।
भ्रम था वो
लक्ष्मी रुपेण मुझे सींचने को
भिंचे हाथ गर्भ निचोड़ने को । ।
भ्रम था वो,
नारी,बाला,भार्या, माला हूँ,
निर्बल, खिलौना अबला हूँ,
हाँ बस अबला हूँ मैं । ।

टिप्पणी: चित्र नारी का अबला रुप प्रदर्शित करता है।जहाँ नारी को पूजा जाता था आज हिंसक अनैतिक प्रवृत्ति ने खिलोना मान नारी के शरीर को गर्भ रुप से ही निचोड़ना प्रारंभ कर दिया है। बस अबला रुप ही चित्र की कहानी दर्शाती है।


Meena
ये हाथ

पुरुषों की रगों में दौड़ती
मर्दानगी की रवानगी
और तेज हो रही है
हिंसात्मक होते हाथों
की लंबाई बढ़-सी रही है
ये हाथ कभी बालों से
चेहरे को नोंचने तक
के लिए तैयार हैं
बच्चे से पिता, पिता से दादा तक
ये हाथ केवल एक मर्द रहा
जिस औरत पर उठा
वह शांत चित्त रही
शांति की तैयारी
स्त्रीत्व में ऐसी भड़की
कि अब अपनी रक्षा की
बारी में है
इसलिए ऊपर से मौन
और भीतर से खुलती जा रही नारी है

टिप्पणी : तस्वीर में जितने हाथ दिखाए गए हैं वे पितृसत्ता का प्रतीक हैं और औरत उस मर्दानगी को झेल रही है। लेकिन अब वो इस पितृसत्ता से लड़ने को भी धीरे धीरे तैयार हो रही है।



सूर्यदीप अंकित त्रिपाठी
लड़की का होना

यही होना था शायद
एक तस्वीर ही बन जाना था तुम्हें,
गुनाह है एक लड़की का होना,
इस अभिशिप्त समाज में,
छोटे से माँस का टुकड़ा हो या लोथड़ा,
गिद्दोँ की नज़र से बच नहीं पाती है,
कभी घूरती नज़रों से तो कभी,
क्रूर पंजों से नोची जाती है,
सिसकती रहती है, किसी अधूरी स्वास की तरह,
भटकती रहती है, किसी अधूरी लाश की तरह,
मर जाये तो, अधूरी रात में,
चुपचाप जला दी जाती है,,
कुछ मोमबत्तियाँ उस तस्वीर के इर्द-गिर्द जलाई जाती हैं,
कुछ चेहरों पर लगी कालिख,मखमली कपड़ों से पोछी जाती है,
खबरों मेरे ये खबर जोरों से, कुछ दिनों तक चलाई जाती है,
फिर वो लड़की किसी ख्वाब की तरह भुला दी जाती है।।

टिप्पणी: स्त्री शब्द मात्र डेढ़ शब्दों से मिलकर बना है, पर इस शब्द की गरिमा अनंत है, और स्त्री स्वयं एक पूर्ण वेद है। जो स्थान उसका होना चाहिए, उसे मिल नहीं पा रहा,आज की सामाजिक स्थिति स्त्री के लिए बहुत ही निराशाजनक हो गई है, वह सुरक्षित है जब तक वो चुप है, चाहे उसे उस चुप्पी के लिए कितनी ही बड़ी कीमत क्यों न हो चुकानी पड़ रही हो। शोषण है, अनाचार है, अत्याचार है, व्याभिचार है, और वो लाचार है। अगर वो हिम्मत करके आवाज़ देना भी चाहे तो रसूखदार क्रुर पंजे उसका मुँह दबोच देते हैं उसकी आँखरी साँस निकलने तक।


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
मर्द नहीं नामर्द हो ......
(प्रोत्साहन हेतु )

नारी के अस्तित्व पर
तुम्हारी आपराधिक मानसिकता
नपुसंकता का द्दोतक है
हाड़ मांस पर तुम्हारी
वासना से भरपूर नज़र
नीचता का परिचायक है
संस्कारहीन पालन पोषण
दुष्कर्म कुकृत्य की बन पहचान
पुरुष शब्द पर धब्बा हो
उम्र तुम्हारी सीमा नहीं
हर उम्र के लिए नरभक्षी हो
तुम पुरुष नहीं दानव हो
पाप का घड़ा भर गया
तुम्हें जलना मरना होगा क्योंकि
तुम मर्द नहीं नामर्द हो

टिप्पणी: इन भीभत्स घटनाओं से मन खिन्न है। बहुत बार लिखा भी। अंगुली उठा उठा, मोमबत्ती जला कर थक गए। अब इन राक्षसों को जलना /मरना होगा – अंत करना होगा।




डॉली अग्रवाल
फितरत

कल कुछ ख्वाहिशों की मौत हुई थी
देर तलक दिल मातम बनाता रहा
ऐतबार मुँह ढांप कर कांधा देने पहुँचा ही था
कि --
फितरत ने ऐतबार को पहचान लिया
इससे पहले हसरतें उठती ओर कुछ कहती
फितरत ने ऐतबार को अलग कर दिया
ये देख
एहसासों ने सब्र को साथ ले खुद को कमरे में बन्द कर लिया ...
उफ़्फ़फ़फ़ क्या गजब हुआ
ख्वाहिशों की मैय्यत पर ऐतबार जार जार हुआ

टिप्पणी: हद से ज्यादा ख्वाहिश और किसी पर ऐतबार हमेशा तकलीफ देता है !



यशोदा दिग्विजय अग्रवाल
नारी की आकांक्षा
........
एक स्त्री के लिए
प्रेम से बढ़कर भी
कुछ हो सकता है,
तो वो है सम्मान
या रिस्पेक्ट..।
क्षणिक हो सकता है
प्रेम ..पर
सम्मान नहीं होता
क्षणिक..वो क्यों
दिखावटी हो सकता है
प्रेम....पर
सम्मान नहीं
एक दिलचस्प बात
कि ईश्वर ने स्त्री को
ऐसी शक्ति दी है
जिससे वह
पढ़ सकती है
किसी भी पुरुष के भावों को
और पुरुष द्वारा
दिया गया
सम्मान भाव को
स्थापित कर लेती है
अपने मन में वह स्त्री
शायद इसी लिए
स्त्री से दिखावा करना
संभव नहीं..।

टिप्पणी..नारी की अभिलाषा और कार्य क्षमता का विश्लेषण..रचना मन में स्वतः विस्फोटित हुई




ब्रह्माणी वीणा हिन्दी साहित्यकार
नारी-अस्मिता पर प्रहार 
दोहा छंद में चित्र अभिव्यक्ति ,,,,
*******************************


पुरुष नहीं,कापुरुष हैं,,जो करते व्यभिचार!
कामुकता की हबस में,करते बलात्कार!!
*
माता- देंह को ध्वस्त कर,कहाँ रहे तुम मर्द ?
जन्मे जिनके गर्भ से,,,,,,,,,उसको देते दर्द!
*
नारी ,जननी बेटियां,,,,,,दुर्गा का अवतार!
दानवता के वेश में,,,,,,करते नर व्यभिचार!
*
कहीं बेटियाँ लुट रहीं,गली- गली मे आज!
द्रुपद-सुता की लाज पर,है घृतराष्ट-समाज!!
*
धर्म,संस्कृति हिंद की,धुमिल हो रही नाथ !
कब आवोगे कृष्ण हरि,नारी बनी अनाथ !!
*
नर की जननी है सदा,शक्ति रूप साकार !
कब समझोगे कापुरुष,,,,,पुत्री बनती नार!
*
नर से उत्तम नारि है,,,,,करे सृष्टि विस्तार!
ईश की भी पूज्यनीय,,,,,प्रभुता अपरंपार!!

टिप्पणी: आजकल नारी-अस्मिता से खेल रहे बलात्कारी पर मेरी कविता है ,,साथ नारी -महिमा का वर्णन भी ,,नारी को भोग्या न समझकर शक्ति का स्वरूप समझना चाहिए,,,क्योकि कापुरुषों के भी पुत्री व बहन के साथ भी ऐसा हो सकता है,,



किरण श्रीवास्तव
नारी

यूं तो
सब ये कहते हैं -
नर से नारी भारी है,
पर हर युग में यह अबला
रही सदा बेचारी है....!
चहुओर बैठे दु:शासन-
ताक लगाए मौके की,
चीर हरण होने से रोके
अब ना कोई गिरधारी है...!!
ईश्वर से होती है तुलना -
ममता इसकी अपरंपार,
पर कोख में नहीं सुरक्षित
ऐसी ये अवतारी है...!!!
पुरुषों सेअब नहीं ये पीछे-
हर क्षेत्र में परचम लहराए ,
पर कोमल फूलों सी काया
टूटे तो मुरझाती है....!!!!
हे! अधम पुरुष यह सोच जरा -
मानवता को क्यों रखें ताक,
मां बेटी और बहन तुम्हारी
वह भी तो एक नारी है ....!!!!!

टिप्पणी: आए दिन दिल दहलाने वाली घटनाओं से महिलाओं में असुरक्षा की भावना बलवती हो रही है!कुपुरुषों की मानसिक विकारता सोचनीय है!





नैनी ग्रोवर
रस्ता बना ही लूँगी

जिस और चल पड़ूँगी, रस्ता बना ही लूँगी,
तिनकों से ही सही पर, घरोंदा सजा ही लूँगी...
तन से कमज़ोर सही मैं, मन से कभी ना हारी,
हौंसलों से अपने, अपनी किस्मत बना ही लूँगी...
छाँव हूँ मैं ममता की, ओढ़नी हूँ लाज की,
रह कर मर्यादा में भी मैं, तूफ़ानों को हरा ही लूँगी...
ना चाँद की चाहत है, ना सितारों को छूना है,
धरती की पुरवाई को मगर, साँसों में समा ही लूँगी...!

टिप्पणी: एक औरत के दिल में बसने वाले भाव, जिन्हें वो पूर्ण करना चाहती है..!


Ajai Agarwal
षड्यंत्र -
(प्रोत्साहन के लिए )
...........
स्त्री को वस्तु ,
बनाता बाजार ;
दीखता है तुम्हें !
ये षड्यंत्र ?
शरीर से परे -
स्त्री मन का भूगोल
पढ़ने की सामर्थ्य हो
तो भी -
चाहत नहीं ;
स्त्री को उठना होगा
स्त्री के लिए
पर नहीं
वो स्त्री विमर्श के
लोभ में फंस गयी ;
स्त्री वहीं की वहीं
रह गयी ;
अपने उबलते इतिहास को
भाप बना देखती !

टिप्पणी: कलम उठती नहीं अब स्त्री विमर्श पे ,अब घर-घर संघर्ष करना होगा ,नारी के पुरुषत्व को बचपन से ही जगाना होगा और करना पड़ेगा लड़कों के भीतर की स्त्री को जागृत --हर बच्चा अर्धनारीश्वर का स्वरूप हो --माँ तुझपे आ पड़ा है सारा बोझ समाज को दिशा देने का।



Mita Chakraborty
दामिनी


पापा की परी तो , हो ही लड़कियों
अब तुम्हे झांसी की रानी भी है बनना
नापाक इरादों से बढ़ते हाथों को
मिला दे खाक मे वो दामिनी भी है बनना ।
फूलों सा सुकोमल हो दिल भले ही
चट्टान सा बुलंद , पर हौसला रखना
छू न पाए आंखों से भी कोई जिस्म को तुम्हारे
अपनी आँखों मे वो अंगार ,वो शोला रखना ।
मलाल न करना कभी, खुद पर अभीमान करना
अपने हाथों मे ही अपनी इज्ज़त अपना स्वाभिमान रखना
मासुमियत का तुम्हारे कर न सके कोई सौदा यहां
इन्सान की शक्ल मे उन गीद्धों की भी पहचान रखना ।

टिप्पणी: समाज मे आजकल बहु बेटियों के साथ जो दुरव्यवहार हो रहा है, उससे उन्हें कोई और नही लड़कियां खुद ही खुद को बचा सकती हैं ।बस अंदर से कोमल होने के बावजूद उन्हें खुद को सशक्त करना है । सिर्फ आर्थिक ही नही शारीरीक और मानसिक तौर पर भी उन्हें स्वालंबी बनना है।


Snehprabha Khare
*नारी-मंथन*
**********
सूख गये भाव सब,मथता रहा भाल है।
चहूँ ओर घूम रहे, भेड़ियों की चाल है।
सपने बिखर गये ,दुनिया उजड़ गयी,
तार तार जिंदगी का, बड़ा बुरा हाल है।।
कहतें है लोग मुझे, पूजिता सुपावन है।
ऋषियों के तप की ये, नारी लुभावन है।
घर को बनाती है तू , देती संस्कार सभी,
दुनिया की प्यारी सी, अनोखी मुस्कान है।।
हँसती हूँ खेलती हूँ , प्यार में ही पलती हूँ।
दिन रात डर डर , सपने सजाती हूँ।
गली गली घूमते हैं, मानसिक ये रोगी से,
स्वपन को मिटाते हैं , रो कर बनाती हूँ।।
शरणागत हूँ सांवरे , करदो नैय्या पार।
नही सुरक्षित बालिका, विवश हुई सरकार।
कहीं सियासत में फसी नारी की ये जात ,
कहीं जला कर मारते , दुखिया अबला नार।।

टिप्पणी: आजकल नारी पर आए दिन होने वाले बलात्कार पर मेरी कविता है सबला,दुर्गा,जगतजननी,नाम जैसे दिखावा है गली गली लड़की होने का दुःख झेल रही है यही नारी विमर्श का मंथन है
******************************************


मीनाक्षी कपूर मीनू
पाक चेहरा
###############
बिखरी हुई लटों में
सिमटा हुआ सा चेहरा
उलझी हुई जिंदगी को
सुलझाता हुआ ये चेहरा
प्रत्याशा में रहता खुशी की..
एक मासूम चेहरा
अनगिनत गलतियों को
भुलाता हुआ ये चेहरा
सबको खुशियाँ दे कर
दर्द छुपाता हुआ ये चेहरा
चारों तरफ से उठते हुए
हाथों को ......
नकारता हुआ चेहरा
रीति रिवाजों की आड़ में
घूंघट में ढका ये चेहरा
आह .. फिर अपनो/बेगानो
के हाथ ही घूंघट में ही
तार-तार हुआ चेहरा
पलटवार आवश्यक है
अब समझता हुआ चेहरा
धीरे धीरे खुद को
समझाता हुआ ये चेहरा
अभी हिम्मत कम सही
मनस्वी .....
एक दिन ऐसा भी आएगा
जब पलट हाथ घुमा
खुद को भी बचाएगा
ये चेहरा....
सबके साथ ही
अपनी उलझन को भी
सुलझाएगा ये चेहरा
देखना एक दिन
ऐसा भी आएगा मनस्वी
जब सच मे दिल से
मुस्कुराएगा ये चेहरा
मनस्वी ....बहुत ही प्यारा है
मासूम पावन ये चेहरा......

टिप्पणी:  मासूम नारी मन सबकी उलझन सुलझाता है , खुद उदास रह कर सबको हंसाता है मगर खुद प्रतिदिन अनगिनत हाथों के अदृश्य प्रहार अपने तनमन पर सहन करता है मगर वह दिन दूर नहीं, जब नारी मन कठोरता का आवरण ले सबको पलट कर जबाब देगा , और मन से मुस्कुराएगा उसका पाक दामन लहलहायेगा ।



प्रभा मित्तल
नारी की व्यथा-कथा

घर बाहर के अंकुश लगते,
भोला बचपन बीत रहा था।
स्त्री होकर जन्म लिया है,
इसका बिल्कुल भान न था।
आस-विश्वास के रंगों से
जीवन का कैनवस भरती थी।
दहलीज लाँघते सपने थे,
पर बाहर की आँखें चुभती थीं।
देवी की मूरत कहकर श्रद्धा से,
जो पूजा घर में बैठाते हैं।
गर कन्या जन्मे घर में तो
वही जन मातम पसराते हैं।
'बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ'
ये तो केवल कोरे नारे हैं।
वंश-वाहक बेटे की चाहत ने
कितने ही कन्या-भ्रूण मारे हैं।
शिक्षा-सम्मान की खोखल में
अपराध दिनों-दिन बढ़ रहे।
दहेज़ की आग कम न हुई,
स्त्री पर सब ताने कस रहे।
भरी सभा में अपमानित कर
द्रौपदी के वस्त्र खींचे गए।
सीता सी पावन सन्नारी पर
धोबी से आरोप मढ़े गए ।
इस पुरुष प्रधान समाज में
नारी पर सदैव हुआ अनाचार।
वही कापुरुष आज भी उसकी
अस्मिता पर कर रहा है प्रहार।
अश्लीलता,छेड़-छाड़ ,उत्पीड़न
नारी केवल बनी भोग-व्यापार।
फाँसी भी रोक न पाई इसे,हो रहा
ज़ुल्म,गैंग-रेप और बलात्कार।
इन वहशी दरिंदों की नज़र में--
नारी केवल देह है, प्राण नहीं।
जबरन पकड़कर भोग लिया,
क्षत-विक्षत किया,फेंक दिया।
मर्मान्तक पीड़ा झेली औरत ने
सबकी कड़वाहट का वार सहा।
बदनामी के दाग लगे माथे पर,
मर्द फिर भी बेख़ौफ़ बेदाग रहा।
सुनते आए हैं--
"नारी को पूजा जाता है जहाँ
देवता बसते हैं वहाँ",पर जब
स्त्री का आँचल होता तार-तार
वही देव तब चले जाते हैं कहाँ ?
शक्ति की पूजा वाले इस देश में
बच्चियों पर हो रहे अत्याचार।
समाज के इस घिनौने कुकृत्य ने
कर दिया पूरी मानवता को शर्मसार।
अरे अभागे,
देह की ताकत से जिसको
तुमने बार-बार कुचला है,
वो नारी भी कमज़ोर नहीं
अबला नहीं वो सबला है।
ममता का मंदिर है नारी।
भोग्या नहीं,वो भक्ति है।
परिवार की धुरी वही है
बोझ नहीं वह शक्ति है।
टिप्पणी: आज हमारे समाज में जब स्त्री पढ़-लिखकर,ऊँचे से ऊँचे पदों पर कार्यरत है..तो भी अपने को सुरक्षित नहीं पाती है।इ स तथाकथित पुरुष की दरिंदगी ने नन्हीं-नन्हीं बच्चियों को भी नहीं बख़्शा है।फाँसी का डर भी नहीं है इसे।समाज में गंदगी बढ़ती जा रही है। पुरुष की ऐसी कुत्सित मानसिकता कहाँ जाकर थमेगी....कुछ समझ में नहीं आता।
सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Tuesday, May 26, 2020

तकब ०१/२०




१. दिए गए चित्र / तस्वीर पर कम से कम १० पंक्तियां व अधिक से अधिक १६ पंक्तियां किसी भी विधा में लिखिये और साथ ही उसका शीर्षक व अंत मे एक टिप्पणी अपने उदृत भावों पर अवश्य लिखिये।
२. रचना मौलिक व अप्रकाशित होनी चाहिए।
३. प्रतियोगिता के वक्त लिखी हुई रचना/पंक्तियों पर कोई टिप्पणी न हो। हां यदि किसी प्रकार का संशय हो तो पूछ सकते है। निवारण होते ही उन टिप्पणियों को हटा दिया जाएगा।
४. आप अपनी रचना किसी अन्य माध्यम में पोस्ट तभी कर सकते हैं जब प्रतियोगिता का परिणाम आ जाये और ब्लॉग में शामिल कर लिया गया हो।
५. प्रतियोगिता हेतु रचना भेजने की अंतिम तिथि ९ मई २०२० है।
६. निर्णायक मंडल के सदस्य केवल प्रोत्साहन हेतु अपनी रचनाएं भेज सकते है। परन्तु आग्रह है कि वे समय से पहले भेजे अन्यथा प्रोत्साहन का कोई औचित्य नहीं रह जाता।
धन्यवाद, शुभम !!!!

.
इस प्रतियोगिता के विजेता हैं  श्री गोपेश दशोरा 

संजीव वर्मा 'सलिल'
(कोई शीर्षक नहीं) 
जिंदगी को जिंदगी के नामकर
श्वास को मधु आस का पैगाम कर
भाग्य देवी अब नहीं दक्षिण रहे
द्वैत तजने मिल उसे अब वाम कर
भाग्य को मत वाम रख, हो दक्ष वह
मिला पग से पग चलें कर थामकर
नाम उसका जोड़ अपने साथ तू
नाम अपना विहँस उसका नाम कर
सुबह सूरज की तरह जो साथ हो
साथ उसके खुशनुमा हर शाम कर
संग उसके हार में भी जीत है
पहन ले भुजहार गाल ललाम कर
अन्य कोई दे नहीं पाए कभी
प्रीत अपनी सलिल तू बेदाम कर
(कोई टिप्पणी नहीं)


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
प्रोत्साहन हेतु
~ साथ तेरा ~
क्षितिज पर
हस्ताक्षर करती
सुबह की किरणे
गवाही दे रही है
तेरे मेरे साथ होने का
खामोश सागर में
लहरे कैद हुई है
देख समर्पण
आगोश में डूबकर
है भाव शून्यता का
रोमांच स्फ्रुटित
लेकिन तटस्थ ख्याल
कामनाओं का
हो रहा शृंगार
हो रहा भान आतिथ्य का
निहारते हुए
एक दूजे का बन संबल
मन के प्रांगण का
फिर समन्दर हो जाना
है ये पल विलय होने का

टिप्पणी : कभी यूं बैठकर साथी के साथ ख़ामोशी से सब कुछ कह जाने का उदृत भाव तस्वीर को देखते ही उभर आया ....
 
प्रजापति शेष
संग संग

देखा जो अकस्मात,
विस्मृत संध्या प्रातः।
यह पकृति अनवरत,
भ्रमित विगत आगत।
अनंत वीथियाँ,एक वातायन
एक भटकन, उभरा द्वेपायन।
हे! कृष्ण नीलाभ, पीताम्बर
कुसुमित,सुरभित, दिगम्बर।
नर, पशु, पतंग,खग, विहग,
कौन शेष ? बिम्ब से विलग।

टिप्पणी: निशब्द संक्रमण काल मे, एक प्रयास किया है बिना क्रियाओं के शब्द विन्यास का। एक मात्र सम्बोधन उस कृष्ण वर्ण के लिए प्रयुक्त हुआ है जिसमे समस्त वर्ण,रंग,शब्द, क्रिया, काल को समाहित हो जाना है। )


ब्रह्माणी वीणा हिन्दी साहित्यकार
एक गीत से चित्राभिव्यक्ति (14 मात्रा हर पँक्ति में)
"साँची प्रीत"

तुम हमारे मीत,,, साथी
जिंदगी इक गीत साथी!
सूर्य सा जीवन उगालें
जिंदगी स्वर्णिम बनालें
स्वप्न-किरनें कामना सी,
प्रेम से जीवन सजालें!
हर कदम पे जीत जाती !
तुम हमारे मीत,,,, साथी!
कुछ पलों में भूल जाएँ !
हर दुखद सी विषमताएँ
सुखद पल को हम चुरालें
मन-कमल को यूँ खिलाएं!
गर मिलेगी प्रीत साँची
तुम हमारे मीत ,,साथी !
********************

टिप्पणी: मेरा भाव दो प्रेमी युगल की स्वप्निल भावनाओं को लेकर है,,,कुछ सुखद पल चिंता मुक्त सिर्फ दोनों के बीच सूर्य की आभा के समान हृदय मे प्रेम उदीप्त हैं,,,,उसी मनोभावों को गीत मे ढालने का प्रयास किया है धन्यवाद



नैनी ग्रोवर
तुम जो साथ हो

ढलती शाम रात में बदल जाएगी,
फिर इक नई नवेली सुबह आएगी...
छंट जाएंगे ये अंधियारे मेरे साथी,
फिर से हर साँस गुनगुनायेगी...
उदास हो गई है मेरे दिल की धड़कन,
तुम जो साथ हो तो,
ये फिर मुस्कुराएगी..
आओ बदलें हम, जीवन जीने का ढंग,
खुश होकर सृष्टि फिर से, प्रेम लुटायेगी..!

टिप्पणी: मेरा मानना है के अगर मानव जाति ने अपने जीने का ढंग अब भी ठीक नहीं किया तो ये नज़ारे भी हमसे सृष्टि छीन लेगी, हमें अब सम्भल जाना चाहिए और सृष्टि से खिलवाड़ बन्द कर देना चाहिए ।


Ajai Agarwal
“तू मुझ में प्रिय फिर अंतर् क्या "
प्रोत्साहन के लिए ---
======================
साथ नहीं वो दे पाए ,कब सूना पन्थ हुआ उनसे ,
अनुगूँज मधुर वाणी की प्रति - पल रहती है उनकी, संग मेरे।
साँसों पे अवलम्बित काया थी, जो ,थक कर चूर हुई तो क्या ?
ये पन्थ अनोखा जीवन का ,मंजिल कहीं नहीं इसकी।
मैं भी न चलूं ,तू भी न चले ,राही मर्त्य पर राह अमर ,
इस पर वो ही चल सकता है ,जो चलने में स्वाद ढूंढता है।
रवि अपनी सिंदूरी आभा संग ,क्षितिज में लोप हुआ तो क्या ?
मुझ को दे चंदा का लिबास ,आँचल में तारे टांक गया।
तुझसे मिलने की चाहत में खाली होना साँसों के घट का ,
रंग -रूप का गर्व मिटा, क्षर काया संग -बेसुध होना पड़ता है।
जात पंथ के निर्मम बंधन ,सुंदर काया संग आड़ोलन ,
सब बिसरा जो चला गया ,वो अब मेरे मन में रहता है।
रवि की प्रखर किरणों में तू ,चंदा की शीतलता तुझसे
मलयसमीर सुगंधित है और सुमनों ने रंग लिया तुझसे।
बादल का सब आवारापन तूने मुझको ही सौंप दिया ,
बिजुरी सी साध मिलन की वो झुलसा कर उज्ज्वल कर देगी।
तू मुझ में प्रिय मैं तुझ में फिर ,काया साँसों का बंधन क्या ?
प्राची की नारंगी आभा या क्षितिजों का नीलम क्या ?

टिप्पणी: मैंने इस चित्र को देख यादों में कविता लिखी --जब हम साथ थे /



Madan Mohan Thapliyal
( प्रोत्साहन हेतु )
दु:सुप्त ( बुरा सपना )
********
हे दिवस्पति , ए, दिवास्वप्न है,
है दिवालोक या दस्यु लोक कोई ।
सोते हुए भी जागता मनुज आज,
है त्रस्त ,न उदय का, न अस्त का भान कोई ।
दु:सुप्त सम, दिष्टांत का तांडव चहुं ओर,
अहम् है निरर्थक , द्यूतक्रिड़ा में दीर्ण हर कोई ।
याचक हैं सब , मिट गया दंभ सारा,
किंकर्तव्यविमूढ़ मानव, न राजा रहा , न रंक कोई।
है विह्वल दृढ़प्रतिज्ञ भी, क्षीण सारा आमोद- प्रमोद,
पृष्ठ भाग में घना अंधेरा, नहीं दीखता आलोक कोई ।
दरपन में भी धूमिल छवि, दग्धा पर टिकी दृष्टि,
मृत्युंजय मंत्र का जाप करता आज हर कोई ।
दीर्घारण्य सा भविष्य आज, दत्तवर की है चाह,
न धर्म, न आस्था , जीवन -मरण का ज्ञान देता हर कोई ।

टिप्पणी: आज सारा विश्व जिस दौर से गुजर रहा है , वहां सब ठहर सा गया है। हर कोई चिंतित है, व्यथित है , समाधान दूर तक दिखाई नहीं देता।
 


जशोदा कोटनाला बुड़ाकोटी
परिवर्तन सुनियोजित है

जब रचा जा रहा था संसार तो
परिवर्तन के नियमों को
निरन्तर रच रहा था विधाता.....
जो परिवर्तित न हो सका
वो 'इतिहास' है.....
हाँ इतिहास .....
जो घट गया वो इतिहास बना
जो रच गया वो इतिहास है.....
न कोई इसे पहले बदल सका
न कोई आज बदल पायेगा.....
वैसे ही जैसे 'प्रेम'
जो पहले भी था
जो आज भी है.....
न प्रेम की प्रकृति बदली है
और न ही प्रवृत्ति.....
क्योंकि इस नश्वर संसार में
प्रेम ही शाश्वत है.....
ये वो इतिहास है
जो बार-बार रचकर इतिहास बनेगा
जो बार-बार होकर इतिहास रचेगा...।

टिप्पणी: प्रेम जीवन में उतना ही जरूरी है जितना साँस लेना मगर दुर्भाग्य से ये विकृत रूप में चाहा गया ! आज प्रकृति भी तो सिर्फ प्रेम ही चाहती है !


माधुरी रावत
तेरे संग


ये समंदर का किनारा
ये जादू भरी शाम
हाथों में तेरा हाथ है
होठों पे तेरा नाम
ये बोलती सी ख़ामोशी
जैसे छा रही मदहोशी
ऐसे में तेरी सरगोशी
आँखों से छलकते जाम
ये प्रकृति का मधुर संगीत
आ मिलकर सुनें मनमीत
हृदय से हृदय तक का गीत
गाएं मिल जीवन तमाम
तेरा साथ जो मिला है
दिल फूल सा खिला है
यही प्यार का सिला है
चाहे जो भी हो अंजाम

टिपण्णी: प्यार जीवन का सबसे उद्दात भाव है। जीवन में प्यार हो और उसका साथ हो तो उससे बेहतर कुछ नहीं।
 

उषा रतूड़ी शर्मा
गुफ्तगूं

स्याह रात की रोशनी में इक सपना पाला,
दूर छितिज में एक तारा तिमतिमाया
छुपकर बादलों में कोई मुस्कुराया
हाथ मे जब हाथ तेरा आया
सजन तन मन मे हर्ष का समंदर लहराया।
लब खनोश रहे, अहसासों ने दिल का राग गया
तुम मिले, हम मिले, कुछ यूँ दिल मिले
जब शाम का धुदलका गहराया
गुफ्तगूं होने लगी दिल ही दिल मे
जब प्रेम का ऐसा मौसम आया।
टिप्पणी ; हर वो पल जिसमे प्रेम हो उन्हें अपने दामन में समेत लेना चाहिए। उषा



गोपेश दशोरा
अस्तोदय

दूर क्षितिज पर सूरज ने,
एक बात हमें है समझाई,
विपदाओं से लड़कर ही तो,
एक नई सुबह फिर है आई।
ये अस्त हो रहा यहां अभी,
पर कहीं सुबह की लाली है,
उम्मीद का दामन ना छोडो,
बस रात ही है, ढल जानी है।
बरसों पहले भी इसी जगह,
कुछ प्रेम के धागे बांधे थे।
साथ तेरा पाकर ही तो,
सुख दूने, गम आधे थे।
आज फिर एक वादा है तुमसे
ये साथ रहे यूं ही कायम,
सुख हो दुःख हम डिगे नहीं
यह प्रेम रहे यूं ही कायम।

टिप्पणीः हमारे लिये जो सूर्य अस्त हो रहा है, दूनिया के किसी कौने वहीं उदय भी हो रहा है। मैने इसी बात को रिश्तो से जोड़ा है। थोड़ी की परेशानी आने पर आजकल लौग एक दूसरे का साथ छोड़ देते है वो ये भूल जाते है कि समस्या एक रात की तरह होती है, कितनी ही बड़ी क्यूं ना हो उसका अन्त निश्चित होता है, और किसी का साथ अगर हो तो वो समस्या से भरा समय भी आनन्द के साथ गुजर जाता है।


कुसुम शर्मा
कुछ अनकही बातें कह दूँ 

दो घड़ी साथ बैठो तो कुछ बातें कर लूँ!
कुछ तुम्हारी सुनूँ कुछ अपनी कह दूँ !
बहुत सी बातें जो अनकही रही
चलो मिल कर आज तुम से कह दूँ !
जो बिताये थे लम्हे एक दूसरे के साथ
चलो मिल कर उन्हीं लम्हों को ताज़ा कर दूँ !
माना तेरे मेरे बीच आने लगी हैं दूरियाँ
क्यों न उन्हीं दूरियों को नज़दीकियाँ कर लूँ !
चलो दो घड़ी साथ बैठो तो कुछ बातें कर लूँ!
बहुत हो गई अब शिकायतें
चलो बैठ कर कुछ
प्यार भरी बातें कर ले !
कुछ हुई भूल तुमसे कुछ हुई हमसे
चलो उन्हें भुलाकर
अपना ये रिश्ता ओर पक्का कर ले !
दो घड़ी साथ बैठो तो कुछ बातें कर लूँ!
कुछ तुम्हारी सुनूँ कुछ अपनी कह दूँ !
बहुत सी बातें जो अनकही रही
चलो मिल कर आज तुम से कह दूँ !

टिप्पणी: जब दो लोगों के बीच में दूरियाँ बढ़ने लगे तो उन्हें आपस में बैठ कर सुलझानी चाहिए मन से रखी बातें से उलझने बढ़ती रही है एक दूसरे को कह कर ग़लतफ़हमी दूर हो जाती है !


डॉली अग्रवाल
मैं

हा मैं ही तो थी
जो छू कर देखना चाहती थी
बहुत करीब से
इश्क को ....
उन निगोड़े से एहसासों को
जो काला जादू करती थी
उतर जाना चाहती थी उस
अंधे कुँए में --
जिसका कोई ओर ना कोई छोर
चंद डुबकी
ओर बस वजूद खत्म
बस फिर एक अंतहीन यात्रा
इस जहाँ से उस जहाँ तक
ना कोई पड़ाव
ना कोई रास्ता
बस
अंतहीन यात्रा !! 

टिप्पणी -- प्रेम , ही तो है वो प्रथम स्पर्श जिसका एहसास मात्र अंतर्मन को झकझोर देता है ओर डूब जाता है हमेशा के लिए किसी में विलीन होने के लिए !

किरण श्रीवास्तव
"सूरज"

सूरज सा हो चमक तुम्हारा,
सागर सी गहराई हो,
आसमां सा हो विस्तार,
वेग पवन पुरवाई हो!
पुनः पुनः मै आता हूँ,
संदेश यही दे जाता हूँ,
नहीं कुछ भी स्थायी है,
कड़वा यही सच्चाई है!!
फिर दुख से क्या घबराना है,
जीवन क्यों व्यर्थ गंवाना है,
सत्कर्म करता ही जा,
डग आगे भरता ही जा!!!
करलो आज प्रतिज्ञा तुम,
कर्म तुम्हारा हो बेमिसाल,
प्रकृति का रखो अब ख्याल ,
धरती होगी तभी निहाल!!!!

टिप्पणी: रात्रि के घोर अंधियारे के बाद सूर्य उदित होता है और अपनें रोशनी से जग को रौशन करता है हमें भी इसी सकारात्मकता को अपनाना चाहिए!
 
प्रभा मित्तल
हम भी सुबह का सूर्य उगा लें !

दूर क्षितिज के पार
रोशनी को साथ ले
बादलों की ओट से
सूरज चमक रहा है।
नीड़ से अपने निकलकर
उग रही है भोर उजली
शांत निश्चल जलधि तीरे
कोहरा घना अब छँट रहा है।
किरणों ने दस्तक दी भली सी
बीत गई है शाम, बावरे !
रात भी अब ढल चुकी है
हम यहाँ सागर किनारे
बैठे विगत को क्यों पुकारें !
चलो ! सुबह का सूर्य उगा लें!
गुज़र गए जो पल अकेले
सो गए थे स्वप्न सजीले
बुझ न जाए दीप मन का,
साथ मिल उनको जगा लें।
चलो! हम सुबह का सूर्य उगा लें!
टूट रही वीणा के तारों को
नेह सधे सुर से सँभालें
साज को नई आवाज़ देकर
प्रीत का एक राग गा लें।
चलो! हम भी सुबह का सूर्य उगा लें!
समय चक्र है घूम रहा है
ये मौसम भी लेगा करवट
मन में आशाओं के दीप जलाकर
भावों में भर धीरज का मकरंद
जीवन को मीठा छंद बना लें।
चलो! हम भी सुबह का सूर्य उगा लें !

टिप्पणी: कुछ मन की कुछ जग की....समय कभी एक सा नहीं रहता है...धीरज और उम्मीदों का दामन नहीं छोड़ना चाहिए।


सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Tuesday, December 31, 2019

#तकब ५ / १९






मित्रों आप सभी को मेरा स्नेहयुक्त नमस्कार! लीजिये प्रस्तुत है इस बार की प्रतियोगिता हेतु तस्वीर। नियमों का पालन अवश्य करें, जिसके लिए उन्हें पढ़ना भी जरूरी है।
१. दिए गए चित्र / तस्वीर पर कम से कम १० पंक्तियां व अधिक से अधिक १६ पंक्तियां किसी भी विधा में लिखिये और साथ ही उसका संक्षिप्त । शीर्षक व अंत मे एक टिप्पणी अपने उदृत भावों पर अवश्य लिखिये।
२. रचना मौलिक व अप्रकाशित होनी चाहिए।
३. प्रतियोगिता के वक्त लिखी हुई रचना/पंक्तियों पर कोई टिप्पणी न हो। हां यदि किसी प्रकार का संशय हो तो पूछ सकते है। निवारण होते ही उन टिप्पणियों को हटा दिया जाएगा।
४. आप अपनी रचना किसी अन्य माध्यम में पोस्ट तभी कर सकते हैं जब प्रतियोगिता का परिणाम आ जाये और ब्लॉग में शामिल कर लिया गया हो।
५. प्रतियोगिता हेतु रचना भेजने की अंतिम तिथि ३० नवम्बर २०१९ है।
६. निर्णायक मंडल के सदस्य केवल प्रोत्साहन हेतु अपनी रचनाएं भेज सकते है। परन्तु आग्रह है कि वे समय से पहले भेजे अन्यथा प्रोत्साहन का कोई औचित्य नहीं रह जाता। धन्यवाद, शुभम !!!! 

इस प्रतियोगिता के विजेता हैं सुश्री माधुरी रावत जी व श्री गोपेश दशोरा जी 

बालकृष्ण धीरजमणि ध्यानी
अकेलापन

फिर एक बार ये
सुबह क्यों उभरी है
कभी भरी रहती थी वो
वो सड़कें क्यों खाली हैं
उभर रहे हैं सवाल
एक एक कर मुझ से क्यों
इस अतृप्त आत्मा को
अब तृप्त कौन करेगा
सुबह का नाश्ता
अब छोड़ उठा मै
चिड़चिड़ापन गुस्सा
अब शांत कौन करेगा
अंतर्गत मेरे बस
अब ऐ चित्र घूम रहा है
लाल है सिग्नल पर
मन बस उसे तोड़ रहा है
सब कुछ रोका हुआ है मेरा
स्तब्ध समय बस बोल रहा है
मेरा अकेलापन इतना क्यों भारी
मुझ से वो क्यों सहन नहीं हो रहा है
फिर एक बार ये
सुबह क्यों उभरी है


टिप्पणी: अपने अकेलेपन से कुंठित हिर्दय पटल अपनी मनस्थिति हिसाब से इतनी सुंदर सुबह से ही लड़ पड़ा उस के कुंठित हिर्दय में उभरे प्रश्नों से लड़ता उसक अकेलापन उसे सहा नहीं जा रहा उसी को वो प्रस्तुत कर रहा है


नैनी ग्रोवर
रूठ गई रौनक

क्यों सुनसान है शहर,
कहाँ गुम हुई रौनक ?
डूबते सूरज की भाँति,
कहाँ डूब गई रौनक,
राहें पुकारें राही को,
तरसें आवा-जाही को,
अंधेरे-उजियारे के मिलन में,
कहाँ दूर हुई रौनक ?
क्या लगी हाय किसी बिरहन की ?
ये पीड़ हो जैसे किसी मन की,
टूटे मन की किस्मत जैसे,
कहाँ रूठ गई रौनक ?

टिप्पणी: बस जितना मुझ कूड़मति को समझ आया, लिख दिया, आप सभी साथी इतना अच्छा लिखते हो, मैं स्वयं पर ही सवाल उठाने लगती हूँ, 😊 मुझे कोई विद्या नहीं आती, बस चार लाइन की मेरी हाज़िरी ही समझें, या आप सभी दोस्तों के बीच रहने का बहाना । 

Madan Mohan Thapliyal
प्रोत्साहन के लिए
दौड़ती-भागती जिंदगी में
नब्बे पल ( Second ) का सच

भोर का समय, सुनसान सड़क ,दो रोज से ऊहापोह की स्थिति
असहनीय प्रसव पीड़ा, चीरफाड़ का डर
फोन की घंटी, जल्दी आने का संदेश
मरीज ICU में और सड़क के नियम
अस्पताल पहुंचने की व्यग्रता , ९० सेकिंड और प्रतीक्षा
आंख फड़कना, अशुभ का संदेह
स्वयं को संयत करने की नाकाम कोशिश
पूजा-अर्चना, दान -पुण्य , धर्म - कर्म दस्तक देते हुए
पांच सेकंड शेष, शिकंजे ( clutch) पर दबाव कम
त्वरक (Accelerator) पर पैर का दबाव
तभी एक समाचार, खुशखबरी !
जच्चा-बच्चा दोनों स्वस्थ
सिग्नल की बत्ती लाल से हरी
पूर्व में भगवान भास्कर उदय होते हुए
गाड़ी मंथर गति से अस्पताल की ओर सरकने लगी
दर्शन करने नव जीवन का ।।

टिप्पणी: जरा सा विलम्ब होने से मन में तरह-तरह के विचार कौंधने लगते हैं जो हमें विचलित कर देते हैं । अतः संयम से काम लेना ही श्रेयस्कर है।

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
प्रोत्साहन हेतु
रुक जाना नहीं ...

वक्त का चक्र घूमता है
कभी खुशियों से दूर करता है
कभी सर माथे को चूमता है
कभी खुद पर इतराता है
बदलती दुनियां में
वैसे राह कोई आसान नहीं
हो वक्त बुरा तो
अपने, कोई पहचानता नही
यूं जब रुकी रुकी सी हो
जीवन में जीने की राहें
अंधियारे से निकलती किरण
जिन्दगी के मायने बदल देती है
हौसला खुद का
किस्मत बदल सकता है
मान बात "प्रतिबिम्ब" की
तू खुद की नियति बदल सकता है

टिप्पणी: बाधाएं आएँगी जायंगी ... रुक जाना नहीं यूं कही हार के .....बस इसी गाने की चंद लाइनों का ख्याल उतर आया इस चित्र को देख कर



Ajai Agarwal
प्रोत्साहन हेतु
दिवस का अवसान


प्रचंड रश्मियों को
थपकियाँ देता अंशुमाली
मृदुल चितवन लिए-
निशा को आगोश में लेने को आतुर
देख रहा ! अनथक चलते चौराहे को -
---
हरी से पीली फिर लाल होती बत्ती
यहां भी गति-विराम एक ही जगह !
लाल बत्ती होना -मतलब --
कदमों का बोसा लेने को आतुर सड़क
घरौंदे को लौटते कुछ कदम -
नहीं करेंगे ये हवा को प्रदूषित -
----
जलती-बुझती बत्तियों संग
चलता-रुकता यातायात
गति -अवरोध- विराम -गति
सृष्टि की दृष्टि ,जीवन चक्र
सोचो तो !
क्या नहीं मिलता चौराहों में -
---
"जटिलो मुण्डी लुञ्चित केशः
काषायाम्बर-बहुकृतवेषः।
पश्यन्नपि च न पश्यति मूढः
उदरनिमित्तं बहुकृत शोकः।।"से लेकर
"पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम्।"तक
यत् ब्रह्मांडे तत् चौराहे 

टिप्पणी: संध्या का मृदुल दिवाकर /अंशुमाली और लालबत्ती पे क्षण भर को रुका हुआ यातायात --मानो जन्म-मृत्यु के मध्य आत्मा के विश्राम का समय ----ध्यान दें तो मन को कबीर बना देते हैं चौराहे -
 

मीनाक्षी कपूर मीनू
रफ्तार ..ज़िंदगी की
******************
हर शाम
ढलते हुए सूरज की
मद्धम सी होती रोशनी में
थक के ये शहर
सुस्त सी होती ज़िंदगी की रफ़्तार के
साथ कहीं
नींद के आग़ोश में जाने को बेताब
इंतज़ार करता है रात का
वहीं , थकी हुई सड़कें
जगी रहती हैं
कुछ जलती- बुझती
रंग बदलती बत्तियाँ साथ देती हैं
रात भर,
और जगा रहता है
कभी ख़त्म न होने वाला सफ़र
जिसकी रफ़्तार कभी तेज़
कभी धीमी हो जाती है
अंततः नई भोर
का आगमन
फिर स्वतः ही
मानो खुल जाती है आंख
सर्पीली सड़क
ज़िंदगी सी ..मानो
फिर चमकने लगती है
एक छोर से दूसरे छोर तक
मनस्वी ....
पुनः आवागमन
पुनरावृत्ति क्षितिज सी .......

टिप्पणी: ज़िंदगी का सफर भी कुछ ऐसा ही तो होता है ढलते सूरज को देख कर भी आने वाले सुबह का इंतज़ार । खामोशी और सदायें मानो साथ साथ चलती रहती जैसे कि सड़क की लाल हरी बतियाँ । कहीं न कहीं सन्देश देती नज़र आती कि उगते सूरज को देखने की खुशी का अहसास महसूस करने के लिए उसकी पूर्व सांध्यबेला में खुद को समेटना पड़ता है । आवाजाही की इस सड़क की भांति अपनी ज़िंदगी के अंधेरे को भी आत्मसात करना पड़ता है ।


Meena
मुश्किलों की लाल बत्ती

मुश्किलों की ये लाल बत्ती
जल्द ही बुझ जाएगी
तेरी उम्मीदों की बंधती बदरी
पूरे आकाश का स्याहपन मिटाएगी
संघर्ष की ये सफेदी धारियां
एक दिन तेरी फतह का, इतिहास बताएंगी
मुश्किलों की ये लाल बत्ती
जल्द ही बुझ जाएगी
तू रुकना नहीं,
तू थकना नहीं
अपनी जिजीविषा का
डीजल, पेट्रोल और सीएनजी
अपनी जीवटता से ही देना
मुश्किलों की ये लाल बत्ती
जल्द ही बुझ जाएगी
इस बत्ती का स्याहपन देख
तू घबराना नहीं
उस आकाश की लालिमा को देख
जो तेरे लिए अपने आँचल की
छांव लिए खड़ी है
स्वागत कर उस उगते सूरज का
जो आज तेरा गुरु बन खड़ा है
मुश्किलों की ये लाल बत्ती
जल्द ही बुझ जाएगी

टिप्पणी: प्रतिस्पर्धा भरी इस ज़िंदगी में इंसान बहुत जल्दी हताश और निराश होता है। सबसे दुख की बात ये है कि किसी के पास दो पल भी नहीं होते हैं, परेशान व्यक्ति से बात करने के लिए। ऐसे में उस हताश व्यक्ति की पीड़ा मैंने इन पंक्तियों में दी गई तस्वीर को देखकर रची है।
 

किरण श्रीवास्तव
"और जीवन चलता रहे " ......!!
----------------------------------------------------
सन्नाटा क्यों छाया है,
क्यों अंधियारा गहराया है?
उठ जा तू अब ना घबरा,
ले देख परख ,बढ़ता ही जा!
नव सूरज देखो मुस्काया,
उम्मीद किरण फिर बिखराया!
मन का अंधियारा मिट जाये,
उल्लास दुबारा भर जाये.....!!!!
दु:ख -सुख कहां ठहर पाता ,
एक आता है,दूजा जाता !
चलने का ही नाम है जीवन,
पथ पर्वत ढ़लान है जीवन!
रस्ते कहाँ खतम होतें हैं,
सफर सदा चलता ही जाये,
मंजिल तो वही तक अपना
जहाँ ख्वाहिशें थम जाये.....!!!!!!

टिप्पणी: कुछ परिस्थितियां जीवन में स्तब्धता भर देती है। कदम ठहर जातें हैं। पर जीवन तो चलने का नाम है...कुछ लोग सूरज की भांति पुनः राहों को रोशन कर आगे का मार्ग प्रशस्त करतें हैं।


Varsha Thapliyal
फिर वही विराम!


फिर वही विराम, वही ठहराव..
ठहराव जिसमें गति है, अस्थिरता है
गंतव्य पर पहुँचने की व्याकुलता है..
उल्टी गिनती में भी कैसे हम, सबकुछ सीधा देख लेते हैं
हरा रंग कैसे हमारी, बेसब्री का इम्तिहान लेता है
और पलक झपकते ही, लाल रंग में खो जाता है..
प्रकृति भी हमारे विवेक को छल नहीं पाती
डूबता सूरज घर जाने का इशारा करता है
तो उगता घर से जाने का..
चलते हैं हम, फिर रुक जाते हैं
पल भर के लिए ज़िन्दगी की दौड़ में हम ठहरना सीख जाते हैं
काश यही नियम असल जिंदगी में भी होते
भाग-दौड़ में हम उन अनमोल पलों को ना खोते
जो ज़िन्दगी को ज़िन्दगी बनाते हैं
घड़ी भर रुकना, देखना, सहेज कर दिल में
फिर चल पढ़ना.. यही मंत्र सिखाते हैं..
फिर वही विराम, वही ठहराव..

टिप्पणी: आज मैं भी इसी दौड़-भाग को जी रही हूँ। जीत तो रही हूँ सबकुछ पर.. ज़िन्दगी को खो रही हूँ। चित्र देखकर जो महसूस किया, बस उकेर दिया..


गोपेश दशोरा
नियम पथ

कुछ पल का ही तो रुकना है,
और फिर आगे बढ़ जाना है।
इतनी जल्दी क्या है इन्सां,
क्या चाँद पे तुझको जाना है।
काश! के जीवन में होते,
ये सिग्नल तो हम रुक जाते,
कब रुकना है, कब चलना है,
खतरे से पहले सम्भल जाते।
यह नियम सड़क का है लेकिन,
यह जीवन में भी चलता है।
बाधाओं पर जो रुके जरा,
वो ही फिर आगे बढ़ता है।
जीवन के नियम तय करके,
निर्भीक होकर उस पर चल दो।
सीखोगे ठोकर खा खा के,
विश्वास रखो, उठो, फिर चल दो।
नियम का पालन करो सदा।
प्रकृति भी यही है सिखलाती,
नियम पथ पर जो चले सदा,
विजय श्री उन्हीं को दिखलाती।

टिप्पणीः सड़क पर जो नियम का पालन करता है वो न केवल चालान से बचता है वरन् सुरक्षित भी रहता है ठीक उसी तरह यदि जीवन में भी नियम बनाकर दृढ़ता से उसका पालन किया जाए तो इन्सान थोड़ा धीरे ही सही पर सफलता निश्चय ही पा सकता है।

कुसुम शर्मा
मंज़िल की चाह
—————-
भोर भई अब हुआ सवेरा ले कर नव किरणों को साथ !
नई चेतना नई उमंग है मन में आया नव विश्वास !
राह कठिन है दूर है मंज़िल अडिग हैं मन में जाने की चाह !
राह में आते मंदिर मस्जिद मन को पुलकित करते है
अडिग रहे विश्वास तुम्हारा नई चेतना भरते है !
राह में आती लाल बत्ती का यही तुम्हें समझना है !
मुश्किल आये राह में कितनी तुम्हें मंज़िल को पाना है !
थोड़ा रूक कर फिर चलते जाना है !!

टिप्पणी:- राह में चाहे कितनी कठिनाई आये हमें उनसे हार नहीं माननी चाहिए उनका डट कर मुक़ाबला करना चाहिए क्योंकि हर रात के बाद सवेरा होता है !
 

माधुरी रावत
मरीचिका

उदय हो रहा है दिनकर का
या अस्ताचल को है प्रस्थान
भेद रहा ना निशा-दिवस का
थमा हुआ सा सब चलायमान
रोक रहा कौन रथ रश्मियों का
नीरवता कैसी ये छाई
ठहरा-ठहरा सा ये जीवन
रक्ताभ लग रही क्यूं अरुणाई
सुविधाजनक हुई चौड़ी सड़कें
और धरती माँ वृक्षविहीन
विकास धरा रहेगा धरा पर
और मानव जीवन स्पन्दनहीन
अपने ही हाथों से हमें अब
करना होगा धरा का सृंगार
एक-एक परिवार लक्ष्य ले
अवश्य पेड़ लगाए एक हज़ार

टिपण्णी: सुख सुविधाओं, साधन संपन्न होते जाने की होड़ में, तथाकथित विकास के लिए, नित्य धरती को रौंद रहे हैं हम, बिगाड़ रहे हैं उसका सुन्दर स्वरुप, जो हमारे स्वयं के लिए घातक है।
 


अलका गुप्ता 'भारती'
गीतिका

बेरहम आँधियाँ हैं चली क्या करें ।
लुट रही आबरू हर गली क्या करें ॥
मौज का शौक था जिंदगी लूट कर ।
अधखिली तोड़ दी वह कली क्या करें ॥
दे दिये हाथ में गान शमशीर के ।
अब लहू सुर लगें , ऐ वली क्या करें ॥
क़ैद हैं वारिसाने हुकुम बेटियां ।
मार दीं कोख में या पली क्या करें ॥
तौल दें..बाज़ ये .. देश का मान भी।
फ़िर मचे..मुल्क में खलबली क्या करें ॥
जंग अब लड़ नयी ठान ले 'भारती' ।
छोड़ दे मानता अब गली क्या करें ॥

टिप्पणी: क्षमा चाहती हूँ रचना पुरानी है नयी रचना संभव नहीं हो सकी ...अतः मैं स्वयं को प्रतियोगिता से बाहर रखती हूँ । हाँ ...देश की सुनसान सड़को पर ..वह भी अंधेरा होने लगने पर माहिलाओं के लिए जो असुरक्षा की भावना पैदा हो गई ..वही व्यक्त कर सकने का प्रयास हुआ है ।



सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Monday, November 4, 2019

तकब – ४/१९



मित्रो नमस्कार !
तस्वीर देख आप समझ ही गए होंगे कि मैं आपसे इस चित्र के माध्यम से क्या कहलवाना चाहता हूँ. फिर भी 

नियम :
१. इस चित्र पर उभरे हुए आपके भाव जिसे शीर्षक व् एक टिप्पणी [ आपके शब्दों का कारण व् सृजन के 
पीछे की सोच ] के साथ लिखना है.
२. किसी भी काव्य विधा में कम से कम १०- १२ और अधिकतम २४ पंक्तियों में आपको अपने भावों को रखना है. अगर आप किसी नई विधा में लिख रहे हैं तो अवश्य उसका उल्लेख करे.
३. कृपया किसी भी सदस्य की रचना पर टिप्पणी रूप में अपनी टिप्पणी न लिखे. यदि आप पोस्ट के संबंध में कोई बात पूछना चाहते है तो अवश्य पूछे लेकिन समाधान के बाद टिप्पणी को हटा लिया जायेगा.
४. निर्णायक मंडल के सदस्य केवल प्रोत्साहन रूप में लिख सकते है और आशा है वे प्रोत्साहन हेतु अवश्य अपने भाव समय से पूर्व प्रेषित करेंगे.
५. आप अपनी रचना को परिणाम घोषित होने व ब्लॉग में पोस्ट होने के बाद ही आप अन्य स्थानों पर पोस्ट कर सकते है.
६. रचना पोस्ट करने की अंतिम तारीख २६ अगस्त २०१९ है.
७. शुभकामनाएं !!!!! 

इस प्रतियोगिता की विजेता है सुश्री रोहिणी नेगी 
प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
प्रोत्साहन हेतु
~एक ध्वज, एक निशान~

अखंड भारत के
हमारे सपने का
अब श्रीगणेश हुआ
मेरे भारत में अब होगा
एक ध्वज, एक निशान
सहत्तर सालों से
जिसका था इंतज़ार
हटा कर तीन से सहत्तर
मोदी शाह की जोड़ी ने
देश को दिया बड़ा उपहार
जम्मू कश्मीर और लद्दाख में
होगा अभी केंद्र का शासन
बन कर भारत का अभिन्न अंग
हम चलेंगे संग संग
बनेगा मेरा भारत महान
आतंक का होगा सहार
बढ़ेगा स्नेह और व्यापार
भारत का मुकुट फिर चमकेगा
शामिल हो विकास यात्रा में
खुशहाली का होगा संचार

टिप्पणी: देश की अखंडता, एकता व् सुरक्षा केंद्र सरकार ने एतेहासिक फैसला लिया है. हर भारतीय आशा करता है की अब कश्मीर में विकास और खुशहाली लौटेगी....बंटा हुआ भारत अब अखंड भारत व् श्रेष्ठ भारत की और अग्रसर है ...जय भारत

Mita Chakraborty
एक झण्डा एक देश

अब एक ही झण्डा और एक है देश मेरा
कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक है देश मेरा
शत्रु भी अब कर न पाएगा खण्डन इसका
जाँ बाज वीरों का ऐसा देश है मेरा
भौगोलिक संरचना बदली , बदला इतिहास आज पुराना
अलग थलग था जो कश्मीर, भारत के सर का ताज बना
अलगाववादी नेताओं की अब चल न पाएगी मनमानी
एक सुत्र मे देश बंधा और अब एक ही संविधान बना
उपेक्षित सा था जो लद्दाख अब उसको भी नया आधार मिला
सबको समान अवसर और एक समान अधिकार मिला
आजादी के बाद सम्पूर्ण आजाद हुआ है देश मेरा
कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक है देश मेरा
अब एक ही झण्डा और एक है देश मेरा


नैनी ग्रोवर
मेरा काश्मीर

अधूरा-अधूरा सा लगता था देश मेरा,
आज एक ही घर मे पूरा परिवार बस गया..
मेरे हिमालय की खुशबू महकने लगी है,
फूलों से सारा मेरा काश्मीर सज गया...
फैंक के पत्थर लौट आओ,
हिंदुस्तान के बच्चो,
इक नया सवेरा आया है,
नसीब जग गया...
बहकावे में अब नहीं आओगे,
ये खुद से करो वादा,
चलो सितारों की और अब,
नया चांद खिल गया...
कामयाबी अब दूर नहीं तुमसे,
बस इतना यकीन करना,
दो तमाचा दुश्मन के मूंह पे,
देखो भारत का नक्शा बदल गया...

टिप्पणी: 370 और 35 A की धारा हटना बहुत आवश्यक था, मासूम बच्चों को गुमराह कर उनके मन में नफ़रत भरने का काम करने वाले देशद्रोहियोँ के मुहं पर ये झन्नाटे दार चांटा है, जो अपने बच्चों को तो विदेशों में पड़ने भेज देते हैं, और घाटी के मासूमों के हाथों में पत्थर थमा देते हैं...



रोहिणी शैलेन्द्र नेगी
भारतवर्ष का स्वरूप
*****************
चोटी का सिर-दर्द बना था जो,
वो दर्द मिटाया है,
आज शहीदों के बलिदान का,
क़र्ज़ उन्हें चुकाया है,
मस्तक जो सूना था अब तक,
उस पर तिलक लगाया है,
मेरे भारत-वर्ष के माथे का,
स्वरूप लौट आया है।
दो विधान और दो निशान की,
गाथा बहुत सुनाते थे,
"भिन्न हैं हम" कहकर स्वयम् को,
जो ये भ्रम फैलाते थे,
आशंकाओं के घेरे में,
जो फ़साद करवाते थे,
आज सुना है वक़्त ने........
उनको भी रुलाया है,
मेरे भारत-वर्ष के माथे का,
स्वरूप लौट आया है।
है सम्पूर्ण अधिकार सभी का,
वो सम्मान मिलेगा सब,
खण्ड-खण्ड में जो बिखरा था,
आज अखण्ड हुआ है अब,
काली स्याह रात की परछाईं का,
अंत किया है अब,
एक राष्ट्र हैं हम.....जनहित में,
जारी ये करवाया है,
मेरे भारत-वर्ष के माथे का,
स्वरूप लौट आया है...!
मेरे भारत-वर्ष के माथे का,
स्वरूप लौट आया है...!!


टिप्पणी: कश्मीर मे धारा-३७० और ३५-ए को पूर्ण रूप से समाप्त करने के बाद अब वहाँ के लोगों को उनके संवैधानिक अधिकार प्राप्त होंगे। कोई भी राजनेता धर्म और जिहाद के नाम पर उन्हें भड़का नहीं सकेगा। कश्मीर से कन्याकुमारी तक अब सही मायने में भारत एक अखंड राष्ट्र बना है।


किरण श्रीवास्तव
नव भारत
-------------------------------------------------
अमन चैन
लगी है छाने,
अलगाववाद की
बंद दुकानें..!
नयी क्रांति और
नया सबेरा,
घाटी में अब
हुआ बसेरा..!!
सूरज चमका
धरती हर्षायी,
बदला इतिहास
जीवन मुस्कायी..!!!
एक संविधान
तिरंगा एक,
नियम कानून
भी लागू एक..!!!!
उपेक्षित था
लद्दाख का रूप,
उसनें पाया
अलग वजूद..!!!!!
वर्षों का सपना
हुआ साकार,
बदली व्यवस्था
बदला आकार..!!!!!!
भारत माता
अति हर्षायी,
खुशहाली सर्वत्र
है छायी.....!!!!!!!


टिप्पणी: धारा370 और 35 A की वजह से अलगाव वाद का बोलबाला था। आवाम तबाह था उपर्युक्त धारा को खतम करनें का सपना लिए कितनें दिग्गज चले गये...। अंततः सपना पूरा हुआ,इसका श्रेय हमारे मोदी जी और उनके सहयोगी टीम को जाता है। भारत के इस कुशल शासक को दिल से सलाम।
 

Ajai Agarwal
अब घाटी हर्षायेगी --प्रोत्साहन के लिए --
===========
अब घाटी हर्षायेगी
अपना सच्चा हक पाएगी
दो पालों में लुटी- पिटी सी
दो झंडे, दो संविधान की
मजबूरी में घुट-घुट के जीती
भारत माँ अब मुस्क्यायेगी।
केसर की सुरभि से अब तो
सारा भारत महक उठेगा
कहवे संग चाय की चुस्की
बतकहियाँ कितनी होंगी अब
फुलकारी पंजाब प्रांत की
कश्मीरी शालों पे काढ़ी जायेगी
कजरी के नृत्यों संग अब तो
वुगी -नचुन ,हाफीजा गूंजेगा
अब मेरी भारत माँ का
हृदय कभी नहीं रोयेगा
डल के दर्पण में सारा
भारत अब मुहं देखेगा
एक देश का एक हो झंडा
एक ही हो संविधान हमारा
मोदी जी ने किया है देखो
माँ भारती का पुनर्संस्थापन।।

टिप्पणी: 5 अगस्त 2019 का दिन भारत के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में एक पृष्ठ लिखा गया जब जन-जन के नायक मोदी जी ने स्वतंत्रता प्राप्ति से चले आ रही कानून की धारा 370 को एक झटके में समाप्त कर दिया - खुशियों की ये कविता उसी संदर्भ में।


रुचि बहुगुणा उनियाल
भारत की भूमि पर बिना भय रहिए
(मनहरण घनाक्षरी)

केसरिया पगड़ी है, हाथों में तिरंगा जहाँ
ऐसे देश के सपूतों पर, हमें अभिमान है।
निडर खड़े हैं वीर, रक्षा करने सीमा पर
एक_एक वीर यहाँ, सिंह के समान है।
भारती की आन_बान, शान के लिए
देखो करते अपनी-अपनी, जान कुर्बान हैं।
भीततरघात कर रहे जो, साँप आस्तीन के
उनकी हत्या करना तो, पुण्य के समान है।
एक राष्ट्र, ध्वज एक, कर दिया है अगर तो
देश के प्रधान पर, ऐसे न बिगड़िए ।
काश्मीर से लेके, है कन्याकुमारी एक
पापियों के पाप को, और मत सहिए।
जहाँ चाहे बिना भय, घूमा कीजै हिंदोस्ताँ में
भारत की भूमि पर, बिना भय रहिए ।
सात दशकों का कुष्ठ, पल में सुधार दिया
देश के प्रधान की जय, बार_बार कहिए।

टिप्पणी _भारतवर्ष के सुयोग्य प्रधानमंत्री के ऐतिहासिक निर्णय ने देश की दशा और दिशा को सुधारा है और इसके लिए जो भी कहूँ सब कम होगा! सत्तर वर्षीय कुष्ठ रोग के समान भारत से लिपटा धारा 370 का रोग प्रधानमंत्री ने धोकर माँ भारती के भाल पर केसर तिलक किया है, और इसके लिए आज के ही नहीं आने वाली पीढ़ियों के लिए भी आदरणीय प्रधानमंत्री का नाम एक महापुरुष की तरह उल्लेखनीय है! नमन उनकी  राष्ट्रधर्मिता को मेरा प्रणाम। 


Madan Mohan Thapliyal
प्रोत्साहन हेतु - पूर्ण आजादी की अलख
आर्यवर्त की हुंकार
*************
कोई कहे आधा सिर मेरा
चैतन्य शरीर यह नहीं स्वीकारता
पूर्णता ही मेरा संकल्प है
अपने शरीर के शीर्ष भाग को गिरवी रख कर -
तुम कैसे सो गए, तुम इतने निर्दय तो नहीं थे
न, मुझे यह स्वीकार नहीं, मुझे कांटों में सोना आता है
धैर्य की बातें मुझे विचलित करती हैं
अभी तो आस्तीन के सांपों से लोहा लेना है
जिन्हें मैंने रक्षक समझा -
कुर्सी की चाहत ने उन्हें कर्मक्षेत्र से विमुख कर दिया
किसी का शहीद होना, मुझे कायर बनाता है
अपनी कोख सूनी सी लगती है
जो मेरी आजादी के लिए कृत-संकल्प हैं
मुझे उनपर पूर्ण विश्वास है, वे निराश नहीं करेंगे
आज पूरा विश्व हमारी प्रशंसा के गीत है गाता
यही कुर्सी भक्तों को रास नहीं आता
दृढ़ संकल्प और और मां भारती के जयघोष काचहुं ओर बजता डंका
पूरव से पश्चिम तक, फहराया और फहरेगा एक तिरंगा
एक देश, एक संविधान और एक कानून यही सपना है
फिर हर कोई गाएगा, अखंड भारत अपना है

टिप्पणी: हर देशवासी का एकमात्र सपना है अखंड भारत।


मीनाक्षी कपूर मीनू
एक भारत , एक परिवार
********************
हमारी संस्कृति का एक गान
हमारा देश है भारत महान
फिर क्यों ये अलग सा था
अलग झण्डा,गान अलग था
आज़ादी की लड़ाई साथ लड़ी
सब जनता भी थी साथ खड़ी
फिर क्यों छोड़ दिया था ताज
अलगाव की चादर तानी बड़ी
बीता युग, प्रताड़ना बहुत सही
पत्थर भी फेंके, उफ्फ न कही
विचारधारा के मंथन में ,मनस्वी
अमित मोदी धारा सब जगह बही
अब भारत परिवार है एक संस्कार
कड़े फैसले ,घर परिवार को जोड़े
बुजुर्ग बन मोदी जीआये सीना तान
गृह दुश्मनों के सामने हो गए खड़े
अब धारा तीन सौ सत्तर को हटाकर
एक झंडा गान दे पूर्ण कर दिया शरीर
लद्धाख की उपेक्षा को अपेक्षा बनाया
यथार्थ बन गया,स्वप्निल जम्मू कश्मीर

टिप्पणी:  भारत माँ रूपी शरीर का एक अंग कैंसर से पीड़ित था इतने साल हो गए उपचार न हुआ । मोदी जी डॉ बन आये एक झटके से वायरस को पकड़ बीमारी का उपचार कर दिया औऱ आज भारत माँ अपनी पूर्ण आभा ले दुश्मनों को अपना सुसंस्कृत रूप दिखा रही है। एक भारत, एक परिवार । 



प्रभा मित्तल
धरती पर स्वर्ग
~~~~~~~~~~~~~~~
"स्वर्ग अगर है कहीं जमीं पर
तो यहीं है यहीं है यहीं है।"
भारत का सिरमौर प्यारा
ऐसा है कश्मीर हमारा।
अलग-थलग सम था प्रदेश
ध्वज भी दूजा लहराता था,
सत्तर सालों बाद सुशोभित
हुआ अब एक झंडा एक देश।
घाटी गाए शांति के गीत
महके खुुुशियाँ, महकें मीत
आदि शंकर की लगे समाधि
बरसे बर्फ़ानी बाबा की प्रीत।
सजे प्रांत औ सब्ज वाज़वां
सर्द मौसम हो गर्म कहवा
नदरू यख़नी हाक गुशतबा
लाजवाब हो सबका ज़ायक़ा।
अब न बरसें अंगार फूट के
हो न कोई संगसार झूठ से
चलें न गोली,बिछें न लाशें
बस्ती में न गूँजें बम धमाके।
केसर की क्यारी में अबकी
नित महकें फूल अमन के,
सूरज की किरणों से प्रभात
हँस-हँसकर डल में चमके।
गीली पगडंडी पहलगाम की
बड़ी हवेली अनन्तनाग की
गुलमर्ग के धवल शिखर हों -
सड़क बड़ी हो लाल चौक की,
सब पर रौनक धूमधाम हो।
खुशहाली का नव वितान हो।
खिले जिंदगी, गूँजे किलकारी
आई हँसकर जीने की बारी,
बच्चे खेलें निर्भय,कहें शान से
कश्मीर में है स्वर्ग सी तैयारी।
गुरबत के दिन तो गए अब
छँटा अँधेरा बदहाली का,
दुश्मन! तू भी देख समझ ले
सचमुच है ये स्वर्ग धरा का।।
भारत का मणि मुकुट है न्यारा !
सबका प्यारा कश्मीर हमारा ! !

टिप्पणी: भारत और कश्मीर आज एक ध्वज एक देश है।उम्मीद है अब कश्मीर सुरक्षित,सुगठित और बलवान होगा,भेदभाव को दूर करें,आतंक का खात्मा हो।


कुसुम शर्मा
आओ मिल कर ख़ुशी मनाये !
——————————-
आओ मिल कर ख़ुशी मनाये
देश के ग़द्दारों को सबक़ सिखाये
कश्मीर की रंगी वादियों मे
अपने तिरंगे को फहराये !
जो हुआ नही बरसो से
उसको आज साकार बनाये
कश्मीर से कन्या कुमारी तक
जय हिन्द के नारे लगवाये !
अब न होगा कोई अशिक्षित
न होगा कोई लाचार
मिलेंगे सभी को
एक से अधिकार !
न कोई बहकायेगा
न आतंक पैर जमायेगा
अपने पूरे भारत मे तिरंगा ही लहरायेगा
नापाक इरादों को अब धूल चटवाये !
आओ मिल कर अब ख़ुशी मनाये !

टिप्पणी: 370 धारा के हटने के कारण अब हमारे देश का नक़्शा बदल गया है देश एक है !तो प्रधान एक नारा! एक !ध्वजा एक !एक से अधिकार मिलेंगे सभीको ! जो देश के ख़िलाफ़ नौजवानों को बहका रहे थे अब वह नही बहका पायेंगे !

सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Friday, July 19, 2019

तकब – ३/१९




मित्रो नमस्कार !
सुबह का सूरज नई उम्मीद और आशा को लेकर उदय होता है. व्यक्तिगत, सामाजिक या राजनितिक सुबह के भाव से उपजी आपकी रचना निम्नलिखित शर्तों के साथ इस प्रतियोगिता में शामिल कीजिये.
नियम :
१. इस चित्र पर उभरे हुए आपके भाव जिसे शीर्षक व् एक टिप्पणी [ आपके शब्दों का कारण व् सृजन के पीछे की सोच ] के साथ लिखना है.
२. किसी भी काव्य विधा में कम से कम १०- १२ और अधिकतम २४ पंक्तियों में आपको अपने भावों को रखना है. अगर आप किसी नई विधा में लिख रहे हैं तो अवश्य उसका उल्लेख करे.
३. कृपया किसी भी सदस्य की रचना पर टिप्पणी रूप में अपनी टिप्पणी न लिखे. यदि आप पोस्ट के संबंध में कोई बात पूछना चाहते है तो अवश्य पूछे लेकिन समाधान के बाद टिप्पणी को हटा लिया जायेगा.
४. निर्णायक मंडल के सदस्य केवल प्रोत्साहन रूप में लिख सकते है और आशा है वे प्रोत्साहन हेतु अवश्य अपने भाव समय से पूर्व प्रेषित करेंगे.
५. आप अपनी रचना को परिणाम घोषित होने व ब्लॉग में पोस्ट होने के बाद ही आप अन्य स्थानों पर पोस्ट कर सकते है.
६. रचना पोस्ट करने की अंतिम तारीख २१ जून २०१९ है.
७. शुभकामनाएं !!!!

इस प्रतियोगिता की विजेता है सुश्री अल्का गुप्ता 

प्रजापति शेष
युग सहस्र योजन पर भानु

मेने संकेतों में बतलाया था,
उसे तुमने झुठलाया है |
बाल पवन ने रवि खाया था,
तुमने पाखंड बताया है |
यह प्रकृति का खेल है,
तुमने प्रपंच बताया है|
मेरी वाणी साकार करने,
यह दृश्य उभर आया है|
यह तो प्रतीक मात्र है
जिसे गीतों में गाया है|
तुम करते रहो शौध,
हमने जो पहले पाया है||

टिप्पणी: हमारी कथाओं में बाल हनुमान ने क्षुधापूर्ति हेतु सूर्य को भक्षण करने का प्रयास किया था,जिसको कुछ विधर्मी काल्पनिक बता कर परिहास करते हैं,लेकिन जब इस तरह के परिदृश्य उभर कर आते है तब लगता है कि प्रकृति हमारी कथाओं का समर्थन करते हुए प्रमाणित करती है कि, सब कुछ सम्भव और सत्य है जो हमारे ग्रन्थों में लिखा हुआ है।


आभा अग्रवाल Ajai Agarwal
सनातनी टोटम
--------------
एक बार की बात ,सुलाकर बजरंगी को
माँ अंजनी चलीं नदी में पानी लेने
माँ को हुआ बिलम्ब इधर था बालक जागा
हुआ भूख से व्यथित ,कुटिया से बाहर आया
आसमान में लाल- लाल सूरज उगता देखा !
वेग भूख का बहुत ,बालक ने उसको फल समझा
उड़ चला लाल अंजना का ,सूरज को खाने
पिता पवन चले वेग से बालक को, सूरज तक पंहुचाने
सूरज को उठा झट से बजरंगबली ने मुहं में डाला
हाहाकार मचा जगती में ,पर था अभी वहां इक फल काला
था राहु वो जो डोल रहा था सूरज के पीछे
लपका बालक काले फल पे ,जान बचा के राहु भागा
दिया संदेशा देवराज इंद्र को वो घबराया। ऐरावत पे चढ़ के आया
बालक ने देखा अरे एक और सफेद फल आया
चलूँ इसे भी खाऊं बजरंगबली का मन ललचाया
घबराहट में छूट गया वज्र इंद्र के हाथों से -
मूर्छित हुआ नन्हा बालक ठुड्डी टूटी ,पवन क्रोध में आया -
वायु हो गयी बंद ,साँसे सबकी अटकीं ,देवराज मूढ़ावस्था में -
ब्रह्मा विष्णु शिव सभी दौड़े आये सारी सृष्टि अटकी
क्रोधित पवन आज सृष्टि को कौन बचाये
करें पवन से विनती -हे देव -करो- क्षमा,अब सांसें दे दो
हम सब ने मिल बालक को अवध्य किया ,अब क्रोद्ध उगल दो
मेरा पुत्र चिरंजीवी होगा , पवन मुस्क्याये
सनसन चली हवा -प्राण फिर सबने पाए
ठुड्डी हुई कुछ टेढ़ी बजरंगबली- हनुमत कहलाये
छोड़ दिया सूरज को ऐरावत में बैठे घर आये।।

टिप्पणी: इस चित्र को देख लगा बादल और सूर्य करोड़ों वर्ष पुरानी घटना का मंचन कर रहे हैं -जिस सनातन को हम पिछड़ा बताते हैं उसके चिरंजीवी देव आज से करोड़ों वर्ष पहले सूर्य पे पहुंच चुके थे जिसकी आज का विज्ञान कल्पना भी नहीं कर सकता।


ब्रह्माणी वीणा हिन्दी साहित्यकार
भारत भाग्य का सूर्य
*************
{मनहरण घनाक्षरी में,,चित्र अभिव्यक्ति का प्रयास
8+8+7 वर्णो की लयात्मक तुकांत के साथ}

सुखद लालिमा संग,,,मन में भरे उमंग,
निकला है स्वदेश का,निराला नया सूर्य !
मिटा के देश-कालिमा,छाई लाल मधुरिमा,
जाति पाति को मिटा,,दमका नया सूर्य !
उदित मोदी राज में,नई आश-विश्वास में,
देश को उल्लास देता,चमका नया सूर्य !
प्रभाती सा खिलेगा,भारत-भाग्य चमकेगा,
हँसेंगे "कमल" दल, निकला नया सूर्य !!
*********************************
टिप्पणी: हमने इस सुखद भोर को नए राजनैतिक परिदृश्य की कल्पना में अभिव्यक्ति किया है चुनावी माहौल कालिमा लिए था देश विघटन के कागार पर था ,,,कमल प्रतीक चिन्ह ने वास्तविक हिंद को हिंदुस्तान बनाकर जन मन को खिली सुहानी भोर की तरह आनंदित कर दिया,,,जय श्री राम


Mita Chakraborty
अरुणिम आभा 


उदित होता है आदित्य
ले कर प्रतिदिन नयी आशा
हर कर तीमीर को
किरणें देती नित नया संदेशा
रूकता नही किसी अड़चन से
छोड़ता नही अपनी धूरी को
चलता ही रहता है अपने पथ पर
मानता नही किसी मजबूरी को
रात घनेरी हो चाहे
हो घनघोर काली घटा
गरज बरस कर खूब
छा जाती है फिर रश्मि की छटा ।

टिप्पणी: सूरज की किरणों को कोई भी बाधा रोक नही सकती, उसे उदित होने से कोई रोक नही सकता ।


मदन मोहन"शैल"
(प्रोत्साहन हेतु)
आस का सूरज
---------
बड़ी आस के बाद उगा है आज का सूरज
है आस , इसके तेज का निरंतर विस्तार हो
हर राह हो निष्कलंक तेरे आगमन से
फिर कभी इस भू -भाग पर कलुषित अंधेरा न हो
बहुत क्षुब्ध है धरा आततायियों के पदचाप से
हो कुछ ऐसा जतन, धरा के गुणधर्म का न अवसान हो
नग्न नृत्य करने को उन्मुक्त है आज जमाना
लगे अंकुश, दग्ध हृदय की शांति का कुछ तो निदान हो
दुधमुंहे बालिकाओं का न हो घृणित कत्ल अब
हो खात्मा दरिंदगी का , तेरा कुछ ऐसा विधान हो
राजकाज का रक्तरंजित है चेहरा आज
हो करिश्मा, किसी को किसी की मौत का न गुमान हो
मिट रही है संस्कृति अपनों के ही कुतर्क से
न झुके शर्म से सर , कुत्सित भावनाओं पर विराम हो
इक जगी है आस तेरे आगमन से भोर से सांझ तक
निर्विवाद हो राज तेरा , जिसकी कभी न शाम हो
हर कण धरा का हो तृप्त तेरे निस्वार्थ कर्म से
चारों दिशाओं में मात्र तेरा गुणगान हो


टिप्पणी : सूर्य आशा का प्रतीक है । यदि किसी मनुष्य के अंदर सूरज के समान निश्कलंक तेज हो और दूसरे का हित सर्वोपरि हो तो उसकी सराहना होनी चाहिए।



नैनी ग्रोवर
खेल


इक दूजे को ढूँढ़ते, सूरज और बादल,
कभी बादल ने ली अंगड़ाई,
कभी सूरज ने दिखाई झलकी...
सूख-दुख इसी समान हैं,
ये बता रहे हमको,
खेल जीवन को जीने का,
सिखला रहे हमको,
हो कुछ भी होठों पे रखो,
मुस्कान हल्की-हल्की...
चाहे कुछ ही पल का साथ हो ये,
फिर भी सुंदर है ये नज़ारा,
जैसे राह में कोई मिल गया हो,
बचपन का मित्र हमारा,
भर जायें आंखें देख कर उसको,
भले हो सूरत, समय ने बदली...!

टिप्पणी: सृष्टि के इस चित्र से मुझे तो यही समझ आया, भले ही कम समय को किसी से मिलो पर ऐसे मिलो के जीवन भर ना भूलें, चाहे राह अलग अलग ही क्यों ना हो ।



रुचि बहुगुणा उनियाल
अनथक यात्रा

जल थल नभ में फैली है चहुंओर उजियार
कण कण में किरणें मेरी दें जीवन संचार
आशा और निराशा जीवन की अमिट कहानी
मानव मन में प्रतिपल होता है इसका व्यापार
नवजीवन को हर क्षण में ऊष्ण वसन देता हूँ
सारी ही सृष्टि से है मुझे प्रेम ही प्रेम अपार
चलते ही जाना है अनथक मंजिल की ओर
मेरी इसी सीख से बढ़े दिवस निशा ये संसार

टिप्पणी : इस तस्वीर को देखकर मुझे यही विचार आया कि संसार प्रतिपल चलायमान है और उसकी प्रथम प्रेरणा स्वयं सूर्यनारायण हैं
 


बलदाऊ गोस्वामी
काले बादल
___________
वह देखो दूर क्षितीज पर
काले घने बादल के कुछ टूकड़े
छाये हैं
जो ड़रा रहे हैं हमे
मगर इन बादलों के टूकड़ों के पीछे
सूर्य उग रहा है
जो टूकड़ों के बीच से
अपना प्रकाश फैला रहा है
अभी उसका प्रकाश हम तक
नही पहूँच पा रहा है पूरी तरह से
अभी कुछ देर में
टूकड़ों से उपर उठ कर
फैलायेगा चारों ओर प्रकाश
फिर जन - जीवन में
गूँज उठेगी
गीतों की सुंदर स्वर लहरियाँ ।
सच कहता हूँ बन्धू
तुम ड़रो मत
मौसम परिवर्तन होने वाला है ।


टिप्पणी: काले घने बादल मनुष्य पर मुसीबत के समान है । किन्तु बादलों के पीछे से सूर्य का उगना आशामय प्रतित हो रहा है । सूर्य के किरण को देख कर लगता है कि हमें काले घने बादलों से नही डरना चाहिऐ ।


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
नया सूरज
{प्रोत्साहन हेतु}
जनता ने लोकतंत्र के यज्ञ में देकर आहुति
नव भारत के निर्माण का संकल्प था लिया
थी राष्ट्रभक्ति से ओत प्रोत भावना सबकी
सबका साथ सबका विकास थी सोच सबकी
देखो फिर नया सूरज नभ पर है उदय हुआ
जन मन की आशाओं का ज्यों है मान हुआ
हर वर्ग - क्षेत्र का, नेतृत्व को पूरा साथ मिला
भारतवर्ष को फिर कर्मठ मोदी सा नेता मिला
साथ हमें इस नेता का, सजग रहकर देना होगा
कर हाथ मजबूत उनका दायित्व भी निभाना होगा
घर,बिजली,पानी,सडक पर हो जब सबका अधिकार
श्रेष्ठ भारत की कल्पना फिर होगी हमारी साकार

टिप्पणी: इस बार व्यस्तता के कारण देर से लिख पाया. चित्र को देखा तो भारत का ख्याल आया, ख्याल आया तो नव नर्वाचित सरकार का ध्यान आया - भारत के लिए इस खुशखबरी को और सबसे मूलभूत चाह इस सरकार से संक्षेप में लिखने का प्रयास किया


किरण श्रीवास्तव
प्रकाश

जब-जब संकट
गहराता है,
अपना वजूद
दिखलाता है,
जन-मानस को
भयभीत करता
अपनाअधिपत्य
जमाता है...!!!
तब-तब
अवतारी आता है,
फिर पाप कहाँ
टिक पाता है,
तिमिर दूर कर
जन-जीवन का
चहुंओर प्रकाश
फैलाता है.....!!!!

टिप्पणी: अच्छाई पर बुराई हावी हो सकती है लेकिन, जीत नहीं सकती.....।



अलका गुप्ता 'भारती'
नव जीवन की नयी बिसात 


करवट ले नव परिवर्तन की पुनः बजाती बीन ।
झाँके अरुण अरुणिमा आँजे बदरी नदिया झीन ॥
लें अंगड़ाई नभ कर भानु रश्मि दिये बिखेर ।
टूट गये सुप्त सारे शिथिल से कजियारे घेर ॥
करे उर्मि संग कल कल नदिया चंचलता विलास ।
लहकती अमराई हरी भरी अंबियन मिठास ॥
फिर बिछी भोर संग नव जीवन की नयी बिसात ।
हँसे खड़ खड़ धुन धरा ये मतवाले पीत पात ॥
छक कर बहकी सुरभित गंध मटियाली बौराए ।
बतियाँ बांचे चहके पंछी कुल-कुल पगुराए ॥
साँझ सकारे सी पनिहारिन नव उम्मीदी आस ।
उड़ जाएँगे दुख कुहासे पकड़ बयारी रास ॥
जीवन ज्योति जगमग जागे दूर हों बाधाएँ ।
होके अस्त तम की चादर कलुषित सब काराएं ॥

टिप्पणी: परिवर्तन प्रकृति का नियम है । हर रात्रि के अंत के पश्चात हर नई सुबह मन में एक नया उत्साह जगाती है एक नई आस जगाती है । समस्त सृष्टि इसी नियम के तहत चलती प्रतीत होती है ।



कुसुम शर्मा
नई सुबह नई आस

कोहरा अंधकार का हट जायेगा
नई किरण लेकर जब
नया सवेरा आयेगा
नई उमंग और तरंग से
ये जग फिर महक जायेगा
जब उदित होकर सूरज
अपनी किरणें बिखरायेगा !!
पंछियों की गूँज हो
या कलियों का खिलना !
भँवरों का गुंजन हो
या फूलो का महकना !
नई तरंग से प्रकृति का
अंग अंग खिल जायेगा
जब उदित होकर सूरज
अपनी किरणें बिखरायेगा !!
शिशु के रूदन से
बच्चों के शोर से
बड़ों की डाँट से
सूना आगंन फिर चहक जायेगा
जब उदित होकर सूरज
अपनी किरणें बिखरायेगा !!
कल कल करके नदियाँ का बहना
झर झर करके झरनो का गिरना
ठंडी हवा का झोंका जब खेत को छू कर जायेगा !
यह दृश्य देखकर किसान मुस्कुरायेगा !
जब उदित होकर सूरज अपनी किरणें बिखरायेगा !!
कण कण प्रकृति का खिल जायेगा
जब उदित होकर सूरज
अपनी किरणें बिखरायेगा !!

टिप्पणी: कहते है न कि नया सवेरा अपने साथ नई चेतना और नई आस लेकर सब के जीवन मे आता है सूरज के निकलते ही अंधकार मिट जाता है और प्रकाश चारों तरफ़ छा जाता है !!





प्रभा मित्तल
~~आशा का सवेरा~~

देखो,
जग आलोकित करने को
असंख्य रश्मियाँ संग लिए
भानु बदली से झाँक रहा।
सागर की लहरें नाच रहीं
जल कुतूहल में थिरक रहा।
सुना, कहीं सवेरा हुआ है !
सुनो,
देवों ने भेजा है तुमको
धरणी की त्रास मिटाने,
जाति-पाँति का भेद भूलकर
समता का राज्य बिछाने,
आर्तजन निबल के उर में
दैवी विश्वास जमाने।
जन - जन के मानस में
आशाओं का दीप जलाने।
इस समाज में फैले गहन-
अहंकार की तमिस्त्रा
का अब करो अंत,ताकि
अनीति भीति से दूर रहे
हर प्राणी बालक वृंद।
सच हो .. सवेरा नया हुआ है।

टिप्पणी: आज की आशाओं का सूरज सुरक्षा की बाँहें फैलाकर इस समाज में फैले अनाचार, अनीति,कुरीति के अंधकार को दूर करे,बस कुछ ऐसी ही अपेक्षाएँ लिए मन के भाव।

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