Sunday, June 23, 2013

15 जून 2013 का चित्र और भाव



अलका गुप्ता 
उत्सुक कुछ बेताब हुई छू लेनें को |
डाली शजर की उन मंथर लहरों को
कुछ कम्पित सी नदी हिल्लोल हुई ..
संकुचित सी .....कुछ विभोर हुई |
मुस्कायी सी शाख फिर झाँक रही |
प्रतिबिम्ब मनोहर ...... आंक रही |
भीज सलिल में स्वस्च्छ सलोना...
धुला-धुला सा ........रूप हरा |
पात-पात .....सहलाए जरा |
महामिलन से ....अविभूत हुई |
छटा मनोहर निस्तब्ध हुई |
हर मुग्ध मन को ...फांस रही |
प्रकृति के ....... नव-गीत लिए |
पवन मधुर ये .... बाँट रहा |
धीमें से हर ..तन-मन को ...
रंग में..आतुर अपने..आंज रहा ||


Bahukhandi Nautiyal Rameshwari 
देख स्वार्थी दुनिया ..
पात पात काँप उठे ...
तरुवर धरे हैं धीर ..
प्यास देख जन की ..
सरवर बेकल हो उठे ..
थामे समग्र नीर ..

बीते ज्येष्ठ, आषाढ़ ..
आने को सावन ..
बरसेगा अम्बर नीर ..
तपन मिटेगी ..
शांत बेकल प्राण होंगे ..
धरना बस ह्रदय में धीर ..
छु सरवर नीर ..
भंवर ख़ुशी का खिला आया ..
खुश्क था तपन से ..
तनिक गीला हो आया


बालकृष्ण डी ध्यानी 
इश्क नचाये

छु रहा है मन
तन को आज यूँ
लग रहा आज ये
सब इश्क ही नचाये
छु रहा है मन
तन को आज यूँ .........

जल को छु रही
पत्तियों के ओठ यूँ
हलचल से हो रही
तरंगों की उमंग पर
छु रहा है मन
तन को आज यूँ .........

साथ तेरा मेरा
यूँ साथ साथ हो
मै इस पार हूँ
तुम उस पार हो
छु रहा है मन
तन को आज यूँ .........

छु रहा है मन
तन को आज यूँ
लग रहा आज ये
सब इश्क ही नचाये
छु रहा है मन
तन को आज यूँ .........



भगवान सिंह जयाड़ा
मंद पवन के झोंखो से जब हिलती डाली ।
करे स्पर्स शांत जल को ,वह मतवाली ॥

उठी लहरें जल में ,शान्ति भंग कर डाली ।
और लहरे करे इजहार जैसे दें कुछ गाली ॥

मै सिचू सदा तुम को अपने स्वच्छ जल से।
और तुम हो , सदा छेड़ते मेरे शांत तल को ॥

पाल पोश बड़ा किया ,नहीं था कोई माली ।
मै सींचू तन को तेरे ,मुझे ही सजा दे डाली ॥

मेरा नहीं कुछ कशूर ,यह हवा की गलती |
छेड़ता वह मुझे और सजा तुमको मिलती ||

तुम को तो ,मैं सदा शांत ही देखना चाहूं |
तुम्हारे शांत जल में देखूं अपनी परछाई ।|

मन ही मन खुश होऊ देख अपनी हरियाली |
तुम्हारा मेरा अटूट रिश्ता ,बोली तब डाली ||

मंद पवन के झोंखो से जब हिलती डाली |
करे स्पर्स शांत जल को ,वह मतवाली ||


नैनी ग्रोवर 
मैं जीवनदायनी नदिया, तूम वृक्ष के हरे पात,
हम दोनों ही मिलकर देते, इंसान को सृष्टि की सौगात

फिर भी बाज़ आता नहीं, इसे लालच ने भरमाया है,
मुझे कर दिया कीचड़ इसने, तुझे आग में जलाया है,
जाने कब समझेगा ये, कब जानेगा ये अपनी बिसात...

एक दिन ऐसा आयेगा, सब कुछ फ़ना हो जाएगा,
तब रोयेगा सर पटक के, हाथ ना पर कुछ आएगा,
ना कोई होगा सुनने वाला, ना पूछेगा कोई किसी के हालात.. !!


जगदीश पांडेय 
मन ये तरस रहा है तम्हे आज छूनें को
मजबूर कर दुंगा लहरों को हिलनें को
हम दोनों के मेल से जीवन चलता है
मैं नही कहता ये जग सारा कहता है
स्पर्श का ये कैसा मधुर एहसास है
तेरे बिन अब मेरा न कहीं वास है


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Friday, June 14, 2013

08 जून 2013 का चित्र और भाव



दीपक अरोड़ा 
चलो अब खेल बहुत हो गया
थोड़ा सा पढ़ लिया जाये
भेजा खपा दिया खेलने में
अब किताबों से लड़ लिया जाये

जगदीश पांडेय
नही आती समझ में मुझे इसकी बातें
बनाई है किसनें ये मोटी मोटी किताबें
नजरें टिकी हैं पर समझ कुछ न आये
अक्षर काले काले देखो मुझको डराये
पढते हुवे बीत गई जानें कितनी रातें
नही आती समझ में मुझे इसकी बातें
बनाई है किसनें ये मोटी मोटी किताबें
.
जब भी मैं करनें बैठूँ पढाई
नींद से होती है मेरी लडाई
उस पर देख मुझको अकेला
जमुहाई भी है करती चढाई
कब तक होगी इनसे मुलाकातें
नही आती समझ में मुझे इसकी बातें
बनाई है किसनें ये मोटी मोटी किताबें
.
पढ लिख शायद इंजिनियर बन जाऊँ
डर है कहीं मैं रेती सिमेंट न बेंच खाऊँ
पढ लिख कर शायद डाक्टर बन जाऊ
नकली दवाओं का क्वार्टर न बन जाऊँ
गुजरे जीवन मेरा शराफत से हँसते गाते
नही आती समझ में मुझे इसकी बातें
बनाई है किसनें ये मोटी मोटी किताबें


भगवान सिंह जयाड़ा 
गुड़िया रानी अब हुई संयानी ,
करती है अब ,वह मनमानी ,

खेल खिलौने भी ,उसके पास ,
किताबों में ढूंडे जीवन आश ,

ख़्वाबों में कुछ यूँ डूबी रहती ,
मन मर्जी कुछ करती रहती ,

चलो आज यह एल्बम देखूं ,
इसी से आज मैं कुछ सीखूं ,

दादा दादी ,को कभी न देखा ,
मिला नहीं कभी ऐसा मौका ,

पाप्पा के संग रह गए प्रदेश ,
ले जाते नहीं मुझे अपने देश ,

मैं खूब पढूंगी ,खूब लिखूंगी ,
पढ़ लिख कर जब कुछ बनूंगी ,

तब मैं खुद ही घूम सकती हूँ ,
हर अपनों से मिल सकती हूँ ,

गुड़िया रानी अब हुई संयानी ,
करती है अब ,वह मनमानी ,


नैनी ग्रोवर
कामयाबी की सीड़ियाँ चड़ना है,
माँ मुझको भी पढ़ना है..

भैया की तरह, मुझे भी हक है,
क्यूँ मेरी योग्यता पर शक है,
मुझे भी बुद्धि दी है मालिक ने,
मुझे इन कुरीतियों से लड़ना है ..

माँ मुझको भी पढना है ....
ऐ मुझको जन्म देने वाले जन्मदाता,
क्यूँ बेटों की तरह मेरा पड़ना नहीं सुहाता,
मेरे नाज़ुक मन को ये भेद नहीं है भाता,
बन के वीरांगना, आगे बड़ना है ...

माँ मुझे भी पढना है ...!!


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
-- मेरा सपना ---
सीख रही हूँ मैं पढ़ना लिखना
बड़े होकर मुझे कुछ है बनना
स्नेह आशीर्वाद आप देते रहना
पूरा करूंगी मैं आपका हर सपना

लिंग भेद को दूर रखना सदा
जन्म से पहले न कोई करे विदा
हर एक कन्या जाये पाठशाला
बुरी नज़र वालो का हो मुंह काला


ममता जोशी 
बिटिया रानी तुझे भी पढ़ना है,
मर्दों की इस दुनिया में तुझे भी आगे बढ़ना है,
साक्षरता ही करवाती है कर्तव्यों का ज्ञान ,
नहीं रहना है तुझे अब अपने अधिकारों से अनजान,
१ दिन बनेगी तू भी डॉक्टर, इंजीनिअर या वैज्ञानिक महान ,
पढ़ लिख कर मिलेगा तुझको सर्वोपरि सम्मान ,
अपने हौसलों का दीपक तू कभी न बुझने देना ,
हर मुश्किल को पीछे छोड़ बस आगे बढ़ते रहना !


Pushpa Tripathi
कुछ ज्ञान मुझे भी पाना है
कुछ शब्द मुझे भी पढना है
चल पडूँगी ... नेक राह भर सहेली
हर मंजिल मुझे तय करना है .....

कन्या हूँ .... छवि अभी कोमल मेरा
जीवन में मुकाम अपना बनाना है
संपूर्ण शिक्षा साध्य सरल अधिकार मिले गर
ऊँचे पद पर टिके रहना मेरा भी तो हक़ है ......

छोटी हूँ .....अभी कई भूल सही
बढ़े बनने का फर्ज अदा करना है
किताबों में खो कर जीवन सुधरेगा
इसी में तो सारी दुनियां दिखती है

Pushpa Tripathi 
नन्हे है हाथ
किताबे बड़ी
शिक्षा के अधिकार से
उम्मीदे कई l

थामती हथेली
उँगलियों का साथ
किताबों से बड़ी
ज्ञान की बात l

छोटे है पैर
बहुत लम्बे रास्ते
चलना है अभी
बहुत दूर फासले l

छोटी है कुर्सी
जिम्मेदारी बहुत
शिक्षा से पा लूंगी
निजात कई


डॉ. सरोज गुप्ता 
बच्चो पर अत्याचार
~~~~~~~~~~~~~~~
बच्चो पर किया जा रहा है अत्याचार !
सुर्खियाँ बना है आज का यह समाचार !!

गर्म हो गया है मीडिया का बच्चा प्रचार ,
माँ -बाप भी चल पड़े हैं बेचने बच्चे बाजार !
मासूमियत बिक रही खुले में बढा व्यापार ,
लहरें उठने से पहले ही बाँध दिए गए कगार !

बच्चो पर किया जा रहा है अत्याचार !
सुर्खियाँ बना है आज का यह समाचार !!

उंगुलियां जो अभी तक पकड न पायी कलम ,
पकड़ चिमटा,चम्मच और कडाही तोड़ेंगी भ्रम !
माचिस की तिल्ली भी रखी जाती थी दूर भाग ,
अब थमा उन हाथों में जलवाई जायेगी आग !

बच्चो पर किया जा रहा है अत्याचार !
सुर्खियाँ बना है आज का यह समाचार !!

मास्टर शेफ का पाने को खिताब लगी होड़ ,
पैसे और शोहरत ने बच्चो के जीवन में लाया मोड़ !
हार और जीत के खेल ने बच्चे-दिल दिए तोड़ ,
गुड्डे -गुडिया से खेलने के दिनों थे जो उसके ,
हाय !किताब में ढूँढ़ रही गुडिया व्यंजन के तरीके !

बच्चो पर किया जा रहा है अत्याचार !
सुर्खियाँ बना है आज का यह समाचार !!


बालकृष्ण डी ध्यानी 
छुई मुई

यूँ ही बैठी हूँ मै
यूँ लगी अपने ही से
रबा क्या होगा क्या जाने
खोयी आज कीस चिंता में मै
यूँ ही बैठी हूँ मै

छुई मुई सी हूँ मै
अल्हड़ सी ये मेरी उम्र
क्या देखों क्या समझों
इस किताब को देख कर
यूँ ही बैठी हूँ मै

उबासी आ रही है
कब जाने आ जायेगी नीद
सपने ही मेरे अच्छे हैं
जिस को चाहीये बस नींद
यूँ ही बैठी हूँ मै

जब होगा तब होगा
इस बचपने पर ना तू
इस बस्ते ना बोझ बन
मुझे रहने दे अपने मन
यूँ ही बैठी हूँ मै

यूँ ही बैठी हूँ मै
यूँ लगी अपने ही से
रबा क्या होगा क्या जाने
खोयी आज कीस चिंता में मै
यूँ ही बैठी हूँ मै


किरण आर्य 
छोटी सी गुड़िया
मोटी सी किताब
अँखियाँ गडाए
बुने है ख्वाब
सारा जग जीतने
का हौसला है लिए
पाएगी कल ये
सफलता का खिताब
किसी से भी
कम नहीं ये
हो लाड साहब
या फिर कोई नवाब
है प्रतिपल आस रत
इसके मन का चिराग
सफलता भी सर
झुकाएगी समक्ष
इसके एक दिन जनाब


अलका गुप्ता 
मुझे भी कुछ पढ़ना है |
पढ़ कर कुछ करना है |
जीवन पथ पर चलना है |
लड़ाई हक़ की लड़ना है |
बेटी भी है जरूरत समाज की |
हक़ है उसका भी समाज पर |
मैं क्यूँ ना पढूं ...
मैं यूँ ही बेमौत....
गर्भ में चुपचाप क्यूँ मरुँ |
मुझे भी जीना है |
ख्वाबों को बोना है |
कर्मों के खेतों में...|
फसलों में बीनुंगी ...
अपनी पहचान ...
सम्मान की आंच में ...
सुखाऊँगी नारी का...
जागरूक आत्म सम्मान |
मुझे भी पढना है |
बहुत कुछ करना है |

कुसुम शर्मा 
मम्मी कहती हैं मुझसे मै भी एक दिन राज करुगी
पढ़ लिख कर एक दिन देश का ऊँचा नाम करुगी
कभी सोचती हूँ मै नेता बन जाऊंगी,
देश की हालत में कुछ तो सुधार लाऊंगी
जहाँ पर होते है भेद भाव, उन्हें प्रेम से दूर करुगी
मेरे जितनी कितनी बेटियां शिक्षा से वंचित रहती है
मै उनके लिए शिक्षा का विस्तार करुगी
उनके मम्मी पापा को समझाकर उनको भी तैयार करुगी
रानी लक्ष्मीबाई के पद चिन्ह पर चलकर दुश्मन का विनाश करुगी
अपने देश का ऊँचा नाम करुगी !!

Garima Kanskar 
माँ मुझे स्कूल जाने दो
माँ मुझे भी पढ़ने दो
मुझे भी सपने गढ़ने दो
जग में आगे बढ़ने दो

मेरे भी कुछ सपने है
उन सपनों को साकार दो
शिक्षा में है शक्ति बहुत
इस शक्ति को ताकत बनने दो

है होसला मुझमे
आसमान को छूने का
इस होसले को पंख देदो
अपने सपनों के
आसमान में उड़ने दो

मुझे दूसरो के लिये
मिशाल बनने दो
माँ मुझे स्कूल जाने दो
माँ मुझे पढने दो


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Thursday, June 6, 2013

03 जून 2013 का चित्र और भाव



बालकृष्ण डी ध्यानी 
रेखाओं में

रेखाओं में सिमटी
ऐ दुनिया सारी

रेखाओं ने ही मिटाई
क्या दूरियों और गहराई ?

सब तरफ फैला है
रेखाओं का ही जाल

नाप है माप है
रेखाओं ने अपना सम्राज्य

अपनी खोज में बंधा है तू
रेखाओं से तू यूँ जोड़ा है इंसान

कट जाये अगर वो एक रेखा
तेरा खेल रह गया वैसा का वैसा

रेखाओं में सिमटी
ऐ दुनिया सारी

रेखाओं ने ही मिटाई
क्या दूरियों और गहराई ?


सुनीता शर्मा 
आभासी दुनिया के हम उन्मुक्त पंछी ,
सुदूर देशो में बना रहे हम सब नई छवि ,
मैत्री का सुंदर संदेश संसार में फैलाते ,
देश धर्म की दूरिया मिटाते बनाकर नई कड़ी !

भगवान सिंह जयाड़ा
संजाल की क्रांति से दुनिया सिमट गयी ।
लगता है ,जैसे एक दुसरे से लिपट गयी ॥

दुनियां में मिले है यहाँ अब तार से तार ।
झट पट सूचनावों की अब है सदा बहार ॥

दूर रह कर भी अपनों का सदा मिले प्यार ।
जब मन करे मिलने को संजाल है तैयार ॥

चेहरे से चेहरा मिला कर खूब करो प्यार ।
मन को खूब सकूंन देता अपनों का दुलार ॥

घर बैठे बैठे कर लो सारी दुनियां की सैर ।
मुलाक़ात करो सब से अपना हो या गैर ॥

संजाल की क्रांति से दुनिया सिमट गयी ।
लगता है ,जैसे एक दुसरे से लिपट गयी ॥



रोहिणी शैलेन्द्र नेगी 
"तारों का जंजाल"

क्यों इन लकीरों ने,
सीमायें तय कर दी हमारी....?
जहाँ देखो इनकी रवायत है,
खींचना ही था.......
तो कुछ और खींचता ये जहां,
क्यों हर तरफ,
इन रेखाओं की बनावट है....?

रास्ते सिमट कर,
रह गए हमारे,
सीमा-रेखा को बांधा गया,
इंसान ही इंसान का,
दुश्मन बन बैठा,
जब भी इसको लांघा गया |

इंसानियत पर हैवानियत,
हावी होती चली जा रही है,
मासूमियत..........
अब दहशत बनकर,
दिन-ओ-दिन तब्दील,
हुई जा रही है |

ऐसे में अपनों का साथ,
शुक्र है..........
ये 'बेतार के तार' (wireless or net)
जुड़े हैं,
अपने गलियारे, चौराहों,
शहरों से जो दूर बसे हैं |

मिटटी की सौंधी-सौंधी-सी,
खुशबू जिनसे गुज़र के आये,
दूर-दूर बैठे अपनों को,
खुशियों से रु-ब-रु कराये |

तारों का जंजाल नहीं बस,
ये तो मायाजाल है,
कोना-कोना बचा न इस से,
चीज़ बड़ी कमाल है |


नैनी ग्रोवर 
देख खुदा इंसानों ने, तेरी धरती का क्या हाल कर दिया,
सरहदों में बाँट के, खड़ा इक ज़िंदा ये सवाल कर दिया ...

मुद्दतों के हो गए फांसले, अब हमारे दिलों के दरमियान,
दूरियों को देखों ना, किस तरह जी का जंजाल कर दिया....!!


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
.... ये दुनियाँ ....
कभी पृथ्वी लगती गोल कभी चपटी
लोग यहाँ ईमानदार है या फिर कपटी
लेकिन गरीब पर ही सारी दुनिया झपटी
शोहरत पर ही देखो सारी माया लिपटी

अब जीवन का एक स्टेशन अंतर्जाल
कभी लगे अपना कभी लगे ये जंजाल
बुद्धि का कोई धनी, चाहे हो वो कंगाल
देशी - विदेशी मित्रो का यहाँ फैला जाल

प्रेम दुश्मनी की जले यहाँ रोज मशाल
कभी रिश्तो की कोई बनाता यहाँ ढाल
हम ज्ञानी दूजा अज्ञानी का भ्रम पाल
खुद को कई सम्मान उपाधि देता डाल

फिर भी विश्व को जोड़ते ये बेतार के तार
किसी को जकड़े किसी का लगाए बेड़ा पार
कितने आबाद कितने बरबाद हुये नर नार
समझ अपनी, सोच अपनी, अपना बने संसार


कुसुम शर्मा 
हम उमयुक्त गगन के पंछी जहाँ चाहे उड़ जाते है,
देश - बिदेश में जा कर शांति का पाठ पढ़ते है,
पर न जाने इसे पढने से ये मानव क्यों घबराते है ,
इस युग में मानव ने जाने कितने अविष्कार किये,
इन अविष्कारों से उसने पूरे विश्व को जोड़ दिया ,
जहाँ पहुंचने में उसको सालो लगते थे वहां कुछ ही घंटो में पहुंच गया ,
हम तो जहाँ थे वही के वही है पहले भी शन्ति चाहते थे अब भी
लेकिन इस प्रगति ने मानव में बहुत बदलाव किया ,
जहाँ पहले प्यार पनपता था उसकी जगह इर्ष्य ने ली
आगे बढने के चक्कर ने भाई भाई को भुला दिया ,
एक दूसरे की होड़ ने संयक्त परिवार को मिटा दिया ,
जहाँ पर बेटियों को लक्ष्मी समझा जाता था
पर इस समय उस लक्ष्मी पर क्या क्या अत्याचार करे ,
कोई लुटे , कोई मरे,कोई तो बचके अपना घर भरे ,
जब अपने ही घर में इनके ये सब होता है
तो क्यों नहीं इस मानव का दिल रोता है
चाहे ये विश्व को कितना जोड़ ले
ये तब तक जोड़ न पायेगा
जब तक ये खुद शन्ति का पाठ न पायेगा !!


डॉ. सरोज गुप्ता 
तूने हाँ मानव तूने
डाला ऐसा जाल
कर दिया कमाल
किया सबको मालामाल !

मानव मानव को जोड़ा
देश देश को जोड़ा
जाति-धर्म को तोडा
बाजार व व्यापार को जोड़ा !

तूने हाँ मानव तूने
डाला ऐसा जाल
कर दिया कमाल
किया सबको मालामाल !

सूचनाओं का संसार
पहुँचा सबके घर-बार
विकास की आई लहर
तकनीक की कहो जयकार !

तूने हाँ मानव तूने
डाला ऐसा जाल
कर दिया कमाल
किया सबको मालामाल !


जगदीश पांडेय 
सीमित हुवा है संसार देखों चंद रेखाओं में
पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण सब दिशाओ में
इतनी तरक्की आखिर इसांन तूनें कर डाला
दुनियाँ होगी मुठ्ठी में सपना सच कर डाला
कहीं धरा का एक हिस्सा प्रकाशमान हो रहा
तो इसी धरा का कोई हिस्सा अंधकार में सो रहा


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Thursday, May 23, 2013

20 मई 2013 का चित्र और भाव





Rohini Shailendra Negi 
"रिक्त हथेली"
ये स्पर्श बूंदों का,
टिप-टिप कर,
मेरे हाथों पर गिरना,
कभी तीव्र तो,
कभी मद्धम-मद्धम,
मेरी हथेलियों पर,
टपकना |

मुट्ठी मे,
बंद कर लेने को,
अब तो जी चाहता है,
हरदम,
आज नाचने को,
जाने क्यों,
फिर करता है,
ये मेरा मन |

खिड़की पर,
बैठे-बैठे मुझको,
कितना इंतज़ार,
कराती हैं ये,
देख नहीं सकता,
इनको मैं,
तभी शायद,
रुलाती हैं ये |

देखूँ तो सही,
इनमे ऐसा क्या है,
छू कर तो,
महसूस करूँ,
अन्यथा सर्र से,
फिसल जाएंगी,
जल्द ही,
फिर रिक्त हथेली,
सँवारता रहूँ |


भगवान सिंह जयाड़ा 
रिम झिम रिम झिम बरसा सावन ,
ठंडी फुवार यह अति मन भावन ,

मिट गई अब, धरती की तपन ,
उमड़ घुमड़ कर अब आया सावन ,

इसे देख करता है ,मेरा भी मन ,
इन फुहारों से भिगा लूं सारा तन ,

गरमी से अकुलाये धरती के जन ,
भीग कर सकुन पायेगा यह मन ,

धरती में अब छाएगी हरयाली ,
झूम उठेंगी अब सब डाली डाली ,


नैनी ग्रोवर 
ठंडी-ठंडी सावन की बूंदे
लो धरती पे आईं
चरों और महकी सृष्टि
मौसम ने ली अंगड़ाई ..

भीगी-भीगी हर डाली है
भीगा है हर आँगन
जाने कब घर आयेगा
मेरा भी मनभावन
पपीहे की भी प्यास बुझी
ना मेरी बारी आई..

कोयल कूकी, मयूर भी नाचे
कलकल बहने लगीं है नदियाँ
इन्द्रधनुष की ओड़ के चूनर
खिल गई अम्बर की बगिया
घन घन करती शोर मचाती
काली घटा है छाई....!!


जगदीश पांडेय 
प्यास धरा की है बुझा रहा देखो ये बादल
समेट हथेली में बूँदे हो जाउँ मैं भी पागल
यूँ बिलखनाँ आसमाँ का धरा सह न सकी
बोल दी बात दिल की जो वो कह न सकी
कि-
अपनी आँखो से अश्कों को बरसनें न दो
मोती अनमोल हैं ये इन्हें बिखरनें न दो
जब कभी बिखरे तो मुझे याद कर
थाम लुंगी हथेली पे न इंकार कर


डॉ. सरोज गुप्ता ...
एक हथेली मोतियों से भरी
~~~~~~~~~~~~~~~~
ठंडी-ठंडी ये बूंदे ,मेरी हथेली पर कूदे !
मुट्ठी बंद कर लूँ ,तुझे अंग अंग में भर लूँ !!

मचल-मचल गिरे बूंदे,पीहू पी-पी की रट बांधे !
आँखों-आँखों रात पार की,फिर आई बरसाते !!

ठंडी-ठंडी ये बूंदे , मेरी हथेली पर कूदे !
मुट्ठी बंद कर लूँ ,तुझे अंग अंग में भर लूँ !!

छम-छम ये बूंदें ,अटखेली भर कूदें !
प्रकृति का देख राग-रंग उड़े मन परिंदे !!

ठंडी-ठंडी ये बूंदे , मेरी हथेली पर कूदे !
मुट्ठी बंद कर लूँ ,तुझे अंग अंग में भर लूँ !!

नन्ही-नन्ही ये बूंदे, अम्बर का रास्ता फांदे !
तपती धरा कर शीतल दिखाए अपने फायदे !!

ठंडी-ठंडी ये बूंदे ,मेरी हथेली पर कूदे !
मुट्ठी बंद कर लूँ ,तुझे अंग अंग में भर लूँ !!

गीली-गीली ये बूंदे , भीगे- भीगे सारे बंदे !
भीगी धानी चुनरिया,उलझ गए सारे फंदे !!

ठंडी -ठंडी ये बूंदे ,मेरी हथेली पर कूदे !
मुट्ठी बंद कर लूँ ,तुझे अंग -अंग में भर लूँ !!

हँसी-हंसी सी ये बूंदे,मचल-मचल कर बरसें !
कागज की कश्ती बिठाया,आँख-मिचौनी खेले जैसे!!

ठंडी -ठंडी ये बूंदे , मेरी हथेली पर कूदे !
मुट्ठी बंद कर लूँ ,तुझे अंग अंग में भर लूँ !!


अलका गुप्ता 
समेट लूँ बूंदों को इन बारिस की |
उमड़ी अभिलाषा अंतर-शिशु की ||

बचैन आह ! उमस की मर जाय |
बारिश की बूंदों से हर मन हर्षाए ||

काले-काले .....बदरा आये |
झीनी-झीनी .....वर्षा लाए ||

भीज-भीज हर मन अकुलाए |
पीया मिलन को आस जगाए ||

गंध भीगी मिट्टी की सोंधी सी
दिशा -दिशा को .... महकाए ||

पवन पुरवाई मधुर संगीत सुनाए |
धुली-धुली सी हरियाली मुस्काए ||

हर मन हर्षित नृत्य उल्लास भरे हैं |
कागज के भी... देखो ! ..जहाज चले हैं ||

नवांकुर से फूटे ...नदी-ताल भरे हैं |
नव गीतों से धरती के हर प्रान भरे हैं ||


Garima Kanskar 
पहली बारिश की बूंदों
को हथेली में लेकर
खेलने का करता है मन
कुछ बूंदे बड़ी कुछ छोटी
जैसे ही पड़ती है हथेली पर
होती है अजीब सी ख़ुशी
इस ख़ुशी का कैसे
लफ्जों में इजहार करू
मन करता है
इन बूंदों को अपनी
मुट्ठी में भरकर
रख लू अपने पास
पर ये बूंदे
छूकर हथेली को
चुपके से चली जाती है
लाख करो समेटने
की कोशिश
हर कोशिश व्यर्थ
चली जाती है
जैसे ही पड़ती है नजर
खाली मुट्ठी की तरफ
सारी ख़ुशी मुझसे
दूर चली जाती है
गरिमा कान्सकार


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
~बरखा की बूंदे ~
बरखा की ये बूंदे
हथेली पर पड़ते ही
तेरा अहसास दे गई
तन मन मे मेरे
राग प्रेम का छेड़ गई

रिमझिम बरखा मे भीग रहा
तेरे ही ख्याल मे जी रहा
रोम रोम जैसे महक रहा
हर भाव तेरा गुदगुदाता रहा
तन मेरा हर बात सुन रहा

नाच उठा मेरा अंग अंग
मानो तुम तुम संग संग
अहसासों की होने लगी जंग
प्रीत के सिमटने लगे फिर रंग


किरण आर्य
बारिश की फुहार
तप्त हथेली पे पड़ते ही
अहसासों से तेरे गई भीग
हाँ वैसे ही जैसे मन मेरा
भिगो जाता तेरा नेह और क़रार
रूह मेरी थी बेक़रार और
तेरा प्यार फुहार सा जब
रूह के रेगिस्तान को भिगो गया
एक सौंधी सी खुशबू
बस गई रूह में जो
आज भी है मदमाती
मेरे तन मन को और
अहसासों में भी जी लेती हूँ
एक जिंदगी संग तेरे आज भी
और तन मन मेरा भीग
पुलक उठता है प्रेम फुहार मे
सिमट जाती अंक में तेरे
वैसे ही जैसे सिमट गई
बरखा की बूंदे हथेली पे
भिगो गई तन बदन और अंतर्मन
बरखा की फुहार से बसे
प्रिय तुम मन में मेरे आज भी


सुनीता शर्मा
धरती हो रही लहुलुहान निसदिन ,
बढ़ रहा कत्लेआम दिन ब दिन ,
आसमान का ह्रदय फट गया
रो रहा अब उसका भी अंतर्मन !

लाल लाल धरती को धोने बरखा आई ,
बारिश नहीं ये तो वक्त के नयन भर आई ,
इस हिंसात्मक संसार में जीवन मात्र खिलौना भर ,
इस धरा पर कभी टिकने वाली ख़ुशी की घड़ी न आई !

इस धरा पर खाली हाथ आये सब ,
इस संसार से खाली हाथ जायेंगे सब ,
पल पल बरसती बूंदों में ,
पढ़ सको तो पढ़ लो जीवन सार सब !


बालकृष्ण डी ध्यानी 
बूंदा बूंदी

बूंदा बूंदी बरसातों की
एक बूंद पड़ी मेरे हाथों पे

पड़ते पड़ते वो कह गयी
नम सी लगी वो बूंदा बूंदी पानी की

छम छम छम गयी
दिल पर जम गयी बूंदा बूंदी पानी की

हाथों पर लपकी वो ऐसे
छपकी हो झपकी हो जैसे बूंदा बूंदी पानी की

हथेली पर और वो अश्रू की धार
गिरी वो आकाश से कुछ ऐसे आज बूंदा बूंदी पानी की

कोई राह देखे मन बिरहा जैसे
रिम झिम राहों पर कतार बूंदा बूंदी पानी की

बूंदा बूंदी बरसातों की
एक बूंद पड़ी मेरे हाथों पे



सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Monday, May 20, 2013

11 मई 2013 का चित्र और भाव




नैनी ग्रोवर
क्या करूँ मैं बैठा -बैठा,
फेसबुक ही अपडेट करूँ ..
कुछ अपने यार दोस्तों से,
थोडा मैं भी डिबेट करूँ ..

एक फ्लेवर नया नया,
पेडीगिरी का आया है ,
कंपनी कह रही है देखो,
आम उसमें मिलाया है,
मैं तो मिनट भर में ही ,
सफाचट अपनी प्लेट करूँ ..

कुछ अपने यार दोस्तों से,
थोडा मैं भी डिबेट करूँ ..

गर्मी का मौसम है आया,
बाहर जाना मुझे सुहाता नहीं,
बिना कूलर और ए सी के ,
कुछ भी मुझको भाता नहीं ,
कर कर के मैं लाइक कमेन्ट,
बार बार उन्हें डिलेट करूँ ..

कुछ अपने यार दोस्तों से,
थोडा मैं भी डिबेट करूँ .....!!


केदार जोशी एक भारतीय 
सारा चक्कर है लैपटॉप और कंप्यूटर का ,
में भला कैसे इस से दूर रहू .

में हु लोहा ये है चुम्बक ,
कब तक इस से दूर रहू

लोग घंटे बिजी रहते है इस में ,
सौचता हु एक आध घंटे में भी पास रहू ..

आखिर ये पूरा खेल है टेक्नोलॉजी का ,
में भला कैसे इस से दूर रहू .


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~गाली मत देना~
हे इन्सान! कुत्ता कह कर गाली मत देना
नज़र उठा आँखों में चढ़ा चस्मा देख लेना
तेरे कर्म से वाकिफ है आजमा कर देख लेना
स्वामीभक्त कैसे होते है, ये हमसे सीख लेना

हर भाषा जानते पर एक जुबान में उतर देते है
जंग हो या अभिनय हम तुम सा हौसला रखते है
प्यार करो या दुश्मनी हम भी निभाना जानते है
वफदारी फितरत है दुश्मन को खदेड़ना जानते है

इन्सान तो अब मिलना छोड़ कंप्यूटर से चिपके है
अच्छा बुरा प्यार दुश्मनी सब कम्यूटर पर करते है
बतलाए तुम्हे हमने भी अब कंप्यूटर गुर सीख लिए है
तुमसे मिलने फेसबुक पर रोज स्टेट्स अपडेट करते है


Govind Prasad Bahuguna 
अब डॉग पर ब्लॉग लिखने का जमाना है
डॉग की महिमा अपार है
घर से लेकर स्वर्ग के द्वार तक
पितृपक्ष में भी आमंत्रण के योग्य
स्वामिभक्ति के लिए स्मरण किये जाने योग्य
अपने कर्तव्य पर चौकन्ना
कहते है कि आप संबिधान के "वाचडॉग" हो
कोई गलत करेगा तो आप उस पर भोंकोगे
नहीं मानेगा तो उसको काटोगे
आप विद्यार्थी हैं तो आपकी निद्रा डॉग की तरह होनी चाहिए
आप जासूस हैं तो डॉग की तरह सूंघिये
चोर की नब्ज ढूंढिए
अब आदमी से भरोसा उठ गया
और डॉग पर भरोसा बढ़ गया I
फैशन में एक ज़माना था डॉग कालर का
"स्वामी की आवाज' में बोलने वाला डॉग
संगीत की दुनिया में चर्चित हुआ-अब स्लम डॉग नाम से पुरस्कृत हुआ
और क्या क्या कहें हम डॉग की तारीफ़ में ...


प्रभा मित्तल 
भई वाह ! आज ये मेरे हाथ लगा है
जब मालिक घर से चला गया है
रोज देखता हूँ..बूढ़े बच्चे और जवान
इसी से चिपके रहते हैं दिन तमाम
गली-क्रिकेट ,कँचे, गुल्ली-डंडा,
पिट्ठू-गरम ,खो-खो और लँगड़ी-टाँग
भूल गए सब कहाँ रहे अब इनके नाम।

ऐसा क्या है इस डिब्बे में,
जिससे मैं हूँ अब तक अनजान,
ये क्या घूम रहा है गोल गोल
क्या ढूँढ रहा है इसका काम।

बिन तनख्वाह के रहता हूं
नाइट ड्यूटी भी करता हूँ
एलटीसी,होम टाऊन नहीं मिलता
स्वामीभक्त हूँ,
कुछ तो सुविधा मिले मुझे भी
लैपटाप लिए बैठा हूँ,
फ्रैंड्स सर्च कर लेता हूँ।

दुनिया आगे बढ़ी जा रही
अब मैं भी पीछे नहीं रहूँगा
डब्बू भोटू चिंकी डिंकी हैप्पी
सबसे मिल इसपर चैट करूँगा

मेरे भी संगी साथी बनकर मॉड
बंद हो गए ए सी वाले महलों में,
तरह-तरह की ड्रैस पहनकर
पैडिग्री खाँए सुन्दर प्यालों में।

मैं करूँगा ऑनलाइन शॉपिंग आज,
टी-शर्ट जींस जेबॉन्ग से ऑर्डर कर
फ्लिपकार्ट से ए.सी. भी मँगवाऊँगा
धूप से तपते दड़बे में ठंडक कर
कुछ तो गर्मी से राहत पाऊँगा।


दीपक अरोड़ा 
वाह, ये है फेसबुक फंडा,
अब तक था मैं इससे अनजान
अब मेरे भी होंगे मित्र
सबसे होगी यहां पहचान... दीपक


भगवान सिंह जयाड़ा 
लैपटॉप पर देख अपनी फोटो ,
कुत्ता मन में कुछ यूँ चौंका ,

पहले तो देखा गौर से उसको ,
फिर वह जोर जोर से भौंका ,

निकाल कर अपना चश्मा ,
खूब रगड़ कर उसको पोंछा ,

पहन कर नजर का चश्मा ,
फिर मन में गहराई से सोचा ,

दोस्त बना लूं अपने भी आज ,
क्या खूब मिला है यह मौका ,

देख ढेरों नस्लों को वह अपनी ,
अनेकों रंग रूप देख फिर चौका ,

सोचा हम तो अच्छे है इन्शान से ,
नहीं देते कभी किसी को धोखा ,

देश भेष अलग है हम सब का ,
बोली गुण दोष एक हैं सब का .

बफादरी की मिशाल हम से है ,
जो इन्शान भी नहीं निभा पाता ,

लैपटॉप पर देख अपनी फोटो ,
कुत्ता मन में कुछ यूँ चौंका ,


जगदीश पांडेय 
मैं भी अब प्यार करुंगा अपनीं चाहत का
इजहार करुँगा
बस मिल जाये कोई मुझे भी आँखें उससे
दो चार करुंगा
फेसबुक है निराली दुनियाँ मित्र निवेदन
हर बार करुंगा
चाहे न अपनाए कोई मुझको लेकिन सब पे
ऐतबार करुंगा
मैं भी अब प्यार करुंगा अपनीं चाहत का
इजहार करुँगा
मासुम जानवर मैं हूँ इंसान पर तेरे जैसा
मैं फेक नही
सूरत नही प्यारी मेरी पर मेरे जैसा कोई
नेक नही
मित्र निवेदन करे स्वीकार कोई संग वादा
सौ बार करुंगा
मैं भी अब प्यार करुंगा अपनीं चाहत का
इजहार करुँगा


Rohini Shailendra Negi
"टायसन"
अब ये दौर कितना प्रसिद्ध हो चला है,
तस्वीर देख कर तो ये सिद्ध हो चला है,
आँखों मे चश्मा, पंजों पर "की-पैड" है,
"डौगी" को देखो करता ये "चैट" है |

मेरा "टायसन" इतना एडवांस है,
"फ़ेस-बुक" पर लेता चान्स है,
"फिमेल फ्रेंड्स" से करता "रोमांस" है,
तभी तो इसका अपना "ग्लान्स" है |

न जाने आजतक कितनों को पटाया है,
"फ्रेंड-रिक्वेस्ट" भेज कर कितनों को सताया है,
"कनफर्म" किया तो समझो बात बन जाएगी,
गर नहीं किया तो कोई दूसरी "लाइन" पर आएगी |

दिन मे उसके पास फुर्सत के यही पल खाली हैं,
क्योंकि......रात "घर" की करनी भी तो रखवाली है,
अपना काम निभाना वो बख़ूबी जानता है,
तभी तो सारा "ब्लौक" उससे थर-थर काँपता है |


उदय ममगाईं राठी 
देख स्टेटस ऑनलाइन मालिक का रह गया कुत्ता दंग
बीस बरस से बने तपस्वी फेसबुक ने कर दिया भंग
तकनिकी की इस दौड़ में हम भी किस्मत आजमायेंगे
बफादारी के इस बंधन तोड़ के कब हम खुद को जगायेंगे


ममता जोशी 
बहुत कर ली है चौकीदारी ,
मैं भी सीखूंगा अब दुनियादारी,
अब अपनाऊंगा ये नया ट्रेंड,
बनाऊंगा मैं भी ऑनलाइन फ्रेंड ,
पहले दरवाजे पर लेता था अजनबियों को रोक ,
लेकिन अब फेसबुक में करूँगा दोस्तों को पोक,
सुबह हो शाम या फिर दिन हो या रात,
अब तो फेसबुक में ही लिखूंगा अपने दिल की बात ....


अलका गुप्ता .........................
मैंने भी अब बना लिया है फेसबुक पे एकाउंट |
आओ मित्रों भेजो मुझे अपनी-अपनी रिक्वेस्ट |
देखो मैंने अपना चश्मा भी अब चढा लिया है ...
मैं भी जानू तुममें है वफा की कितनी अमाउंट ||


Neelima Sharrma 
कुछ महीने पहले की बात हैं
फेस बुक हमारा हम पर चिल्लया
की एक आग्रह मित्र का आया
मुझे भी मित्र बनालो
सन्देश इन बॉक्स खिसकाया
बच्चो की फोटो से सजा था था प्रोफाइल
हमने भी स्वीकारी उनकी गुहार कह कर भाई
हर स्टेटस में लाइक था उनका आता
हर कविता उनको हमारा लिखा था भाता

कुछ ही दिनों में अपना रंग देखाया
हम हैरान कुछ समझ नही आया
अजीब सी उनकी बाते थी
बात करने की जिद भी होने लगी
फ़ोन नंबर दे दो अपना की रट पर
अपना संयम मैं खोने लगी

जब एक दिन हमने उनके अबाउट पर गौर फ़रमाया
लिखे पेज देख के उनके हमारा सर चकराया
ऐसे ऐसे पेज उनके अच्छे अच्छे शरमा जाये
अब हमारे दीमाग में कुछ विचार आये

उनके प्रोफाइल का लिंक हमने सहेलियों कोबतलाया
देखो एक कुत्ता फेक प्रोफाइल बनाकर कुंठा शांत करने आया

सबने मिलकर उसको रिपोर्ट किया फिर ब्लाक किया
कम से कम यहाँ से एक कुत्ता तो कम किया
तो भाई और बहनों अब मित्र शामिल करो तो देखभाल कर करना
शा मिल हो जायेगा आपकी लिस्ट में एक कुत्ता वरना


Garima Kanskar 
सबको देखता हूँ मै
बस में ट्रेन में
ऑफिस में घर में
सब लेपटाप में
नजरे जमाये होते है
ऐसा क्या है इसमे
सोचता हूँ
मै भी तो देखू
एक बार
तो क्या था
चढ़ा लिया चश्मा
और बैठ गया
लेपटोप लेके
इसे ओन किया
और देखा
कितनी सुंदर है
इन्टरनेट की दुनिया
सच यहाँ आ जाओ तो
किसी को किसी की
सुध नही
सब कुछ मिल
जाता है यहाँ
ज्ञान के साथ
दोस्त भी
सचमुच इंटरनेट
की दुनिया बहुत
ही प्यारी है
आपको भी अच्छी
लगती है न
मुझे भी भा गई
इन्टरनेट की दुनिया



Bahukhandi Nautiyal Rameshwari 
इंसानी संगत का असर देखिये ..
कंप्यूटर चला रहा हूँ ..
रह गयी कितनी कसर देखिये ...
इंसानी नमूने साँझा कर रहा हूँ ..
पसंद आये तो क्लिक कीजिये ..
होम डिलीवरी करवा रहा हूँ ..
पसंदगी पर मोहर कीजिये ..
इनकी दूम नदारद है हुजुर !
मेरी वफादारी पर शक न कीजिये ..
कहो तो ....
सौ में निनानवे बेईमान ..
फिर भी मेरा भारत महान ..
का नारा इनकी जुबानी सुन लीजिये ....
टैग कर इंसानी तसवीरें भेज रहा हूँ ..
भिन्न२ जाति के इंसान सहेज रहा हूँ ...
..

कुसुम शर्मा 
चश्मे पहन कर टौमी आया
आते ही कंप्यूटर खोला
कंप्यूटर खोलते सोच रहा वो
खोलनी है कितनो की पोल
कंप्यूटर राजा तू ही बोल

पहले सुने देश विदेश का हाल
फिर लगाके उसमे विराम
फेसबुक का खोल के पेज
लिखने बैठा मन का भेद

बैठे बैठे सोच रहा वो
क्या कलयुग है आया
जिसने इन्सान को भी
जानवर है बनाया

कोई किसी को काट रहा है
कोई किसी पे भोंक रहा है
इनसे तो अच्छे है हम
जिस घर का खाते है हम
उस पर जान लुटाते हम
कभी पीछे से वार न करते
रहेगे हम सदा वफादार
यही है हमारा विचार


किरण आर्य .
इंसानी फितरत का असर
कुछ मुझपे भी छाया है
आज मैंने भी लैपटॉप पर
फेसबुक चलाया है
वाह ये दुनिया
अज़ब निराली है
यहाँ के रंग है न्यारे
अज़ब यहाँ की माया है
भांति भांति के लोग यहाँ पर
सोच गज़ब सी छाया है
चकाचौंध हूँ भैया मैं भी
चस्मा आँखों पे चडाया है
फेसबुक की रौनक से चेहरा
मेरा भी चमक पाया है
मालिक ही नहीं मेरा भी
जिया अब इसपर आया है
सुबह उठते ही अब मुझे भी
याद इसी की आती है
स्टेटस नित नए डालने को
जिया मोरा भरमाया है
इंसानी फितरत का असर
कुछ मुझपे भी छाया है
आज मैंने भी लैपटॉप पर
फेसबुक चलाया है


अलका गुप्ता .............
अभी तक लिए बैठा हूँ लैपटाप |
अधिकार से पूरे डटा हूँ टीपटाप |
पंजा ना हटाऊं ब्लॉग एक बनाउं ..
भाव लिखना यारों ...क्लास टाप ||


प्रजापति शेष .....
स्वीकार/करूं/या/ नकार/दुं
इसको/काट/लुं/या/मार/दुं
एक/आदमी/नें/टेग/कर/दिया/मुझे
सोचता/हूं/शेष/फेसबुक/ही/फाड/दुं


अलका गुप्ता 
माना प्रतिबिम्ब ! तुम्हारे बाद मैं इतना छा गया हूँ |
अब लेकिन मैं ! इस जिम्मेदारी से घबरा गया हूँ |
फंसा के यहाँ...वफादारी का मेरी ये सिला दिया है ..
बैठ कर इस लैपटाप पर ..... अब मैं उकता गया हूँ ||

माना बल पर इनके ही चलता तुम्हारा पागलखाना है |
अब मुश्किल मगर ..तुम्हारे इन मित्रों को झेल पाना है |
ऐंडे-वेंडे भाव इनके ...अजब -गजब तश्वीरों पर जो उभरें ..
ब्लॉग अपना लो सम्भालो ..बस ना भेजा और पकवाना है |


सुनीता शर्मा 
इतने महीनो से मैं अपना साथी ढूंढ ढूंढ कर हार गया ,
अब इस लैपटॉप पर मैंने भी अपना प्रोफाइल खोल लिया ,
मालिक अक्सर कहता है यहाँ सब कुछ मिलता है ,
चल रे टॉमी तूने भी आज अपने दिल का बंद दरवाजा खोल दिया !


बालकृष्ण डी ध्यानी 
जम गया हूँ

लैपटॉप और ऐनक संग
टंग गया हूँ मै
इन्टरनेट और मन संग
जम गया हूँ

खोज राहों मै सहेज राहों मै
अपना अस्तिव अपने से
गूगल मै उपलोड कर राहों मै
खो ना जाऊं मै लुप्त होना जाओं मै कभी
जम गया हूँ

मै भी हूँ लगा हुआ
इंसानों के संग अड़ा हुआ
हार ना मानूंगा मै भी
आँखों पर शीशा चढ़ा हुआ
जम गया हूँ

लप लप रही जीभ मेरी
रंगों भरी ये दुनिया देख के
आयत भरा ये पिटारा भी
बन गया वो सहारा अभी
जम गया हूँ

अपनी जाति को बचाऊँगा
क्रांती एक नई यंहा उभारूंगा
सब कुत्तों का साथ लाऊँगा
अपनों की यंहा दुनिया बसाऊँगा
जम गया हूँ

लैपटॉप और ऐनक संग
टंग गया हूँ मै
इन्टरनेट और मन संग
जम गया हूँ


सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Friday, May 10, 2013

8 मई 2013 का चित्र और भाव




दीपक अरोड़ा 
इन वीरान रास्तों की तरह
तन्हाई ही अब मेरा साया है
अनमोल जिंदगी गंवाकर
यही कुछ तो मैंने पाया है...


जगदीश पांडेय 
आ गया वही राह फिर
पीछे जो छोड आया मैं
याद नही है अब मुझको
क्या खोया क्या पाया मैं
आ गया वही राह फिर
पीछे जो छोड आया मैं

आसमाँ भी धुमिल हुवा है
रास्तें भी हैं पथरीली सी
याद है इसी राह पर मुझे
आती वो लडकी पगली सी
देखे सपनें इन दरख्तों के संग
जिंन्हें सच न कर पाया मैं
आ गया वही राह फिर
पीछे जो छोड आया मैं

.
वादे किये थे संग चलनें के
साथ सदियों हम रहनें के
नही सोचा था कभी हमनें
उम्मीदों की शाम ढलनें के
बदला मौसम हुवा पराया
लौट के वापस फिर न आया
फिर भी तोड सारे बंधन को
तुझको ही तो था अपनाया मैं
आ गया वही राह फिर
पीछे जो छोड आया मैं


डॉ. सरोज गुप्ता 
झड गए सब पते !
धुंधलके रह गए मेरे मत्थे !!

न जा साथी न जा यूँ राह में अकेला छोड़ ,
काटे न कटेंगे जीवन के घुमावदार मोड़ !
तेरे ही नजरों से देखे मैंने स्वप्ने सुनहरे ,
अकेले न छांट पाऊँगी ये बादल हैं घनेरे !
झड गए सब पते !
धुंधलके रह गए मेरे मत्थे !!

तेरे बिना क्या बहारें देखी मैंने कभी ,
अलख भोर का उगता सूरज बैगाना हुआ अभी !
उजड़े हुए शहर बस जाएँ चाहें अब सभी ,
दिल की ड्योढी का कोरा दिया बलेगा तभी ,
तेरी सूरत का दीदार करूंगी मैं जभी !
झड गए सब पते !
धुंधलके रह गए मेरे मत्थे !!


विजय गौड़ 
मैं इस राह में अपने कदमों के निशाँ ढूंढता हूँ,
किस तरफ चला था मैं, वो दिशा ढूंढता हूँ।
कुछ यादगार पल, कुछ खूबसूरत शामें,
चला था जिसके साथ, वो मेहरुनिशाँ ढूँढता हूँ।।

दूर उस धुंध से इक तस्वीर सी उभरती है,
मैं उसमे अपना कोई हिस्सा ढूंढता हूँ,
सूखे पत्तों की एक परत सी ज़मीं है जिसपे,
मैं इस ज़िन्दगी का वो किस्सा ढूंढता हूँ।


Bahukhandi Nautiyal Rameshwari 
इन सर्द धुंधली राहो में ..
देखो कैसे ये वृक्ष तने से हैं ..
झड चुके हैं पात, शाखों से इनकी ..
उग रहे ख्वाब, कोमल टहनियों में ...
आएगा सावन फिर से .
पड़ेंगी बूँदें, प्यासी धरा पर ..
उड़ेगी मृत्तिका श्वास फिर से ..
लिए मंद मंद खुशबू मटैली ..
फिर नाचेगी, प्रकृति फैला छटा नखरेली ..

मिट रहे शाख, राहों से फिर बंट जायेंगे ..
सब्र करना सीखो मानुष, मुफलिसी के दिन भी ..
बदलते मौसम से कट जायेंगे ..
धुंध से आगे भी जीवन है ..
ना इसको ठहराव कहो ..
समय की अविरल धारा .
सदैव संग बहो ......

किरण आर्य .
शाम का धुंधलका
और रूत है सुहानी
धुंध सी यादों के सायें
कहे प्रेम की कहानी

याद आ गई दिल को
भूली बिसरी सी रवानी
थाम हाथ तेरा चली मैं
डगर थी ये अनजानी

तू नहीं है साथ रह गया
प्यार बन कर निशानी
गम के सागर अश्कों में
ना डुबो दें मुझको जानी

याद हर जो वजूद को कर
जाए छलनी है मिटानी
तू रहा दिलबर मेरा ही
मैं रहूँ बन तेरी ही दीवानी

यादो के धुंधलके घनेरे
अमिट भयावह है मगर
हँसते हँसते ही हमें
प्रीत की रीत है निभानी


Rohini Shailendra Negi 
"पतझड़"

ये रस्ते चले जा रहे हैं,
जाने कहाँ हताश से..?
शायद ये भी मसरूफ़ हैं,
मंज़िलों की तलाश मे |

कोई भी तो नज़र न आए,
कैसा ये अंधड़ है.........?
डरे हुये, सिमटे हुये से,
लोग सभी नदारद हैं, |

इस धुंधलके मे गुम होकर,
पथिक हजारों भटक गए,
कामनाओं और लालसाओं के,
त्रिशंकु मे लटक गए |

पतझड़ जाये तो सावन,
अपना सुंदर मुख दिखलाए,
देख कोंपलें फूटें,
बंजर ज़मीं भी अंकुर ले आए |

काश ये सूखा मंज़र हो तब्दील,
घटाएँ छा जाएँ,
हो ऐसा सौभाग्य सभी का,
मस्त बहारें लौट आयें |


अलका गुप्ता
खो गईं है राहें.. कहीं ..दूर वीरान होकर |
धुंधलका घना छा रहा है...मगरूर होकर |
राहों में खड़े हैं वृक्ष पंक्तिवद्ध वाहें फैलाए ..
दिखता नहीं पथिक कहीं कुहासों में फंसकर ||

यही तो जिन्दगी का हाल है ! हाल है या बेहाल है |
मकसद सारे खो गए हैं ..जिम्मेदारियों के बोझ हैं |
कुछ करेंगे !..या रचेंगे नया...बदल देंगे हर मोड़ को ...
कुछ ना हम कर सके..यूँ ही खोई ..बचपने कीसोंच हैं ||


Garima Kanskar 
आया पतझड़
साख से सारे
पत्तो को उड़ा
ले गया
हर एक पत्ता
डाली से जुदा
हो गया
हवा के शोर
में पत्तो का
दर्द सुनाई
पड़ रहा था
पेड तन्हा खड़े थे
सुनसान रास्तो में
उनके दर्द को बाटने
वाला दूर दूर
तक कोई था
रात का घनघोर अँधेरा
या हो सुबह का कोहरा
सब कुछ पेड़
अकेले सह रहे थे
गरिमा


Virendra Sinha Ajnabi .
वही रास्ते और वही आसमान, पर वो हमसफ़र नहीं,
उजड़ा-उजड़ा, वीराना सा है, हरा भरा वो मंज़र नहीं,
मंजिल पीछे रह गई, सामने तो धुंध है और कुछ नहीं,
क्यों न रोक लूं कदम, जब रहा मकसदे-सफर नहीं. ...

Himanshu Kharabanda 
चुप चाप सिमटती राहो को,इँतजार तुम्हारा रहता है,
दरख्तो की सूखती बाहो को,इँतजार तुम्हारा रहता है।
उदास दिखे जर्रा जर्रा, हर पहर उदासी का पहरा,
टूटे पत्तो की आहो को, इँतजार तुम्हारा रहता है।

Bahukhandi Nautiyal Rameshwari 
सर्द दिन, सन्नाटा गहन पसरा है ।
चल पथिक, पथ कितना संकरा है ।
गहन है धुंध, तू पथिक वखरा है ।
ज़र्र पत्तियाँ , तूने पग धीमे धरा है ।
जाने किसका दामन, राह में बिखरा है ।
भय क्यूँ, ये ऋतु का चौमासी नखरा है ।
बढेगा, पायेगा तभी, जहाँ हलाहल बिखरा है ...


बालकृष्ण डी ध्यानी 
खामोश इन राहों में

खामोश इन राहों में
मन और मै यूँ ही अकेला
दूर इन निगाहों से
कोहरा घटने बड़ने लगा
खामोश इन राहों में

सर्द रातों की बात है
ठिठुरन वाली आगे रात है
दो घड़ी का संधी प्रकाश
कदम बढ़ रहा अब साथ है
खामोश इन राहों में

एक राह सीधी जाती हुयी
पेड़ों की कतारों को घेरती हुयी
स्तभ ये नजारा है दो घड़ी का
बस अब अँधेरा की शुरवात है
खामोश इन राहों में

पतझड़ का वो मौसम है
बिरहा छायी ये मधुबन है
रात को तड़पे मोरा जिया
कैसी दिल मची हलचल है
खामोश इन राहों में

खामोश इन राहों में
मन और मै यूँ ही अकेला
दूर इन निगाहों से
कोहरा घटने बड़ने लगा
खामोश इन राहों में


कुसुम शर्मा 
जब तुम हम से मिले तो ऐसा लगा
मानो जीवन में बाहार आ गई
जैसे कलि खिल कर फूल बन गई
चारो ओर खुशियों की हरियाली थी
आकाश में छाई लाली थी

हम मदहोश थे तेरी आहोश में
न खबर थी दिन और रात की
चारो ओर प्यार ही प्यार का डेरा था

तुम क्या गए कि मानो जिंदगी वीरान हो गई
बहारो कि जगह ली पतझड़ ने
कलि फूल बन कर बिखर गई
चारो और छाया दुखो का कोहरा

कभी सोचते है कि तुम हमारे जीवन में न आते
न ही बाहार आती न ही पतझड़ लाती
फिर भी पतझड़ में सावन का दीदार करते है
हर घड़ी सिर्फ तेरा इंतज़ार करते है


भगवान सिंह जयाड़ा 
वो शर्दियों वाली ठिठुरती सुबह ,
वही एकांत जंगलों वाली जगह ,
बादियों में घिरा वह घुप कोहरा ,
नहीं दिखता जब किसी का चेहरा ,
वह सूरज की अठखेलियों संग ,
कभी सप्तरंगी इन्द्र धनुष के रंग ,
बचपन के वह हशीन लह्में के संग ,
इन्हीं राहों पर जब चलते थे संग ,
वो हशीन यादें कुदेरती है मुझे ,
जब इन्हीं राहों पर ढूडते थे तुझे ,
वो शर्दियों वाली ठिठुरती सुबह ,
वही एकांत जंगलों वाली जगह ,


नैनी ग्रोवर 
ये वीरान रास्तों के धुंधले-धुंधले साए,
हम भी चुपचाप से, इनमें जा समाए..

गुमसुम सी इन वादियों में, कोई नहीं,
पत्थर हुई हैं निगाहें, देखो तो , रोई नहीं,
तस्वीर कोई ख़ुशी की, मैंने भी संजोई नहीं,
बीते हुए चमकीले लम्हे, ना कोई याद दिलाए..

हम भी चुपचाप से, इनमें जा समाए..

सर्द हो गए हैं क्यूँकर, ये सारे ही जज़्बात,
ख़तम हो गए सारे किस्से, छूट गए जो हाथ,
फर्क अब पड़ता नहीं, हो गर्मी, सर्दी, या बरसात,
मौसमों के सुहानेपन, अब दिल ने दिए भुलाए ..

हम भी चुपचाप से, इनमें जा समाए...!!



प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
~आज में जीना सही~

देख दृश्य मन कुछ उदास हुआ
कल पर पडी काली छाया देखी
मन को अनेको सवाल करते पाया
लेकिन इसी तस्वीर से जबाब पाया

सावन देखा, पतझड़ देखा
फूल पत्तों को फिर जीते देखा
गिरते कटते वृक्षों को देखा
प्रकृति की मार सहते देखा

हरे भरे संसार में भी कभी
पतझड़ का मौसम आता है
रोशन हुई दुनिया में भी कभी
अन्धकार बरबस छा जाता है

जो आज है वो कल शायद न हो
जो कल था, शायद वो आज नही
जीना तो हमें आज है 'प्रतिबिम्ब'
फिर जो मिले उसमें जीना ही सही




सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Tuesday, May 7, 2013

6 अप्रैल 2013 का चित्र और भाव




अशोक राठी 
सुनो सुनो ऐ भारत वालों
राह नई बतलाता हूँ
भाई भतीजा सुना था अब तक
मामा भांजा की बतलाता हूँ
लूट सको तुम जितना लूटो
नोटों की अब रेल चली है
हिस्सा अपना लूटो तुम भी
अंधे के हाथ बटेर लगी है

दीपक अरोड़ा 
उस मंच पर क्या सुन रहे साथियों,
इस मंच से सुनो वास्तविकता बतलाता हूं
सब भ्रष्टाचारियों का बोलबाला है वहां,
यहां आपको हकीकत दिखलाता हूं
खुद भी समझो दूसरों को समझाओ
देश को इन भ्रष्टाचारियों से खोखला होने से बचाओ
इनकी ना मा है, न बहन है न भाई कोई,
पैसा ही सुबह इनकी आंखों के द्वार खोलता है
कुछ भी नहीं बोलते ये अपने मुख से कभी
पैसा ही सदा इनके मुख से बोलता है...


Neelima Sharrma 
सुनो ! सुनो! सुनो!!!

मेरे देश की बहनों
ध्यान से सुनो !!

देश में लिंग अनुपात बिगड़ रहा हैं
और व्यभिचार ज्यादा बढ़ रहा हैं
४-५ लडको पर हो रही हैं एक लड़की
भविष्य में होगी विवाह के लिय कडकी

तुम हो सूत्रधार हो सृष्टि की
तुम ही प्रजनन का आधार भी
तो अब सब तुम्हारे हाथो में है
मुह दिखाई मैं अब गहने नलो
कन्या जन्म का अधिकार लो

तुम्हारीअपनी पहली पीढ़ी ने
अपनी ही जात को बदनाम किया
बहु ने जो पोती को जन्म दिया
सास ने उसका अपमान किया
अब आयी तुम्हारी बारी हैं

कन्या भ्रूण को जन्म दो
जन्म देने वाली को मान भी
नारी हो नारी को सम्मान दो
पुरुषो को दो पैगाम भी

परिवार दिवस हैं आने वाला
परिवार अपना तुम बनाओ
बेटे बेटी का भेद मिटा कर
खुशहाल समाज तुम बनाओ .


विजय गौड़ 
मैंने तंग गलियों से,
खुले मैदानों तक,
शासन की दहलीजों से,
मंदिर के पायदानों तक,
सिसकती आवाज से,
चीख-पुकार की आवाजों तलक,
न जाने कितनी कोसिसें की,
लेकिन ये आवाज इतनी तेज ना हो पायी,
आखिर एक 'आम इंसान' ही तो था मैं,
लाखों-हज़ारों अनसुनी आवाजों में से एक,
जो फिर अपने अंजाम तक ना पहुँच पायी।
अब यूँ हि चुपचाप समय का राह नहीं देखनी,
समय को बदलना है, कसम है खाई,
जात-पात, छेत्र, धर्म से नहीं बंटूगा अब,
लड़ने को हूँ तैयार, एक नई लड़ाई।।


Himanshu Kharabanda 
खुदाया गौर से देखो बिगडता दौर कैसा है,
जमाना हो गया बहरा कि इसका ठौर कैसा है।
किसी की आह तडपन से कोई गाफिल यहाँ कोई,
जहर उगता है बगिया मैं, कि उनका बौर ऎसा है।


बालकृष्ण डी ध्यानी 
चिला-चिलाकर

चिल्ला-चिल्लाकर
गला फाड़कर तेरा यूँ चिल्लाना
महाशय कंहा से ये हुनर सीखा आपने

कंठ लंगोट
कोट बुट और सूट
सर जी कौनसी चीज पर मिल रही है अब छूट

लुट लुट कर मिली है लगता ये अब छूट
या फिर लगता है मुझको श्रीमान
इस छूट में भी छुपी है कोई बड़ी लूट

हम तो लुटे हैं कितना और लूटोगे
देख तुम्हरा तमाशा दो घड़ी रोक कर
सर जी हम भी तो यंह से अब खिसकेंगे

चिला चिलाकर
गला फाड़कर चिल्लाना
महाशय कंहा से ये हुनर सीखा आपने


Rohini Shailendra Negi
"नव-निर्माण"...
शांत खड़ी मैं देख रही थी एक लोभी का लोभ,
चीख-चीख कर सब को बुलाये देता था प्रलोभ |

उसकी शक्कर जैसी बातें रक्त-चाप को बढ़ाती,
कभी वो मुझको कभी मैं उसको कंखियों से बुलाती |

बातें बनावटी कर-कर के जाने क्या रस घोला,
जितने भी थे आस-पास उन सब का मन था डोला |

झूठी अफवाहों के पीछे "सच" बेचारा सिमट गया,
अपना कफन वो खुद पे लपेटे जा के ज़मीं से लिपट गया |

दफन हुआ गहरायी मे फिर कभी न ऊपर वो आया,
झूठ अब यारों राज कर रहा सच का तो साम्राज्य गया |

मेरी विनति है सब से क्यों हम ऐसों का साथ निभाएँ,
जो सच को पर्दे मे रखते और झूठों का मुकुट लगाए |

वापिस फिर से वही दौर हो दूर हो सारी अटकलें,
कपट, निराशा, झूठ नहीं हो हर कोई सच्ची राह चले |

आओ हम सब मिलकर प्रण लें ऐसा नव-निर्माण करें,
बस आदमी....आदमी न हो.......एक अच्छा इंसान बने |


भगवान सिंह जयाड़ा 
आवो आवो !लूट मची है लूट ,
मौका यह न जाए तुम से छूट ,
आवो इधर ,मंच सजा है यहाँ ,
देश के तारण हार बैठे हैं जहाँ ,
देश की देखो लग रही है बोली ,
लुटा रहे देश को, नियत डोली ,
जल्दी आवो ,जल्दी आजावो ,
देश रखवालों से देश बचावो ,
इन को अब सबक सिखावो ,
जनशक्ति अब इन को दिखावो ,
स्वच्छ सरकार अब है बनाना ,
दलालों को है सबक सिखाना ,
आवो आवो !लूट मची है लूट ,
मौका यह न जाए तुम से छूट ,

Govind Prasad Bahuguna 
भाइयों और बहिनों
देश प्रेम थिएटर में
आज का नाटक
"बिकवाली जारी है "
देखिये हर रोज देखिये
अपना भाव दीजिये
ईमानदारी लीजिये
यहाँ सब कुछ उपलब्ध है
जब तक जनता स्तब्ध है
स्वतंत्रता का आनंद लूटिये
उदारीकरण में यहाँ सब कुछ
बिकता है
खरीदिये सब कुछ
अस्त्र शस्त्र और निर्वस्त्र
हाव भाव और अभाव
रीती नीति और अनीति
आज बिकवाली का आखरी दिन है
क्या पता कल ये जनता जाग जाए
और बिकवाली वाले सब भाग जाएँ II

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
मैं चिल्ला चिल्ला कर थक गया हूँ
लेकिन कोई सुनने को तैयार नही है
सरकार तो बनी जनता की दुश्मन है
जनता का हित भ्रष्ट तंत्र की चढा बलि है
बार - बार जनता को यूं मरना नही है
इस बार जनता को जगाना जरुरी है
किसी बहकावे में न हमको आना है
अपनी शक्ति की पहचान करवानी है


अलका गुप्ता 
तुम यूँ ही बोलते रहो|
चीखते चिल्लाते रहो|
विरोध भ्रष्टाचार का ...
करने के अलावा कहो |
तुम करोगे क्या ?
कमाने का समय है|
जरा चुप रहो !
आओ देखो.... इधर. |
घोटालों का चढा क्या रंग है |
हर नेता कितना हुनरमंद है |
जनता देख देख दंग है |


कवि बलदाऊ गोस्वामी 
अचानक एक आवाज आई,
लगा कि
बम्ब विस्फोट हुआ।
हुआ भी वैसा,
पर आदमी नही मरे,
केवल बात मर गई है।
जिनके कान खुले हैं,
वे सुन सके हैं।
और फिर...............
बम्ब विस्फोट झेत्रफल से
क्या?
भ्रष्टनिति के मकड़जाल
से भी,
उभर गए हैं।
इन निकम्मों ने,
जिनकी होंठो पर
सर्प का विष है,
जिनका गला खुली कब्र है,
आडम्बर और झूठे वादे देकर,
आदमी को
तबाही की गर्भ में धकेलकर,
जनता पर अत्याचार कर रहे हैं।
आज रण भूमि में,
कमर कस कर
तबाही के गर्भ को नष्टकर,
भ्रष्टनीति के मकड़जाल से निकलना है।


जगदीश पांडेय 
देखों आज कैसा शोर चारो ओर हो रहा है
बदनाम ये देश अब चारों ओर हो रहा है
सुनों गौर से हिंदुस्तानी
बात न गर तुमने मानी
दोस्त बन बैठा दुश्मन
करनें को वो मनमानी
जुल्म अत्याचार क्यूँ घनघोर हो रहा है
बदनाम ये देश अब चारों ओर हो रहा है

रातें हो रही हैं अब देखो काली
डरती लडकियाँ भोली भाली
घूम रहे हैं देखो अपनें ही अब
पहन मुखौटा रिश्तों का जाली
कमजोर क्यूँ अपनों का अब डोर हो रहा है
बदनाम ये देश अब चारों ओर हो रहा है

खडा हूँ कब से अकेले मैं
झुक रही कमर अब मेरी
होनें नही दूंगा कमजोर
बुलंद आवाज ये मेरी
इंसानियत पे हैवानियत का जोर हो रहा है
बदनाम ये देश अब चारों ओर हो रहा है


नैनी ग्रोवर 
सुनो-सुनो भाई-बहनों एक पते की बात बताता हूँ,
छोड़ो सारे भेद-भाव, मैं रोज़ गला फाड़ चिल्लाता हूँ ..

अब भी ना माने तो, अंजाम इसका बड़ा बुरा होगा,
आयेगा समय तो कोई भी ना, साथ तुम्हारे खड़ा होगा,
जात-पात को देख कर, मत दो अपने कीमती वोट,
देखो पहले समझो ज़रा, नीयत में इनकी क्या है खोट,
बार-बार में दोनों हाथ जोड़ कर, बात यही दोहराता हूँ ...

छोड़ो सारे भेद-भाव, मैं रोज़ गला फाड़ चिल्लाता हूँ ..

अब तो अपने को हम सुधारें, अपने काम खुद संवारें,
चुनो उसे जो समय आये तो, काम आये तुम्हारे-हमारे,
लूट रहे जो देश हमारा, नज़र उनपे अपनी सख्त करो,
मत दो वोट अपने इनको, मत इनकी भूमिका सशक्त करो,
बना के गीत इस दर्द को मैं, तुम्हें हर रोज़ मैं सुनाता हूँ ...

छोड़ो सारे भेद-भाव, मैं रोज़ गला फाड़ चिल्लाता हूँ ....!!


अलका गुप्ता 
उफ़ .....कितना शोर है |
ये लाउड स्पीकर वाले |
हर जगह शोर ही शोर है |
सडक पर लगा जाम है |
गाड़ियों के हार्न का शोर है |
कहीं जगराता ...
कहीं शादी-बरात है |
कहीं धरना प्रदर्शन ...
कहीं नारे लगाता जलूस है |
घर में भी तो टी.वी.का शोर है |
कहीं लड़ रहा आस-पडोस है |
यह क्या कम था ...
दिवाली में धमाकों शोर ...
या फिर डिस्को या कान फोडू संगीत |
कोई तो लिमिट हो डेसिबल का |
आखिर यही तो ध्वनि प्रदुषण है |
सृष्टि के लिए ....सारी ...
हर प्राणी के लिए घातक है |
आज मन तरस रहा ...
वातावरण शांत हो |
तन-मन भी शांत हों ||


कौशल उप्रेती 
वो पूछता है मुझसे
ज़िन्दगी क्योँ इतनी अनजान सी हो गयी है ,
की हर तरफ बस
अधेरा और वीरानी सी हो गयी है
वो पूछता है मुझसे.........
क्योँ वफ़ा का बदला
वफ़ा न होकर कुछ और ही है
ज़िन्दगी नाम से ज्यादा कुछ और है
वो पूछता है मुझसे.........
क्योँ हर तरफ़ हाहाकार है
ज़माने में क्योँ हर तरफ संघार है
हर तरफ हुंकार है
वो पूछता है मुझसे.........
क्योँ हो गया है आदमी-आदमी का दुश्मन
हर जगह है नफरत
क्योँ खो गए मोहोबत
वो पूछता है मुझसे.........
की तू इतना उदास क्योँ है
ज़िन्दगी एक छुपा हुआ राज़ क्योँ है
हर समय बनवास क्योँ है
वो पूछता है मुझसे......
राम की इस दुनिया मे
क्योँ आराम नहीं मिलता
हर तरफ़ रावण है क्योँ राम नहीं मिलता
वो पूछता है मुझसे..........



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