Wednesday, February 3, 2016

२३ जनवरी २०१६ का चित्र और भाव






प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
पत्थर हो तुम ...

पत्थर हो तुम
पत्थर ही रहोगे
कल तक
जिस नदी का हिस्सा थे
वो आज
अविरल बहते बहते
किसी अनजान रास्तो से
चलकर दूर निकल गई
राह में तुमसे मुसाफिर
उन लहरों की थाप को
अपना मान चलते रहे
और आज फिर
तुम पत्थर हो गए
अब अस्तित्व तुम्हारा
केवल पत्थर ही कहलायेगा
हाँ उपहास करने
कोई बूँद या कोई लहर
तुम्हे सलहा जायेगी
अपना कह जायेगी
'प्रतिबिम्ब' बन
साथ दिख जायेगी
लेकिन फिर समय का
कालचक्र तुम्हे
पत्थर ही सिद्ध कर जाएगा ....


Kiran Srivastava 
~पत्थर दिल~


मेरी अनुनय-विनय
मान-मनुहार का
नही होता असर
क्यों बन बैठे हो
इतने निष्ठुर.....
क्यों भूला दिए
मेरीअच्छाई
मेरी सच्चाई को
मेरी सहजता
मेरी कठिनाई को.....
और कितनी उर्जा
और कितना ताप चाहिए
जिससे पिघल जाओ
तुम थोडा भी.....!!!!!


बालकृष्ण डी ध्यानी .
~देख के इन पत्थरों को~

देख के इन पत्थरों को
मेरा बिता बचपन याद आया
एक एक कर चुन कर रखते थे
वो छुपाया स्थान याद आया
देख के इन पत्थरों को ...............

जुडी हैं बहुत अनेक यादें उनसे
याद कर इन आँखों ने आंसूं का सुख पाया
उन दोस्तों को इन पत्थरों ने
फिर जोर से आवाज दे बुलाया
देख के इन पत्थरों को ...............

अब मैं भी पत्थर सा बन गया हूँ
उस में और मुझ में मैंने कोई फर्क ना पाया
वो तो सवेदना हीन है मुझको भी वो अब बना गया
भेद उस में और मुझ में अब और गहराया
देख के इन पत्थरों को ...............


भगवान सिंह जयाड़ा 
----नदी का पत्थर--
----------------------------
बन कर सेतु इन पत्थरों ने,
हर कदमों को दिया सहारा,
दल दल भरी इस मिट्टी से,
हम सब को मिला किनारा,

कास हम इन से सीख लेते,
दे सकते किसी को सहारा,
दुःख में किसी का साथ देते,
तो अहोभाग्य होता हमारा,

बेजान पड़े यह पत्थर हमको,
जीने की राह शिखा जाते है,
पानी में बह कर घिस कर भी,
कुछ न कुछ भला कर जाते है,

जीवन शंघर्ष में मिलना बिछुड़ना,
यह दुनियां का पुराना दस्तूर है,
बहते पानी में कहाँ बह जायेंगे,
न तो हमारा ना तुम्हारा कशूर है,


नैनी ग्रोवर 
---पत्थर ----

नदी किनारे पड़े,
इन पत्थरों की तरह,
काश,
जज़्बात भी पत्थर होते,
किसी की भी ठोकर से,
जो पिघल उठते हैं,
सोचती हूँ, अब छोड़ दूँ,
इन जज़्बातों में बहना,
तक़दीर से लड़ना,
रोज़ सौ सौ बार मरना,
शिकवे शिकायतें करना,
और हो जाऊँ पथ्थर,
घर के शो केस में पड़ा,
एक ऐसा पत्थर,
जिसे नदी किनारे से लाकर,
कुछ रंग लगाकर,
रख दिया गया,
शायद आज कोई,
मुझपे पड़ी धूल पोंछे,
और पूछ ले,
कैसी तो तुम ?
और मैं मुस्कुरा के कहूँ,
पत्थर के जैसी....


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Wednesday, January 13, 2016

५ जनवरी २०१६ का चित्र और भाव



प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~ हकीकत ~
कहने को तेरे शहर मैं रौनक बहुत है
मगर बदल जाती है ये तस्वीर लम्हा लम्हा
यूं तो सागर में लहर खिलवाड़ करती है
मगर साहिल संभाल लेता है नौका डरते डरते
पंछी अपनी जागीर समझ आते जाते है
मगर एक आहट डरा जाती है उन्हें उठते बैठते
ये खड़े मकान देते तो गवाही वक्त की है
मगर पता उन्हें भी इतिहास दोहराता है धीरे धीरे


किरण आर्य 
~आसमान चाहतो का~

सागर का किनारा
शाम की लालिमा
बड़ी बड़ी इमारते
थमी सी लहरों में
डोलती सी कश्ती
विचारों में मग्न
शांत सा मन
डूबता उतरता
सागर की लहरों सा
हिलोरे खाता
कभी गगनचुंबी
इमारतों से टकराता
उड़ते हुए परिंदे
बेकल मन को देख
मुस्कुराते
कानो में उसके कह जाते
सब भूल भरो एक उड़ान
हमारी तरह
और छू लो आसमां
चाहतो का अपनी





भगवान सिंह जयाड़ा 
-------जिंदगी एक कश्ती------
-----------------------------
जिंदगी भी एक डगमगाती कश्ती सी बन गई है,
साहिल के एक छोर से दूसरे छोर की दौड़ रह गई है,
शहरों को जोड़ने वाले इस कौतुहल भरे रास्तों में,
डगमगाती कश्ती और सहमें हुए दिलों की मजबूरी,
बस मंजिल को हासिल करने की तम्मना दिल में,
यह जिंदगी एक रोमांस और शंघर्ष से कुछ कम नहीं है,
रुक गए तो जिंदगी थम जायेगी चले तो मंजिल मिल जायेगी,
इस लिए कर हौसला ऐ मुसाफिर मंजिल को पाने का,
नहीं तो जिंदगी की यह दौड़ सदा के लिए रुक जायेगी




मीनाक्षी कपूर मीनू

इन्सां की भटकन
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

लम्बी ऊँची इमारतें
बाहर व् भीतर से
सजी हुयी
मगर...
इनके भीतर
बसा इंसान
कितना भिन्न है
बाहर से सजा-धजा
भीतर से खोखला है
आज के धर्म-कर्म
की तरह ,,,
नाव भी है नाविक भी
मंजिल भी
मगर ,,,,,,
कश्ती फिर भी
है फंसी ....
मंझदार में है
सबकी
उठो चलो...
ऐ मुसाफिर
जागो ..
समझ अपना
राजधर्म
समेट लो
फरेबी कर्म
कर्मठ तुम इन्सान बनो
मिल जायेगी
मंजिल ...
आडम्बर होंगे
आर-पार
मनस्वी....
तर जायेगी
नाव ...
कर लोगे तुम
भवसागर पार ...



Kiran Srivastava
"जीवन एक कश्ती"


 कोई पार जाता
कोई हार जाता
कोई है जो सागर मे
गोते लगाता...
ये जीवन की नइया
तभी पार होगी
कुशल मांझी हाथों में
पतवार होगा...
हो जीवन की कश्ती
गर मझधार में तो
दिखे ना तुम्हें जब
कोई भी किनारा
फिर भी खुदी को
बुलन्दी पे रखना...
डूबेगी ना तेरे
जीवन की नइया
अगर हौसला और
करम साथ होगा...!!!!!


प्रभा मित्तल 
~~ सागर किनारे ~~

सागर किनारे बैठकर,
मन में सुकून सा भर देतीं
किनारों से अठखेलियाँ करतीं
आती-जाती लहरों को,
दूर तलक निहारना,
मुझे अच्छा लगता है।

पानी पर भागती कश्तियाँ
डेरा डाले जहाज
अट्टहास करती तरंगें
यहाँ - वहाँ इतराते
डुबकियाँ लगाते जलचर
आसमान छूने की कोशिश में
ऊँचे से ऊँचा उड़ते नभचर।

घंटों देखती पर जी नहीं भरता
जिस दिन न जा पाती तो
ड्रॉइंग रुम की खिड़की से
बाहर ताकती रहती
कब दिन गुजर जाता
पता ही नहीं चलता ।

देखते ही देखते अब
युग बदल गया है
गगनचुम्बी इमारतें
समुद्र को बाँधने की
नाकाम कोशिश में
जलधारा से बातें करतीं हैं।

इस पार जीवन बसता है
उस पार रोटी की तलाश।
मन में अपार भटकन है
जो कल था वो बीत गया
आज यहाँ सब सम्भव है

क्षितिज पाने की चाह में
गगन से बातें करने को
हर प्राणी सुबह - शाम
नौकाओं का सम्बल ले
पानी पर सफर करता है।

ये हर दिन का खेला है
प्रगतिवाद का मेला है
गुमसुम सा हर आदमी
भीड़ में भी आज अकेला है।



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Sunday, January 3, 2016

९ दिसम्बर २०१५ का चित्र और भाव




प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
आखिर कब तक ?

एक स्वपन देखा था
मित्र और सृजन
हिन्दी का प्रतीक बने
बस एक प्रयास भर था
शुरुआत अच्छी थी
सहयोग भावो का
निरंतर मिलता गया
लेकिन शायद
प्रतिभा अब चमक उठी
नाम कहीं और मिलने लगा
सम्मान की अपेक्षा
स्वार्थ पूर्ण होने की
घोषणा करता चला गया
और फिर
समय एक बहाना बन गया
समूह दम तोड़ता
लेकिन फिर जी उठता
क्योंकि एक दो सदस्य
समर्पित है भावो के साथ
कितने प्रतिभाशाली
न अहम् न समय की सीमा
उनके सहयोग समर्पण की
साँसों के साथ चलता समूह
पर आखिर कब तक ????
अब निर्णय उनको ही लेना है
कब तक साथ चलना है
इंतजार मुझे भी है



भगवान सिंह जयाड़ा 
-----मन का द्वन्द हाँ या ना ----
--------------------
हाँ या ना की उलझन में फंस कर रहा गया ,
निर्णय की कशोटी पर सदा पिछड़ सा गया ,
अजीबोगरीब एक उलझन मन में बन गई ,
हाँ कहूं कि ना कहूं दिल में बात फंस गई ,

जज्ज्बात में बुराई का साथ नहीं देता ,
कड़वी सच्चाई का कोई यहाँ साथ नहीं देता ,
है कुछ चाहनें वाले अपने अभी भी यहाँ ,
बरना हौसला कुछ कहने का कभी ना होता ,

इस लिए कर लो पक्का दिल को अपना ,
हाँ या ना में मत उलझावो अब अपना सपना ,
अब मन का द्वन्द मिटा के करो सही फैसला,
जगावो अपने मन में एक नयाँ जीवंत हौसला,



डॉली अग्रवाल 
मन की पीड़ा -- हां ना घूमती ज़िन्दगी

ये लो आज वो फिर पिट गयी
रोटी शायद कहि से जल गयी
मार खा दूसरी रोटी बना लाई
सात फेरे लिए थे , आज चक्कर में आ गयी
वो उसकी पत्नी थी
शायद सारे धर्म उसके हिस्से आ गए थे
सुबह की मार ,रात का दुलार
ये सोच वो जीती रही
अब कहाँ जाउंगी
अकेली नहीं रह पाउंगी
इस तनहा सी ज़िन्दगी के
कितने दावेदार हो जायँगे
घर की दहलीज पार की तो
जाने कितने मर्द खड़े हो जायँगे
ये सोच जीती चली गयी
कल की लक्षमी आज कामवाली हो गयी
रात का मनुहार , सुबह की गालियां हो गयी
लड़की शायद इसलिए ही आज भारी हो गयी !!



मीनाक्षी कपूर मीनू 
"शायद हाँ ,शायद नहीं"
*************
ओह ...
क्यों होता है ऐसा
उसके साथ ही
लोगो की भीड़
से घिरी वह
लेकिन लगता है
अकेली है
समझ सकेगा
कोई उसको कभी
शायद हाँ
शायद नहीं ....
भरी आँखों से
हंस रही है वह
दुनिया को धोखा
दे रही है
खुद को
गुमराह करके
दूसरों को राह
दिखा रही है
लेकिन कब तक
आखिर कब तक
इस तरह जी
सकेगी वह
अपने आंसू पी
सकेगी वह
आखिर वह भी
इन्सां है
उसमें भी जां है
अपनी उदासी को
अपना साथी
बना कर
कब तक जी
सकेगी वह
कब तक
आखिर कब तक
मनस्वी ...
जी सकेगी भी
या नहीं
शायद हाँ
शायद नहीं ......

Kiran Srivastava
 "दुविधा"

क्या करुं क्या ना करुं
जीवन कैसे निर्वाह करुं...?
दुविधाएं अंबार यहां पर
हां ना पर है जोर कहां पर
मन पे हावी दिल होता है
दिल पे हावी है दिमाग...
मानव हर पल ही भटका
हां ना में अटका रहता
जब निर्णय ले भी लेता
फिर भी चैन सदा खोता
लाभ-हानि का खटका रहता
मन उसमें ही अटका रहता
फिर भी निर्णय तो लेना है
जीवन में आगे बढना है...!!!!!


प्रभा मित्तल
~~कैसे कह दूँ ..हाँ या ना~~
~~~~~~~~~~~~~~~~
कभी लगता है .. हाँ है,
कभी लगता है..नहीं है,
झाँक रही है ज़िन्दगी
टिमटिमाती आँखों से
आस की डोर से बँधी
'हाँ' और 'ना' के बीच
एक पेंडुलम की तरह।

पल छिन महीने बीत रहे हैं
जूझ रहे हैं नियति से,
और हँस रहे हैं हम
अपनी ही तक़दीर पर।
काट रहे हैं
वक़्त की ही लकीर को
वक़्त की धार पर चलकर।

ताकि कुछ वक़्त पा सकूँ
सुकून से अपने सुकून का
आ सकूँ यहाँ
गुज़ारने एक पल वक़्त का
फिर तुम ही बता दो
मैं कैसे कह दूँ ..हाँ' या 'ना'।

कैसे बह जाने दूँ
समय की धार में यूँ ही,
सहेज कर रखा था जो
बीता एक जमाना,
नहीं भूलेगा इस सृजन का
रचा वो इतिहास पुराना।

साँस जब तक है
आस भी बाकी है
उम्मीद नहीं छोड़ी है
लौट आने की चाह में
विश्वास अभी बाकी है।

'ना' की कोई गुँजाइश नहीं,
बस साथ बनाए रखना तुम
'हाँ' हम फिर आएँगे।
इन तस्वीरों में प्राण फूँकने
हम फिर फिर आएँगे।



किरण आर्य 
तय है चलना

कभी हो जाते हालात कुछ ऐसे
की चाहते चढ़ जाती है बलि
कर्मों की
जिन्दगी कर्म प्रधान ही तो है न
कर्मों के चक्र से बंधी
दौडती निरंतर जिन्दगी
और उसके साथ हम भी
ये दौड़ अनवरत् अंधी सी
सघन गलियारों से गुजरती
सुबह से रात तक
नजरिये अलग अलग
कर जाते खड़ा आसानी से
कटघरे में
मूक मौन मन बेबसी पर अपनी
मुस्कुराता फीकी सी हंसी
लेकिन साथ चलने का जज्बा
हाँ और न से परे
तय है चलना साथ थाम हाथ
भ्रम भ्रांतियों से परे
मौका अवसर और विश्वास जरा सा
और कदम होंगे साथ
थमें भी और बढ़ते हुए भी
इंतज़ार के साथ आस का दीप
रहे ज्वलंत
बस ये है दुआ और आशा भी


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Friday, November 20, 2015

१२ नवम्बर २०१५ का चित्र और भाव

इस बार चित्र पर आप को दो भाव लिखने है शीर्षक बेसक एक हो - एक सकारत्मक और एक नकारात्मक 
- कम से कम ६ पंक्तियाँ अवश्य होनी चाहिए हर भाव में

Kiran Srivastava 
"दांव"
(1)

ये जीवन भी
दांव खेलती है,
कभी हम खुद से
हार जाते हैं....
कभी जिंदगी
जीतने नहीं देती
लेकिन अपनों से हार
कभी-कभी
जीत से भी ज्यादा
खुशी दे जाती है
और हम हार कर भी
जीत जातें हैं....!!!

(2)

जोश में होश
ना खो जाये
न लगाओ
दांव पे दांव...
निकल ना जाये
चादर से पांव
ऐसा न हो
ज्यादा की चाह में
जीवन बद् से
बद्तर हो जाये...!!!


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ..... 
1.
~ये तो है ~.

जिन्दगी मुस्कराई
जब तुम आई
पल पल में खुशबू
अंग अंग में छाई

प्रेम आकर्षण
तन मन की खुशी
डेरा डाले बैठी रही
रोज सहलाती रही

जीवन समर्पण सा ख्याल
उत्तर देता हुआ हर सवाल
चाहत - संग 'प्रतिबिंब' सा
मिलन - ख्वाबो का हकीकत सा

2.
~वक्त हँसने लगा ~

लम्बी लम्बी बाते
लेकिन छोटी चाहत सी
पल केवल मिलन के
ख्वाइश उन्हें समेटने की

अचानक पल छूटने लगे
चाहत शब्द बन दूर जाने लगी
साथ केवल शब्दों का
भाव अब दूरी बयां करने लगे

पल वक्त की दुहाई देने लगे
एहसास मेरे सवाल बनने लगे
समय कही और बीतने लगा
वक्त मुझ पर फिर हंसने लगा



नैनी ग्रोवर
1.
 --दाँव--
कभी धुप कभी छाँव है,
यही तो जीवन का दाँव है,

कभी हार में भी जीत है,
कभी जीत में भी हार है,
फूलों का बिछोना कभी मिले,
कभी धुप में जलते पाँव हैं,
यही तो जीवन का दाँव है...

मुस्कुरा के स्वीकार करो हर क्षण,
करेगा परमात्मा स्वयं रक्षण,
विश्वास का दामन ना छूटे कभी,
अगले मोड़ पे ही तेरा गाँव है,
यही तो जीवन का दाँव है ..!!

2.

 ---दाँव---
मौज और मस्ती है हर घड़ी,
कल क्या होगा, किसको पड़ी,
ना घर और ना परिवार कुछ है,
बस दो दिन की बहार सबकुछ है,
महफ़िलों में लगाओ, पैसों की झड़ी,
कल क्या होगा, किसको पड़ी...

डुबो दो आज ही, जो कुछ है कमाया,
कल का क्या पता, आया ना आया,
ऐंठ के लगाओ तुम दाँव पे दाँव,
क्या हुआ अगर भूखा मरता है कोई गाँव,
तुम जलाओ, हसीन सपनों की फुलझड़ी,
कल क्या होगा, किसको पड़ी..!!

बालकृष्ण डी ध्यानी
की हो जाये बंटाधार

पास फेल की ये जिंदगी है
ले तू सब नकद या उधार
की हो जाये बंटाधार .... २

यंहा किसी का कोई नहीं
ना कोई रंक ना कोई साहूकार
की हो जाये बंटाधार .... २

पढाई भी इस पर निर्भर है
चाहे उल्लू हो या होशियार
की हो जाये बंटाधार .... २

सुख दुःख की बंधी लड़ी
दुःख छड़ी जिसको ये पड़ी है
की हो जाये बंटाधार .... २

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Tuesday, November 10, 2015

४ नवम्बर २०१५ का चित्र और भाव




नैनी ग्रोवर 
--इंतज़ार--

अंधेरों में बैठे, इंतज़ार कर रहे हैं हम रौशनी का,
कब निकलेगा सुनहरा चाँद, कब देखेंगे मुँह चांदनी का..

ग़ुम हो गए सारे नज़ारे, गुमसुम हुई बहारें,
खो गए जाने कहाँ, अम्बर से तारे प्यारे प्यारे,
लगता है जैसे टूट गया सुर, कोई रागिनी का..

खिलवाड़ किया कुदरत से हमने, अंजाम यही होगा,
डूब जायेगी अँधेरे में दुनियाँ, सच मान यही होगा,
कुछ तो कर लो मान, इस धरती जग जननी का..!!


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
~भीड़~

आज एक भीड़ में खड़े है सब
देख रहे, माहौल बदलेगा कब
कोई रोशनी के लिए जले जब
चेहरा शायद सबका दिखे तब

वैसे भीड़ किसी की होती नही
आज तेरी कल मेरी सोच यही
मानवता सम्मान खोये है कही
अपना कृत्य, केवल लगता सही

भीतर की ज्वाला अभी शांत है
हर कोई, यहाँ असमंजस में है
दूजे को देख 'प्रतिबिंब' सोचते है
मुझे छोड़, यहाँ सब मजे में है


Kiran Srivastava 
" अंधकार "

किंकर्तव्य विमूढ क्यूँ बैठे हैं
ये अंधकार तो है क्षणिक
असली अंधियारी है अंदर
जिससे नही लगे जग सुंदर
मिटा सको तो इसे मिटाओ
एक ज्ञान का दीप जलाओ....

भ्रष्टाचार फैला चहुँओर
त्राहि -त्राहि मची है जोर
क्या महिला क्या बच्चियाँ
उड. रही हैं धज्जियां
खुद समझो सबको समझाओ
एक ज्ञान का दीप जलाओ....

अंदर बाहर सब काला है
नियत में गडबड झाला है
चेहरे पर चेहरा हैँ लगाये
जिसकोकोई समझ न पाये
मिलकर इनकोसबक सिखाओ
एक ज्ञान का दीप जलाओ....!


बाल कृष्ण ध्यानी 
~अँधेरे में ~

अँधेरे में अंधेरों से
अँधेरे चेहरे जब मिले
अंधेर बस अँधेरे ये

बंद तस्वीर
बंद लकीरों से मिले
तब बंद कमरों का खेल चले

मूक हैं अपने से
मूक वो सपने से
ना जाने मन क्या पले

कैसा सन्नाट है
कैसा पल उभर आया है
विचलित ही सब को पाया है

अँधेरे ये .....................



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Sunday, November 1, 2015

२५ अक्तूबर २०१५ का चित्र और भाव





प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~एक रिश्ता ~

सजाया था एहसासों से
बनाया था जिसे हमने अपने शब्द भावो से
एक रिश्ता अपना सा
आज वक्त के साथ बेगाना सा लगने लगा

दरवाज़ा बंद कर लिया अब
दिल का वो कमरा खंडहर नज़र आता है
एक हिस्सा बाकी है अभी
जो टूट कर मिट्टी में मिलना चाहता है

मुड़ कर देखा था उसने
तसल्ली आँखों से करना चाहते है वो
कुछ छूटा तो नहीं 'प्रतिबिंब'
लौटने का हर निशां मिटाना चाहते है वो

Kiran Srivastava 
" यादें"
-----------------
मिटते धरोहर
दरकती दिवारे
लगे मुझको ऐसे
हमें वो पुकारे
सिसकते हैं आंगन
और रोते चौबारे
आहत होती हूँ
जब मुड कर दखतीं हूँ.....

याद आती है
बचपन की शरारते
बाबा का प्यार
मां का दुलार
बच्चों की टोली
वो मीठी वाली गोली
सपनों में खो जातीं हूँ
जब मुडकर देखतीं हूँ.....

ऐशो आराम का जीवन
भागती जिंदगी
दौडते लोग
आगे जानें की होड
रिश्तों में जोड
नजरें चुराते लोग
वहुत दु:खी होतीं हूँ
जब मुड कर देखतीं हूँ.....


प्रभा मित्तल 
~~अतीत के पन्ने~~
आज फिर यूँ ही अतीत के
बंद वो पन्ने पलट रही हूँ,
ढाई अक्षर जिए थे जिनमेंं
यहीं से था शुरु उम्र का रास्ता
मिलीं ज़िंदगी की सदायें नई।

कितना कुछ पाया जीवन में
ना जाने कब कहाँ खो गया
अपने भी सिमट गए अपने में
आस-पास रह गई मेरी तनहाई।

सुन्दर सा सलोना सपना मेरा
नयनों के कोरों से बह निकला
जो रह - रह कर मेरी आँखों में
खेल रहा था छुपम - छुपाई।

मन के सन्नाटे में घिर-घिर
आज फिर वो यादें याद आईं
भूली हुई, वादों की नाकामियाँ
कितने अनकहे दर्द समेट लाई।

मुड़कर फिर-फिर देखा तुमको
उस भीड़ भरी महफिल में मैंने,
डग भरते आगे निकल गए तुम
मैं पीछे संग लिए अपनी तनहाई।

चाहने को तो बहुत कुछ था,मगर
माँगूं भी क्या, अब ढल रही शाम
अख्तियार नहीं मेरी साँसों पर,
तुमसे जो मिला, सौगात हो गई।


भगवान सिंह जयाड़ा
-खामोशी--
------------------
दरो दिवार की खामोशियों को देख ,
आज मैं भी स्तब्ध खामोश हो गई,
बस कुछ धुंदली सी यादों के सहारे,
जिंदगी के जख्मों का दर्द सह गई,

घूरती रह गई हर खामोश कोनों को,
कहीँ तो कुछ उम्मीद की लौ मिले ,
बीते हुए उन लम्हों की यादों का,
दिल में आज फिर एक फूल खिले,

इंतजार आज भी किसी के आने का
खामोश हर राह को ताकती रहती हूँ
मिल जाये आशा की एक किरण ,
तन्हाइयों में सदा जागती रहती हूँ,
--------------------




ज्योति डंगवाल 
-----गाँव की अभिलाषा---

मैं खोजती खुदको
गुम कही अतीत के पैमाने में
हो रहा खंडहर
ये दर ओ दीवार

मन में करवट बदलता
एक अहसास है
गूंजी थी वो पहली किलकारी
तेरी मेरे ही मुहाने पे
यूँ खंडहर मेरे जिस्म को
क्यों चला तू छोड़ वीराने पे

वो नीम आम की डाली
वो चम्पा चमेली गुलाबों की क्यारी
बीते लम्हों की लौटा दो
मुझे सौगात न्यारी

मेरे आँगन का कलरव
वो खोयी सी रंगत
बूढ़े छतनार की जवानी
अपनी आँखों का पानी

मैं सुखद दिनों की आशा
अडिग आज भी
होके जर्जर संभलती हूँ
लिए जी रही हूँ एक अभिलाषा

एक दिन प्रिय तुम आओगे
मुझे सम्भाल सँवार
तीज होली गीत तुम गाओगे
डूबता मेरा अस्तित्व
तुम बचाओगे



Pushpa Tripathi
~वादों वाली बात~

वक्त के बदलते रिश्तें
अब तो अलसाया लगे
रेत में पानी का हिस्सा
अब तो बेगाना लगे !

सिसकते बूंदों की गठरी
दिल पर बोझ उठाते है
बीते दिनों की याद तो
अब कहर सा लगे !

क्यूँ वादो वाली बात
पीछे मुड़कर देखती है
जो कुछ अपना नही
अब वो अपना सा लगे !


कुसुम शर्मा 
विरह
-------
दूर कही गाँव मे बैठी
आज भी राह निहार रही
न जाने विरह अग्न मे
कितने अंशु बहा रही

हर पल हर क्षण वह ये सोचे
अब तो मिलन की बेला है
लेकिन वह ये क्या जाने
विरह ही उसकी जीवन बेला है

वादा करके भूल गया वो
बीच राह मे छोड़ गया वो
उसकी दिल मे आस लगाये
बैठी है वो राह निहारे

निंदा आँखो की छूट चुकी है
हँसना अब वो भूल चुकी है
प्रिया की आस लगाये दिल मे
दुनिया को वो भूल चुकी है !!





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Saturday, October 24, 2015

६ अक्तूबर २०१५ का चित्र और भाव



प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~सही निर्णय ~

रुका तो है पथ
लेकिन
रास्ता कोई न कोई
निकल ही आएगा

जीवन एक संग्राम
लड़ना तो होगा ही
संही समय पर
रास्ता
दाए या बाए
पीछे या सामने
नज़र आ ही जाएगा.

भय, हार से
कोई न जीत पाया है
रुकने से कब
कदम बढ़ते है
जोश उत्साह, हौसला
और विश्वास
को अपनाना होगा
सही निर्णय लेना होगा


नैनी ग्रोवर 
--राहें--

राहें नहीं चलतीं कभी,
जीवन चलता है,
कभी विश्वास कभी अविश्वास में लिप्त,
जाने कितने सपनो को संजोये,
जीवन चलता है..

स्वयं ही मुड़ जाता है,
जहाँ चाहता है मन,
और दोष मढ़ कर,
मूक बेचारी राहों पे,
जीवन चलता है...

मिलने की ललक,
वियोग का दुःख,
उकताए हुए से चेहरों का,
बोझ डाल कर इन राहों पे,
जीवन चलता है...!!


Kiran Srivastava
"अवरोध"

रूकना नही जीवन में हमको
आगे बढते जाना है.....

राह अगर रूक भी जाये तो
आगे ना बढ भी पाये तो
मन में ये संकल्प करो
नहीं ठहरना है हमको
दुजा राह अपनाना है
आगे बढते जाना है.....

रुक जाये वो राही कैसा
थम जाये वो जीवन कैसा
मानेगे ना हार कभी हम
आगे बढते ही जायेगे
कोई ना हो राह अगर
खुद ही राह बनाना है
आगे बढते जाना है.....

जब तक मंजिल नहीं मिले
तब तक चैन नहीं लेगे
राह में आये चट्टाने
या आये कोई तुफान
करेगे डटकर सामना
उससे ना घबरायेगे
आगे बढते जायेगे.....


बालकृष्ण डी ध्यानी 
~कुछ करने से पहले सोच ले~

कुछ करने से पहले सोच ले
रास्ता अपना राही खुद से खोज ले

कोई नहीं खड़ा तेरा इन राहों में
अपने आप से पहले तो ये बोल दे

हर कोई रोकना टोकना तुझे चाहेगा
बस अपनी मन की आँखें तू खोल दे

मंजिल तेरी होगी खड़ी यंहा वहां
उस राह में एक पहला कदम धर दे

आएंगे जायेंगे कितना चिन्ह यंहा
उन पर अपनी सोच की मोहर ठोक दे

कुछ करने से पहले सोच ले
रास्ता राही अपना खुद से खोज ले


अलका गुप्ता 
~~~~~कदम बढ़ाने से पहले~~~~

रहें न राहें मुश्किल.. देखते चलो निशान |
कदम बढ़ाने से पहले..कर लो इत्मीनान ||

अनुभव पुराना आता है सबके बहुत काम |
चांहें हों पदचिन्ह...हो चाहें..तीर कमान ||

निरंतर बढ़ते जाना, है जीवन की पहचान |
बढ़े-चलो बढ़े-चलो ,छोड़ो न..अपनी आन ||

सोचो समझो बुद्धी का..करो हमेशा स्तेमाल |
खोल के रखना है..हमे तो.अपने आँख-कान ||

एक हो जज्वा ..और ह्रदय में ..पाने का अरमान |
हो अगर हौसला मन में..मंजिल पाना है आसान ||


ज्योति डंगवाल 
~~~ कदम रुके क्यों हैं ~~~~

रुके कदम क्यों है...रात काली ही सही
हौसले के चराग तो जला क्या उजाला नहीं

मंजिल तो रहेगी हाँ रहेगी वहीँ
कदमों को मत रोकियेगा कभी

अधीर बावड़ी होती है नहीं
प्यासे को ही जुगत करनी है सभी

मुमकिन है राह भटकाव होगा कभी
राही न रोकना कदम अपने कभी

ले पहाड़ों से इरादे अपने सभी
मंजिल तेरी बाट जोहती खड़ी

विजय पताका लहराती हुयी
तेरे हौसले को दाद दिलाती हुयी...

कुसुम शर्मा 
राह कठिन है
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माना कि राह कठिन है
चलना ही तो बस प्रण है

जिन्दगी की डगर मे
कुछ ऐसे ही तो पल है
न हार तु इस डगर से
मुश्किल के इस पल से
कर ले निश्चय अगर
राह को तू पायेगा
फिर भला तुझे कौन रोक पायेगा

विश्वास अटल जो तेरा
मंज़िल को तू पायेगा
बढ़ते क़दम के आगे
तू सबको झुका पायेगा

कठिनाइयों को सह कर
हौसला बुलन्द कर
सही ग़लत को भेद कर
लक्ष्य का निश्चय कर
बस चला चल
बस चला चल

मंज़िल हो जब पास तेरे
न देखना पलट कर
बस चला चल
बस चला चल !!



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