Saturday, September 24, 2016

#तकब१२ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता तकब 12




#तकब१२ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता #12]
मित्रो लीजिये अगली प्रतियोगिता आपके सम्मुख है. नियम निम्नलिखित है 
१. दिए गए चित्रों में सामंजस्य के साथ कम से कम १० पंक्तियों की काव्य रचना शीर्षक 
सहित होनी अनिवार्य है [ हर प्रतियोगी को एक ही रचना लिखने की अनुमति है]. 
- यह हिन्दी को समर्पित मंच है तो हिन्दी के शब्दों का ही प्रयोग करिए जहाँ तक संभव हो. चयन में इसे महत्व दिया जाएगा.
[एक निवेदन- टाइपिंग के कारण शब्द गलत न पोस्ट हों यह ध्यान रखिये. अपनी रचना को पोस्ट करने से पहले एक दो बार अवश्य पढ़े]
२. रचना के अंत में कम से कम दो पंक्तियाँ लिखनी है जिसमे आपने रचना में उदृत भाव के विषय में सोच को स्थान देना है.
३. प्रतियोगिता में आपके भाव अपने और नए होने चाहिए.
४. प्रतियोगिता २२ सितम्बर २०१६ की रात्रि को समाप्त होगी.
५. अन्य रचनाओं को पसंद कीजिये, कोई अन्य बात न लिखी जाए, हाँ कोई शंका/प्रश्न हो तो लिखिए जिसे समाधान होते ही हटा लीजियेगा.
६. आपकी रचित रचना को कहीं सांझा न कीजिये जब तक प्रतियोगिता समाप्त न हो या उसकी विद्धिवत घोषणा न हो तथा ब्लॉग में प्रकशित न हो.
विशेष : यह समूह सभी सदस्य हेतू है और जो निर्णायक दल के सदस्य है वे भी इस प्रतियोगिता में शामिल है हाँ वे अपनी रचना को नही चुन सकते लेकिन अन्य सदस्य चुन सकते है. सभी का चयन गोपनीय ही होगा जब तक एडमिन विजेता की घोषणा न कर ले.
निर्णायक मंडल के लिए :
1. अब एडमिन प्रतियोगिता से बाहर है, वे रचनाये लिख सकते है. लेकिन उन्हें चयन हेतु न शामिल किया जाए.
2. कृपया अशुद्धियों को नज़र अंदाज न किया जाए।
धन्यवाद !
इस बार की विजेता है सुश्री वीणा ब्रहमाणी जी - शुभकामनायें 
राज मालपाणी ..
{राष्ट्र भाषा हिंदी}

हिंदी भारतवर्ष में ,पाई है मातु सम मान
यही हमारी अस्मिता और यही है पहचान
[ इसे पढ़ा था और इसके आधार पर कविता को सजाया ]

हिन्दी भाषा कितनी सुन्दर, है ये कितनी आसान
हिन्द देश की हिन्दी संस्कृति, है ये सबसे महान

हिन्दी राष्ट्र की अस्मिता , हिन्दी वतन की आन
हिन्दी सरस, सुधारस, है अशक्त तन में प्रान

हिन्दी सूत, सखी, श्याम-सी, है इसका वरदान
चीर-भारती,चक्षु सूर, एकता की अखण्ड कमान

हिंदी को कबीरा ने अपनाया, दिया मीराबाई ने मान
आज़ादी के शहीदों ने, दिया इस हिन्दी को सम्मान

हिन्दी चरित्र है भारत का, नैतिकता की है परिभाषा
हिन्दी सबका स्वाभिमान, यही सबकी है अभिलाषा

अंग्रेज़ी सभी के पास थी , थी मेरे पास हिंदी
जिसके पास जो थी, उसने उसी में लिख दी

___________" जय हिंद - जय हिंदी "____________




ब्रह्माणी वीणा हिन्दी साहित्यकार 

देव नागरी हिन्दी मातृ भाषा

देव सुता, कवि -मानस- हंसिनि ,लोकहुं लोक लुभावत हिंदी /
मातु समान महान सुजानहि , मोद प्रमोद लुटावत हिंदी /
मोहन की मुरली सम लागति ,गान सुगान सुनावत हिंदी /
सूर कबीर यथा रसखानहुॅ ,छंद कवित्त सिखावत हिंदी //
*************************
आखर- आखर कंचन जैसन ,लेख सुलेख रचावत हिंदी /
मातु पिता सम लागति प्रेमिल ,नेह -सुधा बरसावत हिंदी /
देशज भाषहि नेक अनेकहि,देवन -नागरि भावत हिंदी /
भारत में महिमा गरिमा अति, देश विदेशन छावत हिंदी //
*************************

संदर्भ चित्र संदेश 
===========
मेरा भाव हिन्दी दिवस पर ,,,हिन्दी की महिमा पर केंद्रित है वो माँ के समान प्यारी है अपनी मातृभाषा की लिपि माध्यम अक्षर= क ख ग सोने के समान मूल्यवान है जय हो हिन्दी,,,



नैनी ग्रोवर 
~मुझे जब हिंदी मिली~

चली जा रही थी मैं,
अपने में गुम,
बिन किसी उद्देश्य के..
जाने कैसी भटकन थी,
स्वयं भी समझ ना पाई,
टूटे-फूटे भावों को,
जोड़ने की अभिलाषा,
परन्तु छोड़ ना पाई..
टूकड़े-टुकड़े जोड़,
मैं भाव सजाने लगी,
फिर भी,
एक मरुथल सी प्यास,
मुझमे समाने लगी..
भावों से दूर,
मैं स्वयं को खड़ा पाती थी,
जब शब्दों की कमी,
मुझको सताती थी..
मझधार में डूबी-डूबी,
कलम लग रही थी,
कागज की आँखों में भी,
नमी लग रही थी...
सौतेली सी लगती थीं,
लिखी हुईं लकीरें,
जैसे बेरंग सी,
बना दीं मैंने तस्वीरें..
एक दिन सह्रदय मित्र ने,
"हिंदी" से परिचय करवाया,
भावों और शब्दों का,
तालमेल समझाया..
आने लगा समझ उद्देश्य,
कलम भी रंग में आई,
भावों ने भी जागकर,
खूब ली अंगड़ाई..
धन्यवाद प्रतिबिम्ब जी,
आपको कोटि-कोटि मेरा,
अब कोरे कागज़ पे लिखूंगी,
मैं रोज़ नया सवेरा..
हिंदी है पहचान हमारी,
हिंदी ही है ज्ञान,
हिंदी से ही जुड़े हैं हमसब,
जय हिंदी, जय-हिंदुस्तान...!!



टिप्पणी: हिंदी ने मुझे मेरी पहचान दी, शत शत नमन मेरी मातृ भाषा को..



अलका गुप्ता 
~~हिंदीगर्व हमारा ~~


मातृ-भाषा...हमारी...तुम्हारी...हिंदी |
शर्मिंदा..नहीं...है...आज हमारी..हिंदी |
समझ रहा विश्व ध्वनि विज्ञान अवतरित ये...
देवनागरी...संस्कारित...प्यारी....हिंदी ||

स्वाभिमान है आत्म ज्ञान हिंदी गर्व हमारा |
हिंदी..हैं .हम वतन...हिन्दुस्तान रव हमारा }
जन-जन की भाषा समझें वह हर भाव हमारा |
गुंजित है...ज्ञान-विज्ञान..संस्कार..पर्व हमारा ||

व्यर्थ गाते गीत हम क्यूँ विवश विप्र गुलामो के आगे |
तन मन बसे गुलामी..तोड़ न पाएँ ये..बंधन के..धागे |
ये सावन के अंधे..हैं..असली हरियाली को क्या जाने...
सिखे सिखाए श्वान हैं जो कम हियर..गो देयर पे भागे ||



नोट-जबकि हम और समस्त विश्व यह समझ चुका है कि हिंदी हर प्रकार से एक सुगम्य ग्राह्य और वैज्ञानिक भाषा है जिसकी अति प्राचीन देवनागरी लिपि है ... जिस पर हमें गर्व होना चाहिए ..पर अपनी ही मातृभूमी पर हिंदी का प्रचार प्रसार करना पड़ रहा है ...यह गुलाम मानसिकता में जकड़े लोग दुसरो की भाषा पर अपने को अभिजात्य समझ रहे हैं |


गोपेश दशोरा 
~अपनी हिन्दी~

भारत माँ के भाल की बिन्दी
कितनी प्यारी अपनी हिन्दी,
कितना प्यारा लगता है जब,
कोई अपना बोले हिन्दी।
हिन्दु, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई,
जैन, पारसी या हो सिन्धी
धर्म कर्म सब अलग है सबके,
पर सब में एका करती हिन्दी।
छोटे- बड़े का भेद है इसमें,
है कितनी व्यवहारिक हिन्दी।
है अनेको भाषा जग में,
सबसे मीठी लगती हिन्दी।
रोला, छप्पय, कवित्त, सोरठा,
छन्दो से इठलाई हिन्दी।
उपमा, यमक, अनुप्रास, उत्प्रेक्षा
अलंकारों से शरमाई हिन्दी
मात्र भाषा इसे ना समझो,
ईष्वर का वरदान है हिन्दी।
गर्व करों महसूस सभी तब,
जब-जब मुख से निकले हिन्दी।

टिप्पणीः हमारी मातृभाषा जो आज मात्र भाषा बन कर रह गयी है। लेकिन वास्तव में हिन्दी जैसी कोई भाषा नहीं है। और यह बात आज की नई पीढ़ी को समझनी होगी।


किरण श्रीवास्तव 
( मैं हिन्दी हूँ)
===================

नहीं केवल एकभाषा हूँ,
मैं देश की परिभाषा हूँ।
सबने मुझको मान दिया,
मातृभाषा का सम्मान दिया ...।

मुझमें ही तो संत बसे हैं,
कबीर रहीम और पंत बसे हैं।
आभार सभी कृतिकारों का,
भारत के राज दुलारों का ।

वर्चस्व हमेशा बना रहे,
कोशिश तुम करतेही रहना।
चहुंओर उपयोग रहे अपना,
एक राष्ट्र बनाना तुम ऐसा ।

मुझसे ही पहचान तुम्हारा,
मुझपर ये एहसान तुम्हारा ।
औरों को भी मान मिले ,
ऐसा हो कर्तव्य तुम्हारा ।

भारत का मैं हूँ गहना ,
सुख- दु:ख भी है ,मुझको सहना ।
फिर भी माथे की बिंदी हूँ,
हां मैं ही तो हिन्दी हूं...!!!!

===================
टिप्पणी--
हिंदी हमारी मातृभाषा है,श्रेष्ठ है फिर भी इसका उपयोग अन्य क्षेत्रों में कम है।आज विदेशी भाषा का बोलबाला है । वैसे हर भाषा का अपना अलग महत्व है।जानकारी होना जरूरी है, लेकिन अपनी मां तो आखिर अपनी ही मां होती है।इसके महत्व को जानें, इसे दिल से स्वीकार करे । इसके विकास में अग्रसर रहें।चहुंओर प्रयोग हो इसका । ताकि गर्व से कह सके हम हिंदी हैं हम हिन्दूस्तानी हैं.....।



प्रभा मित्तल
~~~हिन्दी मेरी पहचान~~~

हिन्दी मेरी भाषा है
हिन्दी मेरा मान है
हिन्द वतन है मेरा
हिन्दी ही पहचान है।

मेरी माता है हिन्दी,सो
हिन्दी आसां लगती है
हिन्दी में सपने आते हैं
सोच में हिन्दी भाती है

वैसे तो मेरे आज़ाद देश में
हर प्रान्त की अपनी भाषा है।
यहाँ हर जन - मानस में बसी
हिन्दी एकता की परिभाषा है।

पावन संस्कृत की लाडली
हिन्दी मधु रस की गोली है,
फिर भी क्यों हर जुबान पर
यहाँ अंग्रेजी की ही बोली है।

बच्चों की शिक्षा अंग्रेज़ी
शुभ सुबह भी होती अंग्रेज़ी,
प्रणाम - नमस्ते बुढ़ा गए,
हाय-बाय में रहती अंग्रेजी।

अम्मा बाबू जी के घर में
मॉम डैड अब रहते हैं,
दीदी - भईया को भी सब
सिस - ब्रो ही कहते हैं।

अक्सर दुःख होता है मन में,
आज़ादी तो अंग्रेजी ले गई।
भाषा के अल्प-प्रयोग से,माँ
हिन्दी बेड़ियों से जूझ रही।

साल में एक दिन श्राद्ध जैसे
हम हिन्दी दिवस मनाते हैें।
हर दिन काम करें इसपर तो
राष्ट्र-भाषा दिवस मनाएँगे।

प्रण करें सभी मिलजुल कर
प्यारी हिन्दी को अपनाएँगे,
देश-विदेश में चर्चित भाषा को
राष्ट्रभाषा का गौरव दिलवाएँगे।

(हर देश की अपनी भाषा होती है,तो हम अपनी भाषा की उपेक्षा क्यों कर रहे हैं? हम सब प्रण करें कि हिन्दी को अपनाकर इसे राष्ट्रभाषा का गौरव दिलवाएँगे।)



प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~एक दिवस नहीं~

जन्म से मेरा इसका नाता
सुनता, पढ़ता, लिखता आया
मातृभाषा कह इसे अपनाया
मातृभूमि की पहचान बनाया
हम एक दिवस पर क्यों सिमट जाएँ?

मन्त्र मुग्ध करने वाली मेरी हिन्दी
स्वर व्यंजन से सुशोभित मेरी हिन्दी
संस्कृत से जन्मी संस्कारित मेरी हिन्दी
भारत की संस्कृति का आधार मेरी हिन्दी
हम एक दिवस पर क्यों सिमट जाएँ?

अपनी भाषा को पिछड़ा कहते
पर भाषा को खुशी से अपनाते
राज की हम इसे भाषा कहते
राष्ट्रभाषा करने हेतु क्यों नही लड़ते
हम एक दिवस पर क्यों सिमट जाएँ?

सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Wednesday, August 24, 2016

#तकब११ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता #11]







#तकब११ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता #11]
मित्रो लीजिये अगली प्रतियोगिता आपके सम्मुख है. नियम निम्नलिखित है 
१. दिए गए चित्रों में सामंजस्य के साथ कम से कम १० पंक्तियों की काव्य रचना शीर्षक 
सहित होनी अनिवार्य है [ हर प्रतियोगी को एक ही रचना लिखने की अनुमति है]. 
- यह हिन्दी को समर्पित मंच है तो हिन्दी के शब्दों का ही प्रयोग करिए जहाँ तक संभव हो. 
चयन में इसे महत्व दिया जाएगा.
[एक निवेदन- टाइपिंग के कारण शब्द गलत न पोस्ट हों यह ध्यान रखिये. अपनी रचना को
पोस्ट करने से पहले एक दो बार अवश्य पढ़े]
२. रचना के अंत में कम से कम दो पंक्तियाँ लिखनी है जिसमे आपने रचना में उदृत भाव 
के विषय में सोच को स्थान देना है. 
३. प्रतियोगिता में आपके भाव अपने और नए होने चाहिए. 
४. प्रतियोगिता २० अगस्त २०१६ की रात्रि को समाप्त होगी.
५. अन्य रचनाओं को पसंद कीजिये, कोई अन्य बात न लिखी जाए, हाँ कोई शंका/प्रश्न हो 
तो लिखिए जिसे समाधान होते ही हटा लीजियेगा.
६. आपकी रचित रचना को कहीं सांझा न कीजिये जब तक प्रतियोगिता समाप्त न हो या 
उसकी विद्धिवत घोषणा न हो तथा ब्लॉग में प्रकशित न हो.
विशेष : यह समूह सभी सदस्य हेतू है और जो निर्णायक दल के सदस्य है वे भी इस 
प्रतियोगिता में शामिल है हाँ वे अपनी रचना को नही चुन सकते लेकिन अन्य सदस्य चुन 
सकते है. सभी का चयन गोपनीय ही होगा जब तक एडमिन विजेता की घोषणा न कर ले.
निर्णायक मंडल के लिए : 
1. अब एडमिन प्रतियोगिता से बाहर है, वे रचनाये लिख सकते है. लेकिन उन्हें चयन हेतु न 
शामिल किया जाए.
2. कृपया अशुद्धियों को नज़र अंदाज न किया जाए.



इस बार की विजेता है  सुश्री आभा अग्रवाल  - बधाई  एवं शुभकामनाएं 

Meena Prajapati 
~पृथ्वी के रंग~

मुझमें बहुत कम रंगत हैं
पर! मेरी दुनिया रंगीन है
यहाँ हरे, लाल, पीले
नीले, सतरंगी सभी जन हैं
ये मेरे अपने हैं इसलिए ही,
मुझे कुरेदते हैं, मसलते हैं
चढ़ते हैं, खोदते हैं
सभी रंग बहुत खुश हैं
अपने लाल आयतो में
मैंने तो इंसान बनाये थे
मन्दिर, मस्जिद, द्वारा नहीं
तुम समझदार व्यक्ति थे
बेज़ुबान को मारने
वाले हैवान नहीं
मुझे घेरो मत हाथों से
धर्म, जाति-पाति के
गहने ना पहनाओ
रंगत, खुशियाँ बांटो
फूल ,पाती,तलैया
मेरे हर अंग को
नोच खा लिया है
मेरा बलात्कार हुआ है
मुझे फाड़ दिया है
गाय और सूअर जैसे
नहीं सह पा रही हूँ
तेरा कुरेदना और फाड़ना
मेरा दम घुट रहा है
मैं पृथ्वी और मेरा
रंग ढल रहा है
हौले हौले।

टिपण्णी:- उपरोक्त पंक्तियाँ लिखते समय मुझे इस तस्वीर के रंगों ने बहुत प्रभावित किया और पृथ्वी को घेर कर खड़े लोग मुझे परेशान करने लगें। अपनी इसी परेशानी को मैंने अपनी कविता में लिखनी की कोशिश की है।





Prerna Mittal 
~वसुधैव कुटुंबकम~
~~~~~~~~~~

वसुधैव कुटुंबकम का आज तक, जिसका जैसे मन चाहा, उसने मतलब लगाया,
ज़ी टी.वी. ने भी इसे, अपना प्रचार वाक्य बनाकर ख़ूब नाम कमाया ।

महाउपनिषद में प्रथम उल्लेख, वसुधैव कुटुंबकम का,
ऊँच-नीच भेदभाव से ऊपर प्रयोजन था एकता का।
आर्यन थे इसके प्रवक्ता,
हमारी संस्कृति के निर्माता ।
धरती थी उस समय अभिशापित,
ऊँच-नीच जात-पात से कलुषित ।
बुद्ध, महावीर स्वामी ने सामंजस्य बिठाया,
सारे विश्व को समानता का पाठ पढ़ाया ।

ख़्वाब अखंड भारत का देखा चंद्रगुप्त मौर्य ने,
सिकंदर महान भी चला विश्व पर विजय करने ।
शायद यही था तात्पर्य इनके लिए वसुधैव कुटुंबकम का,
बनाएँ पूर्ण धरा को एक कुनबा करके साम्राज्य स्वयं का ।

चौदहवीं सदी में मंगोलों ने मचाई बहुत धूम,
साम, दाम, दंड, भेद सब अपनाया घूम-घूम ।
पन्द्रहवीं सदी में कोलंबस ने ढूँढा अमेरिका,
परिवार को खोजना ही रहा होगा उद्देश्य उसका ।

बाद में मुग़लों ने सबको मुसलमान बनाया,
वसुधैव कुटुंबकम का नया मतलब समझाया ।
अंग्रेज़ों ने भी किया, सम्पूर्ण दुनिया पर राज,
पूरी वसुधा को क़ुटुंब बनाया, सर पर पहना ताज ।

आख़िरकार कम्प्यूटर-इंटरनेट ने किया स्वप्न पूरा पूर्वजों का,
कभी सोचा ना होगा ऐसा, करते समय सृजन वेदों का ।
पृथ्वी बन गई अब, क़ुटुंब सच में,
सिमट गई, हस्त में पकड़े मोबाइल में ।

सहकर्मी, मित्र और पड़ोसी अब परिचितों से आँखें चुराते हैं,
पोकीमोन की खोज में अजनबियों को दोस्त बनाते हैं ।
अब है आदमी को ख़बर, पूरे जगत की,
सुध ना है केवल, अपने घर के जन की ।

टिप्पणी: यह चित्र एकता और भाईचारे का संदेश दे रहा है । जिसे हमारी संस्कृति में हमेशा प्राथमिकता दी गई है । उसमें दिए गए वसुधैव कुटुंबकम के संदेश की मैंने इतिहास और आज के संदर्भ में अपने दृष्टिकोण से विवेचना करने की कोशिश की है ।




Sunita Pushpraj Pandey 
****दुनिया ****


दुनियाभर के लोग
अलग - अलग रूप, अलग - अलग रंग
जीतने को दुनिया कर रहे मानवता का खून
कहाँ रहे जीसस अब कहाँ गये संत रविदास
न रहे अब वैसे पीर फकीर
जो करते इंसानियत का गुणगान
सुख शांती कायम रखने को
कभी उठा करती थी तलवार
अब रक्त पिपासा बन
सत्ता के मद में मचा रही संहार।

टिप्पणी - बहुत कष्ट होता है मानवता का खून बहते




नैनी ग्रोवर
~ सोलह आने सच ~


दाता ने दी धरती,
और अम्बर नीला नीला,
चाँद सितारे बना के उसने,
दिखा दी अपनी लीला..
फिर बनाए आदम और हुव्वा,
दिया धरती पे भेज,
बसने लगी फिर ये दुनियाँ,
ज्यूँ सूरज का तेज...
बना लिए फिर मानव ने,
भिन्न भिन्न ये भेस,
दे दिए, नाम धरती को,
देश और विदेश..
कोई नही पराया जग में,
बात है सोलह आने सच,
इसलिए कहा सन्तों ने,
नफरत से तू बच...
पहरावा पहचान मात्र है,
ज्यूँ सूरत अलग अलग है,
पर खून है सबमे एक ही जैसा,
ज्यूँ जोत से ज्योति ना विलग है...
रंग बिरंगी इस दुनिया में,
प्यार ही प्यार बरसा दो,
ऐ नीली छतरी वाले,
मानव को ये बात ज़रा समझा दो...!!

टिप्पणी : इंसान से इंसान की बेरुखी, और जात पात का भेदभाव,





Kiran Srivastava
(हमारी पृथ्वी)
==================

रंग बिरंगे देश यहाँ पर
अलग -अलग सी भाषा है,
अलग-अलग है रंग रूप
पर एक ही परिभाषा है।

रीति रिवाज संस्कृति का
अगता अद्भुत मेला है,
सभी त्योहार दिलों में बसतें है
सभी रूप अलबेला है।

हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई
मिल-जुल कर हमें रहना है,
इसकी रक्षा की खातिर
कुछ भी कर गुजरना है।

आओ मिलकर करें संकल्प
मिल-जुल करके रहेंगे अब,
आंच न आने देंगे इस पर
इसकी रक्षा करेंगे सब..!!!!

===================
टिप्पणी- ईश्वर प्रदत दुनियां बहुत खूबसूरत है।विभिन्नताओं के होते हुए भी इसकी कला ,संस्कृति रीति रिवाज मन को मोह लेतें हैं इन सभी धरोहरों की रक्षा के साथ साथ पृथ्वीकी रक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है।




कुसुम शर्मा 
~इंसानियत भूल गया इंसान~
---------------------


छा रहा संसार में
आतंक का ज़ोर है ।
चारों ओर
त्राहि त्राहि का शोर है !
मानवता क्यो
भूल गया इंसान
उसके सर चढ़ा
जानवर का
क्या ख़ून है !

जो खेलते थे कभी
रंगो की होली
वही खेल रहे अब
ख़ूनों की होली
क्यो आपस मे
बड़ा ये बैर है
किसने चलाया
ये खेल है

कोई कहता है
हम हिन्दू
कोई कहता
मुस्लबान है
कोई सिख तो
कोई ईसाई
सभी लड़ रहे
धर्म के नाम पर
क्या बचा
यहाँ पर इन्सान है

कोई मज़हब या धर्म
नही सीखाता
आपस मे बैर रखना

छोड कर राह नफरत की
प्रेम से जीना सीख लो
ये धरती है हमारी
इसे प्रेम से सींच लो
जाति धर्म को छोड कर
इंसान होना सीख लो !!

टिप्पणी :- आजकल धर्म के नाम पर अतंक सारे संसार मे छाया हुआ है एक इन्सान दूसरे इन्सान को मार रहा है जैसे वह इंसान नही कोई जानवर हो । वह आपस मे धर्म के नाम पर लड़ते रहते है कोई भी धर्म हमे नफरत करवाना नही सिखाता न ही वह कहता है कि एक दूसरे को मारो ! ये संसार हमारा घर है इसे हमे प्रेम से सजाना चाहिए, हम किस जाति या धर्म के है यह बाद की बात है सबसे पहले हम इन्सान है इस बात ध्यान रखना चाहिए ।



Madan Mohan Thapliyal शैल
वसुधा औ मानव
************

जब मैं न था माते-
तेरा अकूत भंडार था -
न कोई सीमा न बन्धन -
मात्र विस्तार ही विस्तार था .
झरनों की रंगत -
पक्षियों का कलरव -
फल - फूलों से लदी डालियां -
अद्भुत अपूर्व तेरा श्रृंगार था .
मणि- माणिक , हीरे- जवाहरातों से सुसज्जित -
रंगोली सी सजी धरणी -
रंग- बिरंगी तितलियों की चपलता -
आलौकिक तेरा परिधान था .
वैभव की थी नहीं कमी -
सब कुछ था भरा - भरा -
स्नेह पूरित था सब -
न कहीं किसी का तिरस्कार था .
मैं आया परिभाषित करने -
इस भंडार को-
माया - मोह ने जकड़ा-
जगा दिया अहंकार को.
शक्ल सूरत को लगा पूजने -
दिशा भ्रमित होने लगा -
न मिला विस्तार कोई -
सीमाओं में बाँध के रख दिया अपने आप को .
संत, पैगंबरों को बाँटा -
ऋषि - मुनियों औ अवतारों को बाँटा -
मन्दिर, मस्जिद की दे दुहाई -
उलझा दिया अपने आप को .
तेरी ममता को लगा भूलने -
भौतिक सुविधाओं में लगा झूलने -
निज स्वार्थ को कर पोषित -
छिन्न - भिन्न कर दिया तेरे प्यार को .
कर सुधार भूल अपनी -
छोड़ ए सारा क्रंदन -
लगा माथे पर तिलक माटी का -
रंगोली ली सी सजी, धरा को कर नमन .....

टिप्पणी  - धरती और मनुष्य का जन्म जन्मों का संबन्ध है. भौतिक सुखों की होड़ छोड़कर हमें पृथ्वी के अस्तित्व को क़ायम रखने में मानवता का परिचय देना चाहिए..





कौशल उप्रेती
~लिखना~

दिल में जो आये वो पैगाम लिखना
हमने सहर लिखा.. तुम शाम लिखना

कुछ इस तरह से दिलों के रंज भुला
मेरे हिस्से कि धूप भी अपने नाम लिखना

कलम जमाने से रख के रूबरू
महके जो हर खिजां में वो बाम लिखना

मन को फैला के दुनियाँ से बड़ा
कभी काबा तो कभी चार-धाम लिखना

कौशल इस तरह अपनाना खुद को
दिल कि बात दिल से बे-लगाम लिखना

टिप्पणी : हम सब एक हैं चाहे किसी भी जात धर्म से हैं, धरती सबकी है और सब धरती के... वसुधैव कुटुम्बकम्...




प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ......
~विश्व शांति~

परम धरम श्रुति विदित अहिंसा।
पर निंदा सम अध न गरीसा।। [मानसकार ]

विश्व शांति के लिए हर राष्ट्र को
अहिंसा का सही अर्थ समझना होगा
तन, मन, कर्म, वचन और वाणी से
किसी प्राणी को नुकसान न पहुँचाना होगा
यही तो हमारे संस्कार में समाहित है
'अहिंसा परमो धर्मं' को स्वीकारना होगा
साम्प्रदायिक और असाम्प्रदायिक के तर्क वितर्क से
बहार निकल सर्वधर्म संभाव को अपनाना होगा
राजनीति से नही कूटनीति का उपयोग कर
धर्मनिरपेक्ष शब्द को हमें अपनाना होगा
भारत मे परपरागत सब धर्मो का सम्मान है
यहे हमें मानना और विश्व को सिखाना होगा
'वसुधैव कुटुम्बकम' का देकर सबको विचार
शान्ति और सुरक्षा की अभिवृद्धि का प्रयास करना होगा

टिप्पणी: विश्व शांति और सुरक्षा आज हर राष्ट्र का उत्तरदायित्व है और भारत इसमें प्रमुख भूमिका निभा सकता है।



Ajai Agarwal
Ajai Agarwal धरती माँ का पुनः संस्थापन
=================
स्वप्नाभिलाषी तुम कहो ,
मैं तो यही बस मानती हूँ ,
हाथ तुम हाथों में दे दो ,
कारवां बनना ; नियति है ,
प्यार के दो शब्द बोलो
गाँठ उर की खोल देंगे
ध्येय ; हो कल्याण सबका !
लक्ष्य ,ये लेकर चलेंगे ,
अहिंसा धर्म परम् है
इसी से, मानवता बचेगी
विश्व जीवन ज्योति जागे
सृष्टि को यौवन मिले
हर रंग हर बिम्ब की
सृष्टि को सौगात देदें
आज हम सौगन्ध ये लें
हाथ में ले हाथ सबका ,
छोड़ के धर्मों के पहरे ,
तोड़ के जाती के बन्धन
एक हो धरती को बचाएं
कुछ तुम त्यागो ,कुछ मैं छोडूं
सुविधाओं को कम करें अर
शस्यश्यामल धरती माँ का
हम करें पुनः संस्थापन -
हम करें पुनः संस्थापन

टिप्पणी ---सुविधाओं और लालच के जंजाल से ,हिंसा की जकड़ से ,देश धर्म जाती रंगों के बन्धन से मुक्ति पाएंगे तभी धरती को सजा पाएंगे उसका पुनः संस्थापन कर पाएंगे और इसके लिए केवल दिल में प्यार की आवश्यकता है ---

सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Tuesday, August 9, 2016

‪#‎तकब१०‬ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता #10]



‪#‎तकब१०‬ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता #10]
मित्रो लीजिये अगली प्रतियोगिता आपके सम्मुख है. नियम निम्नलिखित है 
१. दिए गए चित्र पर कम से कम १० पंक्तियों की काव्य रचना शीर्षक सहित होनी अनिवार्य है [ हर प्रतियोगी को एक ही रचना लिखने की अनुमति है]. 
- यह हिन्दी को समर्पित मंच है तो हिन्दी के शब्दों का ही प्रयोग करिए जहाँ तक संभव हो. चयन में इसे महत्व दिया जाएगा.
[एक निवेदन- टाइपिंग के कारण शब्द गलत न पोस्ट हों यह ध्यान रखिये. अपनी रचना को पोस्ट करने से पहले एक दो बार अवश्य पढ़े]
२. रचना के अंत में कम से कम दो पंक्तियाँ लिखनी है जिसमे आपने रचना में उदृत भाव के विषय में सोच को स्थान देना है.
३. प्रतियोगिता में आपके भाव अपने और नए होने चाहिए.
४. प्रतियोगिता ७ अगस्त २०१६ की रात्रि को समाप्त होगी.
५. अन्य रचनाओं को पसंद कीजिये, कोई अन्य बात न लिखी जाए, हाँ कोई शंका/प्रश्न हो तो लिखिए जिसे समाधान होते ही हटा लीजियेगा.
६. आपकी रचित रचना को कहीं सांझा न कीजिये जब तक प्रतियोगिता समाप्त न हो और उसकी विद्धिवत घोषणा न हो एवं ब्लॉग में प्रकशित न हो.
विशेष : यह समूह सभी सदस्य हेतू है और जो निर्णायक दल के सदस्य है वे भी इस प्रतियोगिता में शामिल है हाँ वे अपनी रचना को नही चुन सकते लेकिन अन्य सदस्य चुन सकते है. सभी का चयन गोपनीय ही होगा जब तक एडमिन विजेता की घोषणा न कर ले.
निर्णायक मंडल के लिए :
1. अब एडमिन प्रतियोगिता से बाहर है, वे रचनाये लिख सकते है. लेकिन उन्हें चयन हेतु न शामिल किया जाए.
2. कृपया अशुद्धियों को नज़र अंदाज न किया जाए.



इस तकब #10 की विजेता है  सुश्री अलका  गुप्ता जी - हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं 


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
~ पापा ~

जीवन को आधार देता
आपका वर्चस्व
समर्पित परिवार के लिए
आपका सर्वस्व

आप के हाथों में
देकर अंगुली चलना मुझे आया
जीवन मार्ग को कर अग्रसित
आपने जीना मुझे सिखलाया
सुख दुःख को समेट कर
हार जीत का भेद समझाया
दायित्व निभा कर अपना
परिवार का महत्व बताया
देकर शिक्षा धर्म कर्म की
पाप पुण्य का रहस्य समझाया
बन कर कठोर कभी
मुझे कर्तव्य का बोध कराया
बन कर गुरु मेरे
गलत सही का अंतर बतलाया
सच झूठ के जाल में
नफा नुकसान मुझे दिखलाया
टूट कर, फिर खड़े होकर
हौसले से परिचय करवाया

आज साथ नही फिर भी
मेरे मार्गदर्शक बन
राह मुझे दिखलाते हो
बन आशीर्वाद आपका स्नेह
गमो से लड़ता, खुशी को जीता हूँ
याद नही साथ हो
पापा आप आज भी यहीं कहीं हो
आप सदा मेरे साथ हो


टिप्पणी: जीवन में पिता का स्थान माँ के समकक्ष ही होता है बस माँ की ममता दिख जाती है और पिता एक गुरु तुल्य जीवन का मार्ग प्रशस्त करता है....पिता को समर्पित कुछ भाव



Kiran Srivastava 
"जीवन की डगर"
==================

अंगुली थामें
कदम बढ़ाना,
धीरे धीरे
चलते जाना,
चलते चलते
दौड़ लगाना,
अपने मंजिल
को है पाना...!!!

डगमगा जाए
अगर पांव तो,
असफल हो
जाए दांव तो,
मत घिरना
अवसाद से,
चिंता और
तनाव से,
राहों के ये
बाधक है,
जीवन के
अवरोधक हैं....,!!!!

धैर्य बनाए
रखना तुम,
और न पीछे
हटना तुम,
चलते रहना
बढ़ते रहना,
हिम्मत से
लेना तुम काम,
जीवन होगा
तभी आसान......!!!!!

==================
टिप्पणी: जीवन के राहों में बहुत सी मुश्किलें आती है। हमें बहुत ज्यादा हताश या निराश नहीं होना चाहिए।


Prerna Mittal
~परवरिश~

बच्चा रोते हुए इस संसार में आता,
अपने प्यारेपन से सबको लुभाता,
मात-पिता की आँखों का तारा बन जाता,
कभी नख़रे दिखाता और कभी रूठ जाता,
तो कभी लाड़ में आकर सिर पर चढ़ जाता,
और सबको अपनी उँगलियों पर नचाता ।
उसकी एक मुस्कराहट पर न्योछावर हो जाते,
नज़र उतारते, पैसे वारकर नौकरों में बाँटे जाते ।

उँगली पकड़ पिता की वह चलना सीखता,
लड़खड़ाते क़दमों को ज़मीं पर रखना सीखता ।
सब चाहते ऊँचाइयों को छुएँ, वाहवाही करे जमाना,
पर पिता होता ख़ुशी से अभिभूत, गर्व से तनता सीना ।
जब बेटा उसका, उससे ज़्यादा प्रसिद्धि पाता,
और पिता, पुत्र के नाम से पहचाना जाता ।

परवरिश बालक की होती नहीं आसान,
जुड़ा इससे हँसना, रोना, दुःख और मुस्कान,
कभी पड़ता बच्चों के साथ बच्चा बनना,
तो कभी कान पकड़, देना नैतिक ज्ञान ।
व्यावहारिकता के साथ दुनियादारी भी सिखाना,
अनुशासन, स्वास्थ्य और स्वच्छता का पाठ पढ़ाना ।

यह है एक ऐसा उत्तरदायित्व,
बनाना है एक महान व्यक्तित्व ।
जो अपने पैरों पर खड़ा हो सके,
सिर उठाकर अपना वह जी सके ।
ना हो हृदय में बैर, प्राणी के लिए संवेदना हो ।
शोषण का करे विरोध, स्वत्व से ना समझौता हो !

टिप्पणी: सही परवरिश ही बच्चे, परिवार, समाज व देश के भविष्य का आधार है । यह एक ऐसी ज़िम्मेदारी है जिसे निभाने में अपनी और बच्चे दोनों की ख़ुशी, उदासी, क्रोध, प्रेम तथा अनेक भावनाओं के बीच सामंजस्य बिठाते हुए सही निर्णय लेना पड़ता है । यह कभी-कभी अत्यंत कठिन होता है ।


Meena Prjapati 
~प्लास्टिक~

प्लास्टिक मजबूत होती है
इसका अंत नहीं होता
रिश्तों का बंधन भी
मजबूत होता है
जिसकी कसावट
टूटती नहीं हैं
प्लास्टिक हंस्ता,
खेलता, रोता
सब होता है
पापा की डांट
की तरह
जमाकर ऊँगली
खींचकर ले जाना
जैसे प्लास्टिक से
वस्तुएं खींची जाती हैं
उसमें तन्यता
अधातवर्धन्यता गुण होते हैं
रिश्ते बड़े वैज्ञानिक होते हैं
इनमें सभी रिएक्शन होते हैं

टिप्पणी: इस तस्वीर में दी गई गोटियां मेरे दिमाग में प्लास्टिक को दिखाती हैं। इसी वजह से मेरी कविता का नाम प्लास्टिक है और मेरे हिसाब से प्लास्टिक और रिश्तों का जोड़ मजबूत होता है जिसे मैने कविता के रूप में रखा है।



नैनी ग्रोवर
 ~ पगडंडी ~

जीवन की
जिस पगडंडी पर
तुमने,
मेरा हाथ थाम
चलना सिखाया
मेरे पाँव
उसी पे चलते रहे,
कभी उदास
कभी मुस्कुराते
लम्हों को संग लिए
कभी कांटे मिले
कभी फूल
कभी मजबूत बनी
कभी कर बैठी भूल,
परन्तु, फिर भी
निरन्तर चली
जाने कब
तुम हाथ छुड़ा गये
और बस,
एक तस्वीर में
समा गये,
ये पगडंडी,
फिर भी,
समाप्त ना हुई,
और मेरे
छाले पड़े पाँव
चलते ही जाते हैं
इसपर,
निरन्तर
निरन्तर ...!!

टिप्पणी: गोटियों को मैंने लम्हों के रूप में देखा । और जीवन की पगडंडी में शामिल किया


गोपेश दशोरा
~ पीढ़ी का अन्तर~


क्यूं नहीं समझते हो पापा,
मेरा भी अपना जीवन है।
मेरे भी तो कुछ सपने है
घर के बाहर कुछ अपने है।
इतना बड़ा हो गया हूं कि,
भला बुरा सब समझ सकूं।
माना थोड़ी सी मुश्किल है,
पर बिना मदद के सम्भल सकूं।
उंगली थामी थी बचपन में,
अब छोड़ नहीं क्यूं देते हो।
पिंजरे में बांध रखा हमको,
क्यूं ना तुम उड़ने देते हो।
यह पीढ़ी-पीढ़ी का अन्तर है,
कभी समझ नहीं तुम पाओंगे।
ना साथ हमारा अगर दिया,
तो तन्हा ही रह जाओगे।
सुन बेटे की यह बात सभी,
माँ-पापा, थोड़े घबराए।
क्या इसीलिए ही सींचा था,
अपने आंगन के पौधे को?
जो बड़ा हुआ तो छाह नहीं,
फल मिले, जो मानो शर्तों को।
काट के अपना पेट जिसे,
दो वख्त खिलाया करते थे।
वो बेटा आँख दिखता है,
जिसे हाथों में सुलाया करते थे।
तू भी कल बाप बनेगा तब,
क्या इस सब से बच पाएगा।
जितना हमने है सहा यहांँ,
तू तनिक नहीं सह पाएगा।
माना तेरे कुछ सपने है,
पर मेरा सपना तो तू ही है।
माना तेरे कुछ अपने है,
पर मेरा अपना तो तू ही है।
मेरे सपने बस टूट गये,
मेरे अपने भी छूट गये।
जिनकी खातिर खुद को झोंक दिया,
वो ही हमसे मुंह मोड गये।
फिर भी,
बेटा, बस तू खुश रहे सदा,
और चाह नहीं कुछ है हमको,
अब घर में रहे या वृद्धाश्रम,
और कितना जीना है हमको।

टिप्पणी: जब माता-पिता अपने बच्चे को उंगली पकड चलना सिखाते है तब एक ही बात मन में होती है कि जब कल वे वृद्ध हो जाएगें तो उनके बच्चे उनका सहारा बनेंगे। लेकिन समय का पासा क्या लेकर आता है यह कोई नहीं जानता।



डॉली अग्रवाल 
~पिता~

मुझे वो अपना नाम देता है
सुकूँ के सुबह शाम देता है
पिता है वो मेरा ...
मेरे साथ ही जन्म लेता है !
भगवान है वो जमी पर मेरा
हर ख़ुशी मेरे नाम करता है
ऊँगली पकड़ सम्भालता है
माथे पे दे प्यार का बोसा
रोज मुझे संवारता है ...
पिता है वो मेरा , मेरे साथ ही जन्म लेता है !

टिप्पणी :माँ और पिता को परिभाषित करना वश में नही मेरे ! एक छोटा सा प्रयास मात्र !


प्रभा मित्तल
~~ये गोटियाँ~~
~~~~~~~~~~~

ये केवल दो गोटियाँ नहीं
हैं जीवन के अनिवार्य अंग।
मात-पिता दुःख सहकर भी
भरते हैं खुशियों के रंग।

एक जब धमकाता है
दूजा गले लगाता है
दुलरा कर,बहलाकर
चलना भी सिखलाता है।

ये जीवन की सौगात हैं
व्यक्तित्व की पहचान हैं
इन से ही देह में रक्त है।
नहीं! तो मानव अशक्त है।

आशीष साथ हो जब इनका
पथरीली पगडण्डी भी
मखमल सी बन जाती है
संसार चक्र में पिसकर भी
हम ऊँचा उठते जाते हैं।

टिप्पणी: गोटियों  को गोटियाँ नहीं बल्कि माता-पिता का रूप देकर उन्हें जीवन का अनिवार्य अंग माना है।


अलका गुप्ता
~ तस्वीर के दो पहलू ~

हर तस्वीर के दो पहलू होते हैं
सकारात्मक है तो... नकारात्मक भी है !
आज का शिशु...बालक
कल पिता बनेगा
जब कि चल रहें हैं दोनों ही
साथ होते हैं...फ़िर भी..
कोई बचपन देखता है...
और...कोई बुढ़ापा !
एक ही तस्वीर के हैं दो पहलू
यदि आज कोई मृत हुआ तो..
जन्म तो निश्चित ही हुआ होगा
किसी ने मृत्यु गाई तो...
किसी ने जीवन गाथा...
बस उसी तरह से...
जिस तरह से पासे मॆं
अंकित अंक...जो कभी
हर्ष का कारण बनते हैं...
और कभी विषाद का !
लेकिन जो तस्वीर हम देखना चाहते हैं....
वह नज़र वह इशारे तभी
हम देख सकते हैं जबकि
वह ईश हमें दिखलाये.
मतलब साफ है...
यहाँ एक तस्वीर के हम
बेशक ...
मोहताज हों मगर...
तस्वीर का प्रतिबिम्ब
हमारे भावों का मोहताज है
और हम उस ईश्वर की
बख्शी हुई नज़र के !!!

टिपण्णी: बस यूँ ही हाथ फोन पर चलते रहें तस्वीर कॊ देख कर भाव मचलते रहें...जो भी लिखाया उस खुदा ने लिखाया मेरा कोई कसूर नही....न ही कोई कारीगरी !


कुसुम शर्मा
~कुसुम शर्मा छूटते रिश्ते~
---------
हाथ पकड़ कर चलना सिखाया
अच्छे बुरे का भेद बताया
दुख मे जिसने सदा सम्भाला
मात पिता का रिश्ता निराला
जिनकी छाया मे बड़े हुये
हर ज़िद मे उनसे अंडे रहे
पूरी होने पर गले लगे
उनकी डाँट प्यार से बड़े हुए
अपनी कामयाबी के मद मे
आज क्यो उनको भूल गये
वृद्धाश्रम बनाकर
उनकी सेवा से मुक्त हुए
जिन्होंने हमारी खुशी के लिए
अपने हर सुख त्याग दिये
आज हमने वृद्ध अवस्था मे
उनको ही त्याग दिया
कल ये दिन फिर लौट के आयेगा
जो बनाये वृद्धाश्रम हमने
वो ही हमारा घर कहलायेगा !!

टिप्पणी 
पिता की अंगली पकड़ कर हम चलना सीखते है उनकी छाया मे बड़े होते है और बड़े होने पर हम जब उन्हे हमारी अवश्कता होती है तो हम उनको वृद्धाश्रम मे छोड आते है और ये भूल जाते है कि जो हम बो रहे है वही काटेंगे जिन्होंने हमारी खुशी के लिए दुख उठाये हम आज फिर अपनी झूठी खुशी के लिए फिर से उन्हे दुख दे रहे है !!




सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Wednesday, August 3, 2016

तकब खुला मंच #3



तकब खुला मंच #3
समूह का यह तीसरा खुला मंच है. माह के अंतिम सप्ताह में प्रतियोगिता नही होगी. यह एक खुला मंच होगा चर्चा, परिचर्चा, समीक्षा हेतु. इस खुले मंच में हम एक युवा प्रतिभावान रचनाकार को आमंत्रित करेंगे. उनकी कविता के साथ एक चित्र प्रस्तुत करेंगे [ चित्र हम प्रस्तुत करेंगे उनकी रचना पर]. परिचर्चा के दौरान वे ही आपकी रचनाओं की समीक्षा करेंगे - एडमिन किरण प्रतिबिम्ब
इस बार हम आमंत्रित कर रहे है मृदुल भाषी, होनहार, युवा लेखिका कवियत्री , साहित्य प्रेमी मीना प्रजापति जी को। वे अभी दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉक्टर भीम राव अम्बेडकर कॉलेज से हिंदी पत्रकारिता एवं जनसंचार पढ़ रही है। वे अभी तृतीय वर्ष की छात्रा हैं। कवितायेँ लिखने का शौक रखती है। इस मंच के लिए भी इन्होंने इस बार कविता भेजी थी मुझे सन्देश रूप में भेजी थी जिसे मैं न देख पाया न ही शामिल कर पाया। क्षमा के साथ उनकी एक अन्य कविता 'जूड़ा' यहाँ पेश कर रहा हूँ। प्रेषित चित्र केवल आपके लिए है। उनकी कविता पर यह चित्र केंद्रित नही है।
मीना जी को इस परिवार की ओर से हार्दिक बधाई एवम् शुभकामनाएं।
- जूड़ा -
ऐसे लपेटती हूँ उसे
जैसे सारी झुंझलाहट
हाथो की उँगलियों में
लपेट ली हो
खूब कसकर
मसोस देती हूँ जुड़े को
जब खुल जाती हैं
काली स्याह गुस्से की लड़ियाँ
अमेंठती हूँ
समेटती हूँ
खुद को जूड़े की तरह
बार बार खुल जाता है
बिखर जाता है
फिर खुद को शांत कर
उसको समझाती हूँ
तुम हर भाव में
मेरे साथ हो
किलो में नहीं बिकते हो
भावनाओं में बह जाते हो
गुस्से में गुस्सा हो जाते हो
ख़ुशी में खिलखिलाकर
सिमट जाते हो
चिलमिलाती धूप में भी
जूड़ा शिकायत नहीं करता
तुम तो मनचले हो
इसलिये ही
उसे देखते ही
हवाओं मे उड़ जाते हो
मेरी किरकिरी, मिसमिसि
कशमकश, दुविधा
सब जुड़ जाती है
जूड़े के साथ
(आप सभी इस चित्र पर अपने भाव दस पंक्तियों एवं शीर्षक के साथ 1 अगस्त 2016 तक लिख सकते है। मीना जी समय पर उन रचनाओं पर अपनी राय या विचार रखेगी - धन्यवाद )



Kiran Srivastava 
इंतजार
===================
खत ना खबर...
बेबस सी नजर
ढूंढती है तुम्हें,
लौट आओगे,
फिर पास मेरे।
अपलक निहारती
आंखें राहों को...
खिचती चली आतीं हूं
रोज बेबस होकर,
तेरे इंतज़ार में....
मिलने का वादा
जो तुम कर गए
इन वादियों में...!!!
कैसे समझाएं
पागल दिल को....
जो बैठा है
आस लगाए,
कि शायद तुम
फिर आ जाओ,
इसी इंतजार में.....!!!!



डॉली अग्रवाल
इंतजार

इंतजार सिर्फ एक
कोशिश है
इस सच्चाई को
झुठलाने की
कि
वादा करके भी
तुम आओगे नही !
मेरे तुमहारे बीच
एक रौशनी का
फासला
तुमहारे पलट आने
से भी क्या
मिट पायेगा !
इंतजार खत्म नही होता
उम्र और वक्त गुजर जाता है
कोई अपना सा , रूठा सा
बस खो जाता है !!



नैनी ग्रोवर 
खाली वादियाँ

बिरह के पिंजरे में, कैद हुई,
जाने नहीं मेरी पीर कोई,
रिस्ता है लहू, मेरे सपनों का,
ज़रा देखे कलेजा चीर कोई..
पखेरू बन उड़े,
सारे सपने हवाओं में,
घुल गया कजरा,
इन उजरी घटाओं में,
चुभती है निगाहों को,
ये महकी हरियाली,
उतर जाए सीने में,
जैसे के तीर कोई..
खाली-खाली सी,
लगती हैं ये वादियाँ,
देखूँ जिधर भी,
तेरी यादों का ही घुआं,
सर्द मौसम भी,
तपने लगा आजकल,
रंग आसमान भी,
अपना रहा है बदल,
आजा के, आके बंधा जा,
मुझे अब धीर कोई,..!!




Prerna Mittal 
प्रकृति

एक आम, मामूली सी, पहाड़ी सी लड़की,
सीढ़ीनुमा खेतों में बेफ़िक्र घूमती सी लड़की,
देखकर जल जाए कोई, ख़ुशगवार सी लड़की,
पर कुछ ख़ास नहीं, क्यों? आकर्षक सी लड़की ।

हिमालय की वादियाँ ही जिसकी दुनिया,
यहीं पाती वह अपनी सारी ख़ुशियाँ ।
दिन भर माँ का हाथ बँटाती,
रात को उसी के आँचल में सो जाती ।
ना और कुछ चाहा रब से,
ना और कुछ माँगा उससे ।

आज कोई बाबू साहेब आए थे घर में,
दौड़ती खतिरदारी करती अतिथि की क्षण में ।
जाने के बाद उसके मन में कुछ खटक गया,
किसी आशंका से दिल उसका धड़क गया ।

फिर सुना उसने किवाड़ की आड़ से,
बाबा जो बता रहे थे अम्मा को उत्साह से ।
ये हैं दिल्ली में बड़े नामी व्यापारी,
लाडो राज करेगी अब, हमारी ।

दहेज लेना तो दूर वे हमारा क़र्ज़ भी उतारेंगे,
हमारी पल-पल डूबती नैया को पार उतारेंगे ।

उसके पैरों के नीचे से तो ज़मीन ही सरक गई ।
भागते हुए दूर तक पहुँची, आँखें छलक गईं ।
यहाँ फैली हरियाली और हिमाच्छादित पर्वत,
देते उसे असीम शांति, जब भी पड़ती ज़रूरत ।

बैठी ताकती वह चुपचाप अपने अनूठे जहान को,
नहीं चाहती छोड़कर जाना वह इस उद्यान को ।
क्या वह अपना हृदय किसी के समक्ष खोल पाएगी ?
या फिर पिता की आकांक्षाओं पर बलि चढ़ जाएगी ।




प्रभा मित्तल 
~~प्रतीक्षा ~~
~~~~~~~~~~
रोज सोचती हूँ ,पाती आएगी
कहे अनकहे दर्द समेट लाएगी

बैठी तकती हूँ होकर मौन......
बेज़ुबान मगर बोलती सी
हरी -भरी इन वादियों में,
ऊपर से नीचे जाती,
नीचे से ऊपर आती
ये पगडण्डियाँ...
मेरा भी ख़त लाएँगी
बहुत दिनों बाद मुरझाए मन में
मुसकानों की कलियाँ खिल जाएँगी

रोज सोचती हूँ ,पाती आएगी
कहे अनकहे दर्द समेट लाएगी।

इन दरख़्तों के झूमते तन से,
घटाओं के गरजते मन से,
हवा की साँय-साँय और
बरसते कुहासे की धुंध में
नहाई इन वादियों से
रोज पूछती हूँ
स्वप्नों की स्वर लहरी, क्या
सचमुच, आकर मुझे जगाएगी -
मान औ मनुहार की सौगंध खिलाएगी।

रोज सोचती हूँ ,पाती आएगी
कहे अनकहे दर्द समेट लाएगी।




प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
-इंतज़ार-

प्रेम का संसार बड़ा है मेरा
तुझ में ही बसा है जग सारा

रोम रोम पुकारता है जब तुम्हें
अहसासों में खो जाता तन मन मेरा

यह मेरा ख़्वाब ही सही
पर लगता है मेरे मन को प्यारा

रुठने मनाने का मौसम आया नहीं
और दूरियां बिगाड़ रही खेल सारा

हर पल मेरा गुजरे बाहों में तेरी
बस इंतज़ार है मुझे जब वक्त हो हमारा

[ मीना  जी आपका  हार्दिक  धन्यवाद  'तस्वीर क्या बोले'  समूह  परिवार  की  ओर  से, भविष्य  के  लिए  शुभकामनाएं ]

सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Sunday, July 31, 2016

#‎तकब९‬ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता #9 ]



‪#‎तकब९‬ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता #9]
मित्रो लीजिये अगली प्रतियोगिता आपके सम्मुख है. नियम निम्नलिखित है 
१. दिए गए चित्र पर कम से कम १० पंक्तियों की काव्य रचना शीर्षक सहित होनी अनिवार्य है [ हर प्रतियोगी को एक ही रचना लिखने की अनुमति है]. 
- यह हिन्दी को समर्पित मंच है तो हिन्दी के शब्दों का ही प्रयोग करिए जहाँ तक संभव हो. चयन में इसे महत्व दिया जाएगा.
[एक निवेदन- टाइपिंग के कारण शब्द गलत न पोस्ट हों यह ध्यान रखिये. अपनी रचना को पोस्ट करने से पहले एक दो बार अवश्य पढ़े]
२. रचना के अंत में कम से कम दो पंक्तियाँ लिखनी है जिसमे आपने रचना में उदृत भाव के विषय में सोच को स्थान देना है. 
३. प्रतियोगिता में आपके भाव अपने और नए होने चाहिए. 
४. प्रतियोगिता २३ जुलाई २०१६ की रात्रि को समाप्त होगी.
५. अन्य रचनाओं को पसंद कीजिये, कोई अन्य बात न लिखी जाए, हाँ कोई शंका/प्रश्न हो तो लिखिए जिसे समाधान होते ही हटा लीजियेगा.
६. आपकी रचित रचना को कहीं सांझा न कीजिये जब तक प्रतियोगिता समाप्त न हो और उसकी विद्धिवत घोषणा न हो एवं ब्लॉग में प्रकशित न हो.
विशेष : यह समूह सभी सदस्य हेतू है और जो निर्णायक दल के सदस्य है वे भी इस प्रतियोगिता में शामिल है हाँ वे अपनी रचना को नही चुन सकते लेकिन अन्य सदस्य चुन सकते है. सभी का चयन गोपनीय ही होगा जब तक एडमिन विजेता की घोषणा न कर ले.
निर्णायक मंडल के लिए : 
1. अब एडमिन प्रतियोगिता से बाहर है, वे रचनाये लिख सकते है. लेकिन उन्हें चयन हेतु न शामिल किया जाए.
2. कृपया अशुद्धियों को नज़र अंदाज न किया जाए.


इस बार विजेता रही "सुश्री प्रेरणा मित्तल जी" -  बधाई एवं शुभकामनाएं 



अलका गुप्ता

~~~~~~~~~~~~~
~~~जीवन चक्र~~~
~~~~~~~~~~~~~
था पड़ा फर्श पर
उठा प्रयास कर
हुआ फिर..अग्रसर
खड़ा हुआ...तन कर
कर्म...अधीन हो
झुकने लगा सर
हो कर जर-जर
गिर गया वह सर
फिर धरा पर...
बना राख..और..
जल कर ...
माटी का था
माटी में मिला
वह त्रिण सा
तन का..तिनका
चोला वह आत्मा का
आत्मा अजर अविनाशी |
रहेगा..घूमता
पुनः पुनः ..इस ..
सृष्टि में ...
चक्र सा वह...
घूम कर ||


टिप्पणी: जीवन चक्र..का वर्णन समझा रही हैं चित्र की तीलियाँ उसी परआधारित मेरी यह पंक्तियाँ लिखने का प्रयास रहा है |



Kiran Srivastava 
"जीवन चरण"
===================
धरती पर मानव आता है
अक्षम अपनें को पाता है,
कोशिश करके धीरे-धीरे
फिर घुटनों पर चल पाताहै ,

और जीवन चलता जाता है...।

फिर बारी चलने की आती
हर कदम सहारे की पड़ती,
गिर-गिर कर फिर जीवन में
वो सम्भलना सीख जाता है,

और जीवन चलता जाता है...।

अब बारी दौड़ लगानें की
शिक्षा संस्कार अपनानें की,
पढ़लिख कर जीवन में फिर
वो अपने मुकाम को पाता है,

और जीवन चलता जाता है....।

कमर तोड़ मेहनत करके
फिर मानव थकता जाता है,
लड़ते लड़ते वह जीवन से
अपना हर फर्ज निभाता है,

और जीवन चलता जाता है...।

जीवन का अंतिम पड़ाव
जर-जर शरीर कांपता पांव,
मिट्टी से बना शरीर एक दिन
पंचतत्व विलीन हो जाता है,

और जीवन चलता जाता है...।

===================
टिप्पणी- जन्म के बाद मनुष्य विभिन्न अवस्थाओं को पार करते हुए पुन:मृत्यु को प्राप्त करता है। चित्र में तीलियों के माध्यम से भी यही दर्शाया गया है।यह चक्र निरन्तर चलता रहता है।



गोपेश दशोरा 
~अमूल्य जीवन~

मानव जीवन तूने पाया,
पाकर भी तू क्या कर पाया?
जन्म लिया और बड़ा हुआ,
अपने पैरा पर खड़ा हुआ,
चला गया एक रोज बस,
औरों के कन्धे चढ़ा हुआ।
इस जीवन का क्या मतलब है,
तू समझ नहीं पाया इसको,
किसकी खातिर तू जिया यहाँ
क्यूं याद करे कोई तुझको।
अपनों के लिए सब जीते है,
सपनों के लिए सब जीते है,
औरों के लिए जो जीते है,
जीवन को वो ही जीते है।
कुछ कर्म यहां तू कर ऐसा,
मानव जीवन बदनाम ना हो,
आए, भोगे और चले गये,
पशु तुल्य सा काम ना हो।
यह तिनके सा मानव जीवन,
एक दिन ऐसे ढह जाएगा,
जिस पर तुझको अभिमान बहुत,
सब यहीं धरा रह जाएगा।
ऐ मनुज! जीवन बस इतना है,
हर चीज पे तू अधिकार ना कर
एक तीली कर देगी राख तुझे,
इस देह पे तू अभिमान ना कर।

टिप्पणीः जन्म से मृत्यु तक का सफर इन तीलियों में नजर आता है। पर क्या यह सफर ही जीवन की सच्चाई है? क्या इसीलिए विधाता ने हमें धरती पर भेजा है? इन्हीं भावों को शब्दों का रूप दिया है।




नैनी ग्रोवर 
~जीवन का सार~

सारे जीवन सार,
इक ही तस्वीर में कह गए,
थरथरा उठी कलम,
और हम भौंचके रह गए...

जन्म से मरण तक,
घूमा समय का पहिया,
जैसे आए, वैसे गए,
किया कुछ भी नही भैया,
लूटते रहे एक दूजे को,
यूँ बनके उच्चके रह गए..

कुछ ऐसे फंसे माया में,
के ठगनी ने ठग लिया,
बेच दी उसको अच्छाइयां,
और झूठा जग लिया,
कर्मों की दुकानदारी में,
हम तो बड़े कच्चे रह गए..

याद आया कभी मोक्ष तो,
भागे आश्रमों में,
बन्द कर आँखे, ज्ञान पाने,
इंसान के कदमों में,
बहल गये, जिसने बहलाया,
बस बनके बच्चे रह गए...

थरथरा उठी कलम,
और हम भौंचके रह गये..!!

टिप्पणी;, जन्म से मृत्यु तक का सफर सब जानते ही हैं परंतु आखिरी तीली ( अंजाम ) देख कर दिल फिर भी काँप जाता है, और जीवन भर कर किये कर्म याद आने लगते हैं ।


बालकृष्ण डी ध्यानी
~बस राख हो जाना और कुछ नहीं~


बस राख हो जाना और कुछ नहीं
जीवन है बस ये (और कुछ नहीं) ..... ३

किस का बस चला है
कौन यंहा पर रहा है
चलते हैं मिटने को सब
एक के बाद एक (ये सब को पता है) ..... २

लड़ते हैं फिर भी सब हैं झगड़ते
ना जाने किस बात पर सब क्यूं अकड़ते
ना जाने क्या खोया है यंहा पर क्या है खोजते
अब तक ना इस को ( कोई समझा है) ... २

जीवन चक्र है ये बस चलता रहा
रुकने का मतलब बस यंहा पर अलविदा है
कहानी है बस ये सबको सुनानी
आती जाती है ये बस (साँसों की रवानगी ) .... २

बस राख हो जाना और कुछ नहीं। ...........

टिप्पणी : जीवन के भेद को अब तक ना कोई समझ पाया है ना जान पाया है फिर भी लगे रहते ना जाने किस के लिये और क्यों सब के सब


Prerna Mittal 
~आवर्तन~

प्रभात से रात तक की यात्रा के विभिन्न चरण ।
देते जीवन की अवस्थाओं का विस्तृत विवरण ।

रात्रि के अंक से भोर की तरह जन्म लेता है लाल
लालिमा देखकर, माँ उसकी हो जाती है निहाल ।
घर भर में उसकी किलकारियाँ ऐसे गूँजती
प्रातः कलरव करती हों, चिड़ियाँ जैसे कूकतीं ।

उषा जिस तरह समाँ गई सुबह के पसरे आँचल में
बालक बढ़ रहा, घुटलियों चलता, रेंगता आँगन में ।
सवेरे ने करवाया स्फूर्ति व ताज़गी का अहसास
मासूम अठखेलियाँ उसकी, हृदय में भरती मिठास ।

आकाशचोटी पर अब सूर्य है चमक रहा
किशोरवय बालक का चेहरा है दमक रहा ।
रवि की सतरंगी रश्मियाँ जैसे ख़ुशी से झूम रहीं
नई आकांक्षाएँ, उमंगे उसके मन में भी झूल रहीं ।

दोपहर की कड़ी धूप है चारों दिशाओं में फैली,
अब दायित्वों से परिपूर्ण है उसकी भारी झोली ।
उष्णता के आवेश से जग है समस्त जल रहा ।
संघर्षों के बीच में से है पथ उसका निकल रहा ।

इस सुहावनी शाम की चहल-पहल में एक अजीब सी शांति है ।
खट्टे-मीठे अनुभवों की सौग़ात, परिपक्वता की कांति है ।
संध्या पहरा देती चौखट पर, लेकिन प्रविष्टि की चाहत में अंधकार है मँडरा रहा ।
पल-पल झुकती कमर के साथ हर पाप-पुण्य का लेखा-जोखा है याद आ रहा ।

निशा की धुँध चहुँओर, पसरी हुई है नीरवता।
चिरनिद्रा द्वारा, सांसारिक बंधनों से स्वच्छंदता
आरंभ ही दबी ज़ुबान में, अंजाम तय कर देता है ।
सुनता है हर शख़्स पर समझने से इंकार करता है ।

टिप्पणी : रात और दिन के चक्र से जीवन चक्र की समानता बताने की कोशिश की है । जिस तरह हर रात की सुबह निश्चित है और सुबह का अंत भी तय है । उसी प्रकार जन्म के बाद मृत्यु और फिर पुनर्जन्म का चक्र चलता रहता है ।


डॉली अग्रवाल 
~मन कस्तूरी~

तृष्णाओं की इस नगरी में
जिसका ओर ना कोई छोर
उम्र की चौखट पे
गिर के उठा , उठ के गिरा
ये तेरा --- ये मेरा
दुनिया दो दिन का रैन बसेरा
मिट्टी का तन था
सोने का मन था
मिट्टी में मिलता गया
फिर हाथ मलता तू रह गया
मुठ्ठी बांधे आया जग में
हाथ पसारे चल दिया
तेरे मेरे के खेल में
खुद को गवा कर चल दिया !!

टिपणी --- मिट्टी की काया फिर भी इंसान भरमाया


कुसुम शर्मा 
~नफ़रत~
-------------

कपट वो करता रहा
इर्ष्या की अग्न मे जलता रहा
बन कर अपना
अपनो को छलता रहा
नफ़रत का बारूद
हर किसी को वो
छल से देता रहा
जता कर झूठा प्रेम
प्रेम को छलता रहा
भर दिया उसने
एक दूसरे के
मन मे बैर
सुलगा कर
नफरत की तिल्ली
तमाशा वो देखने लगा
भस्म करके भाई चारा
कपट मुस्कान भरने लगा
जला कर घर प्रेम का
नफ़रत का बोया बीज
धर्म और जाति की
खींच दी लकीर !
क्या मिला उसको
जो उसने किया
जला कर
एक माचिस की तिल्ली
भस्म घर प्रेम का किया !!

टिप्पणी :- नफरत की आग लगा कर धर्म और जाति के ठेकेदार अपने स्वार्थ की सिद्धी करते है लोगो के मन मे एक दूसरे के प्रति भेदभाव भर कर अपना उल्लू सीधा करते है लोग इनके चक्कर मे आ कर एक दूसरे से लड़ने लगते है नफरत रूपी माचिस की तिल्ली सब कुछ जला कर राख कर देती है और ये अपने कार्य मे सफल हो जाते है !!


Madan Mohan Thapliyal शैल 
~मैं ( मानव )~


ए मैं ही तो हूँ -
ए मेरे ही अलग - अलग रूप हैं -
पंचतत्वों से निर्मित -
शैशव से जरा तक, यों कहूँ जन्म से मृत्यु तक-
जिन्दगी को हथेली पर लेकर घूम रहा हूँ -
एक जलते दिए की तरह-
जो कभी फड़फड़ाता है -
कभी अँधेरे को चीरता है -
कभी हौसला और हिम्मत बढ़ाता है -
उम्र बढ़ रही है, तेल सूख रहा है -
मैं अपने में ही खोया हूँ, भविष्य से अंजान -
शैशव - हर सुख का भंडार -
बालपन - अंतर्ज्ञान से भ्रमित -
युवा - भौतिक सुखों की चाह -
प्रौढ़ माया का पुतला, अंधी दौड़ -
जोड़ - तोड़ में, सर्वस्व न्योछावर -
सत्य से बे खबर -
यहाँ सब कुछ उधार का है -
चुकता तो करना ही पड़ेगा -
खाली हाथ आया था, खाली हाथ जाना पड़ेगा -
सूरज अस्ताचल की ओर गतिमान -
सारे सुख वैभव आँखों से ओझल -
सब तिरोहित , यहां तक कि रिश्ते नाते भी -
जब झुकना था, झुका नहीं, रुकना था रुका नहीं -
समय बलवान है -
उसके आगे कहाँ किसकी चलती है -
झुकना ही पड़ा, मर्जी से नहीं, अपने कर्म से -
इन्द्रियों ने खुद को समेट लिया -
सब कुछ घट रहा है, घिसटना जारी है -
बचपन में भी घुटनों के बल घिसटता था -
तब और आज में बड़ा अन्तर है -
तब ऊपर उठने की चाह थी -
अब ऊपर जाने की -
ए शोर कैसा -
शरीर धीरे - धीरे शिथिल हो रहा है -
भास्कर भी अपने तेज को समेट रहा है -
सब निश्चल खड़े हैं -
माया मोह सब शांत -
धर्म, तीर्थ, श्री, ऐश्वर्य ,जाति, रुतबा -
सब शरीर का साथ छोड़ रहे हैं -
सब यहीं रह जाएगा -
ज्ञान का उदय और अस्त एक साथ -
मैं किंकर्तव्य- विमूढ़ -
शायद बुलावा आ गया -
सब चलेंगे श्मशान तक -
आगे का रास्ता 'आत्मा' को तय करना है -
एक हिचकी और सब खत्म -
देह पंचतत्व में विलीन -
शेष यादें ---
अलविदा .
नोट - समस्त जीवों में मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो चैतन्य होकर काफी हद तक जीवन की परिभाषा से परिचित है लेकिन माया से वशीभूत वह अपने कल से अपरिचित हो जाता है, फलस्वरूप वह अपने कर्तव्य का निर्वाह ठीक से नहीं कर पाता. मृत्यु शाश्वत सत्य है या यों कहें कि अगले जीवन की तैयारी है इसलिए मृत्यु की विदाई भी सुखद होनी चाहिए.



Ajai Agarwal
 ''रुदन में आनंद के क्षण ''
===================

अलि ; है मुझे अहसास इसका -
जन्म-जन्मांतर से सदा ही -
तू रहा है साथ मेरे !
रुदन में आनन्द के क्षण
मूक से फिर मुखर होना
बालपन की रुनझुनों में
ममता बना था , साथ मेरे ,
तू रहा है साथ मेरे !
अनुराग हर वय का है अपना
स्वप्न का व्यवसाय जीवन
उन्नति , गती जब , हो गयी
पिता सा संबल बना ,
तू रहा तब साथ मेरे !
शत-शत कामनाओं के अंधड़
आपाधापी , कलरव लगे जब
हर लक्ष्य हर ध्येय में भी
तू ही तो था साथ मेरे !
कंटकों का रूप लेकर
गन्तव्य के वो पथ जो आये
पग ने मंजिल ढूंढ ही ली ,
तू सदा था साथ मेरे !
पूछती अब मैं स्वयं से -
चिर-पिपासित हृदय क्यूँ ये ?
क्या यही पाथेय मेरा ?
क्यों तुझे न जान पायी ?
क्यों नहीं पहचान पायी
तू तो सदा था साथ मेरे !
गोधूलि की बेला सुहानी -
लाल सुनहरे रंगों से सज्जित
आँचल , दिशाओं ने है ओढ़ा
कज्जल निशा के आगमन का
है यही संदेश मुझको
तू अभी भी साथ मेरे !
अलि ! यूँ ही रहना साथ मेरे !
जब चढ़ूँ मैं ज्वाल रथ पे
वह्नि हो प्रचण्ड जाये ,
चिंगारियों से सेज जगमग ।
ज्यूँ ; बादलों के बीच बिजली
अलि ! बादलों से झांकना तू ;
मेघ के अश्रु में ढलकर
चिर -पिपासित हृदय को तू
मिलन का उत्सव बनना !
अलि! तू मेरे ही साथ रहना !
तू रहा है साथ मेरे !
पितुमात , प्रियतम और बच्चे
अन्य सारे रिश्ते नाते ;
प्रवृत्तियां - दायित्व -जीवन
बस एक कम्पन एक थिरकन
सांस बनके मिट्टी के तन में
तू रहा है साथ मेरे ,
क्यूँ जांनने में देर करदी ?
क्यों मैं न तुझे , पहचान पायी ?
गर तुझे पहचान जाती
संगीत हो जीवन ये जाता
मैं जरा कुछ संवर जाती
प्यार की मूरत हो जाती
अलि ; अब तुझे मैं जानती हूँ
तू सदा था साथ मेरे
मेरी साँसों में छिपा था !
जीवन मेरा तुझको समर्पित
ध्येय ये ; तुझको मैं जानूं।। आभा।। ......

टिप्पणी........ जन्म के रुदन के आनंद से लेकर मृत्यु के संगीत तक ---इस चित्र में जीवन की हर अवस्था को दिखाया गया है --काश हम भी इस सत्य को समझें जीवन चंद सालों का ही मेला है --अंतिम लक्ष्य उस परमात्मा को पाना ही है जो हमारे साथ ही है हर पल सांस के रूप में ---साधना अभ्यास ,विवेक ,हित -अनहित ,शक्ति , साधक ,साधना विक्षेप ,स्वानुभूति ,प्रकाश आह्लाद सब कुछ ईश्वर को अर्पण कर दें तो '' त्येन त्यक्तेन भुञ्जिथ :'' की आनन्दानुभूति होगी और ''मा गृध:'' का अर्थ बोध होगा --लोभ लालच आसक्ति मिटेगी जिंदगी प्यार का गीत बन जायेगी -----जन्म और ज्वालरथ के सजने ,यानि मृत्यु के रुदन में आनन्दानुभूति ही होगी --''नवानिगृह्णातिनरोपराणी '' की मानिंद ।




Sunita Pushpraj Pandey 
~जीवन यात्रा~

लिखना है मंथन कर रही हूँ खुद का
परिभाषित करना है जीवन का सारांश
यू तो कह दूँ चंद शब्दों में
कि बचपन खेल में खोया,
जवानी चैन से सोया,
बुढ़ापा देख कर रोया!
पर कहना आसान है जीवन की गाथा
सबके लिए जीये ताउम्र
जब हसरत से देखा किसी को
लोगों ने मुहँ फेर लिए परीक्षाएं देते रहे
पास होते रहे न वजीफा मिला न कोई इनाम
बस दूसरों की मुस्कान को ही अपनी संतुष्टि मान
खुश हो लिये।

टिप्पणी - जीवन का वृतांत लिखना था पर जो उम्र भर दूसरों के हिसाब से चला हो वो क्या लिखेगा


प्रभा मित्तल 
--जीवन-संघर्ष--
-------------------------------------

क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर,
पञ्च तत्व से मिलकर बना शरीर।
अद्भुत है प्रकृति
नटी का क्रम भी।
सींचा मन से
अंगुल-अंगुल कर पाला
कर पूरी रखवाली।
घर-आँगन अब
गूँज रही किलकारी।

अपनी क्रीड़ाओं से
जग को हौले से महकाता
मोह पाश में बाँध
शिशु शैशव से
आगे बढ़ता जाता।

सपनों को पूरा करने में
एड़ी से चोटी तक जोर लगाता।
आशा और निराशा के झूले में
अकसर हिचकोले खाता।

यहीं से होता शुरु
जीवन का खेला
आगे बढ़ने की खातिर
संघर्षों का मेला।
मैंने देखा है बहुत करीब से
ढोती साँसों को
बदहवास और अकेला।

आज नहीं लिख पा रही मेैं
जीवन-चक्र की कथा
जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत।
जरूरी नहीं जी जाए मानव
सारी अवस्थाएँ,जीवन की
क्योंकि, उसका तो
हो जाता है...कभी भी अंत।

टिप्पणी : (जीवन आजीवन एक संघर्ष ही है ।)


सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Sunday, July 17, 2016

‪#‎तकब८‬ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता #8 ]



‪#‎तकब८‬ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता #8 ]
मित्रो लीजिये अगली प्रतियोगिता आपके सम्मुख है. नियम निम्नलिखित है 
१. दिए गए तीन चित्रों में सामंजय बना, कम से कम १० पंक्तियों की काव्य रचना शीर्षक सहित होनी अनिवार्य है [ हर प्रतियोगी को एक ही रचना लिखने की अनुमति है]. 
- यह हिन्दी को समर्पित मंच है तो हिन्दी के शब्दों का ही प्रयोग करिए जहाँ तक संभव हो. चयन में इसे महत्व दिया जाएगा.
[एक निवेदन- टाइपिंग के कारण शब्द गलत न पोस्ट हों यह ध्यान रखिये. अपनी रचना को पोस्ट करने से पहले एक दो बार अवश्य पढ़े]
२. रचना के अंत में कम से कम दो पंक्तियाँ लिखनी है जिसमे आपने रचना में उदृत भाव के विषय में सोच को स्थान देना है.
३. प्रतियोगिता में आपके भाव अपने और नए होने चाहिए.
४. प्रतियोगिता १५ जुलाई २०१६ की रात्रि को समाप्त होगी.
५. अन्य रचनाओं को पसंद कीजिये, कोई अन्य बात न लिखी जाए, हाँ कोई शंका/प्रश्न हो तो लिखिए जिसे समाधान होते ही हटा लीजियेगा.
६. आपकी रचित रचना को कहीं सांझा न कीजिये जब तक प्रतियोगिता समाप्त न हो और उसकी विद्धिवत घोषणा न हो एवं ब्लॉग में प्रकशित न हो.
विशेष : यह समूह सभी सदस्य हेतू है और जो निर्णायक दल के सदस्य है वे भी इस प्रतियोगिता में शामिल है हाँ वे अपनी रचना को नही चुन सकते लेकिन अन्य सदस्य चुन सकते है. सभी का चयन गोपनीय ही होगा जब तक एडमिन विजेता की घोषणा न कर ले.
निर्णायक मंडल के लिए :
1. अब एडमिन प्रतियोगिता से बाहर है, वे रचनाये लिख सकते है. लेकिन उन्हें चयन हेतु न शामिल किया जाए.
2. कृपया अशुद्धियों को नज़र अंदाज न किया जाए.


इस बार  की विजेता  है  सुश्री  किरण श्रीवास्तव 

नैनी ग्रोवर 
~चल उठ~

चल उठ सरपट भाग रे,
दिन चढ़ आया, जाग रे..

पंछी उड़े घोंसलों से,
देख कितने हौंसलों से,
संग संग पवन लहराते,
और अपने पंख फैलाते,
करने चले ये अपने काज रे..

दिन चढ़ आया, जाग रे..

मेहनत से मिलती हैं खुशियाँ,
मेहनत से ही चैन,
मेहनत का जो बहे पसीना,
हो नींद से भरपूर रैन,
मेहनत ही जीवन का साज़ रे..

दिन चढ़ आया, अब जाग रे..

मत रुक, के दिन है चलने का,
सूरज की ताप में, पलने का,
बैठ लेंगे, फुर्सत मिलेगी जब,
या कर इंतज़ार, शाम ढलने का,
बुझ जायेगी, मुश्किलों की आग रे...

चल उठ, सरपट भाग रे,
दिन चढ़ आया, जाग रे...!!


टिप्पणी:- जीवन चक्र मेहनत से ही चलता है, समय के साथ चलना आवश्यक है ।




Prerna Mittal 
~सर्वोत्तम क्या ?~

गोधन, गजधन, बाजिधन और रतन धन खान।
जब आवे संतोष धन सब धन धूरि समान।।

तुलसीदासजी तो कह गए पर है बड़ी भारी दुविधा,
आज किसका महत्व कम और किसका है ज़्यादा ।
स्वास्थ्य, परिवार, ज्ञान, यश,सम्पत्ति या बुद्धिमत्ता,
इतना ही नहीं काफ़ी, बावला बनाती बहुत सत्ता।

कैसे कह दूँ कि ये कमतर और वो बेहतर !
आप ही बताओ ना कैसे और क्योंकर ?

परिवार, प्रेम को जो बताऊँ सर्वोत्तम,
बिना धन के कैसे करोगे पालन-पोषण ?
पुरुषार्थ करना ना है सम्भव, बिना स्वास्थ्य,
ज्ञान का साथ भी ज़रूरी, अगर पाना है लक्ष्य ।
करीयर और संपत्ति का चोली दामन का साथ,
सभी चीज़ें संग चलें लेकर हाथ में हाथ ।

अभिप्राय यही जुदा नहीं कोई भी किसी से,
संतोष धन का तात्पर्य यही है मेरे विचार से ।
आवश्यक है सभी के बीच सामंजस्य बिठाना,
कमी और अति के बीच उचित संतुलन बनाना ।

ईश्वर भक्ति संग पुरुषार्थ करोगे,
नहीं कभी फिर असफल होगे ।
सारे स्वप्न तुम्हारे होंगे,
ख़ुशियों के पल सुहाने होंगे ।
योग, स्वास्थ्य और धन का संगम
ऊँचा ओहदा, प्यारे मित्रगण ।

टिप्पणी: ईश्वर रचित सभी जीवधारियो में मानव ही सर्वाधिक बुद्धिमान और गुणवान प्राणी है ।ईश्वर ने मनुष्य को इस कर्मक्षेत्र में भेजा है । यहाँ पर वह स्वयं अपने जीवन की दिशा निर्धारित करता है परंतु समाज में रहते हुए उसे सभी कर्तव्यों को पूरा करने के लिए सभी चीज़ों के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है ।




Kiran Srivastava
 "उडान"
========================

ये भोर हमें सिखलाती है
उर्जा से पूर्ण बनाती है,
सोए से जग जाओ तुम
उडनें की जुगत लगाओ तुम,

बहु वृद्धि चुनौती जीवन की
कंटक से भरा ये जीवन है,
कुछ आनी है कुछ जानी है
कुछ करके भी दिखलानी है,
भीड भरी इस दुनियां में
अपनी पहचान बनानी है,
सब पाना है जब जीवन में
कुछ खोना भी पड जाता है...!

नीड छोडकर पक्षी भी
दर-दर दानें को भटकता है,
पर शाम ढले तो वापस वो
अपने कोटर में आता है ।

हे मनुज उडान कितना भी भर
पर नाता रहे जमीन से,
ये भान रहे तुमको इतना
दौलत -शोहरत पाओ जितना,
अपने तो अपने होते हैं
उनको ना कभी भुलाना तुम,
मात-पिता बिसराना ना
उनको भी गले लगाना तुम...!!!

========================

टिप्पणी-
आज का दौर आगे बढनें का,शीर्ष को पानें का है । उपलब्धियों को हासिल करनें के लिए जीवन में बहुत से समझौते करने पडतें है । पर सपनों के पीछे इतना ना भागे की अपने पीछे छूट जाए ।




गोपेश दशोरा
~ जीवन की राह ~
बचपन बीता आई जवानी,
बदल गई जीवन की कहानी,
उड़ते थे उन्मुक्त गगन में,
किसी चीज की फिक्र नहीं।
जो मन चाहा वो सब पाया,
कहीं किसी की रोक नहीं।
स्कूल-काॅलेज अब खत्म हुआ,
आजादी भी खत्म हुई।
जिम्मेदारी खड़ी सामने,
आखिर उम्र जो बड़ी हुई।
जो भी मिलता है कभी कहीं,
बस ये ही पूछा करता है,
क्या करते हो? क्या करना है?
क्या घर बैठ ही जीना है?
घर वाले भी अब कहते है,
जाओं बेटा कुछ काम करो।
यहाँ काम जो नहीं मिले,
तो दूर देश प्रस्थान करो।
परिवार चुने या, अपना कल,
समझ नहीं कुछ आता है।
अब आ पहूंचे चैराहे पर।
किसी एक राह तो जाना है।
सच करने है मन के सपने,
बस साथ रहे मेरे अपने।
तो हर मंजिल पा जाएंगे।
जीवन को सफल बनाएंगे।
परिवार रहे बस सदा साथ,
मित्रों का हो हाथों में हाथ।
तब किसी बात की फिक्र नहीं,
चाहे कितनी गहरी हो रात।

टिप्पणीः बचपन की उन्मुक्तता के बाद जब जिम्मेदारियों का आगमन होता है तो कुछ समझ नहीं आता कि परिवार चुने, नौकरी चुने या कुछ और।




कुसुम शर्मा
~मुश्किलों को हटायें जा क़दम तू बढ़ाये जा !~
----------------------
मुश्किलों को हटायें जा
क़दम तू बढ़ाये जा
हौसला बुलन्द कर
हिम्मत अपने अन्दर भर
क़दम तू बढ़ाये जा
अपने लक्ष्य को पाये जा
चुनौतियाँ स्वीकार कर
बाधाओं को पार कर
विश्वास मन मे जगाये जा
क़दम अपने बढ़ाये जा
खुद पर यकिन कर
मंज़िलों को पार कर
पानी के वेग सा
तू हर घड़ी बढ़ता जा
चुनौतियों से लड़ता जा
क़दम अपना बढ़ता जा
मुश्किलों को हटाता जा

टिप्पणी :- अपने लक्ष्य को पाने के लिए जिस व्यक्ति के मन मे विश्वास हो , चुनौतियों का सामना करने कि हिम्मत हो और मंज़िल तक पहुँचने की ललक हो , खुद पर यकिन हो , तो वो अपने लक्ष्य तक पहुँच ही जाता है!




Madan Mohan Thapliyal शैल 
~मानव~


त्रिकाल, त्रिगुण, औ इस भुवन की, अपूर्व कृति तू,
दुःख, सन्ताप, क्लेश विश्व के, सबका निवारक भी तू.

शासन- प्रशासन सब तुझ में, सबका नियंत्रक भी तू,
प्रेम गाथा जन्मी तुझी में, सखा बन्धु- बांधव भी तू.

उत्तरार्ध भी तू, पूर्वार्ध भी तू, घर परिवार का वैभव भी तू,
धन, स्वास्थ्य यश, विवेक तेरे निमित्त, सबका पोषक है तू.

हर चौराहे से गुज़रते कई रास्ते, उनका निर्माण करता है तू,
कभी उलझता सरकारी तंत्र से, कभी सबका समाधान तू.

कभी विवेक से अपने, कर्तव्य परायण होकर भविष्य तय करता है तू,
अपने ही प्रारब्ध से खेलता निराकार का साकार प्रतिरूप तू.

रचना उसकी निर्माण तेरा, नील गगन सा विस्तार तू,
उड़ता जा स्वछंद परिंदों की मानिंद, प्रभु की अद्भुत रचना है तू.

चलना ही कर्म तेरा, रुकना नहीं, खुद की पहचान तू,
सारा विश्व तेरे लिए बना है, इसकी सच्ची पहचान तू.

इतिहास को बनाता बिगाड़ता कभी भौंचक्का रह जाता है तू,
कभी अबोध बालक सा, अपनी कृति से अंजान रहता है तू.

धरती तो क्या, व्योम तक पहुँचा है तू,
तेरा गुरूर मोह के वश, इसलिए भगवान नहीं बन पाया तू.

टिप्पणी - मानव ईश्वर की सबसे महत्वपूर्ण और श्रेष्ठ रचना है. मनुष्य ने ही सबका परिचय कराया यहाँ तक कि ईश्वर का भी, लेकिन मानव को अपनी सीमा का ध्यान नहीं रहा. गुरूर के कारण मानव स्वयंभू बन बैठा. हमें अपनी सीमा में रहकर अपना और विश्व का कल्याण करना चाहिए.




किरण आर्य 
*******दौड़********

मन की उड़ान
महत्वाकांक्षी दौड़
जिसका कोई ओर न छोर
स्वप्नों से यथार्थ तक
साँसों संग जीवन अनुबंध
जैसे मृग में निहित कस्तूरी गंध
भोर में पक्षियों के
कलरव संग
उड़ता पंछियों सा
चहचाहता उन्मुक्त मन
गोधुली के साथ
पूरे अधूरे से सपने
लौट पाते है पनाह
दिल के कोटर में
दौड़ एक अंधी सी
जीवन-मरण के फेर में बंधी
कर्मो को गुनती बुनती सी
छूटा बचपन खेल खिलोने
रह गए खाली दिल के कोने
निज में निहित जीवन सारा
पानी जैसे सागर का खारा
गौण हुए सब रिश्ते नाते
भावुकता गई है बट्टे खाते
दोस्त यार और घर परिवार
सब छूटने लगे है अब पीछे
आगे बढ़ने की जो चाह बावरी
हाथ पकड़कर हरपल खीचे
अहम है बस प्राप्ति
उम्मीदों से भरी उड़ान की
दौड़ता मन और जीवन
अंधाधुंध निरंतर हर क्षण
वैभव के आगे है झुकते
स्वास्थ्य बुद्धिमत्ता जीवन के रिश्ते
दौड़ है अंधी
सघन गलियारे
फिरे मन जीव मारे-मारे
गर लगन है सच्ची
कोशिश है जारी
कर्मठ मन के आगे
नाउम्मीदी है हारी
पथ है दुर्गम
थके है कदम
उड़ने को है आतुर
कोमल से पंख
संग हो अपने, तेरे जो जीव
हौसले सदा रहे सजीव
भर तू उड़ान
आस को थाम
प्रयासों में डाल दे जान
सपनों को अपने तू
आस और मेहनत से सींच
देखना होगी एक दिन निश्चित,
मन मेरे हाँ तेरी ही जीत..............

टिपण्णी:- महत्वकांक्षाओं के लिए मनुष्य दौड़ रहा है निरंतर.......निज में निहित उसकी कोशिशें और एक अंधी दौड़ जिसमे पीछे छूटा सब कुछ.............सुबह से लेकर शाम तक......जीवन से मृत्यु तक दौड़ता जीवन और जीव......




प्रभा मित्तल
~~~एक लक्ष्य~~~
~~~~~~~~~~~~~

बीती रैन अब भोर हुई
नयन खोल कर देख जरा
थाली में कुमकुम लेकर
नव प्रभात का स्वागत करने
प्राची से उषा आई है।
दूर क्षितिज पर सूरज उग आया।
पंछी भी उड़ चले गगन में,
जीवन को गति देने का,
अब तेरा भी अवसर आया।

जीवन-साधना-पथ पर
साधक बनकर
पग आगे रख,
उत्थान-पतन के
बीच से निकल -निकल कर
नित नूतन अनुभव कर।

साधना स्वास्थ्य से
स्वास्थ्य साधन से
साधन अर्थ से
अर्थ के लिए कर्म-श्रम,
बुद्धि-विवेक-चातुर्य जरूरी,
ये सब एक ही
थैली के चट्टे-बट्टे हैं
जीने के तौर- तरीके हैं।

आदि काल से मानव का
बस यही प्रयत्न रहा है
एक लक्ष्य निर्धारित कर
'अर्थ'के पीछे भाग रहा है।
संसार-चक्र से बंधकर
नेह-पगा,मोह-माया में फँसकर
संगी-साथी औ परिजनों के
सुख-सपनों को साध रहा है।


टिप्पणी: मनुष्य जीवन यापन के लिए अपने हर सुख-स्वप्न को पूरा करने का हर संभव प्रयत्न करता है


सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Friday, July 8, 2016

‪‎तकब७‬ - तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता #7



‪#‎तकब७‬ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता #7 ]
मित्रो लीजिये अगली प्रतियोगिता आपके सम्मुख है. नियम निम्नलिखित है 
१. दिए गए चित्र पर कम से कम १० पंक्तियों की रचना शीर्षक सहित होनी अनिवार्य है [ हर प्रतियोगी को एक ही रचना लिखने की अनुमति है]. 
- इस बार आपको किन्ही पांच पुराने खेलो का जिक्र आपको अपनी रचना में जरुर करना है
- यह हिन्दी को समर्पित मंच है तो हिन्दी के शब्दों का ही प्रयोग करिए जहाँ तक संभव हो. चयन में इसे महत्व दिया जाएगा.
[एक निवेदन- टाइपिंग के कारण शब्द गलत न पोस्ट हों यह ध्यान रखिये. अपनी रचना को पोस्ट करने से पहले एक दो बार अवश्य पढ़े]
२. रचना के अंत में कम से कम दो पंक्तियाँ लिखनी है जिसमे आपने रचना में उदृत भाव के विषय में सोच को स्थान देना है. 
३. प्रतियोगिता में आपके भाव अपने और नए होने चाहिए. 
४. प्रतियोगिता ७ जुलाई २०१६ की रात्रि को समाप्त होगी.
५. अन्य रचनाओं को पसंद कीजिये, कोई अन्य बात न लिखी जाए, हाँ कोई शंका/प्रश्न हो तो लिखिए जिसे समाधान होते ही हटा लीजियेगा.
६. आपकी रचित रचना को कहीं सांझा न कीजिये जब तक प्रतियोगिता समाप्त न हो और उसकी विद्धिवत घोषणा न हो एवं ब्लॉग में प्रकशित न हो.
विशेष : यह समूह सभी सदस्य हेतू है और जो निर्णायक दल के सदस्य है वे भी इस प्रतियोगिता में शामिल है हाँ वे अपनी रचना को नही चुन सकते लेकिन अन्य सदस्य चुन सकते है. सभी का चयन गोपनीय ही होगा जब तक एडमिन विजेता की घोषणा न कर ले.


इस बार की विजेता है  सुश्री  प्रभा  मित्तल  जी - हार्दिक  बधाई 

नैनी ग्रोवर 
~बचपन के खेल~

बड़े ही प्यारे, लगते थे,
बचपन के खेल न्यारे न्यारे..
कड़ी धूप में भी, हो जाते,
इक्ट्ठे मित्र जो सारे...
लेके पुराने साइकल के पहिया,
और मोड़ के लम्बी तार,
घुमाते फिरते, सारा मौहल्ला,
ज्यूँ हो वो फरारी कार..
बीच गली में बनाते चॉक से,
खानों वाला स्टापू,
होड़ लगती फिर सबमे के,
सब के सब मैं टापूं..
ढूंढ के लाते, सड़क किनारे से,
हम सब छ गीटे,
एक उछाल के, पांच पकड़ते,
सारा दिन यूँ ही बीते..
फॅसा के पैरों में पैर, होती थी ज़ोर आज़माइश,
जीत जाता जो वो करता, कोला की फरमाइश...
खो-खो में, आता था मज़ा, जो हारे, उसे होती थी सज़ा,
चिड़ाते उसे सारे के सारे, पीपनी और डब्बे बजा..
सुनसान पड़ी हैं, अब ये गलियाँ,
खिलती नहीं बचपन की, अब कलियाँ,
टीवी और मोबाइल ने छीने,
बारिशों के दिन भीने-भीने,
अब पहले सी, बचपन की मुस्कान कहाँ है ?
गलियों में पला, मेरा हिन्दुस्तान कहाँ है ?
ये जो एयरकंडीशन कमरे हैं,
ये कम्प्यूटर है मशीने हैं,
दिए इन्होंने इंजियर और डॉक्टर बहुत,
पर मेरे देश की सरहद से वीर छीने हैं..
विज्ञान से करो तरक्क़ी, सीखो और सिखाओ तुम,
पर खेलकूद के दिनों में अपने, पसीना तो बहाओ तुम..!!


टिप्पणी :- आज की नई पीढ़ी के खेल कमरो में ही सिमट कर रह गए हैं, ना उन्हें अब मौसम का मज़ा मालूम होता है, ना ही अब बच्चों के शरीर में वो फुर्ती है जो हमारे समय में हुआ करती थी..


अलका गुप्ता 
~~~भूल न पाए खेल~~~


समय का पहिया...ऐसा...घूमा...भइया |
घूमा न फिर बचपन का उल्टा पहिया ||

खेल खिलौने...धमा चौकड़ियाँ..छौने |
छुआ-छुम्बर..चोर-सिपाही ता-थइया ||

लगती...रहती...टेर..आने...खाने को...
हमें न...फुरसत होती..गुट्टों से...हइया ||

इक्कड़-दुक्कड..खेले..विष-अंबर..खूब |
साँप-सीढ़ी...शतरंज..अर..गुयम-गुइया ||

बूढ़े-बाढ़े... अब...दद्दू...बन गए..हम..
भूल न पाय खेल हम..वो..हाय दइया ||



टिप्पणी
न हम भूले वह बचपन के दिन 
न भूले हम वह खेल पुराने जो 
अधिकतर अब...नहीं दीखते |


\
Kiran Srivastava 
"यादें"
========================

पीछे छूट गया जो सपना
वो भी क्या था बचपन अपना,
अपनें भी कुछ जज्बे थे
जब हम छोटे बच्चे थे,
होती थी बच्चों की टोली
हर दिन लगे दिवाली -होली
इक्कड-दुक्कड में धूम मचाये
कोई डग्गा खूब दौड़ाये
चोपट और गोट्टी का खेल
चार लोग खेले संमेल
उछल कूद और भागम-भाग
सीलो-सालो..करे कमाल
झट से रूठे झट मान जाते
फिर हम जोली भी बन जाते
सारे सबक याद कर जाते
खूब प्यार अपनापन पातें
कोई नहीं पैमाना था
वो भी क्या जमाना था...!!!!

टिप्पणी-
पुराने खेल -खिलौने अब खो से गये है ,जिनसे मन और शरीर स्वस्थ रहता था ।इसका स्थान टीवी और मोबाइल ले लिया है । जो बच्चों को बीमार बना रहा है।


Prerna Mittal 
~समय का खेल~

परिवर्तन प्रकृति का नियम है और
आवश्यकता आविष्कार की जननी है ।
रटे ये जुमले ना जाने कितनी बार तथा
लिखे रेखांकित कर-करके इम्तिहान में
बिना समझे मतलब, केवल एक ही टेक ।
परीक्षा में लाकर अंक, बनना है नम्बर एक ।

पढ़ाई में अव्वल रहना, ख़ूब खेलना,
स्कूल से आते ही खेलने के लिए बाहर भागना,
सपोलिया, छुपन-छुपाई, लँगड़ी टाँग, पोशमपा, गुट्टे,
ख़ूब जमकर धमाचौकड़ी मचाना,
बचपन बीत गया पलक झपकते जाना अनजाना ।

अब समझ में आया, उन उक्तियों का असली अर्थ,
जब भागती दुनिया के साथ चलने में हुए असमर्थ ।
परिवर्तन की तीव्र गति से मस्तिष्क है चकराता,
कहीं पीछे ना रह जाएँ, यह सोच मन घबराता !
आजकल के खेल सारे मोबाइल, टैब और कम्प्यूटर पर
ना जाने की कहीं ज़रूरत, सब बैठे अपने बिस्तर पर

वक़्त का काँटा एक ही दिशा में अपनी गति से है घूमता,
तुम कितना रोको, आवाज़ दो, यह किसी की नहीं ना सुनता ।

प्राचीन काल में हुआ करती थी आविष्कार की जननी आवश्यकता ।
आवश्यकता की जगह अब ले ली जिसने, वह है, महत्वकांक्षा ।
मेरे विचार में अपरिहार्य ये परिवर्तन है,
क्योंकि यह तो प्रकृति का नियम है ।


टिप्पणी : समय और उसके साथ होने वाले बदलाव अटल हैं । यह परिवर्तन हमें पसंद या नापसंद हो सकता है । कई बार नागवार भी गुज़रता है । पर इस पर बस किसी का नहीं चलता।


गोपेश दशोरा 
~मेरा बचपन~

गाँव भी छोटा लगता था, जब पांव कुलाँचें भरते थे।
मिट्टी के घरों में रहकर भी, हम राज दिलों पर करते थे।
मैदान खेल का कहीं नहीं, ना कोई बल्ला, हाॅकी थी,
खेल हमारे अजब गजब, क्या अजब हमारी झांकी थी।
छोटे-मोटे कंकर लेकर, घंटों तक खेला करते थे,
पहिया मिल जाए अगर कही, तो खूब चौकड़ी भरते थे।
क्या छिपनी, क्या पकड़ा-पकड़ी, क्या लंगड़ी खेला करते थे।
जब थक जाते तो आम तले, झूलों पर झूला करते थे।
गुलैल हाथ में लेकर, फिरते रहते थे खेतों में,
चोरी करते थे आम सभी, पर सच्चाई थी बातों में।
ना कोई था अनजान वहाँ, ना हमें किसी ने रोका था,
भूख लगे तो फिकर नहीं, घर-घर में हमारा चैका था।
ना गली, मोहल्ला, काॅलानी, पूरा ही गाँव हमारा था।
जब शहर गये तो क्या देखा, अपना ही नाम सहारा था।

टिप्पणीः आज जिन्दगी की इस भागादौडी में अगर पीछे मुड़कर देखें तो सिर्फ बचपन के ही दिन याद आते है। जब किसी चीज की फिक्र नहीं थी, कुछ भी नहीं था पास फिर भी बहुत कुछ था, जो आज नहीं है।


Ajai Agarwal  आभा अग्रवाल
खेल -खेल में सीखें थीं
==============--

आज याद जब भी आती है ,बचपन की दुनिया अपनी
रोम -रोम में थिरकन होती, ख़्वाबों में खो जाती हूँ ,
कितनी छोटी, सहज ,सुरीली ,दुनियाँ थी वो बचपन की
ख़ुशी आस -पास तिरती थी ,छोटी छोटी बातों में ,
पल -पल जोश ,उमंग भरा था ,खेल -खेल में सीखें थीं ,
महंगे -महंगे खेल खिलौने ,इनकी हमको चाह न थी .
ढूंढ़ -ढांड कर गिट्टू आंगन से ,आंगन में ही खेल जमा
उछाल हवा में पाँचों गिट्टू इक्की दुक्की ,झपकू ,पंजा
बुद्धि नजर हाथ का संतुलन शायद हम यहीं पे सीखे |
पत्थर के टुकड़ों को चुन कर ,पिट्ठू -गरम बना लेते थे
गेंद नही तो क्या , कपड़ा ऊन सुई धागा लेकर
सब बच्चों ने मिलजुल कर ,सतरंगी इक गेंद बना ली
जुगाड़ और काम चलाना ,कम खर्च बाला नशीं
फुर्ती ,शक्ति और संतुलन ,कितनी सीखें थी इस सब में |
आइस -पाइस छुपम छुपाई ,आस -पास ही भागम -भगाई
विष अमृत , -टिप्पी टॉप खेलते ,रंगों में हम रंग जाते थे
आसपास की हर हरकत पे ; ध्यान लगाना ;चौकन्ना रहना ,
शायद जासूसी के कुछ गुर अवश्य ही इन खेलों से आये |
एक पहिया साइकिल का ,एक डाल से लकड़ी तोड़ी ,
सड़कों पे पहिया चल पड़ता ,वो पल गर्वीली ख़ुशी के होते
पहिये के नीचे तार या लकड़ी ,और सडक पर भागम- भाग
क्या अनोखा संतुलन ,नजर न भटके सीखी बात
जीवन की गाड़ी के पहिए आज भी यूँ ही चलते -
आधार आज भी जीवन को अनुभव के तारों से देते |
चिड़िया उड़ ,तोता उड़ ,रोटी उड़ पे कौन उड़ बोला !
ताली बजी आउट हुआ ,ध्येय पे ध्यान ये हमने सीखा
अर्जुन सी हो नजर ध्यान लक्ष्य पे रहे हमेशा
कभी नही फिर वाणी फिसलेगी ,बुद्धि ध्येय पे ही टिकेगी |
टप -टप टप ,स्टेपू पे यादों के बादल बरस रहे हैं ,
संतुलन हम यही से सीखे ! एक टांग से टपना हो या
दोनों से लेनी हों छलांग ,लाइन पे न पड़े पैर ,
एक से सात घरों को टपना और अपना अधिकार बनाना
मेहनत से कुछ मिलने की ख़ुशी को ,सबसे पहले यहीं पे जाना |
और चौपड़ की बिसात पे ,बड़ों को भी खेलते देखा ,
कौड़ी -कौड़ी माया जोड़ी ,कौड़ी का भी मोल है समझा
ऊँची कूद भी हाथ पाँव को जोड़-जाड के कूद गये
पाला --लगे लम्बी व् ऊँची कूद ,बस नजर लक्ष्य पर रखनी होगी
अपनी परीक्षा आप ही लेके ,बारम्बार कोशिशे करनी
कभी गिरे कभी कूद गए पर सीखेंगे ये जिद न छोड़ी |
कभी न मांगे हमने माँ से, महंगे -महंगे खेल खिलौने ,
अलमस्त बचपन में हम सब ,सखियों संग ,झूला झूले
पढ़ना ,लिखना ,सीना बुनना और पिरोना, पाक कला औ -
अतिथि स्वागत , खेल खेल में पढ़ गये जीवन के ये पाठ सुहाने |
संवेदनाएं जीवनकी ,समरसता में जीना क्या है?
साथ निभाना संकल्पित होना ,बाधाओं में डट कर टिकना ,
खेलों में हमने सीखा ,हार जीत पे संतुलित होना
सबको साथ लेके चलना ,प्रीत प्यार से हिलमिल रहना |
समय घड़ी की रेत रिस रही , समय लगा के पंख उड़ चला ,
पर आज उलट इस समय घड़ी को ,मैं फिर बचपन में घूमी ,
ख़्वाबों के जंगल में बचपन संग , फिर से सारे खेली खेल
बचपन की गलबहियां डाले -अपने -पाले तेरे पाले
कविता के दर्पण में आज हुआ फिर , बचपन से मेल |
अब बचपन पूरा बदल गया है ,बच्चों को तो बैट बॉल चाहिए ,
बैड -मिन्टन ,फुटबॉल ,बेस और बास्केट बाल चाहिए ,
मोबाइल ,और लैपटॉप ,साथ में कम्पयूटर गेम्स चाहियें ,
रफ़्तार यदि सीखनी हो तो ,सायकिल-स्कूटर बाइक चाहिए .
और भागने दौड़ने को ,ट्रेड -मिल या रन फार एनी कॉज चाहिए ,
यह सब मिल जाने पर भी ,अब बचपन उतना शांत नहीं है .
भोला और निष्पाप नहीं है ,सुविधाओं में गुम गया कहीं है
अपने को साबित करने के बोझ तले , गुम गया आज बचपन कहीं पे |
बचपन को फिर से गढ़ना ,संवेदनशील बनाना ,
बचपन को बचपन देना ,भोला और सरल बनाना
खोगया कहीं जो हाई -टेक होकर ,,मोबाइल गेम्स से वापस लाकर ,
प्रकृति से मिलवाना , क्या हो सकता है ये फिर से ?
यक्ष प्रश्न ये पर !
कुछ तो जुगत भिडाना होगा ,बचपन को बचपन से मिलवाना होगा
तब ही शायद लौटेगा सच्चा बचपन भोला बचपन-|||आभा||

टिप्पणी----बचपन के खेल भूले नही जाते ,समय की रेत पे निशां नहीं समुद्र से टकराके चट्टानों पे बने निशानों की भांति पक्के वाले निशांछोड़ जाते हैं ,जरासा पन्ना पलटो जीवंत हो उठती हैं स्मृतियाँ--------



Madan Mohan Thapliyal शैल  
~खेल जिन्दगी के~

बचपन के खेल अद्भुत और निराले,
रो पड़तीं आंखें, जब ससुराल जाती कपड़ों की गुड़िया,
गुड्डा-गुड़िया के खेल में,
छलक पड़ते मधुरस के प्याले--
पुराने खेल अद्भुत और निराले. *****

अकड़ बकड़, लंगड़ी टाँग-- खेल प्यारे,
पसीने से तर-बतर हो गए सारे,
चले मतवाले, भार इक दूजे पे डाले,
बचपन के खेल अद्भुत और निराले. *****

आसमां में देखो, बादलों के छौने हैं मन भावन,
रंग-बिरंगी पतंग झूमती, घिर आया है सावन,
कोई खेले कंचे, कोई साफ करे मकड़ी के जाले,
बचपन के खेल अद्भुत और निराले. *****

कभी लूडो साँप सीढ़ी, कभी चौसर सज़ा डाली,
मन किया हॉकी का, चीथड़ों से गेंद बना डाली,
खेल के शौक़ीन सारे, चले गले में बाँहें डाले,
बचपन के खेल अद्भुत और निराले. *****

टीले पर चढ़ कोई विक्रमादित्य बनता,
ध्यान से हर किसी की फ़रियाद सुनता,
इक ग्वाले का सुन फ़ैसला, हर्ष से गुनगुना ले,
बचपन के खेल अद्भुत और निराले. *****

गोमती किनारे शतरंज की बिसात बिछती ,
डरपोक नवाबों की ताकत शतरंज में दिखती,
घर लुटें चिन्ता नहीं, वजीर पहले बचाले,
पुराने खेल अद्भुत और निराले. *****

कर दूं जि़क्र महाभारत का, ज्ञात है सभी को,
जुआ खेलने बुलाया पांडवों में महाबली को,
कर दी धर्मराज ने ताकत जुए के हवाले,
पुराने कुछ खेल नैया डुबोने वाले *****

खेल खेलो तन मन से खेलो,
देश का नाम हो रोशन, ऐसा खेल खेलो,
कबड्डी, पिट्ठू हैं बुद्धि वर्धक ज्ञान बिन्दु सारे,
एकता की दे मिसाल सबको अपना बना ले ****

कभी झुरमुटों की संधि से झाँकते,
लुकाछिपी के खेल में बुद्धि कौशल आँकते,
पोटली में चबेना था जो मां का दिया,
लगायी हाँक साथी को, आ थोड़ा तू भी चबा ले
बचपन के खेल, शैल- अद्भुत और निराले  ******

****
टिप्पणी - खेल चाहे पुराने हों अथवा नए, सभी शारीरिक क्षमता, ज्ञान और भाईचारा बढ़ाते हैं. शारीरिक विकास के लिए खेल ज़रूरी हैं. खेलों को तन मन से खेलना चाहिए. विकृत मानसिकता वाले खेलों का बहिष्कार करना चाहिए.


डॉली अग्रवाल 
~मासूम बचपन~

आहा ! मेरा बचपन सुहाना
कितना मासूम कितना प्यारा
नही भूली बाबुल की वो गालिया
जहाँ आँख मिचौली सा बीता जीवन
छोटी छोटी जरूरते थी
बिना किसी उलझन रोटी बाटी थी
तीली से धनुष बना , सीको से बाण सजाया था ---
हर मोहल्ले में राजा बन मन भरमाया था
हुर्र , कबड्डी ,आइस पाइस
चार आने में सजती थी नुमाईश
विष अमृत में जी जाना
हॉफ हॉफ कर दौड़ लगाना
वो गिली डंडा खेलना
कंचे चुरा कर भागना
सखियो संग गीटे खेलना
हार जाने पर मुँह फुलाना
अगले पल को मान चुनोती
फिर से गेंद आकाश में उछालना
ना पढ़ाई की फिक्र
ना समय की बंदिश थी
हर रात परीयो की कहानी थी
सूखी रोटी से भी पेट भरता था
तलैया के पानी से भी मन भरता था
खो गया कहि वो मेरा मासूम बचपन

टिप्पणी 
आज को देख कर --- अब हवा में वो जहर है की बचपन बेमौत मर रहा है !!




कुसुम शर्मा 
~बदले समय ने खेल भी बदल दिये~
-----------------------

मेरी बिटिया पूछ रही थी
माँ तुम भी बचपन मे
विडियो गेम खेला करती थी
तो नानी क्या ?
तुम को एेसे ही
बार बार टोका करती थी
मैने बड़े प्यार से
अपनी बिटिया को समझाया
पहले ये फ़ोन और विडियो गेम नही थे !
न ही आँखे ख़राब का डर
मै घर पर रहकर
नानी के संग
केरम खेला करती थी
लाल डिब्बी को लेने के लिए
बार बार कोशिश करती थी
हार जाती तो फिर रोती
साँप सीडी ले कर आती
बड़े मज़े का था ये खेल
साँप के काटने से नीचे आते
देख सीडी को चढ़ जाते
सौ अंक का है ये खेल
गोटी रानी ही है मैन
जितने नम्बर आयेंगे
उतनी चाल चलोगे
साँप से बचो
और सीडी से चढ़ो
जो इस गेम मे मज़ा
विडियो गेम मे कहाँ

बड़े प्यार से फिर उसने पूछा
क्या माँ
गरमी की छुट्टियों मे
तुम दिन भर घर पर रहती थी
या तुम भी बाहर घूमने जाती थी
मै बोली
जब हम छोटे थे रानी
हम शाम को बाहर जाते थे
अपने दोस्तों के साथ मिलकर
दो टीमों मे बट जाते थे
कभी छुपन-छुपाई या
पिट्ठू खेला करते थे
बड़ा मज़ा आता था इनमें
मन भर जाये तो फिर
आँख मिचौली ,लग्डी टाँग ,
खो-खो खेला करते थे
बड़े मज़े के थे वो दिन
लेकिन अब वो दिन नही है
जो पहले हुआ करते थे

बदलते समय ने
सब कुछ बदल दिया
माहौल और खेल बदल दिया
अब न बच्चे गलियों मे आकर
शोर मचाते है
न ही खेल जमाते है
सारे दिन भर बस
फ़ोनों या कम्प्यूटर पर चिपके रहते है
बहार के नाम पर गलियों मे घूमा करते है
पहले की बात कुछ ओर थी रानी
अब सब कुछ बदल गया
सोच बदली विचार बदले
रहने का ढंग और संग बदल गया

किसी के पास समय नही !
पहले का प्यार और प्रेम नही !!

टिप्पणी :- जो खेल पहले हुआ करते थे वो अब धीरे धीरे समाप्त हो रहे है ! दौड़ती भागती इस दुनिया मे ,किसी के पास समय नही ,बच्चे छोटे से ही फ़ोन और कम्प्यूटर का प्रयोग कर रहे है जो अच्छा भी है तो बुरा भी वह किसी के साथ न खेल कर दिन भर फ़ोन और कम्प्यूटर पर खेलते रहते है जो उनकी आँखो के लिए अच्छी बात नही एक जगह बैठ बैठ के आलसी हो गये है उनके शरीर मे फुर्ती और शक्ति नही



प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~बीता बचपन~


समय का चक्र
ऐसा घूमा
खो गए सारे
बचपन के खेल
न वक्त रहा
न रहा वो मेल

सुन कर जब
संगी साथियो की टेर
तब निकल पड़ते
झट से न लगती देर
मौसम की
न होती किसी को परवाह
बारी मिले
बस इतनी केवल होती थी चाह
मिट्टी से थी तब दोस्ती
न दिन का होश न खबर

कहाँ भूले है हम
अक्कड़ -बक्कड़ बम्बे बो...
पौसम्म पा भई पौस्म्म पा....
कोडा जमालशाही पीछे देखे मार खाई...
हर समन्दर गोपी चन्दर ...
हर खेल में थे प्रकृति से जुड़े बाते
न जाने
कहाँ गम हुई वो यादें वो बाते

छुपम छुपाई
का खेल था आइस पाइस
कबड्डी खो खो
से होती थी एक्सरसाइज़
लट्टू, गुल्ली डंडा, पिट्ठू
थे सच में बचपन के अभिप्राय
कंचो से भरी जेब
आधे खरीदे आधे जीते
गिन कर सोते उठ कर फिर गिनते
अपनी अमीरी का अहसास होता
विष अमृत कहते कहते
अपनों को हर बार जीवन देते
गुलेल का साध निशाना
अमरुद और आम गिराना
जिसका बल्ला उसके बैटिंग
अपने नियम अपनी सैटिंग

अब न गलियों में वो शोर है
पार्क में नहीं, घरो में बंद बच्चे
टीवी और वीडियो गेम
कम्प्युटर या इन्टरनेट
बस यही वक्त ने दिया है ....


टिप्पणी: वक्त ने अपनी मिट्टी से बचपन को अलग कर दिया है जो अधिकतर कैद से हुए  है घर में ...


प्रभा मित्तल 
~~बचपन के दिन ~~
~~~~~~~~~~~~~~~

बचपन की तो थी बात निराली,
जैसे हर दिन होली,रात दिवाली।
सखियों संग बैठ खूब गिट्टे खेले,
सब समय लगते थे खेलों के मेले।

कुल्हड़ तोड़ा खूब पिट्ठू गरम बनाए,
टूटी मंजिल जो जोड़े, उस पर धाए।
खेलें आँख-मिचौली, छुपम-छुपाई,
खोजते-खोजते चोर की शामत आई।

चिड़ियाँ-तोते उड़ाते-उड़ाते
चूहे-बिल्ली भी उड़ जाते थे।
हँसते-हँसते दोहरे होकर हम
खेल से ही निकाले जाते थे।

हम जब घर पर पढ़ने बैठते ,
मेज पर रखते रेत का टाईमर।
रेत गिरने से पहले ही दिखा देते,
जल्दी-जल्दी प्रश्नों को हल कर।

घमंड नहीं था किसी बात का,
दुःख भी सुख सा लगता था।
नाराज़ बड़ों को मनवाने में,
बस प्यार ही काफी होता था।

गर्मियों की दोपहर बाग में,
घने पेड़ों पर झूला झूलते थे।
आम चुराने जाते जब हम,
माली दौड़-दौड़ पीछे आते थे।

अपना पहिया देकर, भइया
मेरी नई गाड़ी खेलने ले जाता था।
छोटी थी मैं पर 'मेरी बड़ी बहन है'
कहकर, खूब काम करवाता था।

जाने क्या था उसके शब्दों में
उस पर मैं फूली नहीं समाती थी।
मूढ़मति ही ठहरी, जो घंटों बैठी,
उसका होमवर्क भी निपटाती थी।

पिता भी हम बच्चों के संग,
हमारे बाल सखा बन जाते थे।
तकिेए में रख कागज के नोट,
डाक व बैंक का काम सिखाते थे।

बीत गए वो बचपन के दिन,
अब तो सब सपना लगता है।
बच्चे भी अब कहाँ गए सब,
गली-मौहल्ला सूना दिखता है।

सारे खेल सिकुड़कर रह गए,
फोन,टी.वी.और कम्प्यूटर में।
बच्चों का बचपन छीज रहा,
इस महानगर के ऊँचे घर में।

प्रगति कभी बुरी नहीं होती,
हर हाल में अति बुरी होती है।
खेल-कूद कर पूरी करें नींद, तो-
बच्चों की सेहत भी अच्छी होती है।

बच्चे मिलकर करें धमा-चौकड़ी
गर बड़े भी साथ बच्चे बन जाएँ
प्यार से रहें सब मिल-जुलकर
बच्चे अपना बचपन जी जाएँ।


टिप्पणी :
(आज के वैज्ञानिक युग में जहाँ एक ओर प्रगति हुई है ,वहीं दूसरी ओर बच्चों का बाल मन तमाम प्रतियोगिताओं से बँधकर रह गया है..उन्हें ज़रूरत है..स्वतंत्रता की..स्वच्छंदता  की..ताकि उनके व्यक्तित्व का चहुँ ओर सम्पूर्ण विकास हो सके।)



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