Tuesday, June 20, 2017

जून तस्वीर #तकब जून





नमस्कार मित्रों 
पुन: आपके समक्ष एक चित्र रख रहा हूँ. नियम व् शर्ते उसी रूप में होंगी, चयन प्रक्रिया भी उसी रूप में रहेगी. निर्णायक मंडल की दृष्टी से श्रेष्ठ रचना को सम्मान पत्र से पुरस्कृत किया जाएगा.
निम्नलिखित बातो को अवश्य पढ़िए.
१. अपने भावों को कम से कम ८ - १० पंक्तियों की काव्य रचना शीर्षक सहित लिखिए. एक सदस्य एक ही रचना लिख सकता है. 
२. यह हिन्दी को समर्पित मंच है तो हिन्दी के शब्दों का हीप्रयोग करिए जहाँ तक संभव हो. चयन में इसे महत्व दिया जाएगा.
[एक निवेदन- टाइपिंग के कारण शब्द गलत न पोस्ट हों यह ध्यान रखिये. अपनी रचना को पोस्ट करने से पहले एक दो बार अवश्य पढ़े]
३. रचना के अंत में कम से कम दो पंक्तियाँ लिखनी है जिसमे आपने रचना में उदृत भाव के विषय में सोच को स्थान देना है. 
४. आपके भाव अपने और नए होने चाहिए. [ पुरानी रचनाओं को शामिल न कीजिये ]
५. इस चित्र पर भाव लिखने की अंतिम तिथि १५ जून, २०१७ है.
६. अन्य रचनाओं को पसंद कीजिये, कोई अन्य बात न लिखी जाए, हाँ कोई शंका/प्रश्न हो तो लिखिए जिसे समाधान होते ही हटा लीजियेगा. साथ ही कोई भी ऐसी बात न लिखे जिससे निर्णय प्रभावित हो.
७. आपकी रचित रचना को कहीं सांझा न कीजिये जब तक समाप्ति की विद्धिवत घोषणा न हो तथा ब्लॉग में प्रकशित न हो.
८. विशेष : यह समूह सभी सदस्य हेतू है और निर्णायक दल के सदस्य भी एक सदस्य की भांति अपनी रचनाये लिखते रहेंगे. हाँ अब उनकी रचनाये केवल प्रोत्साहन हेतू ही होंगी.
धन्यवाद !

 विजेता रोहिणी शैलन्द्र नेगी



प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल  - प्रोत्साहन हेतू एक रचना 
~एक प्रश्न ~


लिखने का शौक 
आधुनिकता की अंधी दौड़ में 
कलम को छोड़ 
कम्प्युटर में जुड़ गया 
शब्दों का ज्ञान
शब्दों की खोज अब 
गूगल में सिमट गई 
सच कहूं - शब्द अब 
अक्ल के सूखे खलिहान में 
नकल से उभर कर 
साहित्य की शक्ल में 
दखल देने लगे है 
शब्द भाव अशुद्धता की बेड़ी में 
छ्टपटहाट महसूस करते है
तथाकथित रचनाकारों ने
भ्रम की पट्टी से
अंधे क़ानून की तरह
स्वयं को ताज पहना कर
शहंशाह घोषित कर दिया है.
‘प्रतिबिम्ब’ का 
बस एक प्रश्न 
क्या हमारी हिन्दी 
सुरक्षित है इस नेतृत्व में ?


कलम और तकनीक


छूटी कलम जो हाथों से, 
कागज़ बेकार हो गये,
मोबाइल और लैपटॉप ही,
खिलती बहार हो गये....

दूर हुए हम बागों खलिहानों से,
कम्प्यूटर जी ने ये हाल किया,
बैठ एयरकंडिशन में अब तो,
लेते हैं बस तस्वीरों को मज़ा, 
पूछते थे पहले सवाल गुरुओं से,
अब गुरु गूगल महाराज हो गये...

वो बैठ पेड़ों की ठंडी छावं में,
लिखना व्यथा आस पास के समाज की,
अब सोशल मीडिया पे उड़ेलते हैं,
भड़ास अपने दिल में होती खाज की,
हर कोई बना दूरदर्शी, या लाचार हो गये ??

छूटी कलम जो हाथों से,
कागज़ बेकार हो गये....!!

नैनी ग्रोवर

टिप्पणी...
आजकल के दौर में कलम ओर कागज़ से रिश्ता तो टूट ही चुका .. पहले किसी से कुछ पूछते थे तो इसी बहाने मिलना और बात करना एक दूसरे का हाल जानना भी हो जाता था... अब तो गूगल खोलो बस... अब ये तकनीकी युग किस और ले जाएगा सोचने वाली बात है ।



कुसुम शर्मा 
जाने कहाँ गये वो दिन 
-----------------
जाने कहाँ गये वो दिन जब क़लम से लिखा करते थे ! 

ले कर स्याही बस्ते में स्कूल में जाया करते थे !
जब लेख नहीं होता था सुन्दर तो गुरू लगाते डाँट !
श्रुत्रलेख ले कर शब्दों की देते नित्य सीख !
अब कम्प्यूटर का नया ज़माना 
काग़ज़ क़लम को किसने जाना 
गुगल है यहाँ सबका मामा 
हर बात का ज्ञान यह रखता 
हर बच्चे के दिल में बसता 
नहीं कोई प्रश्न जब आता 
एक मिनट में हल ये करता 
पहले के छूटे संस्कार 
गुरू की नहीं डाँट फटकार 
न कोई लेख की चिन्ता न कोई ग़लती का डर !
अब लिखावट नहीं रही सुन्दर , मात्राओं में नहीं कोई अंतर !
छूटा गुरू शिष्य का प्यार न अादर रहा न सत्कार ! 
छोटा हो ,बड़ा हो , बूढा हो या कोई जवान , 
सब की बस गई इसमें जान 
काग़ज़ क़लम का रहा न काम !!

टिप्पणी :- आज के युग में कम्प्यूटर का ही बोलबाला है ! बच्चों को स्कूल में शिक्षा कम्प्यूटर से ही दी जाती है --पहले बच्चे हमेशा गृहकार्य लिखकर कोपी में किया करते थे अब कम्प्यूटर में करते है जिसके कारण उनकी लिखावट बिगड़ गई है न ही आज कल किसी भी चीज़ को सिखने के लिए ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती --गुगल में हर प्रश्न के उत्तर मिल जाते है 
पहले गुरू से डाँट पड़ने का डर रहता था गुरू द्वारा दिये गये कार्य को याद करके और लिख कर जाते थे ताकि गर वह श्रुतलेख भी ले तो सही लिख सके ---आजकल के बच्चों को श्रुतलेख का कोई ज्ञान नहीं है वह अपना कार्य कम्प्यूटर पर करते है और दी गई अवधी के अन्दर जमा करवा देते है जिसके कारण केवल बाहरी ज्ञान की प्राप्त कर पाते है अन्दरूनी नहीं ! 
आज कल स्कूल हो कोलेज हो या कार्यालय सभी जगह कम्प्यूटर का प्रयोग हो रहा है --बच्चा हो जवान हो या बूढ़ा हो सभी को इसकी आदत लग चुकी है ---सच्चाई तो यह है कि हम सब इसके आदी हो चुके है !!




किरण आर्य प्रोत्साहन हेतु.........
कर अंगीकार 


परिवर्तन की है हवा चली 
नई टेक्निक्स 
है नया जमाना 
खो गया सब 
जो हुआ पुराना 
कलम जो कहलाती थी ताक़त 
थाम उँगलियाँ उसे 
उकेरती थी शब्द 
शब्द जो मोती से थे 
दमकते 
पन्नो पर थे इतिहास 
वो रचते 
डिजिटल हुआ है आज जमाना 
कंप्यूटर लेपटोप है 
संगी साथी 
कीबोर्ड पर थिरके है उँगलियाँ 
अब कंप्यूटर की भाषा 
है सबको भाती
भावों एहसास है 
वहीँ पुराने 
पर लोग हुए 
डिजिटल युग संग सयाने 
नियम जीवन का है परिवर्तन 
टेक्निक्स संग मन करे है नर्तन .........किरण आर्य 

टिप्पणी.........जब परिवर्तन जीवन का नियम है और समय की मांग भी तो नए को क्यूँ न हंसकर अंगीकार करे..............



डॉली अग्रवाल 

नये युग के कर्णधार

वक्त के पहिये पे

कागज कलम का मोल नही 
कागज की बिसात पे अक्षर मोहरे हो गए 
आज के कवि शब्दो की दुकान हो गए 
पल में एक दूसरे के रूबरू हो गए 
आधुनिकता की दौड़ में हम लाचार हो गए 
देखो हम भी 21 वी सदी के होनहार हो गए 
दिखावे के मुखोटे लगा 
हम कम्प्यूटर के दास हो गए 
अक्ल को बक्से में बंद कर 
सवाल सारे बेईमान हो गए 
देखो हम नए युग के कर्णधार हो गए !! 

नये परिवेश , नये आयाम तरक्की देते है , पर एक बड़ी कीमत हम खुद को बदल कर चुकाते है !



किरण श्रीवास्तव

 'तकनीकी ओर हम'
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जब से लैपटॉप - कम्प्युटर आया
सबके मन को खूब सुहाया
कागज कलम न अब मन भाये
बटन पे अंगुली थिरकी जाये...!

मिलना-जुलना बंद हुआ
वार्तालाप का अंत हुआ,
अंजाने अब खूब सुहाये
लाइक तारीफें मन को भाये...!

गुरु मिलन अब रास न आये
हर प्रश्नों पर शंका छाये,
गुगलबाबा ज्ञान लुटावे
हर समाधान वही समझावे...!

माना की जमाना अच्छा है
पर संस्कार अब कच्चा है
सुविधाये अम्बार हो गई
इंसानियत अब बीमार हो गई....!!!!

टिप्पणी-देश की प्रगति में नित नये-नये अविष्कार हो रहें है,सुविधाये बढ़ती जा रही है और हम उसके गुलाम होते जा रहें हैं। सुविधाओं का लाभ एक हद तक तो ठीक है लेकिन हमारी संस्कृति परम्परा संस्कार खो रही है ये बड़े दुःख की बात है।




Ajai Agarwal 

''अंतिम अवस्था में कलम दवात ''
=====================


भोजपत्र की भृगु संहिता ,
ताम्रपत्र अर शिलालेख 
बीते युग के हैं शुभंकर 
तस्वीरों में हुए कैद। 
तख्ती की लिपाई सुखाई 
सरकंडे ,बांस की कलम बनाई 
घिस-घिस कोयला स्याही बनाई 
और कलम की कत् लगाई। 
पेन्सिल इसी बीच में आयी 
भली लगी रबर , गलती मिटाई 
होल्डर निब और चेलपार्क की स्याही 
कलम ,कोयले की हुई विदाई। 
फिर फाउंटेन पेन ने किया धमाल 
रंग बिरंगी स्याही की चली बयार 
कुछ छूटा कुछ अपनाया 
सभ्यता को यही नियम भाया। 
जब जाना था चंदा पे ,
अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण शून्य 
स्याही का बाहर होता रिसाव
बालपैन प्रचलन में आया। 
देखो ! फिर तो कोर्ट कचहरी -
परीक्षा ,बैंक अर कार्यालय 
बालपेन का जलवा छाया 
सुलेख ,हुआ अब धाराशाही 
मोती जैसे अक्षर वाली 
लिखाई से व्यक्तित्व पढ़ने वाली 
विद्या देखो हुई पराई ;
और सभ्य हुये हम आज!
छूटे कागज कलम दवात ,
बालपैन पेन्सिल नहीं लुभाते 
अब तो, की बोर्ड का मौसम भाई 
टपटप होती यहां लिखाई 
एक सा ही सुलेख है भाई 
घसीट अब कोई नहीं मारता 
सुलेख में नंबर नहीं हैं कटते 
बुद्धि तेज और तेज हो गयी 
लेखन अब कमजोर हो गया 
तख्ती वाली आत्मनिर्भरता ,
कलम ,निब की कत् बनाना 
पेन्सिल छीलने की कुशलता 
कागज न फ़टे -----
रबर पे संयमित दबाव बनाना !
अब तो सब यांत्रिक ही है ,
अक्षर अब बोलते नहीं हैं 
अहसासों को तोलते नहीं हैं
डिजिटल ; कलयुग का उपहार 
डिजिटल ; कलयुग का व्यवहार
कम नहीं हुआ पर देखो 
पुस्तकों का व्यापार 
तेरेमेरे जैसे ,आज भी करते 
पुस्तक से उतना ही प्यार। .....
मेरी कॉपी में आज भी 
नित होती अक्षरों की बूंदा बांदी
पुस्तक नित नई 
मेरे रेक की शोभा बढाती। 
नेट में है संभावना अपार 
बच्चे करते इससे प्यार 
मुझको भी है इससे प्यार 
पर ?
पाठकीय सुख नहीं है इसमें 
पृष्ठ-स्मृति हेतु मोरपंख को 
पुस्तक चिन्ह बना के रखना 
देने को किसी प्रिय को 
फूल पन्नों के बीच सुखाना 
ताज़ी मृत तितली के पर 
सीधे कर -
पुस्तक में रख -
विद्यामाता मुझको आ -कहना 
अब सपनों की ही बातें हैं 
मुस्कानों की ही बातें हैं 
राह विकास की मुश्किल 
और विकास ; मन की चाहत 
संवेदना -भाव -प्रेम 
ये विकास के नहीं हैं साथी। 
एक ऊँगली की टपटप पे 
पूरा विश्व समाहित है अब 
पर कुछ मेरे जैसे भी 
लिखना -पुस्तक पढ़ना 
सांस लेने सा आवश्यक जिनको 
सांस लेने सा आवश्यक जिनको --आभा -
--------- नेट के पाठकीय सुख के अधूरेपन को आज भी किताबें ही पूरा करती हैं। विश्व डिजिटल हो गया पर पुस्तकों का व्यापार बढ़ा है और मेरे जैसे लोगों की भी बड़ी संख्या है जिनके लिए लिखना ऐसे ही है जैसे मछली का सांस लेने के लिए निश्चित अंतराल में समुद्र की सतह पे आना।-एक कोशिश -




गोपेश दशोरा 
शीर्षकः कलम की व्यथा


आज मैं खामोश हूं,
जब उंगलियां चलने लगी।

देखकर यह उन्नति,
मेरी आत्मा जलने लगी।
मुझे स्याही में डूबोया जाता था,
अल्फाज लिखे तब जाते थे।
अन्दाज अलग था लिखने का,
कुछ तो, उससे पहचाने जाते थे।
पत्र लिखे जब जाते थे,
दिल कागज पे उकेरे जाते थे।
पढ़ते आंखे ना थकती थी,
खत में चित्र उभर के आते थे।
एक दौर था मेरा ऐसा भी,
जब मेरी तूती बजती थी।
मन्दिर में रक्खा जाता था,
मेरी भी पूजा होती थी।
कुछ लोग तो मुझको अपने संग,
तलवार की माफिक रखते थे।
मेरे इस तेवर के आगे,
राजा, नेता तक डरते थे।
पर खत्म हुआ वह दौर तो अब,
अब सब तन्त्रों की माया है।
किसने लिखा और कहां लिखा,
नहीं कोई समझ ही पाया है।
इस देस लिखों या उस देस लिखो,
सब एक ही जैसा दिखता है।
शब्द भले ही भारी हो,
अपनापन तनिक ना दिखता है।
गोपेश दशोरा
टिप्पणीः एक समय था कि कलम की ताकत की काफी अहमियत थी। चाहे पत्रकार हो या साहित्यकार उनकी कलम गजब ढाया करती थी। परन्तु आज फेसबुक और व्हाट्सअप पर आने वाले अच्छे विचारों, लेखों और कविताओं को सीधा काॅपी&पेस्ट कर दिया जाता है। इससे ना केवल लिखने वाले का अपमान होता है वरन उस कलम का भी अपमान होता है जिससे वह रचना सृजित हुई।




रोहिणी शैलेन्द्र नेगी 
😊 
"तकनीकी ज्ञान"
***********
क्यों तकनीकी ज्ञान को हमने,
सर्वोपरि बना दिया...........?
हस्त-लेखन की क्रिया को,
अपने ही हाथों दफ़ना दिया..?

प्रगति के ही नाम पर शायद,
आलस्य को अपना लिया,
'नयी तकनीक' का नाम देकर,
इसको अंगीकार किया ।

तकनीकि विज्ञान-ज्ञान के, 
चक्कर में हम पड़े रहे,
उँगलियों के पोरों से निकली,
ऊर्जा को हम भूल गए ।

क़लम रक्त-संचालन करके,
अपना सहयोग जताती है,
जबकि तकनीकी-क्रिया बस,
साथ में वक़्त निभाती है ।

चंद चहलक़दमी करके हम,
उँगलियों को सरकाते हैं,
और कहते हैं चीज़ ग़ज़ब है,
फूले नहीं समाते हैं ।

यही नयी तकनीक हमें कुछ, 
ऐसा पाठ पढ़ाती है,
रोज़-रोज़ नयी सीख हमें, 
बस किश्तों में दे जाती है ।

मैं विरुद्ध नहीं हूँ......! 
नयी तकनीक, सिद्धांत,
विचारों के............!
किंतु डर है यही......! 
न रह जाएँ वंचित,
संस्कारों से...........!



प्रभा मित्तल ~~~~~~~~
~~ कलम और कम्प्यूटर ~~


कलम, 
मेरे छुटपन की सहेली
नन्हीं अंगुलियों में जैसे पहेली
बाबा से जबरन ले, काग़ज पर
मैं करती रहती थी अठखेली ।

बचपन ने कुछ होश संभाला
धीरे धीरे लिखना आया
स्याही कलम दवात संग
था अब रिश्ता गहराया।

कलम,
मन की बातें बोलती 
कभी अक्षरों को तोलती
मेरी सोच पर अड़ जाती 
हठ करती सी भिड़ जाती।

सुन्दर लेख अनूठा लेखन
स्कूल कॉलेज में हो अध्ययन
सबके संग थिरकती रहती
छात्र हों या हों शिक्षकगण।

बही विज्ञान की नई धारा
बदलने लगा जमाना सारा
कम्प्यूटर का युग आया
कलम छोड़ ये आगे धाया।

सारा ज्ञान किताबों से उठकर
कम्प्यूटर में जा पहुंचा।
गूगल सर अब गुरु बन गए
फैला विश्व में उनका चर्चा।

डायरी नोटबुक सूने पड़ गए
ख़त औ क़िताबत ईमेल हो गए
फ़ाइलों में कारोबार जुड़ गए
काग़ज कलम फेल हो गए।

वो दिन भी क्या दिन थे -
जब चिट्ठी लिखते अपनों को,
खुश होकर मुसकाते थे,
कभी यादों में बहकर पढ़ते
अक्षर आँसू में धुल जाते थे
वो भाव कहाँ अब टाइपिंग में 
जो कलम के संग सुहाते थे।

लेख-लेख की पहचान खो गई
अपना भी बेगाना सा हो गया
यौं अहसासों की शाम हो गई 
भावों का उल्लास मिट गया।

लेखनी चुप बैठी कोने में
देख रही थी बहुत दिनों से,
संगणक की जय-जयकार 
और अपना होता बहिष्कार।

सुलेखन पीछे छोड़ 
टंकण ने थी धाक जमाई
ये भी सच ही है -
'बकरे की माँ ने आखिर
है कब तक खैर मनाई।'

एक दिन सर्वर डाउन हो गया
वायरस ने फन फैलाया था।
डेटा भी सारा उड़ गया
विष से नीला पड़ गया।

जब तकनीकें सारी हार गईं
तब अस्पताल में दाख़िलकर
संगणक को जीवनदान मिला
और मुझको भी ये ज्ञान मिला।

'अपना हाथ जगन्नाथ' -
कम्प्यूटर से जुड़े रहो, पर
कागज कलम सदा के साथी
लिखने का अभ्यास न छोड़ो।
अपना लेखन अपनी पूँजी
हस्त-लिपि में भी जोड़ो।

- प्रभा मित्तल

(कोई भी नई तकनीक अपनानी बुरी नहीं ,लेकिन उसके ग़ुलाम नहीं होना चाहिए। कम्प्यूटर बेहद उपयोगी है पर अपनी लेखनी भी कुछ कम नहीं।ग्रंथों की अगर हस्तलिखित पांडुलिपियाँ न होंती तो हम आज उन्हें कहाँ से पढ़ पाते।अतः जहाँ कम्प्यूटर काम नहीं कर पाता वहाँ कलम जीत जाती है।)



Prerna Mittal 
नींव 
****
देखो मग्न है मनुष्य, अपने आभासी जग में,

चूर होकर बैठा, तकनीकी प्रगति के मद में ।
विस्मृत किए कि होती न लेखनी यदि,
असाध्य हो जाता, करना इतनी उन्नति।

नीचे देखना भूल जाता है, चढ़ जाता जब ऊपर,
अचंभा नहीं, चूँकि नर जन्मा, ऐसी प्रकृति पाकर।

प्यूपे से अभी जन्मी हो, जैसे एक सुंदर तितली,
उसी तरह क़लम ने, विश्व की काया पलटी।
क़लम ही बुनियाद वह, जिस पर सुरक्षित बैठकर, पहुँचा इन्सान आज तरक़्क़ी की चरम सीमा पर।

पहली सीढ़ी है आधार, अंतिम तक पहुँचने का,
आरम्भ, एकमात्र विकल्प, अंजाम तक पहुँचने का।
भव्य इमारत खड़ी, नींव की ईंट पर ही होती है,
आधारशिला सुदृढ़ हो तो, विकास में गति होती है।

क़लम से लिखना सीखा तो इतिहास बनाया,
पढ़ा-समझा, पीढ़ियों ने तो आगे क़दम बढ़ाया, बढ़ते-बढ़ते आज, क्या कुछ न कर दिखाया,
छोटी सी मुट्ठी में है, समस्त संसार समाया।

टिप्पणी: क़लम का बड़ा आकार हमें यह सोचने पर बाध्य करता है कि चाहे मनुष्य कितनी भी तकनीकी उन्नति क्यों न कर ले, यहाँ तक पहुँचने में क़लम के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। वही हर ज्ञान की नींव है।



अलका गुप्ता 
कलम सवार
^^^^^^^^^^
थे सिपाही !

कलम के जो...
आज...उस पर...
सवार हो गए !

हो रहा गायब...
हुनर काग़ज़ पर...
कलम का...
साथ सच्चा !

इंटरनेट फोन...
कम्प्यूटर...
लेपटाप में लेखनी के
अनु-गढ़न भाव वह...
अमर-शब्द खो रहे !!



लेखन के क्षेत्र में सिपाही का शस्त्र जो कलम और कागज हुआ करती थी उसका अस्तित्व आज इंटरनेट के काल में सिकुड़ रहा है।


सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Tuesday, March 7, 2017

तकब #२ @२०१७


नमस्कार मित्रों 
पुन: आपके समक्ष एक चित्र रख रहा हूँ. इस बार दिए गए चित्र को "व्यंग्य" भाव देने है आपको. नियम व् शर्ते उसी रूप में होंगी, चयन प्रक्रिया भी उसी रूप में रहेगी. श्रेष्ठ रचना को सम्मान पत्र से पुरस्कृत किया जाएगा.
निम्नलिखित बातो को अवश्य पढ़िए.
१. अपने भावों को कम से कम ८ - १० पंक्तियों की काव्य रचना शीर्षक सहित लिखिए. एक सदस्य एक ही रचना लिख सकता है. 
२. यह हिन्दी को समर्पित मंच है तो हिन्दी के शब्दों का ही प्रयोग करिए जहाँ तक संभव हो. चयन में इसे महत्व दिया जाएगा.
[एक निवेदन- टाइपिंग के कारण शब्द गलत न पोस्ट हों यह ध्यान रखिये. अपनी रचना को पोस्ट करने से पहले एक दो बार अवश्य पढ़े]
३. रचना के अंत में कम से कम दो पंक्तियाँ लिखनी है जिसमे आपने रचना में उदृत भाव के विषय में सोच को स्थान देना है. 
४. आपके भाव अपने और नए होने चाहिए. [ पुरानी रचनाओं को शामिल न कीजिये ]
५. इस चित्र पर भाव लिखने की अंतिम तिथि १८ फरवरी, २०१७ है.
६. अन्य रचनाओं को पसंद कीजिये, कोई अन्य बात न लिखी जाए, हाँ कोई शंका/प्रश्न हो तो लिखिए जिसे समाधान होते ही हटा लीजियेगा. साथ ही कोई भी ऐसी बात न लिखे जिससे निर्णय प्रभावित हो.
७. आपकी रचित रचना को कहीं सांझा न कीजिये जब तक समाप्ति की विद्धिवत घोषणा न हो तथा ब्लॉग में प्रकशित न हो.
८. विशेष : यह समूह सभी सदस्य हेतू है और निर्णायक दल के सदस्य भी एक सदस्य की भांति अपनी रचनाये लिखते रहेंगे. हाँ अब उनकी रचनाये केवल प्रोत्साहन हेतू ही होंगी.
धन्यवाद !

इस तस्वीर के विजेता है सुश्री किरण श्रीवास्तव एवं श्री गोपेश दशोरा 


दीपक अरोड़ा
~ कब होगा उजाला ~

भ्रष्टाचार का चहुं ओर है बोलबाला
न्याय का हो रहा है मुंह काला
ऑर्डर ऑडर बस करते रहते
छीनते गरीब के मुंह से निवाला
अपने पद की महत्ता न समझी कभी
कागज के टुकड़ों से इसे है धो डाला
जाने कब छंटेगा इनके आगे से अंधेरा
कब फैलेगा ईमानदारी और नेकनीयत का उजाला


टिप्पणी- देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को खत्म करना मुश्किल जरूर है लेकिन नामुमकिन नहीं है। हर कोई यह ठान ले कि रिश्वत देना ही नहीं है तो हो सकता है उनका कार्य विलम्ब से हो, मगर होगा जरूर क्योंकि हम खुद साथ देते हैं इसलिए ही ऐसे कृत्य को बढावा मिलता है।



प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~ऑर्डर - ऑर्डर~

जब
काया का रूप भाया
ढलती उम्र का
ख्याल तो आया
लेकिन
दिल के
टूटे फूटे दरवाजे पर
दस्तक देती
उसकी कातिल मुस्कान
कुछ समझ से परे था
लेकिन वक्त ने
करा दी जान पहचान
इश्क की अदालत में
मस्तिष्क ने
दिल को दे ही दिया
ऑर्डर - ऑर्डर

बूढ़ी हड्डियाँ
फिर जवान हो उठी
आँखों के परदे पर
मन आतुर हुआ गाने को
तू कितने बरस की ...
तू सोलह मै सतरहा
हटाकर चश्मे का पहरा
भावनाओं के सागर से
भर अहसास की गागर
जोश में खोकर होश
आँखों ने
दिल को दे ही दिया
ऑर्डर - ऑर्डर

बस नई नई जवानी
अंगडाई लेने ही वाली थी
हर उभरता ख़्वाब
सच होने ही वाला था
उम्र का पतझड़
बसंती राह पकड़ने वाला था
कि
एक कड़कती
फेफड़ो को फुलानी वाली
मधुर सी कर्कश आवाज ने
निंद्रा भंग करते हुए कहा
क्या अभी तक सोते हो
उठो ! चाय बनाकर लाओ
और सुनो पतिदेव
एक अपनी एक मेरी
चाय पीते हुए
सेल्फी खिंचवाओं
फेसबुक पर अपलोड करो
अपनी
महिला मित्रो को जलने दो
ये मेरा है
ऑर्डर - ऑर्डर



टिप्पणी: कभी कहीं पढ़ा था ..
कौन कहता है बूढ़े इश्क नही करते ...
वो इश्क करते है लेकिन लोग शक नही करते ....
सोचा इसे यह रूप दिया जाए ख़्वाब में सही लेकिन हकीकत से पहचान भी करवाई जाए :) :)




किरण श्रीवास्तव 
°ये कैसा कानून°


आर्डर- आर्डर
मत कर भईये
बहरापन बढ़ जायेगा,
अंधा तो पहले से
ही था...,
बहरा भी हो जायेगा!

कोई करे घोटाला
कोई डाले डाका,
पर वही जेल में
चक्की पीसे जो
ठन-ठन गोपाला !

नेता -अभिनेता
सेठ- महाजन
लगते इसके भाई हैं,
आंच न आये भाई पर
ये ऐसा जुगत लगाता है..!!

घोंट गला
सच्चाई का ये,
आर्डर-आर्डर करते हैं,
सच्चाई पर बोल दें
खुलकर
क्या ऐसा दिन आयेगा...???

टिप्पणी-
कानून का निर्णय निष्पक्ष होना चाहिए ।लेकिन आज के दौर में रूतबे के हिसाब से सजा का प्रावधान देखने सुनने को मिल रहा है। दबाव में आकर सच्चाई को दबा दिया जाता है प्रस्तुत व्यंग इसी पर आधारित है।





नैनी ग्रोवर 
~आर्डर नहीं देते~


कभी सुबह की चाय,
कभी गर्म पानी की माँग,
चक्ररघिन्नी सी बनी ज़िन्दगी,
ओढ़ औरत का स्वांग...

ठंडी हो गई बाबूजी की चाय,
व्यस्त थे बहुत समाचार पड़ने में,
चाय ही लाई ठंडी बहु,
सासु जी लगीं तौहमत मढ़ने में...

पति जी दफ्तर हैं जाने वाले,
नाश्ता हुआ तैय्यार नहीं,
तुम्हारे जैसा बैठूँ निठ्ठला,
इतना मैं बेकार नहीं...

बच्चों के स्कूल की बस,
बजा भोंपू, कान खाती है,
बस पे चड़ा बाय बाय ना करो,
तो शर्म बच्चों को आती है...

क्या हुआ बहु अगर एक दिन,
कामवाली बाई नहीं आई,
तुम ही करलो झाड़ू पोछा,
कर रही हो घर में कौन कमाई...

बीत रहा है यूँ ही हर दिन,
परिवार की नैया खेते-खेते,
मामूली सी ग्रहस्थन हूँ मैं,
घरवाले नहीं कोई आर्डर नहीं देते...!!


टिप्पणी:- घर की महिला अपेक्षा की जाती है के घर के सभी काम और सबकी देखभाल उसी की ज़िम्मेदारी है, यहाँ तक के उसके माता पिता भी उसे यही सीख देते हैं, और उस पर उनका ये मानना के हम कोई आर्डर तो नहीं देते ये तो उसका फ़र्ज़ है, ये सोचने पर बाध्य करता है के क्या सच में ..? हाँ फ़र्ज़ ज़रूर है सबकी देखभाल का परन्तु उसे मात्र सेवादार समझ लेना कहाँ की इंसानियत है..?




Madan Mohan Thapliyal
~न्याय~

मुंगरी की ठक- ठक
दिल की धड़कन
किसी की जिन्दगी लील गई,
किसी का आशियाना हुआ नीलाम
किसी की किस्मत बेदाग खिल गई.

सरोकार, पैरोकार, चमत्कार
सब हथौड़े के आधीन
सब कुछ होते हुए जिन्दगी पराधीन
न पानी न काँटा
कानून के जाल में फंस जाती है मीन.

यह अपना वतन है
जहाँ वकीलों और जजों की चलती है
कानून अंधा है
कोई मरे या जिए इनकी बला से
दूसरे के आँसुओं पर जिन्दगी पलती है.

सफेद, धवल वस्त्रों में सब काला है
काले अंग्रेजों का हर तरफ बोलबाला है
इनकी ही विरासत इनका ही कानून
इनकी ही दया इनका ही अंकुश
हर गरीब इनका निवाला है.

एक मुकदमा सालों चलता है
घर, जमीन, मान-मर्यादा सब खत्म
कई बार जिन्दगी दांव पर लग जती है
वाह रे ! कानून
मरने के बाद भी यहाँ मरने वाले पर मुकदमा चलता है.


टिप्पणी: कानून अंधा नहीं सचमुच अंधा है, यहाँ कमजोर सदा पिसता है, कोई सुनवाई नहीं, पैसा ही कानून है.



कुसुम शर्मा 
~अंधा और बेहरा क़ानून~
-----------------

पहन के सफ़ेदपोश करते काला काम
अदालतों में आना जाना इनका सुबह शाम
बाँध के पट्टी आँखों में गान्धारी बना क़ानून
धृतराष्ट्र के राज्य में कानों से सुनता कौन
न्याय के पद पर अन्याय का राज
खुले घूमते अपराधी बेक़सूरो का जेलों में वास
रोज़ हो रहा चीरहरण गुहार लगा रही द्रौपदी
लेकिन उसकी चीख़ अब कोई सुनता नहीं
अातंक का चारों ओर शोर है
देखके हर कोई यहाँ मौन है
बन्द पड़े दरवाज़े न्याय के अन्याय के साथ
घुट रही आशाये दम तोड़ रही आस
सालों बीत गये पर न सुधरा क़ानून
अॉर्डर- अॉर्डर करते ही सभी को करता मौन !

टिप्पणी :- हमारे देश का क़ानून सब कुछ देख कर सुन कर भी अंधा और बेहरा है जहाँ से न्याय मिलना चाहिए वही अन्याय हो रहा है !




Sunita Pushpraj Pandey 
~आर्डर आर्डर~


न्याय की देवी के आंखों पर
बंधी पट्टी देख
कानून को शायद अंधा इसलिए सब कहते हैं
हरपल ये हम सोचा करते थे
न्याय की देवी अंधी, गूंगी और बहरी
पर पैसा बोलता है
बड़े बड़े अपराधियों को पैसे के बल पर
बाल बराबर भी आंच न आते देखा
वर्दी पहनते ही कसमें खाते
कानून के रक्षकों को दिग्गजों की
जी हजूरी और उनकी ही सुरक्षा में मुस्तैद देखा

टिप्पणी :कानून कुछ मौकापरस्त लोगों के कारण खरीदा और बेचा जा रहा है



Pushpa Tripathi 
~मुझे छोड़ दिया जाए~


हर बार कहता हूँ अपराधी नहीं मैं
नफरत का पूरा साल बाकी नहीं मैं
दिल में तमाम जख़्म तिरी रहे हम
अब ये हालात की मुद्दतों में गिने हम !!

अजीब आलम का कैदी बना हूँ मैं
सर पे ताज दामन से बेआबरू हूँ मैं
जागती आँखों से दुनिया देखा हूँ मैं
तमाम खतरों के निशानात से वाकिफ़ हूँ मैं !!!

मैं बह रहा हूँ मेरा वजूद पानी है
गिरफ्त के कटघरे जकड़ा नहीं मैं
मैं चाहता हूँ मेरी जिंदगी बरी की जाय
ऑडर देकर मुझे छोड़ दिया जाय !!!

टिप्पणी :- जब दिल समय के अदालत में खड़ा होता है तो उसके पास सिवाय आगाजे उम्र -ए -दराज़ कहने को कुछ नहीं होता ... बस चाहता है हर अंजाम से बरी हो जाय !!!



मीनाक्षी कपूर मीनू 
~आर्डर~

आधुनिक है
नारी आज ,,
माँ काली
दुर्गा और
दुष्ट संहारी है
हँसी आती है
देख पढ़ के
आधुनिकता का ढोंग
करते आज भी
गाँव गाँव में
नर नारी करते
आर्डर ,,,,,
भोजन , पानी
खेत -खलियान
दासी मज़दूर
के कर सब काम
घूँघट आज भी
डाले है बेचारी
आर्डर पूरे कर
नहीं तो ,,,
डांट पड़ेगी भारी
आज भी सबके
आर्डर सुनती
चरितार्थ ये पंक्ति
आज भी करती
ढोर गंवार समान
है ये नारी
बस आर्डर पाने
की अधिकारी
मनस्वी,,,,,,
कभी न्यायालय
कभी शहर में
आर्डर आर्डर
करके
डंके की चोट पे
नर नारी की समानता
का रौला डालते
वास्तविकता
गर देखनी तो
गाँव की उस नारी का
कभी मन पढ़ पाते,,,
उठा के उसके स्वाभिमान को
आर्डर प्यार से सुनते सुनाते
उन्हें भी इंसान की तरह
हँसते हंसाते ,,,, ,,, :)


टिपण्णी ,,,, आज भी भारत की ज़्यादातर आबादी गाँव में नारी को शोषित करती है उन्हें घूँघट डलवा कर प्रताड़ित करती है । उन्हें आर्डर करती है । उनके साथ अच्छा सलूक नहीं किया जाता । ये पंक्तियां आज की नर नारी की समानता पर व्यंग कर रही है जो गाँव में आज भी ,,,, ?


गोपेश दशोरा 
~अन्धा कानून~

है अन्धा कानून यहाँ,
ना कुछ भी इसको दिखता है।
हो जात कोई या वर्ण भेद,
इसके सम्मुख ना टिकता है।
सक्षम हो या अक्षम हो,
अपराधी बस अपराधी है।
नेता हो या कोई धन कुबेर,
ना हक में किसी के माफी है।
कितना अच्छा लगता है,
जब ऐसा बोला जाता है।
तकलीफ तो बस तब होती है,
जब केवल बोला जाता है।
कथनी और करनी में यहाँ,
अन्तर बहुत ही भारी है।
आजादी को तो बरस हुए,
आजाद कहाँ नर-नारी है।
कचहरी के चक्कर में,
जब कोई फस जाता है।
ना जीता है, ना मरता है,
ना उससे निकल ही पाता है।
तारीखों पर तारीख मिले,
एक बार नहीं, सौ बार मिले।
जूते, एडी घिस जाते है,
पर कभी ना उसको न्याय मिले।
दे दो पैसा गर थोड़ा सा,
सब काम फटाफट होता है।
चाहे कितना हो बड़ा जुर्म,
रफा-दफा सब होता है।
काश, एक दिवस ऐसा आए,
गंगाजल अमृत बन जाए।
गीता पर रख कर हाथ कोई,
ना कसम कभी झूठी खाए।
ऐसा एक स्वर्णिम दिन आए,
धन की माया ना चल पाए।
राजा हो या प्रजा सभी
सम न्याय व्यवस्था सब पाए।

टिप्पणीः हमारी न्याय व्यवस्था में काफी दौहरापन है, सभी को समान न्याय की बातें तो की जाती है, पर मिलता नहीं। हाँ अगर पैसा है तो आपकी सजा माफ हो सकती है। पर गरीब को जमानत के लिए भी एडियां घिसनी पड़ती है।



किरण आर्य
~आर्डर आर्डर~

पत्नी ने आंखें मटकाकर
कहा प्रेम से
आर्डर आर्डर
देख पत्नी जी के
तीखे तेवर
पतिदेव की मैया गई मर
बोले प्राणों की प्यारी
तुमरे ये जालिम से तेवर
कर ना दे कहीं
मेरा ये मर्डर
जब भी तुम देती हो आर्डर
बजट जाता है मेरा बिगड़
उड़ता फिरू जितना भी
मैं बावरा
क़तर देती तुम पल में मेरे पर
क़तर कर मेरे पर
तुम जिस पल मुस्काती हो
सांप लोटते है सीने पर
जान मेरी निकल ही जाती है
हाई कोर्ट के जज के जैसे
फैसला तुम सुना देती हो
मैं बेचारा पति तुम्हारा
सफाई भी न दे पाता हूँ
मन ही मन बस हे प्राणप्यारी
खून के आंसू
पी मैं जाता हूँ
उस पल तुम जो मुस्काती हो
आरी सीने पर चल जाती है
तुमरा आर्डर आर्डर अब तो
कानो में दिन रात है गूंजता
मानो या ना मानो तुम प्रिय

ये मन बस तुम्हे ही पूजता है......
[ समीक्षा के दौरान प्रस्तुत रचना }



सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Tuesday, January 31, 2017

#तकब१ @२०१७



नमस्कार मित्रों 
एक बार फिर इस समूह के प्रांगण में आपका स्वागत है. आप में से कुछ मित्रों के सुझाव को मध्य नज़र रखते हुए २०१७ की शुरआत एक ही चित्र से कर रहे है. 
इस बार इसे प्रतियोगिता का नाम नहीं दे रहे है. लेकिन नियम व् शर्ते उसी रूप में होंगी, चयन प्रक्रिया भी उसी रूप में रहेगी. श्रेष्ठ रचना को पुरुस्कृत किया जाएगा सम्मान पत्र के साथ. 
निम्नलिखित बातो को अवश्य पढ़िए.
१. अपने भावों को कम से कम ८ - १० पंक्तियों की काव्य रचना शीर्षक सहित लिखिए. एक सदस्य एक ही रचना लिख सकता है. 
२. यह हिन्दी को समर्पित मंच है तो हिन्दी के शब्दों का ही प्रयोग करिए जहाँ तक संभव हो. चयन में इसे महत्व दिया जाएगा.
[एक निवेदन- टाइपिंग के कारण शब्द गलत न पोस्ट हों यह ध्यान रखिये. अपनी रचना को पोस्ट करने से पहले एक दो बार अवश्य पढ़े]
३. रचना के अंत में कम से कम दो पंक्तियाँ लिखनी है जिसमे आपने रचना में उदृत भाव के विषय में सोच को स्थान देना है. 
४. आपके भाव अपने और नए होने चाहिए. [ पुरानी रचनाओं को शामिल न कीजिये ]
५. इस चित्र पर भाव लिखने की अंतिम तिथि १५ जनवरी, २०१७ है.
६. अन्य रचनाओं को पसंद कीजिये, कोई अन्य बात न लिखी जाए, हाँ कोई शंका/प्रश्न हो तो लिखिए जिसे समाधान होते ही हटा लीजियेगा. साथ ही कोई भी ऐसी बात न लिखे जिससे निर्णय प्रभावित हो.
७. आपकी रचित रचना को कहीं सांझा न कीजिये जब तक समाप्ति की विद्धिवत घोषणा न हो तथा ब्लॉग में प्रकशित न हो.
८. विशेष : यह समूह सभी सदस्य हेतू है और निर्णायक दल के सदस्य भी एक सदस्य की भांति अपनी रचनाये लिखते रहेंगे. हाँ अब उनकी रचनाये केवल प्रोत्साहन हेतू ही होंगी.

धन्यवाद !
इस बार की विजेता है सुश्री मिनाक्षी कपूर मीनू 
(बधाई एवं शुभकामनाएं तकब परिवार की ओर से )

आभा Ajai Agarwal
~एक क्लिक में ढूंढो ,चमको~
=========
गूगल बाबा ,गूगल बाबा ,
मुझको बना दिया ध्रुव तारा ,
नेट में ढूंढो मेरा नाम ,
एक क्लिक से होगा काम ,
गली गाँव शहर देश क्या
दुनिया भर के नामों में
तुम पहचाने जाओगे यदि
गूगल पर आ जाओगे ,
फेसबुक ,बलॉगर ट्वीटर
बहुत सारे पोर्टल यहां
याहू भी कर सकते हो
इंस्टाग्राम है मस्त यहां
मन की बात करो ट्विटर पे
गरियाओ हल्के हो जाओ
ब्लागर में जाकर तुम
किस्से कहानी कह आओ।
कितना अच्छा लगता है
सुंदर सपना लगता है
दुनिया में कोई भी -
मुझसे अब मिल सकता है
अरबों खरबों की भीड़ में
मेरा अलग वजूद यहां
नाम मेरा तुम टाइप करो
एक क्लिक में मुझसे मिल लो
ऑन लाइन आ जाओ सब
इस आकाश पे टिमटिमाओं सब।
गूगल अर्थ पे जाओ तुम
गाँव गली भी मिल जायेगी
और जरा सी सर्च करो
अंगने में माँ ,
खेतों में बापू दिख जायेगा।
एक क्लिक की बात है प्यारे
भीड़ में अलग नजर आओगे
आओ ऑन लाइन हो जाएँ ,
पढ़े पढायें देश बनाएं
एक क्लिक में हो शॉपिंग
एक क्लिक में सारे काम
प्रदूषण भी होगा कम
ईधन भी बच जायेगा
समय अलग बचेगा जो
काम हमारे आएगा

टिप्पणी: मेरे अनुसार एक क्लिक में आज सारी दुनिया सिमट आती है आपकी मुट्ठी में --आप के नाम पे क्लिक और आप चमकने लगते है --गूगल बाबा की करामात -- एक क्लिक से ढूंढिए अपने को अपनों को हो जाइये ऑनलाइन ,करलो दुनिया मुट्ठी में ---शायद मैं चित्र से न्याय कर पायी हूँ -------



किरण श्रीवास्तव
~तलाश~
------------
मुझे है
तलाश..!!
इंसान की ।
जो हो
वास्तव में
इंसान....।
इंसानियत हो,
जिसकी पहचान ।
कठीन हो,
शायद अभियान ।
दिनों-दिन
होती जा रही
मुश्किल रूझान...
इंसानी मुखौटो में,
भेड़िए बदहवास-
जो कर देते
इंसानियत को,
शर्मसार..
सरे बाजार!!
बेच देते जमीर
दिखाते झूठी शान,
साधू संत भी
कर देते,
इंसानियत को
लहूलुहान ..!
गर मिल जाये
इंसान तो
कर लूं दीदार
तो हो जाये
पूरी मेरी
तलाश...!!!!!!

टिप्पणी-
आजकल इंसान में इंसानियत का ह्रास होता जा रहा इंसान और पेशे दोनों कलंकित होते जा रहे ऐसे में एक सच्चे इंसान की तलाश शायद नामुमकिन लगने लगा है..!!




प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
~ मेरी पहचान ~

छिपने लगा था हर भीड़ में
तुमने न जाने कैसे पहचान लिया
अपने में ही सिमटा था मेरा व्यक्तित्व
क्यों उसे मेरे ही सामने खड़ा कर दिया
वैसे सच कहूं
मेरी पहचान का अस्तित्व
लोगो की भीड़ में दम तोड़ रहा था
मेरी पहचान में अपनी पहचान
ढूँढने वाले लोग भी
अपना नया साम्राज्य संवारने लगे
नई पहचान की पहचान बनकर
और
व्यतीत जीवन के कटु अनुभव
मेरे ऊपर पहाड़ सा भार बन
मुझे जमीन के नीचे धकेल रहे थे
और भीड़
शरीर के हर हिस्से को कुचलते हुए
तेजी से कदम बढ़ा रही थी
मेरे होने का झूठा भ्रम
टूटने ही वाला था
कि तुमने
मुझे भीड़ से निकाल
फिर अपने आवरण में समेट
पहचान लौटा दी है
हाँ तुम मेरा हौसला
तुम मेरी उम्मीद
या शायद
वक्त हो या फिर नियति हो

टिप्पणी: खुद से खुद की पहचान होना जरूरी है, अपने हौसले और उम्मीद का दामन पकड आगे बढ़ना होगा फिर नियति और वक्त आपके साथ होंगे




ब्रह्माणी वीणा हिन्दी साहित्यकार
~ आभासी संसार ~
÷÷÷÷÷÷÷÷÷

आजकल, आभासी युग में ,
लोगों को पहचानना
बड़ा ही मुश्किल है ,
कि कौन सा चेहरा जाहिल है?
कौन सा व्यक्ति काबिल है?
सफेद पोश भेड़िए
घूमते रहते इधर उधर /
माँ बहनों की अस्मिता को,
तार तार कर देते हैं इस कदर /
माना कि वैज्ञानिक अन्वेषक,
आसमान तक पहुँच गए,
जाॅच संस्थाएँ
खगालती हैं छुप छुपकर
दोषी व निर्दोषी के घर मे घुसकर /
किन्तु राजनीति का गढ ?
अज्ञात सफेद पोशों का अड्डा है !
कौन नेता कहाँ और कैसा है?
पहचानना कठिन जैसा है /
कई कई चेहरे रखते तमाम हैं /
इनका फैला हुआ तामझाम है //
************************
*************************

टिप्पणी: आज कल दूर भाषी यंत्रों का जाल बिछा है फिर भी दोषी को पहचानना मुश्किल है समाज सफेद पोशों से भर गया है कई कईचेहरे रखते हैं तमाम लोग, ,,,,,,


डॉली अग्रवाल
~ मुखोटा ~

मुझे मुखोटा ओढ़ जीना आ गया
बिन हँसी के हँसना आ गया
ये लो दोस्तों , मुझे भी इंसान बनना आ गया
आँखे भरी है बहती नही
दर्द है चीख आती नही
हँसी है पर होंटो पर आती नही
मेरी ख़ामोशी मेरा रूप बन गया
मुझे भी इस गुमनाम से जहाँ में जीना आ गया !
ज़िन्दों का काफिला है
मुर्दो सी सोच का
मुझे मुर्दाओं के लिए नही
ज़िन्दों के लिए आँसू बहाना आ गया !
नफरतों के बाज़ार में
खुद को बचाना आ गया
आईने में खुद को खुद से मिलाना आ गया
मुझे भी इंसान बनना आ गया !!

टिप्पणी: अतीत की स्मृति , और भविष्य की कल्पना कभी इंसान को खुद से मिलने नही देती !




 Madan Mohan Thapliyal  
तीन आखर- आदमी /मानव
***************

वीक्ष ( लेंस ) से टटोला
अपने एहसास को झिंझोड़ा
हाय ! कोई भी न मिला भीड़ में
जो कह दे, औरों से अलग है ए आदमी.

चाहत तो थी, खुद की पहचान बन जाऊँ मैं
विडम्बना देखिए, खड़ा दहलीज पर
चौखट की ओट से झांकता
अपने को अलग खड़ा देखता है आदमी.

बुद्धिचातुर्य से वशीभूत
स्वयं की मिसाल खोजता रहा उम्र भर
विश्व विजय की पताका लिए हाथ में
खुद से खुद ही हारता रहा आदमी.

एक सी काया, एक सा रूप
फिर भी अपने स्वरूप से बेखबर
धर्म के जाल में उलझता, नाहक-
औरों से उम्र भर बैर लेता मोल आदमी.

बुद्धि की विलक्षणता कहूँ
या सनक है तेरी
अमरत्व पाने की धुन पे हो सवार
हर पल दफन हो रहा है आदमी.

अपनी चाहत औ नसीहत
लिख दी उसने तेरी तकदीर में
जब छोड़ना होगा जहां को , उठा लेगा
देखता रह जाएगा, साथ था जो आदमी.

एक सांस का ही तो उलटफेर है, नादां
चल रही है तो घमण्ड में चूर है
दान,पुण्य, पूजा-अर्चना सब धरी रह जाएगी
आखिरी सांस लेगा जिस क्षण आदमी .

न कोई साथ आया न साथ जाएगा
लिए दिए का हिसाब होगा जमीं पर
राख का ढेर हो या माटी का
टटोल लो, कहीं दिखेगा नहीं आदमी.

है जिस देह पर अभिमान उसको
पंचतत्वों से है निर्मित, उन्हीं में मिलेगा
बेसुध खड़ा कतार में अलग दिखने के लिए
न जाने किस मोह से भ्रमित है आदमी .

मानव हो मानव बन कर रहो
यही तेरी सच्ची पहचान है
जनाजे के वक्त हर मुख से निकले ए दुआ
देखो ! वो जा रहा है, जो था सच्चा आदमी.
*********

टिप्पणी : मानव ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है, लेकिन आदमी को अपने गुरूर के आगे ईश्वर के बनाए सारे नियम अर्थहीन लगते हैं और इसी ऊहापोह में उलझकर एक दिन संसार से विदा हो जा है.



नैनी ग्रोवर
~ रिश्ते ~

इतना करीब से,
रिश्तों को देखा ना करो,
सिवाय मायूसी के,
कुछ भी हाथ ना आएगा...
साथी सभी हैं नश्वर तन के,
खोखले गिठाव बन्धन के..
माया के जाल में जकड़े हैं,
मतलब से हाथ ये पकड़े है..
धन और तन के ये झूठे नाते,
बदल के भेस मन को हैं लुभाते..
सुखों के पल में जो संग आयें..
आये दुःख तो किनारा कर जाएँ..
ऐसे अपनों से क्या कहिये,
अच्छा तो यही है के चुप रहिये..
कीजे कर्म अपना अपना,
क्यों देखें रोग दूजे के मन का..
जहाँ तक साँसों का आना जाना है,
तब तक तो साथ निभाना है...
एक दिन तो अकेले जाना है,
नहीं साथ कोई भी आना है..
फिर क्यों रिश्तों को रोऊँ मैं,
क्यों अपना समय गवाउँ मैं...
कोई अच्छा कर्म तो कर जाऊँ,
निर्भय होके प्रभु के दर जाऊँ..
मायावी दुनियां की छोड़ो बातें,
साथ ना कुछ भी जाएगा...
इतना करीब से,
रिश्तों को देखा ना करो,
सिवाय मायूसी के,
कुछ भी हाथ ना आएगा....!!

टिप्पणी :- भाव तो आप सब गुणीजन समझ ही गये होंगे, तस्वीर देख कर यही उत्तपन हुए ...।।



अलका गुप्ता
*हों जागरुक !*
************

प्रदर्शक ये !
चुनाव जनता का !
नेतृत्व खास !

नेता अपना !
जाँच पड़ताल के !
चुनें ध्यान से !

हो जागरुक !
कर्मठ जिम्मेदार !
ईमानदार !

देश संवारे !
भविष्य वर्तमान !
नेता महान !

प्रतिनिध से !
हो देश विकसित !
करें विचार !

टिप्पणी - देश की उन्नति चाहिए तो हमें ईमानदार कर्मठ नेता को पूरी जागरूकता के साथ चुनना होगा



प्रभा मित्तल
--अकेलापन--

चारों तरफ लोगों का हुज़ूम
बीच खड़ा एक बेबस आदमी
ये कैसी बेकल बेकसी है
कभी भीड़ में भी अकेले
तो कभी अकेले में भी
लग जाते हैं मेले...

​इस जीवन दर्शन ने
एकांत के सिलसिले में
मन ने, लो आज मन को
फिर से झकझोर दिया।
यादों की गठरी खुल गई
कुछ ने तो बेरहमी से
मुझको घेर लिया।

घंटों ..पहरों ...बीत गए
फुर्सत नहीं मिली
उन यादों से, जो कभी
निकली नहीं जेहन से।

अन्तर में रचे बसे
चलते-फिरते उन चेहरों से
कितनी ही बार अपनी कहते
अपने ही कानों सुना है मैंने
क्या देखा है तुमने मुझको
खुद से खुद की बातें करते...

मन ही मन मीलों चलकर
मंज़िल तय करते
हर मोड़ पर ठहर-
ठिठक मुड़ मुड़ कर
देखते ...हर बार
साथ चलने की चाह में
चार कदम आगे चलकर
दो डग पीछे हट जाते
क्या देखा है तुमने मुझको
रुक रुक कर रस्ता तय करते।

आखिर मिट गई दुविधा सारी
रिश्तों का हुजूम तो था भारी
पर आदमी भीड़ में अकेला
बहुत हुआ वक़्त का खेला

अब मंजिल दूर नहीं
वक़्त के थपेड़ों से लड़ना सीखा
इन कदमों ने चलना सीखा
जब भी अँधेरों रास्तों से गुज़रती हूँ
मन का उजाला साथ चलता है
अकेला आदमी कभी नहीं होता
उसका जमीर हरदम साथ होता है।

टिप्पणी: आदमी कभी अकेला नहीं होता उसका अनतःकरण हमेशा उसका साथ देता है।



मीनाक्षी कपूर मीनू
~आईना मन का~
,,,,,,,,,,,,,,

सभी इंसान अच्छे लगते है
मन के सच्चे लगते हैं
ख़ुशी से जब हाथ
पकड़ के
एक दूजे का
झूमते हैं तो सच में
बिलकुल बच्चे लगते है
अचानक मन बदलने लगता है
आँखों पर पर्दा पड़ जाता है
जाति वाद या धर्म का
झूठ का या
कच्चे कान के मर्म का
अवसाद मन का छा जाता है
तन पर
और आँखों का आईना
अब नहीं देखता समान
बदल देता है
सफेद को नीले पीले में
क्योंकि ,,, मनस्वी
मन बदलने से
वही दीखता है
जो हम देखना चाहते है
सब बदला बदला सा
वो अपना नहीं
बीच में हाथ पकड़ा खड़ा
नकाबपोश काला है
पीठ में छुरी चलायेगा
अपना होते हुए भी
पराया है।

टिपण्णी: मन भटकने से हम रास्ता भटक जाते है । सच झूठ का अंतर नकार हम वही देखने लगते है जो हमारी मन रूपी आँखों का आईना दिखाता है तब समान भाव में भी अलगाव नज़र आ ता है ।


प्रेरणा मित्तल 
~ख़ास~
*****

हज़ारों-लाखों आमों के बीच, कोई ख़ास,
नज़र रुक जाती है बस, उसी के आसपास।
जैसे हो हंसों के बीच एक कौआ,
या हो कौओं के बीच कोई हंस।

ग़ुदड़ी का लाल हो या दीपक तले अंधेरा,
पृथक हो भीड़ में बस, जिसे लोग निहार सकें,
श्वेत हो तो मर सकें या ईर्ष्या से जल सकें,
उँगली उठाकर स्याह पर, अहम् को हवा दे सकें।

जो बन गया, किसी के लिए इतना विशेष,
क्या अनजान था वह, या कुछ परवाह थी शेष।
क्या भिज्ञ था इससे, कि कुछ ख़ास है उसमें,
तभी तो आकर्षण जन्म लेता है, लोगों के दिल में।

या नितांत अनभिज्ञ, दूसरों की उठती निगाहों से,
जो दूर तक पीछा करतीं, उसके पदचिह्नों का,

उन नेत्रों में मंशा बस,
उसे ख़ास से आम बनाने की,
या स्वयं आम से ख़ास बनने की।

टिप्पणी : जो सबसे अलग हो चाहे अच्छा हो या बुरा सबके ध्यान का केंद्र बन जाता है। लेकिन क्या उसे इस बात का अहसास होता है ? और देखने वाले की नीयत भी अलग - अलग होती है।


सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Friday, December 30, 2016

#तकब१५ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता # 15 ]


#तकब१५ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता # 15 ]
१. इस बार दिए गए चित्रों में सन्देश स्पष्ट है. देखते है मित्र सदस्य किस तरह भावों को जोड़ पाते है. चित्रों में सामंजस्य के साथ कम से कम १० पंक्तियों की काव्य रचना शीर्षक सहित होनी अनिवार्य है [ हर प्रतियोगी को एक ही रचना लिखने की अनुमति है]. 
- यह हिन्दी को समर्पित मंच है तो हिन्दी के शब्दों का ही प्रयोग करिए जहाँ तक संभव हो. चयन में इसे महत्व दिया जाएगा.
[एक निवेदन- टाइपिंग के कारण शब्द गलत न पोस्ट हों यह ध्यान रखिये. अपनी रचना को पोस्ट करने से पहले एक दो बार अवश्य पढ़े]
२. रचना के अंत में कम से कम दो पंक्तियाँ लिखनी है जिसमे आपने रचना में उदृत भाव के विषय में सोच को स्थान देना है.
३. प्रतियोगिता में आपके भाव अपने और नए होने चाहिए.
४. प्रतियोगिता १९ दिसम्बर २०१६ की रात्रि को समाप्त होगी.
५. अन्य रचनाओं को पसंद कीजिये, कोई अन्य बात न लिखी जाए, हाँ कोई शंका/प्रश्न हो तो लिखिए जिसे समाधान होते ही हटा लीजियेगा. साथ ही कोई भी ऐसी बात न लिखे जिससे निर्णय प्रभावित हो.
६. आपकी रचित रचना को कहीं सांझा न कीजिये जब तक प्रतियोगिता समाप्त न हो या उसकी विद्धिवत घोषणा न हो तथा ब्लॉग में प्रकशित न हो.
विशेष : यह समूह सभी सदस्य हेतू है और जो निर्णायक दल के सदस्य है वे भी इस प्रतियोगिता में शामिल है हाँ वे अपनी रचना को नही चुन सकते लेकिन अन्य सदस्य चुन सकते है. सभी का चयन गोपनीय ही होगा जब तक एडमिन विजेता की घोषणा न कर ले.
निर्णायक मंडल के लिए :
1. अब एडमिन प्रतियोगिता से बाहर है, वे रचनाये लिख सकते है. लेकिन उन्हें चयन हेतु न शामिल किया जाए.
2. कृपया अशुद्धियों को नज़र अंदाज न किया जाए।
धन्यवाद !
इस प्रतियोगिता की विजेता रही सुश्री आभा अग्रवाल जी - बधाई - शुभकामनाएं 


किरण श्रीवास्तव
(नव-वर्ष)
--------------------------

अंग्रेजी का वर्ष नया,
अब तो आने वाला है!
मास दिसम्बर कमर झुका कर,
अब तो जाने वाला है|
जन-जन में उत्साह जगा,
पर ठंड से दुबका जाता है!
सूरज की गर्मी का भी
नहीं पता चल पाता है,
डाली-डाली पत्ते-पत्ते
ठंड से सिकुड़े जातें हैं,
नये साल के जोश में इनको
ठंडक नहीं सुहाती है|
होश गंवाने को फिर इंसा,
मद्यपान अपनातें हैं
झूमते-गिरते आपा खोते
न्यू ईयर मनाते हैं..।

चैत्र शुक्ल-पक्ष प्रतिप्रदा -
हिन्दी नव-वर्ष होता है,
पूजा-पाठ कलश-स्थापन
और जागरण चलता है।
नव-वर्ष हिन्दी की अपने,
होती बात निराली है!
प्रकृति भी स्वागत करतीहै,
चहुंओर रहे हरियाली है!
फूल-फूल और कली-कली,
मानो हंसती-गाती है!
छेड़ तराने कोयल भी,
अपने गीत सुनाती है!
नये-नये पत्ते पेड़ों पर,
खड़े हैं सज-धज कर ऐसे,
महमानों के आने पर
कपड़े बदलें हो जैसे...|

हिन्दी हो या अंग्रेजी
साल तो आता जाता है,
समय चक्र चलता रहता
ठहर नहीं वो पाता है!
इससे लेकर हमें सबक,
आगे बढ़ते जाना है,
चाहा जीवन में जो भी
मुकाम वही अपनाना है!
नये साल में यही कामना -
नहीं कोई दुखियारी हो,
मंगलमय हो सभी के लिए
और सदा शुभकारी हो..!!
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टिप्पणी: अंग्रेजी वर्ष हो या हिन्दी वर्ष दोनों ही के कार्य-क्षेत्र अलग और दोनों ही जीवन में महत्वपूर्ण है। अंग्रेजी नववर्ष में कड़ाके की ठंड उत्साह को क्षीण तो करते ही हैं , पाश्चात्य रहन-सहन ,आचरण हमारे संस्कार को भी धराशायी कर देतें हैं ...। हिन्दी नववर्ष -हमारी परम्पराएं धार्मिकता हमारे संस्कार को जीवन्त तो करती ही है ,वहींप्रकृति भी मानों हमारे साथ दिल खोल कर स्वागत को तैयार खड़ी रहती है।


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~नववर्ष - मेरा तुम्हारा~

पाश्चत्य नववर्ष में
सर्दी की ठिठुरन लिए
मदिरा का सेवन कर
मदहोश हो थिरकते रहते
अश्लीलता की करते नुमाइश
अर्धरात्रि में तमोगुण संग
नववर्ष का आरम्भ होता
तामसिक प्रवृति का फिर
जहाँ तहाँ प्रदर्शन होता
कैसा विचित्र है
विदेशियों का यह त्यौहार

वेदों में अंकित है युगादि का सत्य
चंद्रमा की कला का है ये प्रथम दिवस
ब्रह्मा ने इसी दिन कर सृष्टि का निर्माण
नक्षत्रो का देकर उपहार
सतयुग का किया था प्रारम्भ
चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रथमा
ही अपने नववर्ष का है शुभारम्भ
भारतीय संस्कृति का
प्रकृति से है गहरा नाता
नववर्ष भी नही इससे अछूता
पतझड़ का असर कम होता जाता
वसंत ऋतू का फिर आगमन होता
पेड़ पौधे पल्लवित होते
पुष्प नववर्ष का स्वागत करते
शालिवाहन की वीरता का प्रतीक
शक संवत बना साक्षी है
शैल्पुत्री प्रकृति का दूसरा रूप
कर अराधना उसकी
नवरात्र की होती शुरआत
विक्रमादित्य ने फहरा विजय पताका
राज्यभिषेक भी इसी दिन करवाया था
फिर मंगल कार्यो की गणना का आधार
विक्रम संवत को ही बनाया था
इस शुभ दिन कर बाली का वध
राम ने उसकी प्रजा को मुक्ति दिलाई थी
इस नवबेला में उर्जा शक्ति का होता प्रसार
नई फसलो संग उत्साह उमंग का होता विस्तार
और हम अपनी धर्म संस्कृति छोड़
न जाने क्यों विदेशी संस्कार अपनाते
अपनी प्रथा परम्पराओ का लेकर ज्ञान
स्वीकार कर, करो तुम सम्मान

टिप्पणी: किसी भी त्यौहार पर्व [ अन्य देशो के ] बारे में जानना अच्छी बात है या उनकी खुशी में शामिल होना भी अच्छा है लेकिन अपनी परम्पराव संस्कृति को भूल कर, बिसरा कर, छोड़कर नही...


नैनी ग्रोवर
~ नया साल~

देख मुँह लाल दूजे का,
पीट पीट के अपना मत करो,
मान अपनी परम्पराओं का,
अजी कुछ तो समझा करो...
बहके कदम, भोंडे कपड़े,
मुंह में सिगरेट दबाये,
भारत में ये नया साल मनाने,
ये हिप्पी कहाँ से आये...?
माँ बन गई मम्मी जीते जी,
और पिता हो गए डैड..
चाचा चाची बने अंकल आंटी,
बुध्दि हो गई मेड...
हाय ब्रो हाय सिस ने सारा,
कुनबा बिगाड़ डाला,
अपने हाथों हमने,
अपनी भाषा का चमन उजाड़ डाला...
अब नए साल के इंतज़ार में,
सारे पगला रहे हैं,
डेबिट और क्रेडिट कार्ड के,
जलवे दिखा रहे हैं...
जम के पियेंगे रात भर,
हुड़दंग मचाएंगे,
नए साल के पहले दिन,
माँ से फिर सर दबवायेंगे...
अरे छोड़ो यूँ नया साल मनाना,
किसी काम ना आएगा,
बैठो संग परिवार, खाओ पियो,
खुशियों की लहर लाएगा...
जैसी होगी शुरुआत साल की,
वैसा ही मिलेगा फल,
उठ सुबह सवेरे ले नाम प्रभु का,
और काम पे अपने चल...!

टिप्पणी.. आज के मौहाल पे छाये पश्चिम साये को दूर करें,, और अपनी परम्पराएँ समझना ही जीवन जीने का स्वच्छ और निर्मल मार्ग है ।


अलका गुप्ता
~अंतर नव वर्ष का ~
~~~~~~~~~

भावनाएँ उल्लास मय !
सृष्टि संग उमड़ प्रवाहित ॥
संचरित प्रकृति नवांकुर...
अनायास हँसे प्रत्फुटित ॥

नव वर्ष पदार्पण संवत्...
गुनगुना चैत्र मंगल कलश !
प्रसार मातु आँचल तले
आगाज उंमिलन अलस !!

तब मुस्कान भानु रस पिउ..
हरितिमा चंचल फागु घुलित ।
उछले... रंग...वेग..संवेग...
आए..नव-वर्ष... संकलित ॥

ठिठुरने अहसास जब लगें
चादर मॆं वर्फ की सर्द हो ।
आतुर सी लगे प्रकृति...
छिपा पांख..पंख जर्द हो ॥

हैपी न्यू ईयर बोल जब
अंतराल सुप्त बोने लगे ।
झरे पात पंगु वृक्ष शीत...
दुबक हर कोण सोने लगे ॥


टिप्पणी: हिन्दी नव संवत्सर एवं इंग्लिश सन के नव वर्ष के आगमन पर प्रकृति का भारत मॆं हम जो अंतर महसूस करते हैं बस उसी कॊ व्यक्त कर पाने का प्रयास किया है


मीनाक्षी कपूर मीनू
~ नव आगमन ~
--------
दिसम्बर माह की ठिठुरन में
" अंग्रेज़ी नव वर्ष " दिवस आया
सबके मुख पर खुशियां छायी
पीने पिलाने का दौर चलाया

अंग्रेजी ने रंग दिया तनमन
शोर शराबा चले संग संग
मनस्वी ,,भूल अपनी संस्कृति
सब ने बदले अपने रंग ढँग

आज भू ले हम भारत वासी
हिंदी पावन 'नव वर्ष बेला '
प्रकृति का संदेश न समझे
घर होटल में लगता है मेला

चैत्र मास के शुक्ल पक्ष को
अंकुरण हिन्दी नव बेला का
तन मन प्रफुल्लित उमंग भरा
प्राकृतिक सौंदर्य का मेला सा

खुशियां लाएं 'दो दिवस' मनाएं
हिन्दी को तो न ठुकराएँ
ये तो अपना मातृ दिवस है
इसके संग संग सब चलाये

भारत है तो इण्डिया अच्छा है
संस्कृति है तो फैशन अच्छा है
मनस्वी,, बुज़ुर्गों का गर रखें मान
तो पीना पिलाना भी अच्छा है

बिना राग द्वेष के मिल के खाएं
नव वर्ष रूप में हैप्पी न्यू ईयर मनाएं

टिप्पणी: अपनी भारतीयता को जीवंत रखते हुए सभी त्यौहार मनाने चाहिए क्योंकि भारत की पहचान ही है कि विभिन्नता को एक सूत्र में बाँधना। यहाँ अनेकता में एकता है मगर अपनी संस्कृति को भूलते हुए नहीं बल्कि इसका मान बढ़ाते हुए सभी त्योहारो को, दिवस को मनाना चाहिए ताकि भारतीय सबके साथ कदम से कदम मिला करआगे बढ़ सकें और अपनी भारतीयता की पहचान दे सके।



Madan Mohan Thapliyal 'शैल'
~आभास नव वर्ष के आगमन का~


( नव वर्ष की शुभकामनाएं )

जब डालियों पर हो फूलों की बहार
तितलियाँ मंडराएं झूम-झूम कर-
धरणी करे अद्भुत श्रृंगार -
सारंग छौने घूमें, स्वच्छंद -
हिमगिरि की बयार बहे मंद-मंद -
आम की मंजरी पर हो मधुप गुंजार
निर्झर झरनों की अनिमिष प्रीत -

प्रकृति सजती नव दुल्हन सी -
मन्थर गति वाले हिमनद का संगीत -
हो प्रफुल्लित कोयल गाए गीत
हिमनद सिकोड़ते अपनी बाहों को-
सुरभित करते बन कंदराओं को
ठिठुरती सर्दी कहती निज घर जाती
लिए दिए का धर्म निभाती
घने दरख़्तों की झीनी ओट से
झांकती रवि किरणें -
धरती को नमन करती और कहतीं
कुछ नया है होने वाला
जब धरा का कण-कण हो हर्षित
समझो नव वर्ष है आने वाला
चैत्र मास, मधुमास है आने वाला
ऐसी हो जहाँ की पुण्य धरा
क्यों न हो हर्षित जनमानस
क्यों न बजे नव वर्ष का संगीत
स्वागत हे मधुमास तुम्हारा
नव वर्ष का खुशी से गाएँ गीत!!!!

सारा विश्व नव वर्ष का
प्रथम दिन कहता जिसको
ठिठुरन भरी सर्दी चहुंओर
जनवरी मास कहते उसको
चारों ओर बर्फ़ की सफेद चादर
कितना सुख, कितना आदर
किसकी खुशी, किसका रंग
जाड़े से होता सब बदरंग
जीव जन्तु भी छिप जाते
ले आश्रय धरती का
पर्ण विहीन होते बृक्ष
निर्जीव सा लगता सारा मधुबन
कैसा हर्ष, कैसा स्वागत
कैसा नव वर्ष का आगमन
मदहोश हो, सब हैं थिरकते
नूतन वर्ष की जै-जैकार हैं करते
अर्द्ध रात्रि से पौ फटने तक
धमाचौकड़ी और हुड़दंग
नव वर्ष का अनोखा स्वागत और रंग!!!!!!

टिप्पणी: सभी देशवासियों को नव वर्ष की ढेर सारी शुभकामनाएं, भारत एक कृषि प्रधान देश है और इसकी संस्कृति युगों से प्रकृति की उपासक रही है,चाहे वर्ष का प्रथम दिन हो चाहे आखिरी, खुशी नित नये रंग में पल्लवित होती है.


डॉली अग्रवाल
~नया साल - एक ख्याल ~

कुछ अंग्रेजो का नही
कुछ हिंदी का नही
हर वो लम्हा नया साल है
जहाँ जीने का सवाल है !!

किसी नन्हें की इस दुनिया में आँखे खोलना शायद नया साल है ,
किसी मरते हुऐ का ज़िन्दगी जीना शायद नया साल है ,
दर्द को भूल कर सुख का आभास शायद नया साल है ,
उदय होते सूरज का ढल जाना शायद नया साल है ,
खिल के फूल डाली से उतर जाना शायद नया साल है ,
सपनो का साकार हो जाना शायद नया साल है ,
बीते वर्ष का अंत हो जाना शायद नया साल है !

वक्त को थामना मुश्किल है
वक्त के साथ चलना मुश्किल है
कुछ पल और जी लो ज़िन्दगी के
बीते वक्त का लौटना मुश्किल है !!

टिप्पणी: में जो भी लिखती हू वो मैच नही होता चित्र से ! मेरी सोच इससे आगे जाती नही , जो लिखा बस लिख दिया ! आप सबको पढ़ कर मन की बात लिखी !


Ajai Agarwal आभा अग्रवाल
~मंगलमय नव वर्ष --
============
चैत्र शुक्ला प्रतिपदा ,
अवतरण तिथि
आदि पुरुष श्री ''राम '' की
लो आया नव वर्ष
लाव लश्कर संग ----
पतझड़ का हो रहा अंत
दिगम्बर हुई डालों पे
झाँक रहे नव द्रुम मनोहर
बांज बुरांस अशोक
गुलमोहर फूले
रक्तवसना नववधू प्रकृति
सुगन्धित समीर से आरक्त ,
खेत पहने सोना चांदी की चूनर ,
बासन्ती साड़ी पे- रंगों भरी
पिचकारी की फुलकारी
गदराई गेहूं की बाली ,
बौराई अमराई ,
पलाश दहके ,टेसू महके
कोयलिया कुहुके
नील व्योम का नीला निस्वन
कलियाँ करती जादू टोना
मानो उत्सव का आवाह्न
देख श्रृंगार ऋतुराज का
भर अंजुरी फूलों की
रति उतरी करने आरती --
मंगल कलश पराग के ढुलके
भँवरें गुनगुन गान सुनाएँ
लो नव वर्ष है आया
चैत्र शुक्ला प्रतिपदा -
धरती पे आये --
राम चन्द्र संग चारों भाई
प्रकृति भी दे रही बधाई
नव सृजन -नव कलेवर
नव उत्सव ,यही है विक्रमी संवत
अवतरण तिथि
श्री ''राम '' की
और लो नव वर्ष आया
लाव लश्कर संग आया ------
आयी जनवरी ,शीत भारी ,
ओढ़ कुहरे की रजाई ,
शिथिल जगती लेती जम्हाई
पेड़ दिगम्बर रूप धारें ,
फाल इसको कहते सारे
आलस औ तम --सूर्य हारा
हड्डियां तक कँपकपायें
पशु-पक्षी सब कसमसाये
न सृजन ना ही है उत्सव
अलाव को सब घेर बैठे।
धवल हिम की सर्द साड़ी
ज्यूँ कुँवारी विधवा हुई हो ,
सर्द अहसासों में डूबी
संगमरमर की ऋचा सी
स्वप्न बुनती जा रही हो ,
वेदनाओं की ऋचायें
स्वयं को समझा रही हो
इस समय को उत्सव बनायें
उदासियों के श्वेत घेरे
सर्द अहसासों के फेरे
डस न ले इंसान को।
मौन मन की वाटिका में ,
कुछ पुष्प बातों के बिखेरें ,
आगमन है शीत का --
हम विजन में मंगल उतारें
शरद की इस ऋतु में ,
नव वर्ष के गीत गायें
आज झूमें ,खिलखिलायें ,
उंघती सी इन छलकती प्यालियों में
प्राण अपने हम उड़ेलें
अर नया इक गीत गायें
उंघती सी इस ऋतु में
फाल की इन डालियों में
धवल हिम की चादरों संग
पच्छिम का कोई गीत गायें
हिम ढकी इन वादियों के
मरमरी कोमल बदन के
बांकपन को - भर नजर हम आज चूमे ,
एक अल्हड़ बांकपन औ
सर्दी भरा अहसास लेकर
पच्छिम का न्यू ईयर मनाएं
शरद की चांदनी की
सेज में हम गुनगुनायें।
आज हम न्यू ईयर मनाएं ॥ ----


टिप्पणी: विक्रमी संवत का नव वर्ष ,प्रकृति के नव सृजन का समय --चैत्र मास -और कलेंडर का नव वर्ष जनवरी यानी शीत से कँपकँपाती प्रकृति ,एक में प्रकृति का उत्फुल आनन्द , श्रृंगार करे हुए ऋतुराज की आरती उतारने आयी नववधू के रूप में प्रकृति और एक में धवल हिम की साडी पहने तप करती नव यौवना तपस्विनी --दोनों पावन ,दोनों निर्मल --एक काम--सृजन का प्रतीक ,एक शिव के लिए तप करती अपर्णा का प्रतीक ---मनाइये दोनों को --सहजता से --दोनों अपने स्थानों की सभ्यता के प्रतीक हैं ----आभा ॥


कुसुम शर्मा
~नववर्ष का करे अभिनन्दन ~
-------------------
नव वर्ष का करे अभिनन्दन
ख़ुशियों से भरे सबका जीवन
पुलकित हो धरती का कण कण
ऐसा हो नव वर्ष का आगमन !!

विश्व की बात निराली
छाई कही पर सूरज की लाली
कही पर चंदा की उजयाली
कही पूर्व तो कही है पश्चिम
इनकी संस्कृति भी है भिन्न भिन्न

पश्चिम की बात निराली
इनकी संस्कृति भी है प्यारी
अँधियारे से है यहाँ उजियारा
पतझड़ मे भी दीपों की यहाँ माला

करके हुड़दंग चाहे नव वर्ष मानाते है
पर जाने वाले साल की अच्छाई को अपनाते है !

यहाँ सर्द ऋतु है आई चारों ओर वर्फ है छाई !
प्रकृति ने भी इसका साथ दिया है
सफ़ेद चादर बिछा कर नववर्ष का स्वागत किया है
तभी तो जनवरी नाम दिया है !
रात के १२बजते ही सभी खुशी से नाचते है
हैपी न्यू ईयर कह कर नववर्ष मानाते है !!

पूर्व की बात निराली
यहाँ सदा सूरज की उजयाली

नव कोपल है खिल रहे
गगन और धरती मिल रहे
नव पुष्प है खिल रहे
जिसमे भँवर गुंजन कर रहे

शंख की ध्वनि छाई चारों ओर
मचा नवरात्र की पूजा पाठ का शोर
हर वर्ष हरियाली लगाते है
ऐसे पूर्व मे नववर्ष मनाते है

है चैत्र का महिना नवरात्र का आरम्भ
पूजा पाठ से करे नववर्ष का आरम्भ !!

टिप्पणी :- सभी नववर्ष का स्वागत अपने अपने तरीक़े से मनाते है पश्चिम मे नववर्ष जनवरी से शुरू होता है 
वहाँ दिसम्बर मे ३१ की रात के १२ बजते ही नववर्ष आरम्भ हो जाता है लोग नाचकर इसका स्वागत करते है 
इसे अंग्रेज़ी का नव वर्ष कहते है !!पूर्व मे नववर्ष चैत्र मास यानी कि मार्च मे अारम्भ होता है हिन्दू कैलेंडर के हिसाब से ---इस समय चन्द्रमा की कलायें बढ़ती है नवरात्र का आरम्भ इसी समय होता है चारों ओर पूजा पाठ होता है और इस समय नववर्ष का आगमन शुभ माना जाता है इसलिए हिन्दू वर्ष से नववर्ष का आरम्भ चैत्र मे होता है 



प्रभा मित्तल
!!नूतन वर्षाभिनन्दन !!

सौर, चंद्र, नक्षत्र, सावन और अधिमास
इनके मेल से बना विक्रम संवत खास।
यहीं से शुरु हुए बारह महीने बरस के,
हफ्ते में दिन सात और तीस का मास।

सृष्टि की रचना का प्रथम दिवस
सूरज की पहली किरण जन्मी
यहीं से सतयुग का उदय हुआ
विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया
प्रभु राम-राज्याभिषेक इसी दिन
काल गणना का प्रारम्भ और
रात से अब दिन भी बड़ा हुआ।

​सूर्य का मेष राशि में प्रवेश
चैत्रमास का शुक्ल पक्ष और
जब तिथि हो प्रतिपदा
नवरात्रि का प्रथम दिवस
कर नए साल की शुरुआत
नवसंवत्सर ​कहलाता है।

आया वसंत हरियाली छाई
चहुँ ओर खुशहाली आई
मौसम ने भी ली अँगड़ाई
वृक्ष लताएँ फूलों से लदकर
नव पल्लव खिलने को आतुर
मंद समीरण मादक बनकर
नए साल का स्वागत करती
नटी प्रकृति भी मुसकाई !

दुनियाभर में इसी माह
काम-काज का तय होता है
नया रूप और लेखा-जोखा।
कह लो चाहे चैत्र या मार्च
कुछ तो है इसमें बात खास।

यौं तो देश-देश की बात है
अपनी संस्कृति अपना कायदा
यहाँ रात है वहाँ भोर हुई
दिन और रात का अन्तर है

जब पतझड़ की उदासी फैली
न आध्यात्मिक न वैज्ञानिक
अकारण पश्चिम की नकल में
क्यों अपने सूर्योदय को भूलें?
31 दिसम्बर आधी रात अंधेरी
सर्दी में ठिठुर-ठिठुर कर
नए साल के स्वागत में
क्यों अंग्रेजी में जश्न मनाएँ?
सोचो....
हम अपनी रीति क्यों छोड़ें?

हम भी भोर का स्वागत करें
मंगल कलश स्थापित करें
घर- घर होवें मंगलाचार
द्वार-द्वार तोरण बंदनवार।
नए-नए परिधान पहन कर
बड़ों को प्रणाम करें छोटों से
स्नेह-सिक्त हो गले मिलें
यथा योग्य अभिवादन कर
जी भर खुशियों से इठलाएँ।

अंग्रेज़ी का हो हल्ला या
शक्ति-भक्ति का वंदन
नए बरस का नया दिन है
सभी रहें प्रसन्न-वदन औ
रखें अपना उत्साहित मन।

धन-धान्य और समृद्धि लेकर
हर साल नया आता है
गु़ज़रे वक़्त का अँधेरा लेकर
जीवन में सुबह का उजाला और
मन में उत्साह नया भर जाता है
पिछला भूल कर आगे बढ़ें....
करें नव वर्ष का अभिनन्दन !!
नूतन वर्षाभिनन्दन !!
हैप्पी न्यू ईयर !!


टिप्पणी: (नव वर्ष मनाने के उत्साह में हमें अपनी संस्कृति नहीं भूलनी चाहिए।पश्चिम की सभ्यता हमारी नहीं है..वे लोग अपना कायदा अपनाते हैं तो हम भी अपनी सभ्यता भूलकर उनका अन्धानुकरण न करें।)




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