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Saturday, June 25, 2016

‎तकब ६ - [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता 6 ]





‪#‎तकब६‬ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता #6 ]
मित्रो लीजिये अगली प्रतियोगिता आपके सम्मुख है. नियम निम्नलिखित है 
१. दिए गए दो चित्रों में अंग्रेजी में कुछ लिखा गया है दोनों में सामंजस्य बिठा कर [ चित्रऔरलिखे पर] कम से कम १० पंक्तियों की रचना शीर्षक सहित होनी अनिवार्य है [ हर प्रतियोगी को एक ही रचना लिखने की अनुमति है.] 
यह हिन्दी को समर्पित मंच है तो हिन्दी के शब्दों का ही प्रयोग करिए जहाँ तक संभव हो. चयन में इसे महत्व दिया जाएगा.
[एक निवेदन- टाइपिंग के कारण शब्द गलत न पोस्ट हों यह ध्यान रखिये. अपनी रचना को पोस्ट करने से पहले एक दो बार अवश्य पढ़े]
२. रचना के अंत में कम से कम दो पंक्तियाँ लिखनी है कि आपने रचना में उदृत भाव किस कारण या सोच से दिया है, 
३. प्रतियोगिता में आपके भाव अपने और नए होने चाहिए. 
४. प्रतियोगिता २३ जून २०१६ की रात्रि को समाप्त होगी.
५. अन्य रचनाओं को पसंद कीजिये, कोई अन्य बात न लिखी जाए, हाँ कोई शंका/प्रश्न हो तो लिखिए जिसे समाधान होते ही हटा लीजियेगा.
६.आपकी रचित रचना को कहीं सांझा न कीजिये जब तक प्रतियोगिता समाप्त न हो और उसकी विद्धिवत घोषणा न हो एवं ब्लॉग में प्रकशित न हो.
विशेष : यह समूह सभी सदस्य हेतू है और जो निर्णायक दल के सदस्य है वे भी इस प्रतियोगिता में शामिल है हाँ वे अपनी रचना को नही चुन सकते लेकिन अन्य सदस्य चुन सकते है. सभी का चयन गोपनीय ही होगा जब तक एडमिन विजेता की घोषणा न कर ले.

इस बार के विजेता है  श्री मदन मोहन थपलियाल 'शैल'


Kiran Srivastava
"कर्म-लेखा"
======================

कर्म सदा करते जाना है
चाहा जो उसको पाना है
नहीं अडिग कर्तव्य पथ से
नहीं भाग्य पे इतराना है..!!
पहले से ही सब तय है
ईश्वर ही कर्ता-धर्ता है,
जो लिखा है किस्मत में
वो भाग कर आयेगा
जाना है गर किस्मत से
आकर भी चला जायेगा,
हम तो बस कठपुतली हैं
डोरी उसके हाथों में
वही चलाता वही नचाता
हम बस चलते जातें हैं
मनुज समझ नहीं पाता
सोचे वो भाग्य-विधाता है
जितना किस्मत में है उसके
उतना ही वो पाता हैं ,...!!!!

टिप्पणी- मनुष्य खुद को सर्वकारी समझता है ।जो की सत्य नहीं है । हम सब किसी अदृश्य शक्ति के अधीन हैं,और उसी के अनुसार कर्म करते हैं ।


बालकृष्ण डी ध्यानी
*********
~भाव मेरे~

भाव मेरे उड़ चले हैं
आज सब उड़ चले कहाँ
शब्द ना मिले मुझे
आज सब वो खो गये कहाँ

सब कुछ वो मेरे लिये था
इसका ना कभी पता चला
व्यर्थ ही जीवन मेरा आज
धूल संग उड़ चला कहाँ

कुछ उसने था लिखा
उसे ना मैं फिर लिख सका
जैसा भी हो मैं तो जी लिया
जो भी होगा उसने लिखा

बेफिक्री मौसम था वो मेरा
मेरे चारों तरफ जो बिखरा
मदहोश होकर घूमता रहा
बस मैं अपने आप से जुड़ा

भाव मेरे उड़ चले हैं ...



टिप्पणी : अपने भावों को खोजता जीवन, जैसा मिले वैसा जी रहा जीवन ,बेफिक्री में फिरता जीवन , अपने आप से लगा हुआ जीवन , मदहोश होकर घूमता जीवन


सुशील जोशी 
“आज का सत्य”
******************************************
इन्साँ ही गलती करते हैं, क्योंकि वे भगवान नहीं,
जानबूझ कर गलती करने वाले पर नादान नहीं,
लगे रहो तुम कोशिश में या लालच दो घर भरने का,
ईमान बेचकर शोहरत पाने वाला मैं इन्सान नहीं।

नहीं चाहिए ऐसा बंगला चमक हो जिसमें सट्टे की,
नहीं चाहिए दौलत जिसमें बू आती हो कट्टे की,
जो चोरी को अपना समझे ना चाहूँ उस यारी को,
ठुकराता हूँ ऐसे लोगों को उनकी मक्कारी को,
भले रहूँ गुमनामी में चाहूँ झूठा सम्मान नहीं,
ईमान बेचकर शोहरत पाने वाला मैं इन्सान नहीं।

सबका लेखा जोखा लिखकर भेजा ऊपर वाले ने,
लेकिन हम हैं जो उस सब को रख बैठे हैं ताले में,
आज हम अपने इन्साँ होने का भी सत्य भुला बैठे,
कर्म की लेकर आड़ कुकर्मों से खुद ईश रुला बैठे,
गीता के उपदेश नदारद और कहीं कुरआन नहीं,
ईमान बेचकर शोहरत पाने वाला मैं इन्सान नहीं।


टिप्पणी : आजकल के माहौल को देखते हुए अपने चरित्र चित्रण को माध्यम बनाकर मैंने सही और गलत बताने का प्रयास किया है। यद्दपि पता नहीं चित्र के साथ पूर्ण न्याय करने में मैं कितना सफल हुआ किंतु जो मन में भाव उभरे उन्हें यहाँ लिख दिया।


नैनी ग्रोवर 
~जो होना है सो होगा~

जो होना है सो होगा,
विधाता का लिखा है,
उसके लिखे को पढ़ पाना,
भला कौन सीखा है ...
मैं क्यों देखूँ,
किसी और का धर्म है क्या,
क्यों ना सोचूँ,
के मेरा अपना कर्म है क्या,
क्यों कड़वे बोल से,
किसी का मन में दुखाऊँ,
क्यों निंदा करूँ किसी की,
पाप का बोझ उठाऊं,
कर सकती नही भला,
तो किसी का बुरा भी क्यों करूँ,
किसी के मासूम सपनो को,
मैं चूरा-चूरा भी क्यों करूँ,
कौन जाने, कौन हे सच्चा,
कौन है झूठा जहान में,
स्वयं को देखूँ, भीतर तक तो,
हैं सारे ही, कर्म नादान से..!!

टिप्पणी... इंसान अपने कर्म ना देख कर दूसरों पे उंगली उठाता है, अपने किये गन्दे कर्मों को भूल जाता है ।


गोपेश दशोरा
~नियति और कर्म~

जब वो ही लिखने वाला है, और वो ही मिटाने वाला है,
किस बात का तुझको ग़म इंसा, किस बात पे तु इतराता है।
देकर जीवन उसने तुझको, अपना कर्म साकार किया,
माथे पे लिखकर किस्मत को, हाथों में उसे आकार दिया।
जो लिखा है तुझको पता नहीं, फिर हार मान क्यूं बैठा है,
मेहनत कर ले मिल जाएगा, आखिर तु उसका बेटा है।
यह जीवन सागर ऐसा है, जो जितना गहरा जाता है,
उसको ही मोती मिलते हैं, वो ही तर बाहर आता है।
हाथों पर धर कर हाथ यहाँ, कुछ होगा, सोचते रहते है,
कुछ भी नहीं मिलता उनको, किस्मत को रोते रहते है।
जो लिखा हुआ है किस्मत में, निश्चित तु एक दिन पाएगा,
पर कर्म तुझे करना होगा, वरना सब फिसला जाएगा।
जो मिला उसे सर्वस्व मान, बहुतों को यह भी मिला नहीं,
ईश्वर है तेरे साथ सदा, सच्चों को उसने छला नहीं।
अन्तर्मन में झांक के देख, है ईश्वर तेरे अन्दर ही,
भला-बुरा सब देख रहा, है कुछ भी उससे छिपा नहीं।
कर्म कर सच्चे मन से, मत फल की आशा कर पगले,
संतोष परम सुख मान सदा, बदलेंगे तेरे दिन अगले।
मत हार समझ अपनी नियति, उसने भुजबल है तुझको दिया,
विपरीत चला जो धारों के, उसने सच्चा जीवन है जिया।

टिप्पणीः कुछ लोग एक या दो असफलता के बाद उसे ही अपनी नियति मानने लगते है और कहते है कि ईश्वर नहीं होने दे रहा। जबकि कमीं उनके प्रयासों में होती है। यदि पूरे मन से प्रयास करें तो ईश्वर भी साथ देता है और सफलता निश्चित मिलती है। हो सकता है कि सफलता एक निश्चित प्रयास के बाद ही लिखी हो।


प्रभा मित्तल
~~विधि का लेखा~~
~~~~~~~~~~~~~
मन तू उठ चल ! धीरज धर,
अधिकार नहीं तेरा जिस पर
क्यों फिर तड़पन इतनी उस पर,
विधि ने दिया जो,ले ले हँस कर ,
क्यों रोता है पगले नर होकर।

मन में रखकर विश्वास अटल ,
दूर हटा दे पथ का पत्थर,
अन्य किसी से आशा मत कर
अपना मन पहले अपना कर,
अधिकार जता फिर औरों पर।

उठ, मिटने के मत कारज कर,
आँधी-तूफानों से घबराकर
क्यों बैठ गया है साहस खोकर,
जो बदा है भाग्य में तेरे,वो तो
निश्चय ही पाएगा आगे बढ़कर।

नहीं मिला संतोष कभी भी
किसी और पर दृष्टि गड़ाकर
तेरा - मेरा करते-करते ही
मिट जाएगा जीवन नश्वर।
गर ढूँढे तो मिल जाएगा -
पारस मणि तेरे ही घर पर।

तेरा सुख है तेरे ही कर्मों पर निर्भर,
दूजे के कन्धों पर चढ़कर,क्या
देख सका कोई जग सत्वर।
अरे! मंजिल तक पहुँचेगा राही
अपने ही पैरों से चलकर।

हाँ..ये सच ही तो है ...
मंजिल तक पहुँचेगा राही
अपने ही पैरों से चलकर।

टिप्पणी: मनुष्य हमेशा दूसरों के सुख को अपने से अधिक आँकता हैं ...ऐसे में मानव-मन को सम्बोधित करते हुए,जो मिला उसमें ही संतुष्ट रहने और कर्म पर विश्वास रखने की सलाह देने की कोशिश की है।



प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
~ कर उद्धार ~

कर्म होता आधार
बनता नियति का सार
रचता है वो
सजता व् सवंरता मनुष्य
कैसे कोई मिटाए
किस्मत का लेखा
राजा से रंक
फकीर कोई बादशाह बनता
नियति से सोच
बदलती जाती है
अच्छा या बुरा
फिर मनुष्य करता जाता
भाग्य है प्रधान
कर्म बने पहचान
जीवन का सच
तू इसे मान न मान
कर ले ध्यान
पास तेरे भगवान
आज नही तो
कल मिलेगी तुझे पहचान
मन से शुद्ध
अपना पवित्र संस्कार
छोड़ उस पर
कर खुद का उद्धार

टिप्पणी:  नियति को मान चलता हूँ कर्म को आधार समझ बढ़ता हूँ .. सफल असफल खुद फैसला करता हूँ.


किरण आर्य 
---नियति---

जिन्दगी में नियत है सब
नियति से बंधा है जीवन और जीव
जिस तरह शब्द विचरते ब्रहमांड में
वैसे ही आत्मा बदल चौला बदलती है रूप
संस्कारों और नियति से बंधा जीवन
हर चरण को करता है पूरा

कर्म करते है नियत संस्कारों को
सुकर्म करते है अमरता प्रदान
नाम और जीवन को
कुकर्म कर जाते है कलंकित
जीवन को नरक है बनाते

एक शक्ति अलौकिक सी
करती सञ्चालन जीवन चक्र का
जीवन से मृत्यु पथ तक
जो लिखा गया वो मिटा नहीं
जो बीत गया समय वो लौटा नहीं

समय का चक्र बड़ा बलवान
बस कर्मों का खेला है जीवन
सुकर्म कर और आगे बढ़
जीवन को दे तू राह सही
बाकी कर मत चिंता तू

सब छोड़ उस परमात्मा पर तू
हो जा निश्चिन्त और निफ्राम तू
सब कुछ तुझमे और तुझ तक है
कुछ भी न अलग हाँ तुझसे है
आत्मा में बसे वहीँ राम रहीम
वहीँ है ईसा घनश्याम करीम

आत्मा भी तू परमात्मा भी तू
प्रकृति भी तू सृष्टि भी है तू
नश्वरता से अमरता तक
पंचतत्वों का है सार भी तू
आस भी तू विश्वास भी तू

अतृप्ति से तृप्ति का आकार भी तू
साकार भी तू निराकार भी तू
तुझसे ही शुरू है ख़त्म तुझी पे
ये समझ ले बन्दे बस तू ही तू..............

टिप्पणी: नियति तो अपनी चाल चलती है लेकिन अगर प्रारब्ध का फल मान लिया जाए जीवन को तो मनुष्य को सतकर्म करते हुए जीवन बिताना चाहिए



डॉली अग्रवाल 
~कर्म~

जन्मों का किस्सा
कर्मो का हिस्सा
कार्य और कारण
यूँही नही बनते !

साँस आनी जानी है
ज़िन्दगी बड़ी सयानी है
आखिर ढल ही जानी है
धूप की कहानी है !

कश्ती का रखवाला
कश्ती डुबोता है
शिकायतों का दौर
बड़ा बेमानी है !

जागता है अंधियारा
उजियारा सोता है
हर एक को विधाता
नाच करवाता है !

रिश्ते नाते , अपने परायो
की माला वो पिरोता है
नियति का नाम दे
ता -- ता थैया
करवाता है !

ज़िन्दगी की डोर थामे
गरूर वो तोड़ देता है
जब मन में आये तो
साँस भी खींच लेता है !

टिप्पणी: मिट्टी का शरीर न तेरा न मेरा -- रेत के घरौंदे है बनते है मिट जाते है ! आस्था और विश्वास जो हुआ अच्छा हुआ , जो होगा वो भी अच्छा होगा !!


Ajai Agarwal
===विधना (नियति +कर्म ) ===

मैं क्या हूँ ? इक कठपुतली !
विधना के हाथों से फिसली
विधना ही खेल खिलाती है
ये हर क्षण मुझे नचाती है ,
निज से निज की पहचान करूं
कैसे आगत का मान करूं ?
मुझको लिखकर अपनी मसि से
मुझमें ही छिपा दिया तूने !
द्वार झरोखे तन मन में !
पर फिर भी भेद नहीं पाऊं ?
तू मुझमे है ,मैं तुझमे हूँ
सदियों से सदियों तक खेल यही !
तब भी जब तू मुझ में थी ,
औ मैं अज्ञानी अंजान रही !
अब भी जब तू मुझमे है
अर मैं तुझको पहचान गई ।
जब मैं ही तू हूँ , तू ही मैं
फिर सगरा विश्व हुआ मेरा
अब ''मैं'' कहीं खोने को है -
तू ही तू है तू ही तू है।
मैं बादलों की क्यारियों से -
बरसती मोती की झालर ,
उषा की सिन्दूरि आभा ,
कुमकुम चूर्ण सी प्राची में बिखरी।
बात करूं कभी मैं तुम संग ,
कभी मैं आस करूं तेरी--
अपने तन में मेहमान रहूं
हाँ मैं हूँ तेरी कठपुतली !
ये सूरज चंदा मेरे हैं ,
नभ के सब तारे मेरे हैं ,
वन -पर्वत नदियाँ सागर ,
सब मेरे लिये -सब मेरे हैं।
झरनों सा बहता मन मेरा ,
ताल-तलैया नयन मेरे ,
सदियों की यादों के जंगल ,
है मन में रोप दिये तूने।
तू विशवास मैं तेरी अभिव्यक्ति ,
तू संस्कृति मैं इतिहास तेरा ,
तू रूढ़ कल्पना -विस्तार हूँ मैं
तू सौंदर्य और मैं चेतनता।
सब मेरा है ,तो मैं हूँ कहाँ ?
विधना ; ये सब तेरी लीला है !
है -भविष्य यदि अंधियारे में
तो ,भूत कहां उजियारा है
तड़ित की क्षणिक चमक ही
बादलों का भाग्य लेखा।
कैसे पढूं ? क्यूँकर पढूं !
जब हाथ में तेरे ही सब है
तू दीर्घ रूप नारायण है -
लघु रूप तेरा मैं तो नर हूँ।
विधना की स्याही के अक्षर
विधना ही बस तू ही पढ़ सकती
जीवन पारद माला जैसा
इक चोट लगी औ बिखर गया
जीवन ,नदिया -सागर की लहरें
पानी में लिखी लिखाई है।
भाग्य-भाग्य को क्यूँ रोऊँ ,
सत्ता तेरी कानून तेरा
मैं कुसुमों का सौरभ बनकर
पवन सुवासित बन जाऊं
विधना तू दे वरदान मुझे ,
अभिलाषा मेरी हो - लेख तेरा।।

टिप्पणी ------दो चित्रों के भाव इस कविता की प्रेरणा -- सब पूर्व लिखित ,नियति कठोर है अपने नियम नहीं तोड़ती -कर्मों का फल ,कुछ संचित अपने , कुछ पूर्वजों के --हानि लाभ जीवन मरण यश -अपयश विधि हाथ --शुभ कर्म समर्पित भाव से किये जाएँ ,तो its all about me --

Madan Mohan Thapliyal 

~ऊहापोह~

बार -बार एक प्रश्न,
कुन्द बुद्धि जाग जरा,
क्षीण होता है सब,
जब दस्तक देती जरा.

हंस रहा गगन,
किंकर्तव्यविमूढ़ वसुन्धरा,
भाग्य की ए वैतरणी,
क्या लिखा क्या धरा ?

विधाता ने सब लिखा
सयाने ए कह गए,
मिट सकता नहीं लेख,
हम हतप्रभ रह गए.

कोई करे पाप घनेरे,
क्यों है समाज कोसता,
छोड़ दें कहना सब
विधाता का है किया धरा.

तिलिस्म है जिन्दगी,
भाग्य में है क्या बदा ?
मायने टटोल जिन्दगी के,
कहानी ए रहेगी सदा.

जो करे ओ करे,
क्या सोचना श्रेष्ठ है,
स्वयं को निष्क्रिय रखना,
क्या यथेष्ट है ?

मेरा काम नहीं सोचना,
अगर सब उसी का है रचा,
बुद्धि विवेक का फिर काम क्या,
नाहक शोर है मचा.

मृत्यु उसकी बानगी,
प्रलय की डोर उसके हाथ,
यहीं धरा रह जाएगा,
कुछ था नहीं तेरे साथ.

कर पुरुषार्थ,
कुछ भी अकर्मण्य नहीं
सब है खरा-खरा,
नसीब को न बना संगिनी,
नाहक नसीब से है डरा !!!! *********।

टिप्पणी: ईश्वर के लेख को कोई मिटा नहीं सकता, लेकिन भाग्य के भरोसे हाथ पर हाथ धर कर बैठना भी बुद्धिमत्ता नहीं. पुरुषार्थ करना ही मानव का कर्म और धर्म दोनों हैं.


Prerna Mittal 
~आस्थावान या अहंकारी {दो विरोधी व्यक्तित्व }~

सृष्टि का सारा क्रम चलता, प्रभु के एक इशारे पर
क्या है प्रारब्ध, भविष्य है क्या ? उसके ही सिर्फ़ सहारे पर
अनहोनी होती कभी नहीं, जो होता है, वह होता है ।
वैसे ही फल तो पाएगा, जो जैसे बीज को बोता है ।
अच्छा तो अच्छा, बुरे को भी स्वीकार तो करना ही होगा ।
प्रारब्ध कहो, क़िस्मत कह दो या भाग्य कुछ तो कहना होगा ।
कैसा होगा भविष्य? इसको तो कोई ना जान सका ।
कल बहुत दूर, अगले ही पल को कोई ना पहचान सका ।
होनी और भाग्य, मरण, जीवन, यश, धन सब ईश की माया है ।
वह महाशक्ति है, सघन वृक्ष, जीवन उसकी ही छाया है ।

इसके विपरीत भाग्य को जो केवल पुरुषार्थ मानते हैं ।
वे अहंकार के वश होकर, सत्यता नहीं पहचानते हैं ।
गीता में योगेश्वर प्रभु ने पुरुषार्थ कर्म सब बतलाया ।
है सिर्फ़ कर्म मानव के लिए, फल इच्छित कब ?किसने पाया ?
सारे दोषों में मानव के, है अहंकार ही दोष बड़ा ।
जब मैं-मैं-मैं-मैं का डमरू बजा तो समझो ! सब कुछ नष्ट हुआ ।
मैं-मैं करने वाले को कब आवाज किसी की आती है ?
बकरी भी मैं-मैं करती है और गले छुरी फिरवाती है ।
था एक सिकंदर अति महान, दुनिया को सारी जीता था ।
दो गज़ ज़मीन ही है नियति, यह उसकी मृत्यु से सीखा था ।
बस दूर करो ये ग़लत भ्रांतियाँ, तुम कुछ भी नहीं कर सकते हो ।
उस महाशक्ति के बिना कहो क्या, एक भी डग चल सकते हो ?
भूतल से, जल से पशु-पक्षी क्यों नहीं उपजते हैं, बोलो?
पेड़ों से, पत्तों से मनुज क्यों नहीं पैदा होते बोलो ?
इतना तो बतलाना होगा, क्रमबद्ध क्रियाएँ क्यों चलती हैं ?
लपटें उठतीं क्यों ऊपर को, धारा क्यों नीचे बहती है ?

टिप्पणी : भाग्य बहुत बलवान होता है ।कर्म करना मनुष्य के हाथ में है, परंतु फल उसकी क़िस्मत के अनुसार ही मिलेगा । नियति के संचालक सिर्फ़ सृष्टि के नियंता हैं और कोई नहीं ।



अलका गुप्ता 
~हर मकां मुहब्बत का~
~~~~~~~~~~~~~~
कयास में बहु रूपों का.. टेरा लगता है |
चर्च मंदिर मस्जिद का फेरा लगता है |
हर जर्रा करे है...तेरा ही जब इशारा...
क्यूँ धर्मों का अलग से बसेरा लगता है ||

छूटें ...हे नाथ ...मायाबी ...बन्धनों से !
निकाल अंधियारे इन अति-गुम्फनों से !
शान्ति स्पंदन से भर देना जीवन ये ...
कर मुक्त ईश मुझे इन भव-उलझनों से !!

मजहब एक ही..इंसानियत...चलाया जाए !
हर मकां मुहब्बत का धरा पर बसाया जाए !
बुझा आग़ नफरतों की..बहा दरिया सीने में...
दुनिया-बे-समंदर...प्रेम ही...छलकाया जाए !!

करें अराधना आओ इंसानियत की |
मूल्यांकन करें पूजा नैतिक धर्म की |
ढकोसला धर्म का अवधारणा झूठी ..
चरित्र ही धर्म है इबादत उस ख़ुदा की ||

ईश ! वही परमपिता परमात्मा..एक है !
आत्मा प्रकृति ..रूप परिवर्तित अनेक है !
स्वामी एक वही सबका..अजर अमर वो..
घट-घट..व्यापी न्यायी उपकारी नेक है !!


टिप्पणी --इंग्लिश मुझे बहुत नहीं आती ..जितना मुझे मेरी बुद्धि ने समझाया उसी हिसाब से लिखने का प्रयास किया है... इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है |जहाँ कहीं से पुकारो सुनने वाला हर तरफ एक ही ईश है ! ...चाहें ...जिस नाम से पुकार लो उसको..| उसने हमें इंसान बनाया .. तो हमें भी बस इंसानियत का निर्वाह या कर्म करना चाहिए बिना किसी दुनियाबी धर्म के झूठे ढकोसलों में पड़े |



कुसुम शर्मा 
~..ख़ाली हाथ ही जाएगा~
----------------------
तू-तू मै-मै करते - करते
एक दिन तू मर जाएगा !
क्या लाया था साथ
जो साथ तू ले जाएगा !

पाँच तत्व का बना शरीर
उन्हीं मे मिल जाएगा !
ख़ाली हाथ ही आया तू
ख़ाली हाथ ही जाएगा !

न कोई है तेरा
न कोई साथ जाएगा !
धन दौलत सोना चाँदी
यही छूट जाएगा !

जैसा कर्म करेगा जग मे
वैसा ही फल पाएगा !
केवल कर्मों की पोथी
तू साथ मे ले जाएगा !

मोह माया मे फँस कर तू
जीवन का मक़सद भूल गया !
संसार मे आते ही तू
इसी के रंग मे रंग गया !

स्वार्थ भरी इस दुनिया मे
तू भी स्वार्थी बन गया !
करके ओरों पर अत्याचार
तू भी अत्याचारी बन गया !

किस बात का अभिमान करे
निर्दोषों को मार कर
क्यो अपने भण्डार भरे !

क्यो भूल गया उस ईश्वर को
जिसने तुझे बनाया है !
मिट्टी की देह बनाकर
सासो का दीप जगाया है !

उसने तो पाठ प्रेम का समझाया !
तूने आ कर इस जीवन मे
पापों का ही भार कमाया !

अरे पगले यहाँ सब कुछ मिलेगा दुवारा !
पर यह जीवन नही मिलेगा दुवारा !

टिप्पणी :- हम अपने जीवन मे अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए जाने कितनों का मन दुखाते है अपनी झूठी खुशी के लिए जाने कितनों को रूलाते है अपने झूठे अभिमान मे हम भगवान को भी भूल जाते है हम सोचते है जो भी कर रहे है हम कर रहे है उस सृष्टि रचेता को भूल जाते है किन्तु सत्य यह है कि हम अपने जीवन मे जैसे कर्म करते है उसी प्रकार का फल पाते है




सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Thursday, June 9, 2016

#तकब4 - तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता 4






#‎तकब४‬ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता #4 ]
मित्रो लीजिये अगली प्रतियोगिता आपके सम्मुख है. नियम निम्नलिखित है 
१. इस चित्र में है दो चित्र - दोनों में सम्बन्ध स्थापित करते हुए, कम से कम १२ पंक्तियों की रचना का सृजन करे शीर्षक सहित. 
यह हिन्दी को समर्पित मंच है तो हिन्दी के शब्दों का ही प्रयोग करिए जहाँ तक संभव हो. चयन में इसे महत्व दिया जाएगा.
२. रचना के अंत में कम से कम दो पंक्तियाँ लिखनी है कि आपने रचना में उदृत भाव किस कारण या सोच से दिया है, 
३. प्रतियोगिता में आपके भाव अपने और नए होने चाहिए. 
४. प्रतियोगिता ७ जून २०१६ की रात्रि को समाप्त होगी.
५. अन्य रचनाओं को पसंद कीजिये, कोई अन्य बात न लिखी जाए, हाँ कोई शंका/प्रश्न हो तो लिखिए जिसे समाधान होते ही हटा लीजियेगा.
६.आपकी रचित रचना को कहीं सांझा न कीजिये जब तक प्रतियोगिता समाप्त न हो और उसकी विद्धिवत घोषणा न हो एवं ब्लॉग में प्रकशित न हो.
विशेष : यह समूह सभी सदस्य हेतू है और जो निर्णायक दल के सदस्य है वे भी इस प्रतियोगिता में शामिल है हाँ वे अपनी रचना को नही चुन सकते लेकिन अन्य सदस्य चुन सकते है. सभी का चयन गोपनीय ही होगा जब तक एडमिन विजेता की घोषणा न कर ले.


इस बार  के  विजेता  है " प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल "


1.
बालकृष्ण डी ध्यानी 
~कल्पना और हकीकत~

एक पेड़ है एक इंसान
कल्पनाओं की है ये उड़ान

कृष्ण धवल है जिनका स्थान
कल्पनाओं का रंग फीका जान

चुप है वो शांत अकेला खड़ा
अपने से वो अब क्यों बोल पड़ा

खो गयी है अब उसकी पहचान
सजीव है वो उसे तू निर्जीव जान

छोड़ चुके अब मन के प्राण
कल्पना समझ या हकीकत जान

खो गयी है अब वो मुस्कान
चुप है एक पेड़ अब चुप है एक इंसान

टिप्पणी:
कल्पना और हकीकत में ताल मेल बैठने का काम कराती ये रचना हमे अपने अब के यथार्त जीवन के दर्शन को दर्शाने की एक छूटी कोशिश की है जो रंग से बेरंग होती जा रही है


2.
Pushpa Tripathi 
~तन रूपी एक पेड़ उदास~.

नन्हा मन अंजान था
सपने बहुत देखे उसने
उम्र नादान ... अनुभवों से अज्ञान
अभी तो
छोटी छोटी कोंपल से बनती
बाद जैसे शाखाओं पर
हरी हरीभरी पत्तियाँ
पूरा का पूरा वृक्ष उत्साहों से घना बना
मन ----- अंजान उदासी से परे
फैला हुआ !!

बडा हुआ मन ,,,,,, अब
असंख्य बाधाओं विपदाओं से सना
बैठा अकेला सोचने .... करे भी तो कैसे करे
समस्या के उलझ सुलझ में
कर्तव्यो का पूरा काम !!!!

जो हौसले कल थे फूले फले
आज रंग बना एक गहरा आभास
इसी सोच में सिर्फ पत्ती नहीं बल्कि
मन सहित तन रूपी एक पेड़ उदास !!

टिप्पणी:
( आयु के एक ऐसे पड़ाव में खुशियाँ बहुत होती है जब मन बच्चा होता है उस समय उमंग और हौसले में ज्यादा फर्क नहीं रहता किन्तु उम्र के साथ जिम्मेदारियाँ व कार्य का भार बढ़ जाने से हरित मन उदास हो जाता है .... कविता का भाव इसी को दर्शाता है। )


3.
नैनी ग्रोवर 
~मन और तन~

थक चुके हैं,
मन और तन,
कहाँ जाके अब,
चैन मैं पाऊँ,
दूर-दूर तक,
धूप ही धूप है,
जिस और भी,
नज़र घुमाउँ..

जाने कहाँ,
गुम हुआ वो पेड़,
जिसपे झूला,
मैं झूला करती थी,
जिसकी ठंडी-ठंडी,
छाँव को,
माँ का आँचल,
समझा करती थी,
अब जाके वैसा,
आराम कहाँ में पाऊँ..

खूब घनेरे पत्तों से,
आँगन में,
छाँव बिछाये,
यहाँ वहां,
सारे घर को,
खुशबु से महकाए,
वो दोस्त मेरा,
फिर से कोई,
इक बार ढूंढ के लाये,
देखूँ उसे तो फिर से,
लौट जीवन में आऊँ...

ऐसा ना हो,
घुट जाए दम,
साँसे रुकने लगें,
हवा हो जाए कम,
ना मिले कोई दवा,
लाचारियों की,
हर घर बने जाए,
पनाह बीमारियों की,
जाओ जाओ,
उसे ढूंड लाओ,
इस सुलगते वीराने से,
मुझको बचाओ,
करूँ विनिति मैं,
अपनी झोली फैलाऊँ...!!


टिपण्णी:-
पर्यावरण एवम् पेड़ों के प्रति मानव जाति की लापरवाही ।



4.
Kiran Srivastava 
[प्रकृति और हम]
======================

जीवन में ठहराव कहां है
धूप ही धूप है, छांव कहां है....

पहले पेडों की छाये में
थक हार सुस्ताते थे

फिर आगे जाने की
हिम्मत हौसला पाते थे

हरियाली नाराज हो गयी
पेडों की अब छांव चली गयी...

गर मानव करनें की ठानें
पत्थर पर भी घास उगा दे

लेकिन क्यों सुस्ती है आयी
प्रकृति पर घोर आपदा छायी

प्रकृति पर हम हैं निर्भर
हमसे प्रकृति ही कायम है

सोचें कुछ ऐसी तरकीब
रहें हमेशा प्रकृति के करीब....

टिप्पणी-
पर्यावरण की रक्षा हमारी रक्षा है। पर्यावरण को बचाना हमारा कर्तव्य है।



5.
Prerna Mittal 
~एकांत~

तरु एक विशाल, बीज की छाती को चीरता,
अचल वह, हवा के तेज़ थपेड़ों को झेलता ।

पनपता, बढ़ता, वह आत्मचेतना से भरपूर,
शांत, चुप, अपने आप में मग्न और मगरूर ।
ना जाने क्या सोचता, मस्ती में झूमता,
अपनी शाखाओं और पत्तों को चूमता ।

आदमी को भी चाहिए थोड़ा सा एकांत,
सो बिताए वह स्वतः कुछ एकाकी क्षण
जिससे कर पाए आत्म विश्लेषण
पहचान पाए अपना अंतर्मन

क्या यह नीरवता दे पाएगी उसे शांति ?
कि खोज पाए वह अपने 'मैं' को ?
जो उससे कहीं खो गया है ।
वक़्त की धारा में बह गया है ।

अपने ही अस्तित्व से बेख़बर रहा अनजान भय से,
आज हिम्मत जुटाकर ईमानदार हुआ स्वयं से ।
आया इस सुनसान जगह,
जानने कि है, कौन वह ?

संसार से मुँह फेर,
बैठा रहा, पता नहीं कितनी देर ?
प्रारम्भ में सकुचाता,
कैसे करे अपने से ही वार्ता ।
आहिस्ता से निज से खुलता,
कभी हँसता, कभी रोता ।

आज ख़ामोशी का आलम लगता सुहाना
कितना अपना, कितना सुखद यह वीराना
मन की परत-दर-परत खोलता हुआ
आज हर सिलाई, हर टाँका उधेड़ता हुआ

हर बीते पल को टटोलता, परखता,
कहाँ हुई चूक और कहाँ मिली सफलता ।
कब किया कुछ बहुत ख़ास,
जिसने कराया तृप्ति का एहसास ।
कब हो गई यह इतनी भयंकर भूल,
अफ़सोस ! हटाई नहीं ग़लतफ़हमियों की धूल ।

आज हुआ आत्मबोध, जागी चेतना
तो बिहंसा और मुस्कराया ।
हँसी आई ख़ुद पर,
क्यों हमेशा राई का पहाड़ बनाया ।

आज आभास होता वे थीं अर्थहीन छोटी-छोटी बातें
जिनके लिए गँवाईं उसने तमाम दिन और रातें

वृक्ष जिस तरह अपने आप में ख़ुश रहता है ।
जीता है और जीने देता है ।
एकांत, मौक़ा देता आत्म विचार करने का
देता जीवन को लक्ष्य, करवाता बोध पूर्णता का ।

- प्रेरणा मित्तल

टिप्पणी:
मनुष्य व पेड़ दोनों प्रकृति का हिस्सा हैं । दोनों को ही भली-भाँति बढ़ने के लिए थोड़ा सा एकांत (space) चाहिए । असली ख़ुशी व शांति अपने आप को जानकर ही प्राप्त की जा सकती है ।


7.
भगवान सिंह जयाड़ा 
----ढलती काया----

इंशान हो या पेड़ जब ढल जाती है काया,
साथ छोड़ देता है जब अपनों का ही साया,
बस एकाकीपन और तन्हाई ही रह जाती है,
तब बीते लम्हों की यादें मन को बहुत दुखाती है,
जिस के चारों तरफ कभी उसके बहुत मंडराते थे,
कमी न रहे इनकी परवरिश में बहुत घबराते थे,
जीवन के इस पड़ाव में अब सब ने साथ छोड़ा,
निहार कर अपने लगाये पेड़ से शकुन मिलता थोड़ा,
कोई साथ नहीं तो क्या हुवा,साथी पेड़ खड़ा है,
मेरी तरह वह भी आज अकेला निर्जन पड़ा है,
बूढा पेड़ फल भले ही न दे,पर देता शीतल छाया,
आशिर्बाद ही बहुत है बुजुर्गो का जब ढल जाती काया,
करो सम्मान इन का पेड़ हो या कोई बुजुर्ग इन्शान,
मिलती एक असीम शान्ति और खुश होंगे भगवान,

-----भगवान सिंह जयाड़ा--
------------------------------------------
टिप्पणी:
अक्सर बुजुर्ग इन्शान और जर जर पेड़ों की अवहेलना को देख कर यह लिखने का मन किया,,धन्यबाद


8
प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~ शाश्वत सत्य ~

वृक्ष और जीवन
कहाँ विलग एक दूजे से
जन्म संग हो सुवासित
विकसित चलते दोनों
कोमल पौधा एक दिन
वृक्ष बन कर इतराता
बचपन से यौवन का हाथ थाम
दोनों हरित हो कुसुमित होते
जीवन के नित नए पल है बोते

एकांत से उपजी पीड़ा
अलग कहाँ होती है
वृक्ष और मानव जीवन
जन्म मरण से है बंधे
जन्मचक्र नियति का धारक
अंतिम पथ पर सब चले अकेले
रिश्ते नाते मोह जीवन का
एक पड़ाव पर सब व्यर्थ लगे

राह दुर्गम और पथ अनजाना
किस पल जाने मृत्यु वरे
बसंत सा उज्ज्वल यौवन
फिर पतझड़ की रुत आती है
टूटे मन के सपन सलोने
मृगतृष्णा सा जीवन लगता है

जाना है निश्चित
है मृत्यु शाश्वत
अंतिम पथ पर है कर्म खड़े
जो बोया वहीँ है काटे
जीवन पर यह नियम चलेतो

टिप्पणी:
जीवन एक समान पौधा हो चाहे इंसान... अंत तो एक ही है - अटल सत्य



9.
किरण आर्य 
****अंतिम यात्रा****

बचपन, यौवन का मन लिए
बुढ़ापे का जर्र जर्र तन लिए
झेल रहा है एकांत
मन में लिए कई संताप
बस अंतिम साँस के इंतजार में

सोच रहा जीवन वृक्ष सा
पथिक सा लाभ सभी उठाए
एक दिन जल कर
बन लकड़ी चूल्हे की, शायद
किसी घर का पेट भर जाए

सांस रुकी, अपने ही जला देंगे
बची खुची होगी जो राख
गंगा में विसर्जित कर देंगे
यही अंतिम यात्रा....
सत्य जीवन का यही कहलाये

टिप्पणी:
एक तरफ जीवन है लहराता और दूसरी ओर इंसान खुद पर तरस खाता - अंतिम सच से अवगत


10.

कुसुम शर्मा 
~आज और बिता कल~
-----------------

कोई क़तरा तेरी आँखो से गिरा तो होगा
कोई शख़्स तेरे सामने से गुज़रा तो होगा
जो आज है सौन्दर्य से रहित
वो कभी हरा भरा रहा तो होगा
कभी कोई पथिक तेरी छांव मे बैठा तो होगा
कभी किसी की थकान मिटी तो होगी
जो आज है निर्जन सा
उसमें कभी बाहार आई तो होगी
जाने कितनी आँधियों से गुज़रा होगा
जाने कितनी मार सही होगी
जो आज है परायो सा
वो कभी अपनो के बीच घिरा तो होगा
कोई क़तरा तेरी आँखो से गिरा तो होगा


टिप्पणी :-
ढलती उम्र के पड़ाव मे सब कुछ बदल जाता है वृक्ष जब तक हरा भारा रहता है सभी उसकी छांव मे बैठते है जैसे ही उसके पत्ते गिरने लगते है लोग वहाँ बैठना भी पसन्द नही करते इसी तरह जब तक कोई व्यक्ति अपने परिवार और समाज की अवश्यकता की पूर्ति करता है तब तक हर कोई पंसद करता है !


11.
अलका गुप्ता 
~~~~~~~~
नव-चेतना
~~~~~~~~~
कर विनाश हरीतिमा का..
अंधकार तूने ही वरा है |
स्वार्थी अतृप्त ज्वाला से..
बाँझ कर दी वसुंधरा है |
यह तिमिर वाचाल बोल रहा |
विष अम्बर में सब घोल रहा |
भाव विमूढ़ सा तू पछताएगा |
चेतन ..अवचेतन फर्क न ..
कुछ भी ...तू ..समझ पाएगा |
अब भी तो ...तू चेत जरा |
जग कर ..कुछ नव.. संधान कर |
प्राण वायु का कुशल संवाहन कर |
हरित वसुंधरा का पुनः श्रृंगार कर |
श्वेत-श्याम को परे सकेल |
सोंधी माटी ...कलरव खेल |
वन..पांखी.. पंछी खेल |
जल थल नभ चर में भरे संवेग |
भरें रंग.. हास हरित ..अतिरेक |
'सर्वे भवन्तु सुखिनः' से ...
विश्व शान्ति का ..करें अभिषेक ||

__________________अलका गुप्ता____

नोट-इंसान ने हीअपने स्वार्थ में इस धरा का अब तक विनाश किया है जंगल वृक्ष पहाड़ काट कर जल और वायु हरियाली का विनाश किया है...हमे ही जाग कर इनमे चेतनता को समझना होगा | ..हमारे सफल प्रयास से समस्त वातावरण पुनः विभिन्न जीव जन्तुओं पशु पक्षियों के सुख शान्ति का आधार बनेगा और संसार सजीव रंगों से जीवंत हो उठेगा |





12
Ajai Agarwal आभा  अग्रवाल 
 -- वृक्ष ; मित्र मेरा ---
========
दादाजी ने बिरवा रोपा था ,जिस दिन मैं धरती पे आया
तेरी मेरी एक ही आयु , फिर क्यों मेरा चेहरा पीला
रीढ़ झुक गई मेरी आज ,तरु तू अब भी तना खड़ा है
मैं नितांत अकेला खोया सा ,खग-कुल गाँव तेरे आंचल में
चकित थकित चितवन मेरी ,तेरी छाया से महक उठी
जीवन की वो आपाधापी ,महत्वाकांक्षाओं के जंगल
मैंने जिस को सुख समझा था , निज अस्तित्व मिटा ; जिन को सींचा था
संध्या बेला में जीवन की ,वे सभी अपनी ठौर बस गए
आज तेरी शरण मैं आया ,मित्र बचपन का याद आया
तेरी शाखाओं पे लटका करता था , झूला भी झूला करता था
तू ही मेरा बस इक अपना ,तूने मुझको गले लगाया
छू तुझको तृप्त हुआ मैं ,अवसाद तिरोहित तेरी छाया में
दादा -पिता जब अशक्त हो गए ,क्यों ! तेरे नीचे बैठा करते थे
आ तेरी छाँव तले ,जब ! समय निज दुःख का मैं भी भूला
तभी समझ ये मेरी आया !
ऐ मित्र तू पुरखों का साथी , सच्चा सखा मेरे बचपन का
मैं अचेतन जड़ भी मैं था ,चेतना का संसार तरु तू
बादलों के आंसुओं का मोल है तू , मित्र मेरे
आज मारुत खेलता तृण -तृण तेरे की ओट लेके
मौन हूँ , है शून्य मन में ,स्तब्ध होकर सुन रहा
गान विहगों का यहाँ मैं, ताल पत्ते दे रहे है
नृत्य करती डालियां ,मन का कलुष सब धो रही है
मैं रहा स्वारथ में डूबा ,तू साधू परमार्थी है
आज अग्नि ले हृदय में ,विनती जग से कर रहा हूँ
वृक्ष रोपो ,वृक्ष पालो ,वृक्ष को संतति बना लो
वृक्ष मुरझाने न पाये ,फलें फूलें औ लहराएं
वृक्ष ही है सच्चा साथी , प्रकृति की अनमोल थाती
जगती के सुख का गान औ कोकिल शुकों का मान तरु ये
पाप पूण्य मुझमें मिलेंगे ,स्वार्थ औ लालच भी होंगे
आज सांझ की इस बेला में मैं तो अकारथ हो चुका हूँ
पर ; होगा जब तरु ये बूढ़ा ,पत्ते झड़ेंगे ,खाद बनकर
हरियाली का पोषण करेंगे ऋण धरा का चुका देंगे
लकड़ियां इस डाल की मेरा अग्नि रथ बनेंगी
मित्र है सच्चा ये मेरा ,ऋण मित्रता का चुका देगा
आज अग्नि ले हृदय में ,विनती जग से कर रहा हूँ
वृक्ष रोपो ,वृक्ष पालो ,वृक्ष को संतति बना लो ॥ आभा ॥
=======
टिप्पणी
जीवन संध्या आ गई तब ही हम प्रकृति के पास जाते है --चलो ये भी ठीक है कभी तो वृक्ष रोपें --वृक्ष ही हमारे सच्चे मित्र हैं ,विकास की यात्रा में इन्हें काटना भी पड़े तो एक की जगह दस लगाएं ,यही उपाय है धरती माँ का ऋण चुकाने का ।



13.
गोपेश दशोरा
~वृक्ष और वृद्ध~

नव पीढ़ी को यह ज्ञात नहीं
शाष्वत सत्यों का ज्ञान नहीं,
जैसा भी जो कोई करता है,
वैसा ही वह भरता भी है।
एक वृक्ष लगा कर आंगन में,
उसको पाला, पौसा सींचा,
बरसों की मेहनत रंग लाई
पेड़ों पर अमिया उग आई।
बरसों तक पाई घनी छाह,
अब फल भी देने वाला है,
जल को पीकर अब एक वृक्ष
सोने को उगलने वाला है।
जब हुआ वृद्ध वह पेड़ कभी,
आंखे क्यू तुमने फेरी है,
अपने शैषव को भूल गये,
और उस पर आँख तरेरी है।
जब तलक तुम उनसे पाते हो,
उनके हर नाज उठाते हो।
जब देने की बारी आई
तब उनसे नजर बचाते हो।
मत यौवन मद में अंधे हो,
यह यौवन तो ढल जायेगा।
जब तु बूढ़ा हो जायेगा,
तब खुद को अकेला पायेगा।
तब याद आयेगे ये दिन तुझको,
पर कुछ भी नहीं कर पायेगा।
मत बोझा समझो बुढ़ो को,
ये घने वृक्ष हैं आंगन के,
फल ना दे कोई बात नहीं
पर छाह तो देंगे ये तय है।
-गोपेष दषोरा

टिप्पणीः अक्सर देखा जाता है कि बच्चे अपने माता-पिता उनकी वृद्धावस्था में अकेला छोड देते है। वे यह भूल जाते है कि जो उनके माता-पिता का आज है वहीं उनका कल होगा।



14.
प्रभा मित्तल
~~एक तुम और एक मैं~~
~~~~~~~~~~~~~~~~~
एक तुम और एक मैं
रहते सघन निर्जन में
हवा की सांय सांय और
पत्तों की खड़ खड़, अब
बस यही बचा जीवन में।

बोलते हैं हम एक सी भाषा
सहते हैं एक से द्वंद
वक़्त के गर्म थपेड़ों से
झुलस गए हैं मर्म के छंद।

प्राणी ने कुदरत को तड़पाया
नियति ने मनुज भरमाया,
तल में जब हुई हलचल तो
जलधि सुनामी भर लाया।
सबने अधिकार बराबर पाया।

मनुज यदि सँभल जाए तो
प्रदूषण की कालिख मिट जाए
हरी भरी हो धरती औ तुम्हारी
साँसों का जीवन बढ़ जाए।

उम्र के इस मोड़ पर एकाकी
थक हार कर बैठा ,रे मन !
विगत में डूब -उतर,क्या
सोच रहा जीवन का लेखा।

वृक्ष हमारे जीवनदाता !
होता प्रहार तुम पर, तो
मौन हो सह लेते हो वार।
मैं विद्रोही बचपन का
पर झेल नहीं सकता
रोता हूँ जार-जार,
आखिर क्यों ? क्या-
मेरा खून... खून
और तुम्हारा पानी ?

तुम जग पालित,कर्म-बद्ध!
मैं विधि शापित,होकर निवृत्त
आहें भरते हैं दोनों ...लेकिन
अब भी, तुम मौन, मैं मुखर।
तुम विशाल हृदय,मैं अनमना
इस वसुन्धरा के ही वासी-
एक तुम और एक मैं।
--प्रभा मित्तल.

(मनुष्य के प्रहार को वृक्षों ने चुपचाप सहा.. उसी सोच से उपजा मन में कुंठा का भाव।)


15.
नीरज द्विवेदी 

~ऐ मनुज, क्या बोलता है~

ऐ मनुज तू
दंड दे मे-री
खता है,
खोदकर अप-नी
जडें, ही
मृत्यु से क्यों
तोलता है?
धार दे चा-कू
छुरी में
और पैनी
कर कुल्हाड़ी,
घोंप दे मे-रे
हृदय में
होश खो पी
खूब ताड़ी,
जान ले मे-री
हिचक मत
बेवजह क्यों
डोलता है?
रुक गया क्यों
साँस लेने
की जरूरत
ही तुझे क्या,
मौत से मे-री
मरेगा
कौन, क्यों, कै-से
मुझे क्या,
सोच, तू अप-नी
रगों में
ही जहर क्यों
घोलता है?
नष्ट कर सा-रे
वनों को
खेत तू सा-रे
जला दे,
सूख जब जा-ए
तलैया
ईंट पत्थर
से सजा दे,
छेद कर आ-काश
तू अप-नी
छतें क्यों
खोलता है?
है जमीं ते-री
बपौती
और पानी
भी हवा भी,
छीन ले मा-तृत्व
इसका
और विष दे
कर दवा भी,
बाँझ कर फिर
इस धरा को
मातु ही क्यों
बोलता है?


टिप्पड़ी - मुझे लगा कि एक वृक्ष अपनी व्यथा को भुलाकर उसे काटने आए मनुज को आइना दिखा कर व्यंग्य करते हुए ये बताने और समझाने की कोशिश कर रहा है कि मेरी साँसे तुम्हारी साँसों से जुडी हुयी हैं, इस सम्बन्ध को न पहचानने पर तुम्हारा विनाश तय है।


16.
 Madan Mohan Thapliyal 

~अंतर्द्वंद्व ~

मन मारे बैठा पथिक,
देख पेड़ की डाल.
वीरान है जिन्दगी,
एक दूजे से पूछें, कैसे तेरे हाल.

बढ़त-बढ़त तृष्णा बढ़ी,
भई धरा कंकाल,
कौन लेगा सुधि तेरी मेरी,
कौन है अपना, जो पूछे सवाल.

लालच की गति रुकती नहीं,
भूख है कि बढ़ती जाए.
सब कुछ खा लिया रे बावले,
हाय ! प्यास तेरी कबहुँ न जाए.
जल मैला, हवा दूषित,
विनाश के ए हाल.

सांस लेनी दूभर हो गई,
कैसे कटें उमरिया के बाकी साल.
पानी खरीद कर पी रहे,
देश के होनहार नौनिहाल.
हवा जब बिकेगी बाजार में,
तब कैसे होंगे हाल.

सांसों पर भी होंगे पहरे,
बदल जाएगी सारी चाल.
जिन्दगी होगी गिरवी सबकी,
पर्यावरण के दुश्मन होंगे मालामाल.
औरों की छोड़ अपनी सुध ले प्यारे,
छोड़ पिपासा और बनना एक सवाल,

जैसे आया वैसे जाएगा,
थोड़ी लकड़ी और दो गज कफ़न का है सवाल.
वनस्पति और मानव का,
चोली दामन का साथ.
रोक सके तो रोक ले,
नहीं तो होगी नहीं प्रभात !!

टिपण्णी :- आदमी और पर्यावरण का चोली दामन का साथ है एक दूसरे के बिना जीवन

असम्भव है, समय से चेतना का उदय ही मानव की जिन्दगी बचा सकता है..............शैल

(मदन मोहन थपलियाल)


सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Tuesday, April 12, 2016

तस्वीर क्या बोले - तकब १ [ प्रतियोगिता ]

‪#‎तकब१‬ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता #१ ]
मित्रो लीजिये इस समूह के पुन: शुरआत के साथ पहली प्रतियोगिता आपके सम्मुख है. नियम निम्नलिखित है 
१. इस चित्र में है दो चित्र लेकिन दोनों में सम्बन्ध स्थापित करते हुए, कम से कम ८ पंक्तियों की रचना का सृजन करे. हिन्दी के शब्दों का ही प्रयोग करिए जहाँ तक संभव हो. 
२. प्रतियोगिता में आपके भाव अपने और नए होने चाहिए. रचना को शीर्षक अवश्य दे. 
३. प्रतियोगिता एक सप्ताह चलेगी यानि १० मई २०१६ की रात्रि तक.
४. केवल अन्य रचनाओं को पसंद कीजिये, कोई अन्य बात न लिखीजाए, हाँ कोई शंका/प्रश्न हो तो लिखिए जिसे समाधान होते ही हटा लीजियेगा.
५. चयन प्रक्रिया को बीच में सूचित किया जाएगा.
६. आपकी रचित रचना को कहीं सांझा न कीजिये जब तक प्रतियोगिता समाप्त न हो और उसकी विद्धिवत घोषणा न हो एवं ब्लॉग में प्रकशित न हो.
विशेष : यह समूह सभी सदस्य हेतू है और जो निर्णायक दल के सदस्य है वे भी इस प्रतियोगिता में शामिल है हाँ वे अपनी रचना को नही चुन सकते लेकिन अन्य सदस्य चुन सकते है. सभी का चयन गोपनीय ही होगा जब तक एडमिन विजेता की घोषणा न कर ले.

इस  प्रतियोगिता के विजेता है : सुश्री नैनी ग्रोवर

१.
नैनी ग्रोवर 
~ स्पर्श ~

भाव स्पर्श का,
अब भी वही है,
बस, अहसास बदल गया..

कभी मेरे हाथ में,
तुम्हारा हाथ था,
आज तुम्हारे हाथ में,
मेरा हाथ है,
देखो तो,
सवेरा कितनी जल्दी,
रंग बदल गया...

अब डर नहीं,
के तुम गिर जाओगे,
अब, भरोसा है,
मुझको उठाओगे,
देने की जगह,
पाने की चाह में,
ढल गया...

जीवन के इस,
पड़ाव पर,
इस शरीर के,
उतार पर,
छुअन तुम्हारे
हाथ की,
सौगात लगती है
रब की ज़ात की,
खुशियाँ आज,
झोली में हैं,
कल का क्या है,
वो तो कल गया...!!


२.
बालकृष्ण डी ध्यानी
~एक छत है~

एक छत है
और वो एक कहानी है
बहती जाती वो रवानी है
संपर्क और वो एक पल का संयोग
वो छूना तेरा वो छूना मेरा
बस प्रेम था वो बस ये प्रेम है

एक छत है
और रिश्तों की वो किश्तें हैं
समय ने समय में बंटे वो हिस्से हैं
कभी स्पर्श हुआ था मेरे हाथों का
अब पकड़ा है तूने मुझे अपने हाथों में
बस प्रेम था वो बस ये प्रेम है

एक छत है
और आता है वक्त फिर लौट उसमें
दोहराने अपनी बात वो तुझ से मुझ से
बस अहसासों का वो समंदर है
डूबा है जो उस में वो ही है उभरा उस से
बस प्रेम था वो बस ये प्रेम है

३.
मदन मोहन थपलियाल 
~ 'अहसास' ~
थाम के उंगली,
न जाने क्या कुछ कह गई,
निर्झर झरने सम,
हृदयपटल में बह गई.
सपने बुनने हुए शुरू,
छोर का दूर तक पता नहीं,
कब गुजरे दिन जिन्दगी के,
वक्त कुछ लगा नहीं.
झुर्रियों भरे अहसास को थाम,
माथे में बिजली सी कौंध गई,
उलझ के रह गई भावना,
बात ज्यों की त्यों रह गई.
हकीकत से दो-चार होना ही पड़ता है,
'शैल' दिल की हर धड़कन ए कह गई




४.
प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~रिश्ता...पानी या खून ?~

"बूढ़ी माँ को
घर से निकाल रखा है
अजीब शौक है बेटे का
कुत्ते को पाल रखा है"
...... ये कही पढ़ा था..

माँ की रूह रूह में
भरा है
बच्चे के लिए वात्सल्य
उसके जन्म से लेकर
खुद के इस संसार से
अलविदा होने तक....
माँ पिता के दिल में
सिवाय ममता और
आशीर्वाद के
कुछ होता भी है कहाँ?

बुजुर्गो की
शारीरिक मानसिक शक्ति
कम होते ही
वो खून
तब क्यों पानी हो जाता है
आखिर इन्सान
अपने खून में रचे बसे
उस स्पर्श को
कैसे भूल जाता है

आज इंसान
उनके प्रति संवेदना
और सम्मान के विरुद्ध
उन्हें खुद से अलग कर
स्वयं शान शौकत को
अपनाता है
और बुजुर्गो को तब
केवल तिरस्कार मिलता है.
सच है
उम्र के आख़री पड़ाव में
यूं अकेले हो जाना
अपनों का मुंह मोड़ लेना
दुसरे पर निर्भर बुजर्गो को
तब कुंठा और
निराशा का घेर लेना
लेकिन वृद्धावस्था
कोई बीमारी नही
यह तो जीवन की अवस्था
और
हमारा ही भविष्य है

बुजुर्ग तो
अतीत के प्रतीक
और है अनुभव के भंडार
दया नही
श्रद्धा उनके प्रति, है हमारे संस्कार
वृद्धावस्था को
उनकी सुखी बनाए, ऐसे हो विचार
संवेदना भर स्वयं में,
सम्मान कर, करे उनका आदर
हाथो में हाथ लेकर उनका
सेवा भाव का देकर परिचय
उनकी सेवा अभिशाप नही
है कार्य पुण्य का



५.

किरण आर्य
~रिश्तों का सच~

स्नेह प्रकृति का हिस्सा है
अपनत्व इसमें रचा बसा है
जीवन चक्र घूमता
स्नेह के इर्द गिर्द
हाथ थाम एक दूजे का
चलते है रिश्ते

कुछ लौकिक कुछ अलौकिक से
कुछ जन्म से है हाथ थामे
कुछ हमने जो जाने पहचाने
थाम कर जिनकी ऊँगली
उम्र के हर पड़ाव तक जीवन
गिरता है संभलता है चलता है

उसका चलना
बहती नदी के संगीत सा
उसके चलने में बसा है
कलरव पक्षियों सा
उसका चलना करता
जीवन को गुंजायमान

पहले यूं चलना ही
मुक्ति की राह करता प्रशस्त
पहले चलता था जीवन
बचपन में वयस्कों की
ऊँगली थाम कर
उम्र के अंतिम पड़ाव पर
थाम लेता था उसी हाथ को वो

समय बदला मिजाज़ बदले
और बदल गई फिर फितरत उसकी
बदल गया मन और जीवन
थाम लेते थे जो हाथ बचपन को
वहीँ हाथ जब चाहते साथ
खाली रह जाता उनका बढ़ा हाथ
हाथ को न मिलता साथ



६.
अलका गुप्ता 
~~~बस एक चाह~~~


मुठ्ठियों ने नन्ही नन्हीं
जकड़ लिए थे अहसास
भींच लिए थे ममत्व जाल में
सारे क्रिया कलाप ||

तन मन का हिस्सा थे तुम |
मेरे बच्चे..तेरे हित..मेरे आस !
मात-पिता हम कहलाए ...
समझ स्वयं को बड़ भाग ||

नन्हे नन्हे डग ये चल कर..
नाम कमाए..दौलत का भंडार |
बस एक चाह थी..जीते तू...
जग सारा...यह संसार ||

आज से नहीं थे कोई ..
मेरे भाव लाचार |
एक चाह उमड़ी है ..बस
अंत समय. हो तेरा साथ ||

सशक्त हाथ...थाम मुझे ...
सुला दें .धर काँधे अर्थी मेरी
चिता की..चिर शैय्या पर
सुखद निद्रा साथ ||



७.

डॉली अग्रवाल 
~ममता का मोल~

तेरे नन्हे हाथो ने जब मुझे छुआ
मन के कोने से निकली दुआ
ऐ मेरे मौला
करम तू करना , इस फरिश्ते पर
पीड़ा जो हमने झेली वो इसका नसीब ना हो
बस सुकून ही सुकून बरसे , दिल खुशियो से भरा रहे ...
बस ये खवाहिश है दिल की --
कल जब झुकने लगु तो --लाठी तुम बन जाना
मैंने सर्वस्व वारा तुमपे , बस कुछ लम्हे हमे देना तुम ....
बुढ़ापे में हमें अपना लेना तुम



८.

ज्योति डंगवाल 
~तुम्हारे साथ~

मेरे अंश
जब छुये तूने
अपने नर्म हाथों
मेरे मेहनतकश हाथ
फिर जगी एक तमन्ना
करूँ कोई भी जतन
तुझे हो कभी कोई कमी ना
भरे जब डग तेरे कदम
तू गिरे न थाम लूँ मैं हरदम
तेरी बुलंदी को हाथ मेरा उठता
खोती हूँ मैं जब यादों की प्राचीर
याद आता है मुझे हर बार
माँ तुम्हारे हाथों की छुअन
घेर बाँहों का आलिंगन
मेरे लिए किये सज़दे हज़ार
मिंट में लिपटा हुआ प्यार
तुम्हे छोड़ हम
हुए नीड़ के पंछी
आओ छोड़ के अब
दो मुझे फिर सुवास
फिर अपने हाथो को
मेरे हाथों में थमा दो
कल तुम घुमाते थे मुझे
आज मुझे वो लम्हा चुराने दो
असल में जी रही हूँ घुटती साँसों तले
जी लूँ मैं कुछ पल कककहे जो तेरे लगे
समेटे हुए कुछ सुखद अहसास
मेरे कल और आज तुम्हारे साथ ...


९.
Raj Malpani

~~~ वो हाथ ~~~

आज पकड़ इन हाँथों को सिखा है बहोत कुछ ......

इन हथ को पकड़ चलना सिखा है तुमने
इन हाथ से गोद में उठाया है तूजे
इन हाथो से ही खिलाया है तूजे
इन हाथो से ही पिठा है तूजे
इन हाथो से ही आशीर्वाद दिया है तूजे
इन हाथो ने ही आगे बड़ने का हौसला दिया है तूजे
पर आज वही हाथ ....... कमज़ोर होने लगे है
उमर भर बस तेरी ही परवरिश करते करते ये हात झुकने लगे है
अब है तेरी बारी जितना थमा था तुमने इस हाथ को
बस चौथाई वक़्त बीता देना ....... इस बुढ़ापे को सँवर देना तुम


१०.

Kiran Srivastava 
"कर्त्तव्य"
_-_-_-_-_-_-_-_-_-_-_-_-_-_-_-_-

अंगुली थामें चलना सिखाया
जीवन का हर पाठ पढाया
अच्छे बुरे का भेद बताया
संस्कार का बीज रोप कर
जीवन को समृद्ध बनाया
माँ बाप ने फर्ज निभाया !!!!

अब अपनी बारी है आयी
उनकी वृद्धावस्था आयी
जिन हाथों ने दिया सहारा
उन हाथों को थामें रखना
देते दुआ नहीं ये थकते
सच इनमें हैं ईश्वर बसते
इनको न असहाय बनाये
सेवा सहानुभूति दर्शाये
जीवन के अन्तिम पडाव में
खूब प्यार और ध्यान लुटाये
सभी यही सोच अपनाये
वृद्धाश्रम में ताला लगवायें!!!!



११

प्रजापति शेष 
~मेरी चाहत~

जब मैं सोता था,
माँ जगती थी रातों में,
खो जाता हूँ,
अक्सर उन बातों में,
फिर निकल नही पाता,
उलझ जाता हूँ
स्वप्निल रास्तों में,
एक एक परते खुलती है
सुनहरे जंगल की,
मैं खो जाता हूँ

जड़ों में ,फूलों में,
फलों में ,पातों में
इन हाथों की पकड़
तब भी मैं चाहता था
शेष आज भी है
मेरी चाहतों में,



१२.

मीनाक्षी कपूर मीनू 
~स्नेहिल रिश्ता ~
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

रिश्ता ,,
मेरे खून का
रिश्ता ,,,
मेरे गरूर का
प्यारा सा ,,
तुतला कर बोला
माँ ,,,
बस शरू हो गया
सफर ,, वात्सल्य का
सहला कर
नन्हे हाथों को
चलना सिखाया
अहसास क्या होता है
अहसास करवाया
संस्कार दिए
रीति रिवाज़
त्योहारों से
आत्मसात करवाया
धीरे धीरे
रिश्तों की छाँव में
पल कर तुम
बढ़ते गए
और हम भी ,,
वक्त ने पलटा खाया
तुम्हारे कोमल हाथ
हमारे बन गए
और ,,,,
हमारे सिकुड़ने लगे
हल्की हल्की
झुर्रियों से
सब बदला
लगा कहीं तुम भी
न बदल जाओ
मगर ओ मेरे खुदा ( प्रभू )
मेरे प्यार की छाँव
में पला बढा रिश्ता
आज रिश्ते निभाना
जान गया ,,
थाम मेरे हाथ
इस कलयुग के
मंजर में
सतयुगी स्नेह
बरसा गया
जीते रहो
मेरे बच्चे ,,,
खुश रहो ,,
बस अब कोई
गम नहीं
मनस्वी ,,
मैं ,,, तुम में
और
तू ,,, मुझ में
समा गया ,,,
समर्पित,,,
स्नेह भाव को ,,
सकार भाव को ,,


१३.

Pushpa Tripathi 

~रिवाजों का चलन~

मैंने मुद्दत से अपनी माँ

का हात नहीं छुआ

मगर हात माँ के मेरे

लिए दुआ माँगती है .. !!

फरिश्ता हुआ करती है माँ

दिल को छूआ करती है माँ

मैं कितना ही दूर हो जाऊं

ख्याल मेरा रखती है माँ ...!!

**************************

बच्चे सब बड़े हो गए

परिवार एक साथ

अब , कहीं दूर हो गए

बदलने लगे अब साझा चूल्हे का रिवाज़।

दौलत की हबस ने

माँ बाप को छोड़कर

बच्चों के मन ने कर लिया हिसाब

बुजुर्गों का हाथ पकड़

साथ रखने का रिवाज़

जो चलन था ..... बँट रहा !!



१४.

दीपक अरोड़ा 
### थामे रखूंगा तेरा हाथ ###

पहले थामा तूने
अब मैं थामू तुझे
तू है मेरा पालनहार
ये गर्व है मुझे
वक्त बदले पर न बदला
ये रिश्ता हमारा
पहले तू था मेरा
अब मैं तेरा सहारा
तेरी परछाई बनकर
चलूंगा तेरे साथ
न दूर जाउंगा पल भर को
थामे रखूंगा तेरा हाथ


१५.

भगवान सिंह जयाड़ा
----ममता का कर्ज--
----------------------------
नहीं भूला तेरे हाथों का वह स्पर्श,
जिन हाथों ने मेरी उंगली थामी थी,
हाथ नहीं वह ,जन्नत थे मुझ को,
जिस में मेरी हर खुशी समाई थी,
अब सायद थक गए हाथ तेरे माँ,
उस जन्नत का बोझ उठाते उठाते,
बहुत थक गई अब तू सहारा देते देते,
तेरे बुजुर्ग हाथों का सहारा बन जाऊं,
यूँ ममता का कोई मोल तो नहीं होता,
पर हाँ ममता के बदले ममता दे जाऊं,
हाथ तेरा सदा रहे सिर पर मेरे यूँ ही,
चाहे मैं आसमा को भी क्यों न छू लूँ,
तेरे हाथों की दी हुई इस जन्नत में माँ
तेरी ममता की मूरत मैं कभी न भूलूँ,

१६.
प्रभा मित्तल 
प्रभा मित्तल
~~~सम्बल~~~

पाकर प्रथम स्पर्श तुम्हारा
भूल गई मैं दुःख सारा,
आँचल में समेटे क्षीर-सिंधु
औ सीने में ममता की धारा।
नयनों में भर नेह प्रबल
बिसराया मैंने जग सारा।

बे-बात बिन आँसू के रोना
और मन्द-मन्द मुस्काना
जाने किन सपनों से डरकर
सिहर - सिहर जग जाना
नन्हीं मुट्ठी में कस आँचल
गोदी में सिमट-सिमट जाना।

तन कर रहने की कोशिश में
ठुमक-ठुमक कर चलना और
मेरी अँगुलि का सम्बल ले
गिर -गिर कर उठ जाना।

तुम्हारी भोली क्रीड़ाओं ने
मन मोह लिया था मेरा।
मेरे आँगन गूँजी किलकारी
डाला था खुशियों ने डेरा।

मखमल से कोमल मन में
मेरा अटल विश्वास समेटे
जाने तुम कब बड़े हो गए
मैंने ये भी न पहचाना।

चाहा मैंने क्षितिज छुओ तुम
उड़ो गगन में पंख लगा कर
ले अपने सपनों की गठरी
उन राहों पर बढ़ते जाओ,
उन्नति को सोपान बनाकर
सुयोग्य बनो और यश पाओ।
सतरंगी रंगों से भर अपने
श्रेयों से जीवन महकाओ।

आज जमाना वहाँ खड़ा है
जहाँ हमने ही पहुँचाया है
यादें रह जाती हैं झोली में
दिन महीने गिनते-गिनते
वक़्त बेरहम निकल जाता है।

नहीं कूकती कोयल यहाँ अब
काक -पिक नहीं शोर मचाते
नहीं गूँजते भ्रमर भी क्योंकि
ध्रुपद-मल्हार तुम नहीं सुनाते।

आकुल मन राह तुम्हारी
ताक रहा है,कब आओगे -----
जीवन-मरु में फिर बहे
वो बासन्ती बयार कब लाओगे ?

ये मन आज अकेला है
अब सन्ध्या की बेला है
चाहत बस कुछ और नहीं ,
जी भर देख सकूँ तुमको
कुछ पल साथ बिता लेना,
शिथिल हो रहे तन-मन पर
नेह का मरहम लगा देना।
और चला-चली में होऊँ जब
अपने हाथों की मजबूत पकड़ से
मेरे बूढ़े हाथों को थाम,
वैतरणी पार करा देना।



१७.
कुसुम शर्मा
~ तु क्यों बदल गया ~
--------------
तेरी नन्हीं-नन्हीं
अंगुलियों को पकड़ कर
चलना सिखाया जिसने
आज क्यों ?
उन्हीं हाथो को ठुकराया तूने
जिसकी पनाह में बचपन बीता
तेरी हर इच्छा पर उनका जीवन बीता
आज क्यों ?
इतना बेबस हुआ
जो उन्हें थाम न सका
जिनकी हर सुबह और रात
तेरे और तेरे सपनों के साथ
आज क्यों ?
उन से तू अंजान हुआ
तेरे सपने पूरे होते ही
तू क्यों बेजान हुआ
जिस ने न्योछावर किया
अपना सारा जीवन
आज उसी को तूने
क्यो बेबस और लाचार किया
तेरे सुख के लिए दुख उठाये जिन्होंने
आज अपने सुख के लिए वृद्धाक्षम बनाये तूने
क्यो तू उनका तिरस्कार करे
जो बोयेगा वो काटेगा
तेरा आने वाला पल
भी ये जाँचेगा
जिसने थामा तुझे निस्वार्थ से
आज तू भी थाम हाथ उसी भाव से !!


१८.

रोहिणी शैलेन्द्र नेगी
 "कोमल स्पर्श"
वो पल बार-बार आता है,
आँखों को चैन दिलाता है,
यादों में रम-सा जाता है,
उँगलियों का कोमल स्पर्श,
पुतलियों को छलकाता है ।
थी पहले मैं अपरिचित,
कुछ भी न था निश्चित,
आशाओं का लबादा ओढ़े,
कर लिया था सुनिश्चित ।
आँचल में छुपाए रखा,
सीने से लगाये रखा,
लोगों की नज़रों से सदैव,
तुझको बचाये रखा ।
आज प्रतिफल दिख रहा है,
साथ तू जो अब खड़ा है,
है वही स्पर्श कोमल,
धमनियों के संग जुड़ा है ।
मैं निरीह-जर्जर सही,
फिर भी मुझे सहलाता है,
बस यही अद्भुत स्पर्श,
ममत्व का बोध कराता है ।


१९.
Ajai Agarwal 
''अभिलाषा ''
-------------
प्रेम यौवन का नव स्वर्ग
सृजन अहसासों का
मृदुल हथेली की इस छुवन में
मौन मुखरित प्राण पुलकित
नन्ही सी ये हथेली
अहसासों की अनमोल पोटली
माँ-पिता ही सृजनकर्ता ;
अर्थ इसका अब मैं जानी
है यही अभिलाष मेरी -
उम्र की सीढ़ी चढ़ें वो ,
हो हिचकियों से हिलकोर तनमन
हाथ थामें परिवार उनका
पर -पर हम कभी ये ना जताएं -
हाथ उनका हमने है थामा
कि ,अब
तुम हो हमारे आश्रितों में
है यही अभिलाष मेरी
हर शिशु ये धारणा ले
पितु मात को अहसास ये दे -
क्या हुआ जो क्षीण काया
अनुभवों की शक्ति तुम हो
हौसला तुम ही हमारा
विश्वास और संस्कार तुम से
एक ये अभिलाष सबकी ,
पितु मात का संबल बनेगी
आज भी मेरी हथेली
झुर्रियों वाले हाथों में होगी
बुजुर्ग फिर बेघर न होंगे



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