Tuesday, April 12, 2016

तस्वीर क्या बोले - तकब १ [ प्रतियोगिता ]

‪#‎तकब१‬ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता #१ ]
मित्रो लीजिये इस समूह के पुन: शुरआत के साथ पहली प्रतियोगिता आपके सम्मुख है. नियम निम्नलिखित है 
१. इस चित्र में है दो चित्र लेकिन दोनों में सम्बन्ध स्थापित करते हुए, कम से कम ८ पंक्तियों की रचना का सृजन करे. हिन्दी के शब्दों का ही प्रयोग करिए जहाँ तक संभव हो. 
२. प्रतियोगिता में आपके भाव अपने और नए होने चाहिए. रचना को शीर्षक अवश्य दे. 
३. प्रतियोगिता एक सप्ताह चलेगी यानि १० मई २०१६ की रात्रि तक.
४. केवल अन्य रचनाओं को पसंद कीजिये, कोई अन्य बात न लिखीजाए, हाँ कोई शंका/प्रश्न हो तो लिखिए जिसे समाधान होते ही हटा लीजियेगा.
५. चयन प्रक्रिया को बीच में सूचित किया जाएगा.
६. आपकी रचित रचना को कहीं सांझा न कीजिये जब तक प्रतियोगिता समाप्त न हो और उसकी विद्धिवत घोषणा न हो एवं ब्लॉग में प्रकशित न हो.
विशेष : यह समूह सभी सदस्य हेतू है और जो निर्णायक दल के सदस्य है वे भी इस प्रतियोगिता में शामिल है हाँ वे अपनी रचना को नही चुन सकते लेकिन अन्य सदस्य चुन सकते है. सभी का चयन गोपनीय ही होगा जब तक एडमिन विजेता की घोषणा न कर ले.

इस  प्रतियोगिता के विजेता है : सुश्री नैनी ग्रोवर

१.
नैनी ग्रोवर 
~ स्पर्श ~

भाव स्पर्श का,
अब भी वही है,
बस, अहसास बदल गया..

कभी मेरे हाथ में,
तुम्हारा हाथ था,
आज तुम्हारे हाथ में,
मेरा हाथ है,
देखो तो,
सवेरा कितनी जल्दी,
रंग बदल गया...

अब डर नहीं,
के तुम गिर जाओगे,
अब, भरोसा है,
मुझको उठाओगे,
देने की जगह,
पाने की चाह में,
ढल गया...

जीवन के इस,
पड़ाव पर,
इस शरीर के,
उतार पर,
छुअन तुम्हारे
हाथ की,
सौगात लगती है
रब की ज़ात की,
खुशियाँ आज,
झोली में हैं,
कल का क्या है,
वो तो कल गया...!!


२.
बालकृष्ण डी ध्यानी
~एक छत है~

एक छत है
और वो एक कहानी है
बहती जाती वो रवानी है
संपर्क और वो एक पल का संयोग
वो छूना तेरा वो छूना मेरा
बस प्रेम था वो बस ये प्रेम है

एक छत है
और रिश्तों की वो किश्तें हैं
समय ने समय में बंटे वो हिस्से हैं
कभी स्पर्श हुआ था मेरे हाथों का
अब पकड़ा है तूने मुझे अपने हाथों में
बस प्रेम था वो बस ये प्रेम है

एक छत है
और आता है वक्त फिर लौट उसमें
दोहराने अपनी बात वो तुझ से मुझ से
बस अहसासों का वो समंदर है
डूबा है जो उस में वो ही है उभरा उस से
बस प्रेम था वो बस ये प्रेम है

३.
मदन मोहन थपलियाल 
~ 'अहसास' ~
थाम के उंगली,
न जाने क्या कुछ कह गई,
निर्झर झरने सम,
हृदयपटल में बह गई.
सपने बुनने हुए शुरू,
छोर का दूर तक पता नहीं,
कब गुजरे दिन जिन्दगी के,
वक्त कुछ लगा नहीं.
झुर्रियों भरे अहसास को थाम,
माथे में बिजली सी कौंध गई,
उलझ के रह गई भावना,
बात ज्यों की त्यों रह गई.
हकीकत से दो-चार होना ही पड़ता है,
'शैल' दिल की हर धड़कन ए कह गई




४.
प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~रिश्ता...पानी या खून ?~

"बूढ़ी माँ को
घर से निकाल रखा है
अजीब शौक है बेटे का
कुत्ते को पाल रखा है"
...... ये कही पढ़ा था..

माँ की रूह रूह में
भरा है
बच्चे के लिए वात्सल्य
उसके जन्म से लेकर
खुद के इस संसार से
अलविदा होने तक....
माँ पिता के दिल में
सिवाय ममता और
आशीर्वाद के
कुछ होता भी है कहाँ?

बुजुर्गो की
शारीरिक मानसिक शक्ति
कम होते ही
वो खून
तब क्यों पानी हो जाता है
आखिर इन्सान
अपने खून में रचे बसे
उस स्पर्श को
कैसे भूल जाता है

आज इंसान
उनके प्रति संवेदना
और सम्मान के विरुद्ध
उन्हें खुद से अलग कर
स्वयं शान शौकत को
अपनाता है
और बुजुर्गो को तब
केवल तिरस्कार मिलता है.
सच है
उम्र के आख़री पड़ाव में
यूं अकेले हो जाना
अपनों का मुंह मोड़ लेना
दुसरे पर निर्भर बुजर्गो को
तब कुंठा और
निराशा का घेर लेना
लेकिन वृद्धावस्था
कोई बीमारी नही
यह तो जीवन की अवस्था
और
हमारा ही भविष्य है

बुजुर्ग तो
अतीत के प्रतीक
और है अनुभव के भंडार
दया नही
श्रद्धा उनके प्रति, है हमारे संस्कार
वृद्धावस्था को
उनकी सुखी बनाए, ऐसे हो विचार
संवेदना भर स्वयं में,
सम्मान कर, करे उनका आदर
हाथो में हाथ लेकर उनका
सेवा भाव का देकर परिचय
उनकी सेवा अभिशाप नही
है कार्य पुण्य का



५.

किरण आर्य
~रिश्तों का सच~

स्नेह प्रकृति का हिस्सा है
अपनत्व इसमें रचा बसा है
जीवन चक्र घूमता
स्नेह के इर्द गिर्द
हाथ थाम एक दूजे का
चलते है रिश्ते

कुछ लौकिक कुछ अलौकिक से
कुछ जन्म से है हाथ थामे
कुछ हमने जो जाने पहचाने
थाम कर जिनकी ऊँगली
उम्र के हर पड़ाव तक जीवन
गिरता है संभलता है चलता है

उसका चलना
बहती नदी के संगीत सा
उसके चलने में बसा है
कलरव पक्षियों सा
उसका चलना करता
जीवन को गुंजायमान

पहले यूं चलना ही
मुक्ति की राह करता प्रशस्त
पहले चलता था जीवन
बचपन में वयस्कों की
ऊँगली थाम कर
उम्र के अंतिम पड़ाव पर
थाम लेता था उसी हाथ को वो

समय बदला मिजाज़ बदले
और बदल गई फिर फितरत उसकी
बदल गया मन और जीवन
थाम लेते थे जो हाथ बचपन को
वहीँ हाथ जब चाहते साथ
खाली रह जाता उनका बढ़ा हाथ
हाथ को न मिलता साथ



६.
अलका गुप्ता 
~~~बस एक चाह~~~


मुठ्ठियों ने नन्ही नन्हीं
जकड़ लिए थे अहसास
भींच लिए थे ममत्व जाल में
सारे क्रिया कलाप ||

तन मन का हिस्सा थे तुम |
मेरे बच्चे..तेरे हित..मेरे आस !
मात-पिता हम कहलाए ...
समझ स्वयं को बड़ भाग ||

नन्हे नन्हे डग ये चल कर..
नाम कमाए..दौलत का भंडार |
बस एक चाह थी..जीते तू...
जग सारा...यह संसार ||

आज से नहीं थे कोई ..
मेरे भाव लाचार |
एक चाह उमड़ी है ..बस
अंत समय. हो तेरा साथ ||

सशक्त हाथ...थाम मुझे ...
सुला दें .धर काँधे अर्थी मेरी
चिता की..चिर शैय्या पर
सुखद निद्रा साथ ||



७.

डॉली अग्रवाल 
~ममता का मोल~

तेरे नन्हे हाथो ने जब मुझे छुआ
मन के कोने से निकली दुआ
ऐ मेरे मौला
करम तू करना , इस फरिश्ते पर
पीड़ा जो हमने झेली वो इसका नसीब ना हो
बस सुकून ही सुकून बरसे , दिल खुशियो से भरा रहे ...
बस ये खवाहिश है दिल की --
कल जब झुकने लगु तो --लाठी तुम बन जाना
मैंने सर्वस्व वारा तुमपे , बस कुछ लम्हे हमे देना तुम ....
बुढ़ापे में हमें अपना लेना तुम



८.

ज्योति डंगवाल 
~तुम्हारे साथ~

मेरे अंश
जब छुये तूने
अपने नर्म हाथों
मेरे मेहनतकश हाथ
फिर जगी एक तमन्ना
करूँ कोई भी जतन
तुझे हो कभी कोई कमी ना
भरे जब डग तेरे कदम
तू गिरे न थाम लूँ मैं हरदम
तेरी बुलंदी को हाथ मेरा उठता
खोती हूँ मैं जब यादों की प्राचीर
याद आता है मुझे हर बार
माँ तुम्हारे हाथों की छुअन
घेर बाँहों का आलिंगन
मेरे लिए किये सज़दे हज़ार
मिंट में लिपटा हुआ प्यार
तुम्हे छोड़ हम
हुए नीड़ के पंछी
आओ छोड़ के अब
दो मुझे फिर सुवास
फिर अपने हाथो को
मेरे हाथों में थमा दो
कल तुम घुमाते थे मुझे
आज मुझे वो लम्हा चुराने दो
असल में जी रही हूँ घुटती साँसों तले
जी लूँ मैं कुछ पल कककहे जो तेरे लगे
समेटे हुए कुछ सुखद अहसास
मेरे कल और आज तुम्हारे साथ ...


९.
Raj Malpani

~~~ वो हाथ ~~~

आज पकड़ इन हाँथों को सिखा है बहोत कुछ ......

इन हथ को पकड़ चलना सिखा है तुमने
इन हाथ से गोद में उठाया है तूजे
इन हाथो से ही खिलाया है तूजे
इन हाथो से ही पिठा है तूजे
इन हाथो से ही आशीर्वाद दिया है तूजे
इन हाथो ने ही आगे बड़ने का हौसला दिया है तूजे
पर आज वही हाथ ....... कमज़ोर होने लगे है
उमर भर बस तेरी ही परवरिश करते करते ये हात झुकने लगे है
अब है तेरी बारी जितना थमा था तुमने इस हाथ को
बस चौथाई वक़्त बीता देना ....... इस बुढ़ापे को सँवर देना तुम


१०.

Kiran Srivastava 
"कर्त्तव्य"
_-_-_-_-_-_-_-_-_-_-_-_-_-_-_-_-

अंगुली थामें चलना सिखाया
जीवन का हर पाठ पढाया
अच्छे बुरे का भेद बताया
संस्कार का बीज रोप कर
जीवन को समृद्ध बनाया
माँ बाप ने फर्ज निभाया !!!!

अब अपनी बारी है आयी
उनकी वृद्धावस्था आयी
जिन हाथों ने दिया सहारा
उन हाथों को थामें रखना
देते दुआ नहीं ये थकते
सच इनमें हैं ईश्वर बसते
इनको न असहाय बनाये
सेवा सहानुभूति दर्शाये
जीवन के अन्तिम पडाव में
खूब प्यार और ध्यान लुटाये
सभी यही सोच अपनाये
वृद्धाश्रम में ताला लगवायें!!!!



११

प्रजापति शेष 
~मेरी चाहत~

जब मैं सोता था,
माँ जगती थी रातों में,
खो जाता हूँ,
अक्सर उन बातों में,
फिर निकल नही पाता,
उलझ जाता हूँ
स्वप्निल रास्तों में,
एक एक परते खुलती है
सुनहरे जंगल की,
मैं खो जाता हूँ

जड़ों में ,फूलों में,
फलों में ,पातों में
इन हाथों की पकड़
तब भी मैं चाहता था
शेष आज भी है
मेरी चाहतों में,



१२.

मीनाक्षी कपूर मीनू 
~स्नेहिल रिश्ता ~
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

रिश्ता ,,
मेरे खून का
रिश्ता ,,,
मेरे गरूर का
प्यारा सा ,,
तुतला कर बोला
माँ ,,,
बस शरू हो गया
सफर ,, वात्सल्य का
सहला कर
नन्हे हाथों को
चलना सिखाया
अहसास क्या होता है
अहसास करवाया
संस्कार दिए
रीति रिवाज़
त्योहारों से
आत्मसात करवाया
धीरे धीरे
रिश्तों की छाँव में
पल कर तुम
बढ़ते गए
और हम भी ,,
वक्त ने पलटा खाया
तुम्हारे कोमल हाथ
हमारे बन गए
और ,,,,
हमारे सिकुड़ने लगे
हल्की हल्की
झुर्रियों से
सब बदला
लगा कहीं तुम भी
न बदल जाओ
मगर ओ मेरे खुदा ( प्रभू )
मेरे प्यार की छाँव
में पला बढा रिश्ता
आज रिश्ते निभाना
जान गया ,,
थाम मेरे हाथ
इस कलयुग के
मंजर में
सतयुगी स्नेह
बरसा गया
जीते रहो
मेरे बच्चे ,,,
खुश रहो ,,
बस अब कोई
गम नहीं
मनस्वी ,,
मैं ,,, तुम में
और
तू ,,, मुझ में
समा गया ,,,
समर्पित,,,
स्नेह भाव को ,,
सकार भाव को ,,


१३.

Pushpa Tripathi 

~रिवाजों का चलन~

मैंने मुद्दत से अपनी माँ

का हात नहीं छुआ

मगर हात माँ के मेरे

लिए दुआ माँगती है .. !!

फरिश्ता हुआ करती है माँ

दिल को छूआ करती है माँ

मैं कितना ही दूर हो जाऊं

ख्याल मेरा रखती है माँ ...!!

**************************

बच्चे सब बड़े हो गए

परिवार एक साथ

अब , कहीं दूर हो गए

बदलने लगे अब साझा चूल्हे का रिवाज़।

दौलत की हबस ने

माँ बाप को छोड़कर

बच्चों के मन ने कर लिया हिसाब

बुजुर्गों का हाथ पकड़

साथ रखने का रिवाज़

जो चलन था ..... बँट रहा !!



१४.

दीपक अरोड़ा 
### थामे रखूंगा तेरा हाथ ###

पहले थामा तूने
अब मैं थामू तुझे
तू है मेरा पालनहार
ये गर्व है मुझे
वक्त बदले पर न बदला
ये रिश्ता हमारा
पहले तू था मेरा
अब मैं तेरा सहारा
तेरी परछाई बनकर
चलूंगा तेरे साथ
न दूर जाउंगा पल भर को
थामे रखूंगा तेरा हाथ


१५.

भगवान सिंह जयाड़ा
----ममता का कर्ज--
----------------------------
नहीं भूला तेरे हाथों का वह स्पर्श,
जिन हाथों ने मेरी उंगली थामी थी,
हाथ नहीं वह ,जन्नत थे मुझ को,
जिस में मेरी हर खुशी समाई थी,
अब सायद थक गए हाथ तेरे माँ,
उस जन्नत का बोझ उठाते उठाते,
बहुत थक गई अब तू सहारा देते देते,
तेरे बुजुर्ग हाथों का सहारा बन जाऊं,
यूँ ममता का कोई मोल तो नहीं होता,
पर हाँ ममता के बदले ममता दे जाऊं,
हाथ तेरा सदा रहे सिर पर मेरे यूँ ही,
चाहे मैं आसमा को भी क्यों न छू लूँ,
तेरे हाथों की दी हुई इस जन्नत में माँ
तेरी ममता की मूरत मैं कभी न भूलूँ,

१६.
प्रभा मित्तल 
प्रभा मित्तल
~~~सम्बल~~~

पाकर प्रथम स्पर्श तुम्हारा
भूल गई मैं दुःख सारा,
आँचल में समेटे क्षीर-सिंधु
औ सीने में ममता की धारा।
नयनों में भर नेह प्रबल
बिसराया मैंने जग सारा।

बे-बात बिन आँसू के रोना
और मन्द-मन्द मुस्काना
जाने किन सपनों से डरकर
सिहर - सिहर जग जाना
नन्हीं मुट्ठी में कस आँचल
गोदी में सिमट-सिमट जाना।

तन कर रहने की कोशिश में
ठुमक-ठुमक कर चलना और
मेरी अँगुलि का सम्बल ले
गिर -गिर कर उठ जाना।

तुम्हारी भोली क्रीड़ाओं ने
मन मोह लिया था मेरा।
मेरे आँगन गूँजी किलकारी
डाला था खुशियों ने डेरा।

मखमल से कोमल मन में
मेरा अटल विश्वास समेटे
जाने तुम कब बड़े हो गए
मैंने ये भी न पहचाना।

चाहा मैंने क्षितिज छुओ तुम
उड़ो गगन में पंख लगा कर
ले अपने सपनों की गठरी
उन राहों पर बढ़ते जाओ,
उन्नति को सोपान बनाकर
सुयोग्य बनो और यश पाओ।
सतरंगी रंगों से भर अपने
श्रेयों से जीवन महकाओ।

आज जमाना वहाँ खड़ा है
जहाँ हमने ही पहुँचाया है
यादें रह जाती हैं झोली में
दिन महीने गिनते-गिनते
वक़्त बेरहम निकल जाता है।

नहीं कूकती कोयल यहाँ अब
काक -पिक नहीं शोर मचाते
नहीं गूँजते भ्रमर भी क्योंकि
ध्रुपद-मल्हार तुम नहीं सुनाते।

आकुल मन राह तुम्हारी
ताक रहा है,कब आओगे -----
जीवन-मरु में फिर बहे
वो बासन्ती बयार कब लाओगे ?

ये मन आज अकेला है
अब सन्ध्या की बेला है
चाहत बस कुछ और नहीं ,
जी भर देख सकूँ तुमको
कुछ पल साथ बिता लेना,
शिथिल हो रहे तन-मन पर
नेह का मरहम लगा देना।
और चला-चली में होऊँ जब
अपने हाथों की मजबूत पकड़ से
मेरे बूढ़े हाथों को थाम,
वैतरणी पार करा देना।



१७.
कुसुम शर्मा
~ तु क्यों बदल गया ~
--------------
तेरी नन्हीं-नन्हीं
अंगुलियों को पकड़ कर
चलना सिखाया जिसने
आज क्यों ?
उन्हीं हाथो को ठुकराया तूने
जिसकी पनाह में बचपन बीता
तेरी हर इच्छा पर उनका जीवन बीता
आज क्यों ?
इतना बेबस हुआ
जो उन्हें थाम न सका
जिनकी हर सुबह और रात
तेरे और तेरे सपनों के साथ
आज क्यों ?
उन से तू अंजान हुआ
तेरे सपने पूरे होते ही
तू क्यों बेजान हुआ
जिस ने न्योछावर किया
अपना सारा जीवन
आज उसी को तूने
क्यो बेबस और लाचार किया
तेरे सुख के लिए दुख उठाये जिन्होंने
आज अपने सुख के लिए वृद्धाक्षम बनाये तूने
क्यो तू उनका तिरस्कार करे
जो बोयेगा वो काटेगा
तेरा आने वाला पल
भी ये जाँचेगा
जिसने थामा तुझे निस्वार्थ से
आज तू भी थाम हाथ उसी भाव से !!


१८.

रोहिणी शैलेन्द्र नेगी
 "कोमल स्पर्श"
वो पल बार-बार आता है,
आँखों को चैन दिलाता है,
यादों में रम-सा जाता है,
उँगलियों का कोमल स्पर्श,
पुतलियों को छलकाता है ।
थी पहले मैं अपरिचित,
कुछ भी न था निश्चित,
आशाओं का लबादा ओढ़े,
कर लिया था सुनिश्चित ।
आँचल में छुपाए रखा,
सीने से लगाये रखा,
लोगों की नज़रों से सदैव,
तुझको बचाये रखा ।
आज प्रतिफल दिख रहा है,
साथ तू जो अब खड़ा है,
है वही स्पर्श कोमल,
धमनियों के संग जुड़ा है ।
मैं निरीह-जर्जर सही,
फिर भी मुझे सहलाता है,
बस यही अद्भुत स्पर्श,
ममत्व का बोध कराता है ।


१९.
Ajai Agarwal 
''अभिलाषा ''
-------------
प्रेम यौवन का नव स्वर्ग
सृजन अहसासों का
मृदुल हथेली की इस छुवन में
मौन मुखरित प्राण पुलकित
नन्ही सी ये हथेली
अहसासों की अनमोल पोटली
माँ-पिता ही सृजनकर्ता ;
अर्थ इसका अब मैं जानी
है यही अभिलाष मेरी -
उम्र की सीढ़ी चढ़ें वो ,
हो हिचकियों से हिलकोर तनमन
हाथ थामें परिवार उनका
पर -पर हम कभी ये ना जताएं -
हाथ उनका हमने है थामा
कि ,अब
तुम हो हमारे आश्रितों में
है यही अभिलाष मेरी
हर शिशु ये धारणा ले
पितु मात को अहसास ये दे -
क्या हुआ जो क्षीण काया
अनुभवों की शक्ति तुम हो
हौसला तुम ही हमारा
विश्वास और संस्कार तुम से
एक ये अभिलाष सबकी ,
पितु मात का संबल बनेगी
आज भी मेरी हथेली
झुर्रियों वाले हाथों में होगी
बुजुर्ग फिर बेघर न होंगे



सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Wednesday, February 3, 2016

२३ जनवरी २०१६ का चित्र और भाव






प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
पत्थर हो तुम ...

पत्थर हो तुम
पत्थर ही रहोगे
कल तक
जिस नदी का हिस्सा थे
वो आज
अविरल बहते बहते
किसी अनजान रास्तो से
चलकर दूर निकल गई
राह में तुमसे मुसाफिर
उन लहरों की थाप को
अपना मान चलते रहे
और आज फिर
तुम पत्थर हो गए
अब अस्तित्व तुम्हारा
केवल पत्थर ही कहलायेगा
हाँ उपहास करने
कोई बूँद या कोई लहर
तुम्हे सलहा जायेगी
अपना कह जायेगी
'प्रतिबिम्ब' बन
साथ दिख जायेगी
लेकिन फिर समय का
कालचक्र तुम्हे
पत्थर ही सिद्ध कर जाएगा ....


Kiran Srivastava 
~पत्थर दिल~


मेरी अनुनय-विनय
मान-मनुहार का
नही होता असर
क्यों बन बैठे हो
इतने निष्ठुर.....
क्यों भूला दिए
मेरीअच्छाई
मेरी सच्चाई को
मेरी सहजता
मेरी कठिनाई को.....
और कितनी उर्जा
और कितना ताप चाहिए
जिससे पिघल जाओ
तुम थोडा भी.....!!!!!


बालकृष्ण डी ध्यानी .
~देख के इन पत्थरों को~

देख के इन पत्थरों को
मेरा बिता बचपन याद आया
एक एक कर चुन कर रखते थे
वो छुपाया स्थान याद आया
देख के इन पत्थरों को ...............

जुडी हैं बहुत अनेक यादें उनसे
याद कर इन आँखों ने आंसूं का सुख पाया
उन दोस्तों को इन पत्थरों ने
फिर जोर से आवाज दे बुलाया
देख के इन पत्थरों को ...............

अब मैं भी पत्थर सा बन गया हूँ
उस में और मुझ में मैंने कोई फर्क ना पाया
वो तो सवेदना हीन है मुझको भी वो अब बना गया
भेद उस में और मुझ में अब और गहराया
देख के इन पत्थरों को ...............


भगवान सिंह जयाड़ा 
----नदी का पत्थर--
----------------------------
बन कर सेतु इन पत्थरों ने,
हर कदमों को दिया सहारा,
दल दल भरी इस मिट्टी से,
हम सब को मिला किनारा,

कास हम इन से सीख लेते,
दे सकते किसी को सहारा,
दुःख में किसी का साथ देते,
तो अहोभाग्य होता हमारा,

बेजान पड़े यह पत्थर हमको,
जीने की राह शिखा जाते है,
पानी में बह कर घिस कर भी,
कुछ न कुछ भला कर जाते है,

जीवन शंघर्ष में मिलना बिछुड़ना,
यह दुनियां का पुराना दस्तूर है,
बहते पानी में कहाँ बह जायेंगे,
न तो हमारा ना तुम्हारा कशूर है,


नैनी ग्रोवर 
---पत्थर ----

नदी किनारे पड़े,
इन पत्थरों की तरह,
काश,
जज़्बात भी पत्थर होते,
किसी की भी ठोकर से,
जो पिघल उठते हैं,
सोचती हूँ, अब छोड़ दूँ,
इन जज़्बातों में बहना,
तक़दीर से लड़ना,
रोज़ सौ सौ बार मरना,
शिकवे शिकायतें करना,
और हो जाऊँ पथ्थर,
घर के शो केस में पड़ा,
एक ऐसा पत्थर,
जिसे नदी किनारे से लाकर,
कुछ रंग लगाकर,
रख दिया गया,
शायद आज कोई,
मुझपे पड़ी धूल पोंछे,
और पूछ ले,
कैसी तो तुम ?
और मैं मुस्कुरा के कहूँ,
पत्थर के जैसी....


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Wednesday, January 13, 2016

५ जनवरी २०१६ का चित्र और भाव



प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~ हकीकत ~
कहने को तेरे शहर मैं रौनक बहुत है
मगर बदल जाती है ये तस्वीर लम्हा लम्हा
यूं तो सागर में लहर खिलवाड़ करती है
मगर साहिल संभाल लेता है नौका डरते डरते
पंछी अपनी जागीर समझ आते जाते है
मगर एक आहट डरा जाती है उन्हें उठते बैठते
ये खड़े मकान देते तो गवाही वक्त की है
मगर पता उन्हें भी इतिहास दोहराता है धीरे धीरे


किरण आर्य 
~आसमान चाहतो का~

सागर का किनारा
शाम की लालिमा
बड़ी बड़ी इमारते
थमी सी लहरों में
डोलती सी कश्ती
विचारों में मग्न
शांत सा मन
डूबता उतरता
सागर की लहरों सा
हिलोरे खाता
कभी गगनचुंबी
इमारतों से टकराता
उड़ते हुए परिंदे
बेकल मन को देख
मुस्कुराते
कानो में उसके कह जाते
सब भूल भरो एक उड़ान
हमारी तरह
और छू लो आसमां
चाहतो का अपनी





भगवान सिंह जयाड़ा 
-------जिंदगी एक कश्ती------
-----------------------------
जिंदगी भी एक डगमगाती कश्ती सी बन गई है,
साहिल के एक छोर से दूसरे छोर की दौड़ रह गई है,
शहरों को जोड़ने वाले इस कौतुहल भरे रास्तों में,
डगमगाती कश्ती और सहमें हुए दिलों की मजबूरी,
बस मंजिल को हासिल करने की तम्मना दिल में,
यह जिंदगी एक रोमांस और शंघर्ष से कुछ कम नहीं है,
रुक गए तो जिंदगी थम जायेगी चले तो मंजिल मिल जायेगी,
इस लिए कर हौसला ऐ मुसाफिर मंजिल को पाने का,
नहीं तो जिंदगी की यह दौड़ सदा के लिए रुक जायेगी




मीनाक्षी कपूर मीनू

इन्सां की भटकन
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

लम्बी ऊँची इमारतें
बाहर व् भीतर से
सजी हुयी
मगर...
इनके भीतर
बसा इंसान
कितना भिन्न है
बाहर से सजा-धजा
भीतर से खोखला है
आज के धर्म-कर्म
की तरह ,,,
नाव भी है नाविक भी
मंजिल भी
मगर ,,,,,,
कश्ती फिर भी
है फंसी ....
मंझदार में है
सबकी
उठो चलो...
ऐ मुसाफिर
जागो ..
समझ अपना
राजधर्म
समेट लो
फरेबी कर्म
कर्मठ तुम इन्सान बनो
मिल जायेगी
मंजिल ...
आडम्बर होंगे
आर-पार
मनस्वी....
तर जायेगी
नाव ...
कर लोगे तुम
भवसागर पार ...



Kiran Srivastava
"जीवन एक कश्ती"


 कोई पार जाता
कोई हार जाता
कोई है जो सागर मे
गोते लगाता...
ये जीवन की नइया
तभी पार होगी
कुशल मांझी हाथों में
पतवार होगा...
हो जीवन की कश्ती
गर मझधार में तो
दिखे ना तुम्हें जब
कोई भी किनारा
फिर भी खुदी को
बुलन्दी पे रखना...
डूबेगी ना तेरे
जीवन की नइया
अगर हौसला और
करम साथ होगा...!!!!!


प्रभा मित्तल 
~~ सागर किनारे ~~

सागर किनारे बैठकर,
मन में सुकून सा भर देतीं
किनारों से अठखेलियाँ करतीं
आती-जाती लहरों को,
दूर तलक निहारना,
मुझे अच्छा लगता है।

पानी पर भागती कश्तियाँ
डेरा डाले जहाज
अट्टहास करती तरंगें
यहाँ - वहाँ इतराते
डुबकियाँ लगाते जलचर
आसमान छूने की कोशिश में
ऊँचे से ऊँचा उड़ते नभचर।

घंटों देखती पर जी नहीं भरता
जिस दिन न जा पाती तो
ड्रॉइंग रुम की खिड़की से
बाहर ताकती रहती
कब दिन गुजर जाता
पता ही नहीं चलता ।

देखते ही देखते अब
युग बदल गया है
गगनचुम्बी इमारतें
समुद्र को बाँधने की
नाकाम कोशिश में
जलधारा से बातें करतीं हैं।

इस पार जीवन बसता है
उस पार रोटी की तलाश।
मन में अपार भटकन है
जो कल था वो बीत गया
आज यहाँ सब सम्भव है

क्षितिज पाने की चाह में
गगन से बातें करने को
हर प्राणी सुबह - शाम
नौकाओं का सम्बल ले
पानी पर सफर करता है।

ये हर दिन का खेला है
प्रगतिवाद का मेला है
गुमसुम सा हर आदमी
भीड़ में भी आज अकेला है।



सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Sunday, January 3, 2016

९ दिसम्बर २०१५ का चित्र और भाव




प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
आखिर कब तक ?

एक स्वपन देखा था
मित्र और सृजन
हिन्दी का प्रतीक बने
बस एक प्रयास भर था
शुरुआत अच्छी थी
सहयोग भावो का
निरंतर मिलता गया
लेकिन शायद
प्रतिभा अब चमक उठी
नाम कहीं और मिलने लगा
सम्मान की अपेक्षा
स्वार्थ पूर्ण होने की
घोषणा करता चला गया
और फिर
समय एक बहाना बन गया
समूह दम तोड़ता
लेकिन फिर जी उठता
क्योंकि एक दो सदस्य
समर्पित है भावो के साथ
कितने प्रतिभाशाली
न अहम् न समय की सीमा
उनके सहयोग समर्पण की
साँसों के साथ चलता समूह
पर आखिर कब तक ????
अब निर्णय उनको ही लेना है
कब तक साथ चलना है
इंतजार मुझे भी है



भगवान सिंह जयाड़ा 
-----मन का द्वन्द हाँ या ना ----
--------------------
हाँ या ना की उलझन में फंस कर रहा गया ,
निर्णय की कशोटी पर सदा पिछड़ सा गया ,
अजीबोगरीब एक उलझन मन में बन गई ,
हाँ कहूं कि ना कहूं दिल में बात फंस गई ,

जज्ज्बात में बुराई का साथ नहीं देता ,
कड़वी सच्चाई का कोई यहाँ साथ नहीं देता ,
है कुछ चाहनें वाले अपने अभी भी यहाँ ,
बरना हौसला कुछ कहने का कभी ना होता ,

इस लिए कर लो पक्का दिल को अपना ,
हाँ या ना में मत उलझावो अब अपना सपना ,
अब मन का द्वन्द मिटा के करो सही फैसला,
जगावो अपने मन में एक नयाँ जीवंत हौसला,



डॉली अग्रवाल 
मन की पीड़ा -- हां ना घूमती ज़िन्दगी

ये लो आज वो फिर पिट गयी
रोटी शायद कहि से जल गयी
मार खा दूसरी रोटी बना लाई
सात फेरे लिए थे , आज चक्कर में आ गयी
वो उसकी पत्नी थी
शायद सारे धर्म उसके हिस्से आ गए थे
सुबह की मार ,रात का दुलार
ये सोच वो जीती रही
अब कहाँ जाउंगी
अकेली नहीं रह पाउंगी
इस तनहा सी ज़िन्दगी के
कितने दावेदार हो जायँगे
घर की दहलीज पार की तो
जाने कितने मर्द खड़े हो जायँगे
ये सोच जीती चली गयी
कल की लक्षमी आज कामवाली हो गयी
रात का मनुहार , सुबह की गालियां हो गयी
लड़की शायद इसलिए ही आज भारी हो गयी !!



मीनाक्षी कपूर मीनू 
"शायद हाँ ,शायद नहीं"
*************
ओह ...
क्यों होता है ऐसा
उसके साथ ही
लोगो की भीड़
से घिरी वह
लेकिन लगता है
अकेली है
समझ सकेगा
कोई उसको कभी
शायद हाँ
शायद नहीं ....
भरी आँखों से
हंस रही है वह
दुनिया को धोखा
दे रही है
खुद को
गुमराह करके
दूसरों को राह
दिखा रही है
लेकिन कब तक
आखिर कब तक
इस तरह जी
सकेगी वह
अपने आंसू पी
सकेगी वह
आखिर वह भी
इन्सां है
उसमें भी जां है
अपनी उदासी को
अपना साथी
बना कर
कब तक जी
सकेगी वह
कब तक
आखिर कब तक
मनस्वी ...
जी सकेगी भी
या नहीं
शायद हाँ
शायद नहीं ......

Kiran Srivastava
 "दुविधा"

क्या करुं क्या ना करुं
जीवन कैसे निर्वाह करुं...?
दुविधाएं अंबार यहां पर
हां ना पर है जोर कहां पर
मन पे हावी दिल होता है
दिल पे हावी है दिमाग...
मानव हर पल ही भटका
हां ना में अटका रहता
जब निर्णय ले भी लेता
फिर भी चैन सदा खोता
लाभ-हानि का खटका रहता
मन उसमें ही अटका रहता
फिर भी निर्णय तो लेना है
जीवन में आगे बढना है...!!!!!


प्रभा मित्तल
~~कैसे कह दूँ ..हाँ या ना~~
~~~~~~~~~~~~~~~~
कभी लगता है .. हाँ है,
कभी लगता है..नहीं है,
झाँक रही है ज़िन्दगी
टिमटिमाती आँखों से
आस की डोर से बँधी
'हाँ' और 'ना' के बीच
एक पेंडुलम की तरह।

पल छिन महीने बीत रहे हैं
जूझ रहे हैं नियति से,
और हँस रहे हैं हम
अपनी ही तक़दीर पर।
काट रहे हैं
वक़्त की ही लकीर को
वक़्त की धार पर चलकर।

ताकि कुछ वक़्त पा सकूँ
सुकून से अपने सुकून का
आ सकूँ यहाँ
गुज़ारने एक पल वक़्त का
फिर तुम ही बता दो
मैं कैसे कह दूँ ..हाँ' या 'ना'।

कैसे बह जाने दूँ
समय की धार में यूँ ही,
सहेज कर रखा था जो
बीता एक जमाना,
नहीं भूलेगा इस सृजन का
रचा वो इतिहास पुराना।

साँस जब तक है
आस भी बाकी है
उम्मीद नहीं छोड़ी है
लौट आने की चाह में
विश्वास अभी बाकी है।

'ना' की कोई गुँजाइश नहीं,
बस साथ बनाए रखना तुम
'हाँ' हम फिर आएँगे।
इन तस्वीरों में प्राण फूँकने
हम फिर फिर आएँगे।



किरण आर्य 
तय है चलना

कभी हो जाते हालात कुछ ऐसे
की चाहते चढ़ जाती है बलि
कर्मों की
जिन्दगी कर्म प्रधान ही तो है न
कर्मों के चक्र से बंधी
दौडती निरंतर जिन्दगी
और उसके साथ हम भी
ये दौड़ अनवरत् अंधी सी
सघन गलियारों से गुजरती
सुबह से रात तक
नजरिये अलग अलग
कर जाते खड़ा आसानी से
कटघरे में
मूक मौन मन बेबसी पर अपनी
मुस्कुराता फीकी सी हंसी
लेकिन साथ चलने का जज्बा
हाँ और न से परे
तय है चलना साथ थाम हाथ
भ्रम भ्रांतियों से परे
मौका अवसर और विश्वास जरा सा
और कदम होंगे साथ
थमें भी और बढ़ते हुए भी
इंतज़ार के साथ आस का दीप
रहे ज्वलंत
बस ये है दुआ और आशा भी


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Friday, November 20, 2015

१२ नवम्बर २०१५ का चित्र और भाव

इस बार चित्र पर आप को दो भाव लिखने है शीर्षक बेसक एक हो - एक सकारत्मक और एक नकारात्मक 
- कम से कम ६ पंक्तियाँ अवश्य होनी चाहिए हर भाव में

Kiran Srivastava 
"दांव"
(1)

ये जीवन भी
दांव खेलती है,
कभी हम खुद से
हार जाते हैं....
कभी जिंदगी
जीतने नहीं देती
लेकिन अपनों से हार
कभी-कभी
जीत से भी ज्यादा
खुशी दे जाती है
और हम हार कर भी
जीत जातें हैं....!!!

(2)

जोश में होश
ना खो जाये
न लगाओ
दांव पे दांव...
निकल ना जाये
चादर से पांव
ऐसा न हो
ज्यादा की चाह में
जीवन बद् से
बद्तर हो जाये...!!!


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ..... 
1.
~ये तो है ~.

जिन्दगी मुस्कराई
जब तुम आई
पल पल में खुशबू
अंग अंग में छाई

प्रेम आकर्षण
तन मन की खुशी
डेरा डाले बैठी रही
रोज सहलाती रही

जीवन समर्पण सा ख्याल
उत्तर देता हुआ हर सवाल
चाहत - संग 'प्रतिबिंब' सा
मिलन - ख्वाबो का हकीकत सा

2.
~वक्त हँसने लगा ~

लम्बी लम्बी बाते
लेकिन छोटी चाहत सी
पल केवल मिलन के
ख्वाइश उन्हें समेटने की

अचानक पल छूटने लगे
चाहत शब्द बन दूर जाने लगी
साथ केवल शब्दों का
भाव अब दूरी बयां करने लगे

पल वक्त की दुहाई देने लगे
एहसास मेरे सवाल बनने लगे
समय कही और बीतने लगा
वक्त मुझ पर फिर हंसने लगा



नैनी ग्रोवर
1.
 --दाँव--
कभी धुप कभी छाँव है,
यही तो जीवन का दाँव है,

कभी हार में भी जीत है,
कभी जीत में भी हार है,
फूलों का बिछोना कभी मिले,
कभी धुप में जलते पाँव हैं,
यही तो जीवन का दाँव है...

मुस्कुरा के स्वीकार करो हर क्षण,
करेगा परमात्मा स्वयं रक्षण,
विश्वास का दामन ना छूटे कभी,
अगले मोड़ पे ही तेरा गाँव है,
यही तो जीवन का दाँव है ..!!

2.

 ---दाँव---
मौज और मस्ती है हर घड़ी,
कल क्या होगा, किसको पड़ी,
ना घर और ना परिवार कुछ है,
बस दो दिन की बहार सबकुछ है,
महफ़िलों में लगाओ, पैसों की झड़ी,
कल क्या होगा, किसको पड़ी...

डुबो दो आज ही, जो कुछ है कमाया,
कल का क्या पता, आया ना आया,
ऐंठ के लगाओ तुम दाँव पे दाँव,
क्या हुआ अगर भूखा मरता है कोई गाँव,
तुम जलाओ, हसीन सपनों की फुलझड़ी,
कल क्या होगा, किसको पड़ी..!!

बालकृष्ण डी ध्यानी
की हो जाये बंटाधार

पास फेल की ये जिंदगी है
ले तू सब नकद या उधार
की हो जाये बंटाधार .... २

यंहा किसी का कोई नहीं
ना कोई रंक ना कोई साहूकार
की हो जाये बंटाधार .... २

पढाई भी इस पर निर्भर है
चाहे उल्लू हो या होशियार
की हो जाये बंटाधार .... २

सुख दुःख की बंधी लड़ी
दुःख छड़ी जिसको ये पड़ी है
की हो जाये बंटाधार .... २

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Tuesday, November 10, 2015

४ नवम्बर २०१५ का चित्र और भाव




नैनी ग्रोवर 
--इंतज़ार--

अंधेरों में बैठे, इंतज़ार कर रहे हैं हम रौशनी का,
कब निकलेगा सुनहरा चाँद, कब देखेंगे मुँह चांदनी का..

ग़ुम हो गए सारे नज़ारे, गुमसुम हुई बहारें,
खो गए जाने कहाँ, अम्बर से तारे प्यारे प्यारे,
लगता है जैसे टूट गया सुर, कोई रागिनी का..

खिलवाड़ किया कुदरत से हमने, अंजाम यही होगा,
डूब जायेगी अँधेरे में दुनियाँ, सच मान यही होगा,
कुछ तो कर लो मान, इस धरती जग जननी का..!!


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
~भीड़~

आज एक भीड़ में खड़े है सब
देख रहे, माहौल बदलेगा कब
कोई रोशनी के लिए जले जब
चेहरा शायद सबका दिखे तब

वैसे भीड़ किसी की होती नही
आज तेरी कल मेरी सोच यही
मानवता सम्मान खोये है कही
अपना कृत्य, केवल लगता सही

भीतर की ज्वाला अभी शांत है
हर कोई, यहाँ असमंजस में है
दूजे को देख 'प्रतिबिंब' सोचते है
मुझे छोड़, यहाँ सब मजे में है


Kiran Srivastava 
" अंधकार "

किंकर्तव्य विमूढ क्यूँ बैठे हैं
ये अंधकार तो है क्षणिक
असली अंधियारी है अंदर
जिससे नही लगे जग सुंदर
मिटा सको तो इसे मिटाओ
एक ज्ञान का दीप जलाओ....

भ्रष्टाचार फैला चहुँओर
त्राहि -त्राहि मची है जोर
क्या महिला क्या बच्चियाँ
उड. रही हैं धज्जियां
खुद समझो सबको समझाओ
एक ज्ञान का दीप जलाओ....

अंदर बाहर सब काला है
नियत में गडबड झाला है
चेहरे पर चेहरा हैँ लगाये
जिसकोकोई समझ न पाये
मिलकर इनकोसबक सिखाओ
एक ज्ञान का दीप जलाओ....!


बाल कृष्ण ध्यानी 
~अँधेरे में ~

अँधेरे में अंधेरों से
अँधेरे चेहरे जब मिले
अंधेर बस अँधेरे ये

बंद तस्वीर
बंद लकीरों से मिले
तब बंद कमरों का खेल चले

मूक हैं अपने से
मूक वो सपने से
ना जाने मन क्या पले

कैसा सन्नाट है
कैसा पल उभर आया है
विचलित ही सब को पाया है

अँधेरे ये .....................



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Sunday, November 1, 2015

२५ अक्तूबर २०१५ का चित्र और भाव





प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~एक रिश्ता ~

सजाया था एहसासों से
बनाया था जिसे हमने अपने शब्द भावो से
एक रिश्ता अपना सा
आज वक्त के साथ बेगाना सा लगने लगा

दरवाज़ा बंद कर लिया अब
दिल का वो कमरा खंडहर नज़र आता है
एक हिस्सा बाकी है अभी
जो टूट कर मिट्टी में मिलना चाहता है

मुड़ कर देखा था उसने
तसल्ली आँखों से करना चाहते है वो
कुछ छूटा तो नहीं 'प्रतिबिंब'
लौटने का हर निशां मिटाना चाहते है वो

Kiran Srivastava 
" यादें"
-----------------
मिटते धरोहर
दरकती दिवारे
लगे मुझको ऐसे
हमें वो पुकारे
सिसकते हैं आंगन
और रोते चौबारे
आहत होती हूँ
जब मुड कर दखतीं हूँ.....

याद आती है
बचपन की शरारते
बाबा का प्यार
मां का दुलार
बच्चों की टोली
वो मीठी वाली गोली
सपनों में खो जातीं हूँ
जब मुडकर देखतीं हूँ.....

ऐशो आराम का जीवन
भागती जिंदगी
दौडते लोग
आगे जानें की होड
रिश्तों में जोड
नजरें चुराते लोग
वहुत दु:खी होतीं हूँ
जब मुड कर देखतीं हूँ.....


प्रभा मित्तल 
~~अतीत के पन्ने~~
आज फिर यूँ ही अतीत के
बंद वो पन्ने पलट रही हूँ,
ढाई अक्षर जिए थे जिनमेंं
यहीं से था शुरु उम्र का रास्ता
मिलीं ज़िंदगी की सदायें नई।

कितना कुछ पाया जीवन में
ना जाने कब कहाँ खो गया
अपने भी सिमट गए अपने में
आस-पास रह गई मेरी तनहाई।

सुन्दर सा सलोना सपना मेरा
नयनों के कोरों से बह निकला
जो रह - रह कर मेरी आँखों में
खेल रहा था छुपम - छुपाई।

मन के सन्नाटे में घिर-घिर
आज फिर वो यादें याद आईं
भूली हुई, वादों की नाकामियाँ
कितने अनकहे दर्द समेट लाई।

मुड़कर फिर-फिर देखा तुमको
उस भीड़ भरी महफिल में मैंने,
डग भरते आगे निकल गए तुम
मैं पीछे संग लिए अपनी तनहाई।

चाहने को तो बहुत कुछ था,मगर
माँगूं भी क्या, अब ढल रही शाम
अख्तियार नहीं मेरी साँसों पर,
तुमसे जो मिला, सौगात हो गई।


भगवान सिंह जयाड़ा
-खामोशी--
------------------
दरो दिवार की खामोशियों को देख ,
आज मैं भी स्तब्ध खामोश हो गई,
बस कुछ धुंदली सी यादों के सहारे,
जिंदगी के जख्मों का दर्द सह गई,

घूरती रह गई हर खामोश कोनों को,
कहीँ तो कुछ उम्मीद की लौ मिले ,
बीते हुए उन लम्हों की यादों का,
दिल में आज फिर एक फूल खिले,

इंतजार आज भी किसी के आने का
खामोश हर राह को ताकती रहती हूँ
मिल जाये आशा की एक किरण ,
तन्हाइयों में सदा जागती रहती हूँ,
--------------------




ज्योति डंगवाल 
-----गाँव की अभिलाषा---

मैं खोजती खुदको
गुम कही अतीत के पैमाने में
हो रहा खंडहर
ये दर ओ दीवार

मन में करवट बदलता
एक अहसास है
गूंजी थी वो पहली किलकारी
तेरी मेरे ही मुहाने पे
यूँ खंडहर मेरे जिस्म को
क्यों चला तू छोड़ वीराने पे

वो नीम आम की डाली
वो चम्पा चमेली गुलाबों की क्यारी
बीते लम्हों की लौटा दो
मुझे सौगात न्यारी

मेरे आँगन का कलरव
वो खोयी सी रंगत
बूढ़े छतनार की जवानी
अपनी आँखों का पानी

मैं सुखद दिनों की आशा
अडिग आज भी
होके जर्जर संभलती हूँ
लिए जी रही हूँ एक अभिलाषा

एक दिन प्रिय तुम आओगे
मुझे सम्भाल सँवार
तीज होली गीत तुम गाओगे
डूबता मेरा अस्तित्व
तुम बचाओगे



Pushpa Tripathi
~वादों वाली बात~

वक्त के बदलते रिश्तें
अब तो अलसाया लगे
रेत में पानी का हिस्सा
अब तो बेगाना लगे !

सिसकते बूंदों की गठरी
दिल पर बोझ उठाते है
बीते दिनों की याद तो
अब कहर सा लगे !

क्यूँ वादो वाली बात
पीछे मुड़कर देखती है
जो कुछ अपना नही
अब वो अपना सा लगे !


कुसुम शर्मा 
विरह
-------
दूर कही गाँव मे बैठी
आज भी राह निहार रही
न जाने विरह अग्न मे
कितने अंशु बहा रही

हर पल हर क्षण वह ये सोचे
अब तो मिलन की बेला है
लेकिन वह ये क्या जाने
विरह ही उसकी जीवन बेला है

वादा करके भूल गया वो
बीच राह मे छोड़ गया वो
उसकी दिल मे आस लगाये
बैठी है वो राह निहारे

निंदा आँखो की छूट चुकी है
हँसना अब वो भूल चुकी है
प्रिया की आस लगाये दिल मे
दुनिया को वो भूल चुकी है !!





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