Wednesday, December 16, 2020

तकब ०३ /२०





प्रिय स्नेही मित्रों
सप्रेम नमस्कार!
पिछली प्रतियोगिता का परिणाम आने ही वाला है। तब तक आप इस नई प्रतियोगिता के लिए सोचना शुरू कीजिये। आप सभी से आग्रह है कि नियमों का पालन अवश्य करें, जिसके लिए उन्हें पढ़ना भी जरूरी है।

तकब ०३ /२०
१. दिए गए चित्र / तस्वीर पर कम से कम १० पंक्तियां व अधिक से अधिक २० पंक्तियां किसी भी विधा में लिखिये और साथ ही उसका शीर्षक व अंत मे एक टिप्पणी अपने उदृत भावों पर अवश्य लिखिये।
२. चित्र पर रचना नई, मौलिक व अप्रकाशित होनी चाहिए। एक निवेदन है कि जितना संभव हो रचनाओं मे हिंदी के शब्द ही प्रयोग मे लाएँ।
३. प्रतियोगिता के वक्त लिखी हुई रचना/पंक्तियों पर पसंद के अलावा कोई टिप्पणी न हो। हां यदि किसी प्रकार का संशय हो तो पूछ सकते है। निवारण होते ही उन टिप्पणियों को हटा दिया जाएगा।
४. आप अपनी रचना किसी अन्य स्थान पर पोस्ट तभी कर सकते हैं जब प्रतियोगिता का परिणाम आ जाये और आपकी रचना को ब्लॉग में शामिल कर लिया गया हो।
५. प्रतियोगिता हेतु रचना भेजने की अंतिम तिथि २५ नवंबर २०२० है।
६. निर्णायक मंडल के सदस्य केवल प्रोत्साहन हेतु अपनी रचनाएं भेज सकते हैं। आग्रह है कि वे समय से पहले भेजे अन्यथा प्रोत्साहन का कोई औचित्य नहीं रह जाता।

धन्यवाद, शुभम !!!!
प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

इस प्रतियोगिता की विजेता हैं

सुश्री कुसुम शर्मा


कुसुम शर्मा
~लोगों के मस्तिष्क में बैठी यह बीमारी हैं~

उभर सके न जिससे हम ऐसी यह महामारी है !
लोगों के मस्तिष्क में बैठी यह बीमारी है !!
बीमारी से बच भी जाए आर्थिक मार भी भारी है !
लॉक डाउन के चक्कर में निकली जान हमारी है!!
महामारी व घर काम के चक्कर में अटकी जान हमारी है !
सोच समझ भी शून्य हो गई ऐसी स्थिति हमारी है !!
शुरू हुई यह चायना से विश्व भर में फैल गई !
मौत का तांडव मचाया हर व्यक्ति को बन्दी बनाया !!
डबल्यूएचओ ने भी क्या ख़ूब साथ निभाया!
दे कर न सही ख़बर विश्व में तांडव करवाया !!
मुँह में मास्क, छह फुट की दूरी !
बार बार हाथों को धोना है ज़रूरी !!
जाने कितने बेघर हुए सड़कों पर वह सोते है !
इस बीमारी के डर से नही आर्थिक तंगी से वो रोते है!!
कई डर से पागल हो गए खुद से बातें करते है !
देख कर यह स्थिति हम मन ही मन रोते है !!
कहते है जाको राखे साईंया मार सके ना कोई!
आया जो संसार में एक दिन तो उसको जाना !!
मान लें इस सत्य को मानव!
तो फिर क्यूँ इस बीमारी से घबराना !!

टिप्पणी: यह हमारे यहाँ की स्थिति है इस बीमारी के देश में प्रवेश करते ही जाने कितने लोग बेघर हो कर सड़कों पर अभी तक रह रहे हैं लाँकडाउन में जाने कितने घरों में चूल्हा तक नहीं जला ! जाने कितने लोग इसके डर से ही मर गये जाने कितने इस चिन्ता में पागल हो गए घर का बिल कैसे भरेंगे ! सही बात है बीमारी से इन्सान लड़ सकता है पर आर्थिक तंगी से कैसे लड़े !


पुष्पा त्रिपाठी
~कोरोना के युद्ध में विश्व जितेगा~

कोलाहल जीवन का थमा थमा सा है
चिकित्सकीय संसाधन अब गिरफ़्त सा है
दम तोड़ते लोग निरंतर संक्रमित संख्या
मौतों का बढ़ता आंकड़ा अब रफ़्तार सा है।
मजदूर दूर-दूर से भूखे-प्यासे घरों को लौट रहे
कितने खौफ़नाक मंज़र यहां तबाही ने कमर तोडे
मंदी की यह जबर्दस्त मार अब उभरा उभरा है
विकास औ कामकाज की गति अब अवरुद्ध सा है।
इसके हजारों पाँव, लाखों बाहें मौत की मंजिल थामे
कौन कहाँ कब कैसे चला जाये कौन जाने ?
पांसों में एक वायरस टहल रहा सांसों में अवरोधक
आवाज में खौफ़नाक मंज़र अब दिखा -दिखा सा हैं।
सुरक्षित हम जीवनरसमास्क पहन कर घूम रहे
अस्त्र शस्त्र के बिना निरंतरजारी यह विश्वयुद्ध जीत रहे
ख़त्म होगा यह कहर हम जानते है मगर फिर भी तो
यह हिटलरी शासन हर तरफ अब दिखा - दिखा सा है।

टिप्पणी : पूरी दुनिया कोरोना वायरस के खिलाफ जंग लड़ रही हैं। इस संक्रमण ने सम्पूर्ण विश्व की आर्थिक व्यवस्था को चरमरा दिया है। भारत में इसे रोकने के लिए बहुत प्रयास किए जा रहे हैं यह किसी हिटलरी शासन और युद्ध से कम नहीं है।



प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
~संस्कृति संस्कार से मिलन~
(प्रोत्साहन हेतु)


भूल गए थे हम कुछ
नहीं, भूल गए थे बहुत कुछ
हमारी पहचान खोने लगी थी
पाश्चात्य संस्कृति का मुखौटा ओढ़
हम जंक फूड के शौकीन हो गए थे
हाँ ये है कड़वा सच
हम भूल गए थे
प्रवेश करते ही हाथ मुंह धोना
भूल गए हाथ जोड़ करना नमस्ते
छूट रहा था
सयुंक्त परिवार, स्वयं का परिवार
बढ़ रही थी दूरियाँ, गुम हो रहा था प्यार
छूट रहा था
एक दूजे का साथ व विचार विमर्श
लेकिन
वक्त का खेल, पुन: किया स्वीकार सहर्ष
कोरोना की महामारी से चाहे घबराकर
अपना लिये फिर हमने अपनी संस्कृति-संस्कार
कोरोना से डरना न अब, खुद से करना प्यार

टिप्पणी: मानता हूँ कि कोरोना कि महामारी ने जान के नुकसान के साथ जीवन जीना दुर्लभ कर दिया लेकिन इस बीमारी का यह असर दुनिया भर में हुआ या हो रहा है। लेकिन इसमें मुझे सकारत्मक पहलू भी दिखाई दिया कि कुछ संस्कृति संस्कार से जुड़ाव जो छूट रहा था उसे हम पुन: जीवन में उतार रहे है। शायद समझ जाये हम लोग।


प्रगति मिश्रा
~दैव! दैव! कोरोना-समस्या ने पुकारा~


दैव! दैव! कोरोना-समस्या ने पुकारा
'मास्क' और सामाजिक दूरी का प्रण लोगों ने स्वीकारा।
'हेल्थ-हाइजीन' एवं 'सैनिटाइजर' को बार-बार निहारा।।
पर साहब! यहाँ समस्या
कोरोना से उत्पन्न समस्या से है,
इस 'लॉकडाउन' में गए रोज़गार से है।
बचपन से सहेजी डिग्रियाँ और प्रशस्ति पत्र
उस प्रतिभा के गवाह हैं
जिनके एवज में कभी नौकरी पाई थी,
लेकिन वे एक संदूक में कैद हो कर रह गए है।
इस वैश्विक महामारी से, तब भी लगता था डर,
पर, अब तो बेरोजगारी ने ही बना लिया है घर।
योग्यता अब भी उन्मुक्त आकाश में है
पर लगता है कि जैसे आय पर ताला जड़ गया है।
एक तो कोरोना का कहर, दूसरे बेरोजगारी की मार
मध्यवर्गीय परिवार तो मानो जद्दोजहद से भर गया हैं ।
खैर, समस्याएँ आती हैं तो आए
घिरे गड़गड़ाती घोर घटाएं, अंतरद्वंद को न भरने देंगे,
'कोविड' को भगाकर ही हम दम लेंगे।
स्वस्थ व समृद्ध देश बना कर ही हम दम लेंगे।।

टिप्पणी: हम भारतवासी कोरोनावायरस की सामान्य समस्या या ज्ञान पर ही ध्यान देते हैं,पर इन सामान्य समस्याओं के अतिरिक्त व्यक्ति विशेष समस्याएँ भी हैं जो कि लोगों को जद्दोजहद में डाले हुए हैं । उनमें से एक है - बेरोजगारी की समस्या। आज करीब ढ़ाई करोड़ अतिरिक्त लोग बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहे हैं जिनकी पारिवारिक स्थिति दयनीय है । इस कविता के माध्यम से मैं आप सबका ध्यान उसी ओर आकृष्ट करना चाहती हूँ। धन्यवाद। आभार। सादर।



यशोदा दिग्विजय अग्रवाल
~सीठा त्यौहार~

बीत गई
फीकी दीपावली
उत्साहविहीन
सुविधा विहीन
यंत्रवत जीवन जिया ..
एक मशीन की तरह
सुबह से शाम तक
रात में भी सोने के पहले
एक चिंतन कि
कल की कल-कल
मन में असंतोष
खुशियाँ सारी समाप्त,
मास्क पहनने
और हाथ धोने में
बची खुची कसर
चढ़ गई बनकर भेंट
इस कहर भरी
विदेशी विषाणुओं रचित
महामारी कोरोना की भेट
घर पर रहकर मानव
महज निसहाय 'औ'
किस्से -कहानी तक
रह गया सीमित
यह महोत्सव दीपावली का
रस्म अदाई हो गई है..

टिप्पणीः चित्र के आधार पर आत्मिक अवलोकन सिखा गई हमें अल्प सुविधा में जीना है और अपने आपको स्वस्थ रखना है...।


किरण श्रीवास्तव
"करोना"

रक्तबीज सा है विस्तार
नहीं समझ आए निस्तार..
कितनों को तू लील गई
होठों को भी सील गई,
दिल दूरी ना अब सह पाए
मन मचले रिश्ते तड़पाए ...!
ना मिलना तो मजबूरी थी
ऐसे ही क्या कम दूरी थी...
काम धंधे चौपट कर डाला
शादी पार्टी ना मिर्च मसाला,
माफ करो तुम अब हम सब को
लौट जाओ अब अपने घर को।


टिप्पणी: विज्ञान के विभिन्न चमत्कारों से दुनिया चकित थी, लोग चंद्रमा पर पहुंचने का ख्वाब देख रहे थे परंतु ,एक वायरस ने सबको धरातल पर ला दिया| जिस नियम संस्कार को लोग भूल चुके थे वही एकमात्र बचाव का कारण बना......!!!!


विजय लक्ष्मी भट्ट शर्मा
~करो ‘ना’~

वक्त की चाल,बड़ी बलवान यहाँ
हम मद में चूर,अहम मे गुम
वक्त चलता,अपनी चाल
दिखाता तमाशा ,एक वायरस
मुँह चिड़ाता,रोज तेरी उम्र चुराता
तेरे शान से ,ऊँचे घमंडी
मस्तक पर ,एक छोटी सी
लकीर छोड़ ,आइना दिखाता
तुझको ही तेरी,असलियत बताता
क्या पाया तूने,इतना कमाया तूने
गरीब की रोटी छीनी
मुँह बंद अब ,खोल चड़ा
तेरा कमाया ,काम ना आया
तू भी तो चैन से ,खा ना पाया
करोना नाम ले,यमराज खड़ा
अब तो हे मनु ,अपने अहम को
करो ‘ना’
मिल मिल रहो ,अब तेरा मेरा को
करो ‘ना’
भाग ही जाएगा ,एक दिन फिर
सबक सिखाता
ये करोना।

टिप्पणी: मेरी कविता करो ‘ना’ याद दिलाती है की हम कितने स्वार्थी हो गये, सिर्फ़ अपना फ़ायदा सोचने लगे और इस बीमारी कारोना ने दिखा दिया की कोई भी वस्तु जरुरी नहीं , आपका पैसा रुतबा किसी काम का नहीं , ये बीमारी ना अमीरी ग़रीबी देखती है ना ही कोई रुतबा फिर किस बात का घमंड जब जाना ख़ाली हाथ।



मीता चक्रवर्ती
~कोरोना~


बदलने चले थे हम प्रकृति को
मानव की मानवीय प्रवृत्ति को
माडर्न कहलाने चले थे , भूलाकर
अपने संस्कार और संस्कृति को
बहती नदियों को हमने रोक दिया
पेड़ पौधे लगाना छोड़ दिया
ईंट कांक्रीट रुपी इन दानवों ने
अरण्य को हमारे लील लिया
किया खिलवाड़ जो प्रकृति से
खामियाजा उसका ही भर रहे
नही दोष केवल ही कोरोना का
हम भी इस महामारी के जिम्मेदार रहे
अब हमे ही इसे भगाना होगा
संस्कार अपना अपनाना होगा
दूर दूर रहकर ही सही
साथ अपनों का निभाना होगा ।

टिप्पणी: ये जो महामारी फैली हुई है विश्व भर में, इसका वाहक भले ही कोई वायरस हो पर हम मानव भी कहीं न कहीं इसके जिम्मेदार हैं। हमने अपने स्वार्थ के लिए प्रकृति के साथ बहोत खिलवाड़ किया है शायद इसी का परिणाम हम चुका रहे हैं ।


सूर्यदीप अंकित त्रिपाठी
~सुना तुमने? ~

सुना तुमने ?
सुना ही होगा, इसी धरती के जो हो,
गुलजार साहेब ने भी बता दिया अब तो...
“महामारी लगी है”
और वो महानायक जो रोज़, आपको चेता रहा है कब से,
दूध का जला है साहेब, सुन लो उसकी भी..
पर ये भूलने भी नहीं देता... ये बुरा लगता है..
क्यूंकि भूलने की आदत जो है हमारी,
बस यही बात पसंद नहीं आती हमें...
ये भूलने नहीं देता..
पर कुछ तो है जो हमें नहीं भूलना चाहिए था,
उन त्रिशंकु मजदूरों का पलायन, रूदन, रोदन, मर्दन,
इनको सड़क पर भूखे, पैदल चलते हुए देख ऐसा लगा,
इनसे इनका घर छीन लिया हो,
और कह दिया हो...कि यहाँ रहना है कि वहाँ, ये तुम पर है..
बस फर्क ये था कि ये बंटवारे की घड़ी नहीं थी..
गुलजार साहेब, प्लग निकाल चल तो दिए थे सब,
पर भूख धूप-पानी खाकर नहीं बुझती,
कुछ पहुंच पाए, कुछ रास्ते में ही रह गए थे, डिस्चार्ज होकर,
ये कैसे भूल गए हम..
कोई महानायक नहीं आएगा ये याद दिलाने...
सुना तुमने ??

टिप्पणी: मेरी ये कविता सिर्फ और सिर्फ मेरी भड़ास है.. इसलिए यहाँ प्रतियोगिता के लिए नहीं है.. विषय आपने दिया...तो मन किया की यहाँ अपनी कुछ मन की कह दूँ... धन्यवाद...



प्रभा मित्तल
~ कोरोना-काल ~

प्रगति प्रयोग के अतिक्रमण पर
कुपित प्रकृति का प्रकोप बरपाया
कोरोना ने आ धमकाया,रे मानव!
ठहर जरा,धीमी कर अपनी चाल।
तभी संक्रमण की दहशत फैली ..
अपनों से मिलने की आज़ादी गई-
अब कोविड प्रकोप से कैसे बच पाएँगे.
सोचा न था ऐसे भी दिन आएँगे
आगे बढ़ते - बढ़ते अचानक
सब पीछे को सिकुड़ जाएँगे।
सूनी सड़कों पर विचरेंगे पशु,
घरों में बंद रहेंगे हम,
बागों में पंछी चहचहाएँगे।
कोयल-कौेए,चिड़िया तोते
हमको पिंजरे में बंद देख, हँसेंगे
और हम भीतर रहकर भी डरपाएँगे।
मास्क बिना न जीवन होगा,
खुली हवा में होकर उन्मुक्त
साँस लेने को भी तरस जाएँगे।
बाज़ारों में सूनापन पसरा
और त्यौहारों में धूम नहीं,
स्वजनों बिन कैसे खुशी मनाएँगे...।
कैसी ये महामारी फैली..
स्कूलों की हो गई छुट्टी,अब
बच्चे सब कैसे पढ़ पाएँगे।
ये वक़्त की हुंकार है--
मौत का सौदा करने आया है कोरोना!
सो जरूरी है हमारा संस्कारों में लौटना,
सादगी और सभ्यता ही हमें बचाएँगे
तभी देश-काल-वातावरण शुद्ध हो पाएँगे!
मास्क और दूरी अपनाकर कोरोना को भगाएँगे।
शीघ्र ही हम सब फिर से हिल-मिल जी पाएँगे।

टिप्पणी: आज प्रगति प्रयोग और आधुनिकता का अतिक्रमण हो रहा है। इसीलिए कोरोना -काल ने मनुष्य को समझा दिया कि इतना तेज न भाग.. चाल कुछ धीमी कर। अब प्रकृति बदला लेगी। क्योंकि मनुष्य ने प्रकृति की स्वाभाविकता नष्ट कर दी है। वापिस अपनी जड़ों को पहचान...उन्हें अपनाने का समय आ गया है, तभी कोरोना से मुक्ति मिलेगी।
 








सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Thursday, October 22, 2020

तकब २ / २०







१. दिए गए चित्र / तस्वीर पर कम से कम १० पंक्तियां व अधिक से अधिक १६ पंक्तियां किसी भी विधा में लिखिये और साथ ही उसका शीर्षक व अंत मे एक टिप्पणी अपने उदृत भावों पर अवश्य लिखिये।
२. चित्र पर रचना नई, मौलिक व अप्रकाशित होनी चाहिए।
३. प्रतियोगिता के वक्त लिखी हुई रचना/पंक्तियों पर पसंद के अलावा कोई टिप्पणी न हो। हां यदि किसी प्रकार का संशय हो तो पूछ सकते है। निवारण होते ही उन टिप्पणियों को हटा दिया जाएगा।
४. आप अपनी रचना किसी अन्य माध्यम में पोस्ट तभी कर सकते हैं जब प्रतियोगिता का परिणाम आ जाये और ब्लॉग में शामिल कर लिया गया हो।
५. प्रतियोगिता हेतु रचना भेजने की अंतिम तिथि २२ अक्तूबर २०२० है।
६. निर्णायक मंडल के सदस्य केवल प्रोत्साहन हेतु अपनी रचनाएं भेज सकते हैं। आग्रह है कि वे समय से पहले भेजे अन्यथा प्रोत्साहन का कोई औचित्य नहीं रह जाता।
धन्यवाद, शुभम !!!!

इस प्रतियोगिता के विजेता है  "सूर्यदीप अंकित त्रिपाठी
हार्दिक शुभकामनायें 

प्रजापति शेष
व्यंजन

कहाँ भटकी है
कहाँ अटकी है
कहाँ लटकी है
किस की लटकन।
कुछ उलझा सा
कुछ सुलझा सा
कुछ अलगा सा
उसका चितवन।
कहीं बिखरा है
कहीं सुथरा है
कहीं निखरा है
मन का उपवन।
कोई पढ़ता है
कोई लिखता है
कोई गुणता है
भाषा का व्यंजन ।

टिप्पणी: कितने भी शब्द हों, चित्र को पूर्ण परिभाषित नहीं कर सकते। वैसे ही श्री (स्त्री) को शब्दों में, काव्य में, साहित्य में लिखना असम्भव है। हर शब्द कभी कम या कभी अधिक भारी पड़ता है, बिना तुला के ही स्पष्टतः। व ये आव्हान, ये ललकार ! एक रेगिस्तानी कैसे दृष्टिगौण कर सकता है? निःस्वाद निरर्थक ही सही व्यंजन परोस दिया है शब्दो का।


Pushpa Mishra Tripathi
ख़ामोशी


कई बार चीखती है खामोशी
ह्रदय में चुभ रहे दर्द के कांटे
सहचर बन जाती दोनों आंखें
नीरसता उर की पीड़ा जानती है ....
सब कुछ होते हुए भी कुछ तो कमी
तभी तो मेरी आंखों में नमी सी है
समाज की क्रूरता को लेकर
उस वक़्त मैंने बहुत कुछ खोया था
नहीं मिला जो खो दिया मन का चैन
कहीं छिपे उस मर्मभेद को
या फिर दब जाती मेरी आवाज़
दुनियादारी के शोर में ,
आपाधापी के होड़ में ;
और खामोश हो जाती है
चीखती , बोलती , रोती खामोशी ।

टिप्पणी : चित्र में स्त्री मन को दर्शाते भाव पर केंद्रित कविता लिखी गई है। जब एक स्त्री सामाजिक रूढ़िवादी परंपरा की जंजीरों को तोड़ आगे बढती है तो चरों ओर से कई हाथ उसे रोकने को तत्पर रहते हैं उस समय वह कितनी वेदनाओं से गुजरती है इसी पर आधारित मन के भाव कविता के रूप में प्रेषित है।
 

विश्वेश्वर प्रसाद सिलस्वाल
अबला

भ्रम था वो,
पूजी जाती नारी जहाँ
देव करते वास वहाँ ।।
भ्रम था वो
उठे हाथ मुझे पूजने को
थे उठे मुझे नोचने को ।।
भ्रम था वो
लक्ष्मी रुपेण मुझे सींचने को
भिंचे हाथ गर्भ निचोड़ने को । ।
भ्रम था वो,
नारी,बाला,भार्या, माला हूँ,
निर्बल, खिलौना अबला हूँ,
हाँ बस अबला हूँ मैं । ।

टिप्पणी: चित्र नारी का अबला रुप प्रदर्शित करता है।जहाँ नारी को पूजा जाता था आज हिंसक अनैतिक प्रवृत्ति ने खिलोना मान नारी के शरीर को गर्भ रुप से ही निचोड़ना प्रारंभ कर दिया है। बस अबला रुप ही चित्र की कहानी दर्शाती है।


Meena
ये हाथ

पुरुषों की रगों में दौड़ती
मर्दानगी की रवानगी
और तेज हो रही है
हिंसात्मक होते हाथों
की लंबाई बढ़-सी रही है
ये हाथ कभी बालों से
चेहरे को नोंचने तक
के लिए तैयार हैं
बच्चे से पिता, पिता से दादा तक
ये हाथ केवल एक मर्द रहा
जिस औरत पर उठा
वह शांत चित्त रही
शांति की तैयारी
स्त्रीत्व में ऐसी भड़की
कि अब अपनी रक्षा की
बारी में है
इसलिए ऊपर से मौन
और भीतर से खुलती जा रही नारी है

टिप्पणी : तस्वीर में जितने हाथ दिखाए गए हैं वे पितृसत्ता का प्रतीक हैं और औरत उस मर्दानगी को झेल रही है। लेकिन अब वो इस पितृसत्ता से लड़ने को भी धीरे धीरे तैयार हो रही है।



सूर्यदीप अंकित त्रिपाठी
लड़की का होना

यही होना था शायद
एक तस्वीर ही बन जाना था तुम्हें,
गुनाह है एक लड़की का होना,
इस अभिशिप्त समाज में,
छोटे से माँस का टुकड़ा हो या लोथड़ा,
गिद्दोँ की नज़र से बच नहीं पाती है,
कभी घूरती नज़रों से तो कभी,
क्रूर पंजों से नोची जाती है,
सिसकती रहती है, किसी अधूरी स्वास की तरह,
भटकती रहती है, किसी अधूरी लाश की तरह,
मर जाये तो, अधूरी रात में,
चुपचाप जला दी जाती है,,
कुछ मोमबत्तियाँ उस तस्वीर के इर्द-गिर्द जलाई जाती हैं,
कुछ चेहरों पर लगी कालिख,मखमली कपड़ों से पोछी जाती है,
खबरों मेरे ये खबर जोरों से, कुछ दिनों तक चलाई जाती है,
फिर वो लड़की किसी ख्वाब की तरह भुला दी जाती है।।

टिप्पणी: स्त्री शब्द मात्र डेढ़ शब्दों से मिलकर बना है, पर इस शब्द की गरिमा अनंत है, और स्त्री स्वयं एक पूर्ण वेद है। जो स्थान उसका होना चाहिए, उसे मिल नहीं पा रहा,आज की सामाजिक स्थिति स्त्री के लिए बहुत ही निराशाजनक हो गई है, वह सुरक्षित है जब तक वो चुप है, चाहे उसे उस चुप्पी के लिए कितनी ही बड़ी कीमत क्यों न हो चुकानी पड़ रही हो। शोषण है, अनाचार है, अत्याचार है, व्याभिचार है, और वो लाचार है। अगर वो हिम्मत करके आवाज़ देना भी चाहे तो रसूखदार क्रुर पंजे उसका मुँह दबोच देते हैं उसकी आँखरी साँस निकलने तक।


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
मर्द नहीं नामर्द हो ......
(प्रोत्साहन हेतु )

नारी के अस्तित्व पर
तुम्हारी आपराधिक मानसिकता
नपुसंकता का द्दोतक है
हाड़ मांस पर तुम्हारी
वासना से भरपूर नज़र
नीचता का परिचायक है
संस्कारहीन पालन पोषण
दुष्कर्म कुकृत्य की बन पहचान
पुरुष शब्द पर धब्बा हो
उम्र तुम्हारी सीमा नहीं
हर उम्र के लिए नरभक्षी हो
तुम पुरुष नहीं दानव हो
पाप का घड़ा भर गया
तुम्हें जलना मरना होगा क्योंकि
तुम मर्द नहीं नामर्द हो

टिप्पणी: इन भीभत्स घटनाओं से मन खिन्न है। बहुत बार लिखा भी। अंगुली उठा उठा, मोमबत्ती जला कर थक गए। अब इन राक्षसों को जलना /मरना होगा – अंत करना होगा।




डॉली अग्रवाल
फितरत

कल कुछ ख्वाहिशों की मौत हुई थी
देर तलक दिल मातम बनाता रहा
ऐतबार मुँह ढांप कर कांधा देने पहुँचा ही था
कि --
फितरत ने ऐतबार को पहचान लिया
इससे पहले हसरतें उठती ओर कुछ कहती
फितरत ने ऐतबार को अलग कर दिया
ये देख
एहसासों ने सब्र को साथ ले खुद को कमरे में बन्द कर लिया ...
उफ़्फ़फ़फ़ क्या गजब हुआ
ख्वाहिशों की मैय्यत पर ऐतबार जार जार हुआ

टिप्पणी: हद से ज्यादा ख्वाहिश और किसी पर ऐतबार हमेशा तकलीफ देता है !



यशोदा दिग्विजय अग्रवाल
नारी की आकांक्षा
........
एक स्त्री के लिए
प्रेम से बढ़कर भी
कुछ हो सकता है,
तो वो है सम्मान
या रिस्पेक्ट..।
क्षणिक हो सकता है
प्रेम ..पर
सम्मान नहीं होता
क्षणिक..वो क्यों
दिखावटी हो सकता है
प्रेम....पर
सम्मान नहीं
एक दिलचस्प बात
कि ईश्वर ने स्त्री को
ऐसी शक्ति दी है
जिससे वह
पढ़ सकती है
किसी भी पुरुष के भावों को
और पुरुष द्वारा
दिया गया
सम्मान भाव को
स्थापित कर लेती है
अपने मन में वह स्त्री
शायद इसी लिए
स्त्री से दिखावा करना
संभव नहीं..।

टिप्पणी..नारी की अभिलाषा और कार्य क्षमता का विश्लेषण..रचना मन में स्वतः विस्फोटित हुई




ब्रह्माणी वीणा हिन्दी साहित्यकार
नारी-अस्मिता पर प्रहार 
दोहा छंद में चित्र अभिव्यक्ति ,,,,
*******************************


पुरुष नहीं,कापुरुष हैं,,जो करते व्यभिचार!
कामुकता की हबस में,करते बलात्कार!!
*
माता- देंह को ध्वस्त कर,कहाँ रहे तुम मर्द ?
जन्मे जिनके गर्भ से,,,,,,,,,उसको देते दर्द!
*
नारी ,जननी बेटियां,,,,,,दुर्गा का अवतार!
दानवता के वेश में,,,,,,करते नर व्यभिचार!
*
कहीं बेटियाँ लुट रहीं,गली- गली मे आज!
द्रुपद-सुता की लाज पर,है घृतराष्ट-समाज!!
*
धर्म,संस्कृति हिंद की,धुमिल हो रही नाथ !
कब आवोगे कृष्ण हरि,नारी बनी अनाथ !!
*
नर की जननी है सदा,शक्ति रूप साकार !
कब समझोगे कापुरुष,,,,,पुत्री बनती नार!
*
नर से उत्तम नारि है,,,,,करे सृष्टि विस्तार!
ईश की भी पूज्यनीय,,,,,प्रभुता अपरंपार!!

टिप्पणी: आजकल नारी-अस्मिता से खेल रहे बलात्कारी पर मेरी कविता है ,,साथ नारी -महिमा का वर्णन भी ,,नारी को भोग्या न समझकर शक्ति का स्वरूप समझना चाहिए,,,क्योकि कापुरुषों के भी पुत्री व बहन के साथ भी ऐसा हो सकता है,,



किरण श्रीवास्तव
नारी

यूं तो
सब ये कहते हैं -
नर से नारी भारी है,
पर हर युग में यह अबला
रही सदा बेचारी है....!
चहुओर बैठे दु:शासन-
ताक लगाए मौके की,
चीर हरण होने से रोके
अब ना कोई गिरधारी है...!!
ईश्वर से होती है तुलना -
ममता इसकी अपरंपार,
पर कोख में नहीं सुरक्षित
ऐसी ये अवतारी है...!!!
पुरुषों सेअब नहीं ये पीछे-
हर क्षेत्र में परचम लहराए ,
पर कोमल फूलों सी काया
टूटे तो मुरझाती है....!!!!
हे! अधम पुरुष यह सोच जरा -
मानवता को क्यों रखें ताक,
मां बेटी और बहन तुम्हारी
वह भी तो एक नारी है ....!!!!!

टिप्पणी: आए दिन दिल दहलाने वाली घटनाओं से महिलाओं में असुरक्षा की भावना बलवती हो रही है!कुपुरुषों की मानसिक विकारता सोचनीय है!





नैनी ग्रोवर
रस्ता बना ही लूँगी

जिस और चल पड़ूँगी, रस्ता बना ही लूँगी,
तिनकों से ही सही पर, घरोंदा सजा ही लूँगी...
तन से कमज़ोर सही मैं, मन से कभी ना हारी,
हौंसलों से अपने, अपनी किस्मत बना ही लूँगी...
छाँव हूँ मैं ममता की, ओढ़नी हूँ लाज की,
रह कर मर्यादा में भी मैं, तूफ़ानों को हरा ही लूँगी...
ना चाँद की चाहत है, ना सितारों को छूना है,
धरती की पुरवाई को मगर, साँसों में समा ही लूँगी...!

टिप्पणी: एक औरत के दिल में बसने वाले भाव, जिन्हें वो पूर्ण करना चाहती है..!


Ajai Agarwal
षड्यंत्र -
(प्रोत्साहन के लिए )
...........
स्त्री को वस्तु ,
बनाता बाजार ;
दीखता है तुम्हें !
ये षड्यंत्र ?
शरीर से परे -
स्त्री मन का भूगोल
पढ़ने की सामर्थ्य हो
तो भी -
चाहत नहीं ;
स्त्री को उठना होगा
स्त्री के लिए
पर नहीं
वो स्त्री विमर्श के
लोभ में फंस गयी ;
स्त्री वहीं की वहीं
रह गयी ;
अपने उबलते इतिहास को
भाप बना देखती !

टिप्पणी: कलम उठती नहीं अब स्त्री विमर्श पे ,अब घर-घर संघर्ष करना होगा ,नारी के पुरुषत्व को बचपन से ही जगाना होगा और करना पड़ेगा लड़कों के भीतर की स्त्री को जागृत --हर बच्चा अर्धनारीश्वर का स्वरूप हो --माँ तुझपे आ पड़ा है सारा बोझ समाज को दिशा देने का।



Mita Chakraborty
दामिनी


पापा की परी तो , हो ही लड़कियों
अब तुम्हे झांसी की रानी भी है बनना
नापाक इरादों से बढ़ते हाथों को
मिला दे खाक मे वो दामिनी भी है बनना ।
फूलों सा सुकोमल हो दिल भले ही
चट्टान सा बुलंद , पर हौसला रखना
छू न पाए आंखों से भी कोई जिस्म को तुम्हारे
अपनी आँखों मे वो अंगार ,वो शोला रखना ।
मलाल न करना कभी, खुद पर अभीमान करना
अपने हाथों मे ही अपनी इज्ज़त अपना स्वाभिमान रखना
मासुमियत का तुम्हारे कर न सके कोई सौदा यहां
इन्सान की शक्ल मे उन गीद्धों की भी पहचान रखना ।

टिप्पणी: समाज मे आजकल बहु बेटियों के साथ जो दुरव्यवहार हो रहा है, उससे उन्हें कोई और नही लड़कियां खुद ही खुद को बचा सकती हैं ।बस अंदर से कोमल होने के बावजूद उन्हें खुद को सशक्त करना है । सिर्फ आर्थिक ही नही शारीरीक और मानसिक तौर पर भी उन्हें स्वालंबी बनना है।


Snehprabha Khare
*नारी-मंथन*
**********
सूख गये भाव सब,मथता रहा भाल है।
चहूँ ओर घूम रहे, भेड़ियों की चाल है।
सपने बिखर गये ,दुनिया उजड़ गयी,
तार तार जिंदगी का, बड़ा बुरा हाल है।।
कहतें है लोग मुझे, पूजिता सुपावन है।
ऋषियों के तप की ये, नारी लुभावन है।
घर को बनाती है तू , देती संस्कार सभी,
दुनिया की प्यारी सी, अनोखी मुस्कान है।।
हँसती हूँ खेलती हूँ , प्यार में ही पलती हूँ।
दिन रात डर डर , सपने सजाती हूँ।
गली गली घूमते हैं, मानसिक ये रोगी से,
स्वपन को मिटाते हैं , रो कर बनाती हूँ।।
शरणागत हूँ सांवरे , करदो नैय्या पार।
नही सुरक्षित बालिका, विवश हुई सरकार।
कहीं सियासत में फसी नारी की ये जात ,
कहीं जला कर मारते , दुखिया अबला नार।।

टिप्पणी: आजकल नारी पर आए दिन होने वाले बलात्कार पर मेरी कविता है सबला,दुर्गा,जगतजननी,नाम जैसे दिखावा है गली गली लड़की होने का दुःख झेल रही है यही नारी विमर्श का मंथन है
******************************************


मीनाक्षी कपूर मीनू
पाक चेहरा
###############
बिखरी हुई लटों में
सिमटा हुआ सा चेहरा
उलझी हुई जिंदगी को
सुलझाता हुआ ये चेहरा
प्रत्याशा में रहता खुशी की..
एक मासूम चेहरा
अनगिनत गलतियों को
भुलाता हुआ ये चेहरा
सबको खुशियाँ दे कर
दर्द छुपाता हुआ ये चेहरा
चारों तरफ से उठते हुए
हाथों को ......
नकारता हुआ चेहरा
रीति रिवाजों की आड़ में
घूंघट में ढका ये चेहरा
आह .. फिर अपनो/बेगानो
के हाथ ही घूंघट में ही
तार-तार हुआ चेहरा
पलटवार आवश्यक है
अब समझता हुआ चेहरा
धीरे धीरे खुद को
समझाता हुआ ये चेहरा
अभी हिम्मत कम सही
मनस्वी .....
एक दिन ऐसा भी आएगा
जब पलट हाथ घुमा
खुद को भी बचाएगा
ये चेहरा....
सबके साथ ही
अपनी उलझन को भी
सुलझाएगा ये चेहरा
देखना एक दिन
ऐसा भी आएगा मनस्वी
जब सच मे दिल से
मुस्कुराएगा ये चेहरा
मनस्वी ....बहुत ही प्यारा है
मासूम पावन ये चेहरा......

टिप्पणी:  मासूम नारी मन सबकी उलझन सुलझाता है , खुद उदास रह कर सबको हंसाता है मगर खुद प्रतिदिन अनगिनत हाथों के अदृश्य प्रहार अपने तनमन पर सहन करता है मगर वह दिन दूर नहीं, जब नारी मन कठोरता का आवरण ले सबको पलट कर जबाब देगा , और मन से मुस्कुराएगा उसका पाक दामन लहलहायेगा ।



प्रभा मित्तल
नारी की व्यथा-कथा

घर बाहर के अंकुश लगते,
भोला बचपन बीत रहा था।
स्त्री होकर जन्म लिया है,
इसका बिल्कुल भान न था।
आस-विश्वास के रंगों से
जीवन का कैनवस भरती थी।
दहलीज लाँघते सपने थे,
पर बाहर की आँखें चुभती थीं।
देवी की मूरत कहकर श्रद्धा से,
जो पूजा घर में बैठाते हैं।
गर कन्या जन्मे घर में तो
वही जन मातम पसराते हैं।
'बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ'
ये तो केवल कोरे नारे हैं।
वंश-वाहक बेटे की चाहत ने
कितने ही कन्या-भ्रूण मारे हैं।
शिक्षा-सम्मान की खोखल में
अपराध दिनों-दिन बढ़ रहे।
दहेज़ की आग कम न हुई,
स्त्री पर सब ताने कस रहे।
भरी सभा में अपमानित कर
द्रौपदी के वस्त्र खींचे गए।
सीता सी पावन सन्नारी पर
धोबी से आरोप मढ़े गए ।
इस पुरुष प्रधान समाज में
नारी पर सदैव हुआ अनाचार।
वही कापुरुष आज भी उसकी
अस्मिता पर कर रहा है प्रहार।
अश्लीलता,छेड़-छाड़ ,उत्पीड़न
नारी केवल बनी भोग-व्यापार।
फाँसी भी रोक न पाई इसे,हो रहा
ज़ुल्म,गैंग-रेप और बलात्कार।
इन वहशी दरिंदों की नज़र में--
नारी केवल देह है, प्राण नहीं।
जबरन पकड़कर भोग लिया,
क्षत-विक्षत किया,फेंक दिया।
मर्मान्तक पीड़ा झेली औरत ने
सबकी कड़वाहट का वार सहा।
बदनामी के दाग लगे माथे पर,
मर्द फिर भी बेख़ौफ़ बेदाग रहा।
सुनते आए हैं--
"नारी को पूजा जाता है जहाँ
देवता बसते हैं वहाँ",पर जब
स्त्री का आँचल होता तार-तार
वही देव तब चले जाते हैं कहाँ ?
शक्ति की पूजा वाले इस देश में
बच्चियों पर हो रहे अत्याचार।
समाज के इस घिनौने कुकृत्य ने
कर दिया पूरी मानवता को शर्मसार।
अरे अभागे,
देह की ताकत से जिसको
तुमने बार-बार कुचला है,
वो नारी भी कमज़ोर नहीं
अबला नहीं वो सबला है।
ममता का मंदिर है नारी।
भोग्या नहीं,वो भक्ति है।
परिवार की धुरी वही है
बोझ नहीं वह शक्ति है।
टिप्पणी: आज हमारे समाज में जब स्त्री पढ़-लिखकर,ऊँचे से ऊँचे पदों पर कार्यरत है..तो भी अपने को सुरक्षित नहीं पाती है।इ स तथाकथित पुरुष की दरिंदगी ने नन्हीं-नन्हीं बच्चियों को भी नहीं बख़्शा है।फाँसी का डर भी नहीं है इसे।समाज में गंदगी बढ़ती जा रही है। पुरुष की ऐसी कुत्सित मानसिकता कहाँ जाकर थमेगी....कुछ समझ में नहीं आता।
सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Tuesday, May 26, 2020

तकब ०१/२०




१. दिए गए चित्र / तस्वीर पर कम से कम १० पंक्तियां व अधिक से अधिक १६ पंक्तियां किसी भी विधा में लिखिये और साथ ही उसका शीर्षक व अंत मे एक टिप्पणी अपने उदृत भावों पर अवश्य लिखिये।
२. रचना मौलिक व अप्रकाशित होनी चाहिए।
३. प्रतियोगिता के वक्त लिखी हुई रचना/पंक्तियों पर कोई टिप्पणी न हो। हां यदि किसी प्रकार का संशय हो तो पूछ सकते है। निवारण होते ही उन टिप्पणियों को हटा दिया जाएगा।
४. आप अपनी रचना किसी अन्य माध्यम में पोस्ट तभी कर सकते हैं जब प्रतियोगिता का परिणाम आ जाये और ब्लॉग में शामिल कर लिया गया हो।
५. प्रतियोगिता हेतु रचना भेजने की अंतिम तिथि ९ मई २०२० है।
६. निर्णायक मंडल के सदस्य केवल प्रोत्साहन हेतु अपनी रचनाएं भेज सकते है। परन्तु आग्रह है कि वे समय से पहले भेजे अन्यथा प्रोत्साहन का कोई औचित्य नहीं रह जाता।
धन्यवाद, शुभम !!!!

.
इस प्रतियोगिता के विजेता हैं  श्री गोपेश दशोरा 

संजीव वर्मा 'सलिल'
(कोई शीर्षक नहीं) 
जिंदगी को जिंदगी के नामकर
श्वास को मधु आस का पैगाम कर
भाग्य देवी अब नहीं दक्षिण रहे
द्वैत तजने मिल उसे अब वाम कर
भाग्य को मत वाम रख, हो दक्ष वह
मिला पग से पग चलें कर थामकर
नाम उसका जोड़ अपने साथ तू
नाम अपना विहँस उसका नाम कर
सुबह सूरज की तरह जो साथ हो
साथ उसके खुशनुमा हर शाम कर
संग उसके हार में भी जीत है
पहन ले भुजहार गाल ललाम कर
अन्य कोई दे नहीं पाए कभी
प्रीत अपनी सलिल तू बेदाम कर
(कोई टिप्पणी नहीं)


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
प्रोत्साहन हेतु
~ साथ तेरा ~
क्षितिज पर
हस्ताक्षर करती
सुबह की किरणे
गवाही दे रही है
तेरे मेरे साथ होने का
खामोश सागर में
लहरे कैद हुई है
देख समर्पण
आगोश में डूबकर
है भाव शून्यता का
रोमांच स्फ्रुटित
लेकिन तटस्थ ख्याल
कामनाओं का
हो रहा शृंगार
हो रहा भान आतिथ्य का
निहारते हुए
एक दूजे का बन संबल
मन के प्रांगण का
फिर समन्दर हो जाना
है ये पल विलय होने का

टिप्पणी : कभी यूं बैठकर साथी के साथ ख़ामोशी से सब कुछ कह जाने का उदृत भाव तस्वीर को देखते ही उभर आया ....
 
प्रजापति शेष
संग संग

देखा जो अकस्मात,
विस्मृत संध्या प्रातः।
यह पकृति अनवरत,
भ्रमित विगत आगत।
अनंत वीथियाँ,एक वातायन
एक भटकन, उभरा द्वेपायन।
हे! कृष्ण नीलाभ, पीताम्बर
कुसुमित,सुरभित, दिगम्बर।
नर, पशु, पतंग,खग, विहग,
कौन शेष ? बिम्ब से विलग।

टिप्पणी: निशब्द संक्रमण काल मे, एक प्रयास किया है बिना क्रियाओं के शब्द विन्यास का। एक मात्र सम्बोधन उस कृष्ण वर्ण के लिए प्रयुक्त हुआ है जिसमे समस्त वर्ण,रंग,शब्द, क्रिया, काल को समाहित हो जाना है। )


ब्रह्माणी वीणा हिन्दी साहित्यकार
एक गीत से चित्राभिव्यक्ति (14 मात्रा हर पँक्ति में)
"साँची प्रीत"

तुम हमारे मीत,,, साथी
जिंदगी इक गीत साथी!
सूर्य सा जीवन उगालें
जिंदगी स्वर्णिम बनालें
स्वप्न-किरनें कामना सी,
प्रेम से जीवन सजालें!
हर कदम पे जीत जाती !
तुम हमारे मीत,,,, साथी!
कुछ पलों में भूल जाएँ !
हर दुखद सी विषमताएँ
सुखद पल को हम चुरालें
मन-कमल को यूँ खिलाएं!
गर मिलेगी प्रीत साँची
तुम हमारे मीत ,,साथी !
********************

टिप्पणी: मेरा भाव दो प्रेमी युगल की स्वप्निल भावनाओं को लेकर है,,,कुछ सुखद पल चिंता मुक्त सिर्फ दोनों के बीच सूर्य की आभा के समान हृदय मे प्रेम उदीप्त हैं,,,,उसी मनोभावों को गीत मे ढालने का प्रयास किया है धन्यवाद



नैनी ग्रोवर
तुम जो साथ हो

ढलती शाम रात में बदल जाएगी,
फिर इक नई नवेली सुबह आएगी...
छंट जाएंगे ये अंधियारे मेरे साथी,
फिर से हर साँस गुनगुनायेगी...
उदास हो गई है मेरे दिल की धड़कन,
तुम जो साथ हो तो,
ये फिर मुस्कुराएगी..
आओ बदलें हम, जीवन जीने का ढंग,
खुश होकर सृष्टि फिर से, प्रेम लुटायेगी..!

टिप्पणी: मेरा मानना है के अगर मानव जाति ने अपने जीने का ढंग अब भी ठीक नहीं किया तो ये नज़ारे भी हमसे सृष्टि छीन लेगी, हमें अब सम्भल जाना चाहिए और सृष्टि से खिलवाड़ बन्द कर देना चाहिए ।


Ajai Agarwal
तू मुझ में प्रिय फिर अंतर् क्या "
प्रोत्साहन के लिए ---
======================
साथ नहीं वो दे पाए ,कब सूना पन्थ हुआ उनसे ,
अनुगूँज मधुर वाणी की प्रति - पल रहती है उनकी, संग मेरे।
साँसों पे अवलम्बित काया थी, जो ,थक कर चूर हुई तो क्या ?
ये पन्थ अनोखा जीवन का ,मंजिल कहीं नहीं इसकी।
मैं भी न चलूं ,तू भी न चले ,राही मर्त्य पर राह अमर ,
इस पर वो ही चल सकता है ,जो चलने में स्वाद ढूंढता है।
रवि अपनी सिंदूरी आभा संग ,क्षितिज में लोप हुआ तो क्या ?
मुझ को दे चंदा का लिबास ,आँचल में तारे टांक गया।
तुझसे मिलने की चाहत में खाली होना साँसों के घट का ,
रंग -रूप का गर्व मिटा, क्षर काया संग -बेसुध होना पड़ता है।
जात पंथ के निर्मम बंधन ,सुंदर काया संग आड़ोलन ,
सब बिसरा जो चला गया ,वो अब मेरे मन में रहता है।
रवि की प्रखर किरणों में तू ,चंदा की शीतलता तुझसे
मलयसमीर सुगंधित है और सुमनों ने रंग लिया तुझसे।
बादल का सब आवारापन तूने मुझको ही सौंप दिया ,
बिजुरी सी साध मिलन की वो झुलसा कर उज्ज्वल कर देगी।
तू मुझ में प्रिय मैं तुझ में फिर ,काया साँसों का बंधन क्या ?
प्राची की नारंगी आभा या क्षितिजों का नीलम क्या ?

टिप्पणी: मैंने इस चित्र को देख यादों में कविता लिखी --जब हम साथ थे /



Madan Mohan Thapliyal
( प्रोत्साहन हेतु )
दु:सुप्त ( बुरा सपना )
********
हे दिवस्पति , ए, दिवास्वप्न है,
है दिवालोक या दस्यु लोक कोई ।
सोते हुए भी जागता मनुज आज,
है त्रस्त ,न उदय का, न अस्त का भान कोई ।
दु:सुप्त सम, दिष्टांत का तांडव चहुं ओर,
अहम् है निरर्थक , द्यूतक्रिड़ा में दीर्ण हर कोई ।
याचक हैं सब , मिट गया दंभ सारा,
किंकर्तव्यविमूढ़ मानव, न राजा रहा , न रंक कोई।
है विह्वल दृढ़प्रतिज्ञ भी, क्षीण सारा आमोद- प्रमोद,
पृष्ठ भाग में घना अंधेरा, नहीं दीखता आलोक कोई ।
दरपन में भी धूमिल छवि, दग्धा पर टिकी दृष्टि,
मृत्युंजय मंत्र का जाप करता आज हर कोई ।
दीर्घारण्य सा भविष्य आज, दत्तवर की है चाह,
न धर्म, न आस्था , जीवन -मरण का ज्ञान देता हर कोई ।

टिप्पणी: आज सारा विश्व जिस दौर से गुजर रहा है , वहां सब ठहर सा गया है। हर कोई चिंतित है, व्यथित है , समाधान दूर तक दिखाई नहीं देता।
 


जशोदा कोटनाला बुड़ाकोटी
परिवर्तन सुनियोजित है

जब रचा जा रहा था संसार तो
परिवर्तन के नियमों को
निरन्तर रच रहा था विधाता.....
जो परिवर्तित न हो सका
वो 'इतिहास' है.....
हाँ इतिहास .....
जो घट गया वो इतिहास बना
जो रच गया वो इतिहास है.....
न कोई इसे पहले बदल सका
न कोई आज बदल पायेगा.....
वैसे ही जैसे 'प्रेम'
जो पहले भी था
जो आज भी है.....
न प्रेम की प्रकृति बदली है
और न ही प्रवृत्ति.....
क्योंकि इस नश्वर संसार में
प्रेम ही शाश्वत है.....
ये वो इतिहास है
जो बार-बार रचकर इतिहास बनेगा
जो बार-बार होकर इतिहास रचेगा...।

टिप्पणी: प्रेम जीवन में उतना ही जरूरी है जितना साँस लेना मगर दुर्भाग्य से ये विकृत रूप में चाहा गया ! आज प्रकृति भी तो सिर्फ प्रेम ही चाहती है !


माधुरी रावत
तेरे संग


ये समंदर का किनारा
ये जादू भरी शाम
हाथों में तेरा हाथ है
होठों पे तेरा नाम
ये बोलती सी ख़ामोशी
जैसे छा रही मदहोशी
ऐसे में तेरी सरगोशी
आँखों से छलकते जाम
ये प्रकृति का मधुर संगीत
आ मिलकर सुनें मनमीत
हृदय से हृदय तक का गीत
गाएं मिल जीवन तमाम
तेरा साथ जो मिला है
दिल फूल सा खिला है
यही प्यार का सिला है
चाहे जो भी हो अंजाम

टिपण्णी: प्यार जीवन का सबसे उद्दात भाव है। जीवन में प्यार हो और उसका साथ हो तो उससे बेहतर कुछ नहीं।
 

उषा रतूड़ी शर्मा
गुफ्तगूं

स्याह रात की रोशनी में इक सपना पाला,
दूर छितिज में एक तारा तिमतिमाया
छुपकर बादलों में कोई मुस्कुराया
हाथ मे जब हाथ तेरा आया
सजन तन मन मे हर्ष का समंदर लहराया।
लब खनोश रहे, अहसासों ने दिल का राग गया
तुम मिले, हम मिले, कुछ यूँ दिल मिले
जब शाम का धुदलका गहराया
गुफ्तगूं होने लगी दिल ही दिल मे
जब प्रेम का ऐसा मौसम आया।
टिप्पणी ; हर वो पल जिसमे प्रेम हो उन्हें अपने दामन में समेत लेना चाहिए। उषा



गोपेश दशोरा
अस्तोदय

दूर क्षितिज पर सूरज ने,
एक बात हमें है समझाई,
विपदाओं से लड़कर ही तो,
एक नई सुबह फिर है आई।
ये अस्त हो रहा यहां अभी,
पर कहीं सुबह की लाली है,
उम्मीद का दामन ना छोडो,
बस रात ही है, ढल जानी है।
बरसों पहले भी इसी जगह,
कुछ प्रेम के धागे बांधे थे।
साथ तेरा पाकर ही तो,
सुख दूने, गम आधे थे।
आज फिर एक वादा है तुमसे
ये साथ रहे यूं ही कायम,
सुख हो दुःख हम डिगे नहीं
यह प्रेम रहे यूं ही कायम।

टिप्पणीः हमारे लिये जो सूर्य अस्त हो रहा है, दूनिया के किसी कौने वहीं उदय भी हो रहा है। मैने इसी बात को रिश्तो से जोड़ा है। थोड़ी की परेशानी आने पर आजकल लौग एक दूसरे का साथ छोड़ देते है वो ये भूल जाते है कि समस्या एक रात की तरह होती है, कितनी ही बड़ी क्यूं ना हो उसका अन्त निश्चित होता है, और किसी का साथ अगर हो तो वो समस्या से भरा समय भी आनन्द के साथ गुजर जाता है।


कुसुम शर्मा
कुछ अनकही बातें कह दूँ 

दो घड़ी साथ बैठो तो कुछ बातें कर लूँ!
कुछ तुम्हारी सुनूँ कुछ अपनी कह दूँ !
बहुत सी बातें जो अनकही रही
चलो मिल कर आज तुम से कह दूँ !
जो बिताये थे लम्हे एक दूसरे के साथ
चलो मिल कर उन्हीं लम्हों को ताज़ा कर दूँ !
माना तेरे मेरे बीच आने लगी हैं दूरियाँ
क्यों न उन्हीं दूरियों को नज़दीकियाँ कर लूँ !
चलो दो घड़ी साथ बैठो तो कुछ बातें कर लूँ!
बहुत हो गई अब शिकायतें
चलो बैठ कर कुछ
प्यार भरी बातें कर ले !
कुछ हुई भूल तुमसे कुछ हुई हमसे
चलो उन्हें भुलाकर
अपना ये रिश्ता ओर पक्का कर ले !
दो घड़ी साथ बैठो तो कुछ बातें कर लूँ!
कुछ तुम्हारी सुनूँ कुछ अपनी कह दूँ !
बहुत सी बातें जो अनकही रही
चलो मिल कर आज तुम से कह दूँ !

टिप्पणी: जब दो लोगों के बीच में दूरियाँ बढ़ने लगे तो उन्हें आपस में बैठ कर सुलझानी चाहिए मन से रखी बातें से उलझने बढ़ती रही है एक दूसरे को कह कर ग़लतफ़हमी दूर हो जाती है !


डॉली अग्रवाल
मैं

हा मैं ही तो थी
जो छू कर देखना चाहती थी
बहुत करीब से
इश्क को ....
उन निगोड़े से एहसासों को
जो काला जादू करती थी
उतर जाना चाहती थी उस
अंधे कुँए में --
जिसका कोई ओर ना कोई छोर
चंद डुबकी
ओर बस वजूद खत्म
बस फिर एक अंतहीन यात्रा
इस जहाँ से उस जहाँ तक
ना कोई पड़ाव
ना कोई रास्ता
बस
अंतहीन यात्रा !! 

टिप्पणी -- प्रेम , ही तो है वो प्रथम स्पर्श जिसका एहसास मात्र अंतर्मन को झकझोर देता है ओर डूब जाता है हमेशा के लिए किसी में विलीन होने के लिए !

किरण श्रीवास्तव
"सूरज"

सूरज सा हो चमक तुम्हारा,
सागर सी गहराई हो,
आसमां सा हो विस्तार,
वेग पवन पुरवाई हो!
पुनः पुनः मै आता हूँ,
संदेश यही दे जाता हूँ,
नहीं कुछ भी स्थायी है,
कड़वा यही सच्चाई है!!
फिर दुख से क्या घबराना है,
जीवन क्यों व्यर्थ गंवाना है,
सत्कर्म करता ही जा,
डग आगे भरता ही जा!!!
करलो आज प्रतिज्ञा तुम,
कर्म तुम्हारा हो बेमिसाल,
प्रकृति का रखो अब ख्याल ,
धरती होगी तभी निहाल!!!!

टिप्पणी: रात्रि के घोर अंधियारे के बाद सूर्य उदित होता है और अपनें रोशनी से जग को रौशन करता है हमें भी इसी सकारात्मकता को अपनाना चाहिए!
 
प्रभा मित्तल
हम भी सुबह का सूर्य उगा लें !

दूर क्षितिज के पार
रोशनी को साथ ले
बादलों की ओट से
सूरज चमक रहा है।
नीड़ से अपने निकलकर
उग रही है भोर उजली
शांत निश्चल जलधि तीरे
कोहरा घना अब छँट रहा है।
किरणों ने दस्तक दी भली सी
बीत गई है शाम, बावरे !
रात भी अब ढल चुकी है
हम यहाँ सागर किनारे
बैठे विगत को क्यों पुकारें !
चलो ! सुबह का सूर्य उगा लें!
गुज़र गए जो पल अकेले
सो गए थे स्वप्न सजीले
बुझ न जाए दीप मन का,
साथ मिल उनको जगा लें।
चलो! हम सुबह का सूर्य उगा लें!
टूट रही वीणा के तारों को
नेह सधे सुर से सँभालें
साज को नई आवाज़ देकर
प्रीत का एक राग गा लें।
चलो! हम भी सुबह का सूर्य उगा लें!
समय चक्र है घूम रहा है
ये मौसम भी लेगा करवट
मन में आशाओं के दीप जलाकर
भावों में भर धीरज का मकरंद
जीवन को मीठा छंद बना लें।
चलो! हम भी सुबह का सूर्य उगा लें !

टिप्पणी: कुछ मन की कुछ जग की....समय कभी एक सा नहीं रहता है...धीरज और उम्मीदों का दामन नहीं छोड़ना चाहिए।


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