Friday, December 30, 2016

#तकब१५ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता # 15 ]


#तकब१५ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता # 15 ]
१. इस बार दिए गए चित्रों में सन्देश स्पष्ट है. देखते है मित्र सदस्य किस तरह भावों को जोड़ पाते है. चित्रों में सामंजस्य के साथ कम से कम १० पंक्तियों की काव्य रचना शीर्षक सहित होनी अनिवार्य है [ हर प्रतियोगी को एक ही रचना लिखने की अनुमति है]. 
- यह हिन्दी को समर्पित मंच है तो हिन्दी के शब्दों का ही प्रयोग करिए जहाँ तक संभव हो. चयन में इसे महत्व दिया जाएगा.
[एक निवेदन- टाइपिंग के कारण शब्द गलत न पोस्ट हों यह ध्यान रखिये. अपनी रचना को पोस्ट करने से पहले एक दो बार अवश्य पढ़े]
२. रचना के अंत में कम से कम दो पंक्तियाँ लिखनी है जिसमे आपने रचना में उदृत भाव के विषय में सोच को स्थान देना है.
३. प्रतियोगिता में आपके भाव अपने और नए होने चाहिए.
४. प्रतियोगिता १९ दिसम्बर २०१६ की रात्रि को समाप्त होगी.
५. अन्य रचनाओं को पसंद कीजिये, कोई अन्य बात न लिखी जाए, हाँ कोई शंका/प्रश्न हो तो लिखिए जिसे समाधान होते ही हटा लीजियेगा. साथ ही कोई भी ऐसी बात न लिखे जिससे निर्णय प्रभावित हो.
६. आपकी रचित रचना को कहीं सांझा न कीजिये जब तक प्रतियोगिता समाप्त न हो या उसकी विद्धिवत घोषणा न हो तथा ब्लॉग में प्रकशित न हो.
विशेष : यह समूह सभी सदस्य हेतू है और जो निर्णायक दल के सदस्य है वे भी इस प्रतियोगिता में शामिल है हाँ वे अपनी रचना को नही चुन सकते लेकिन अन्य सदस्य चुन सकते है. सभी का चयन गोपनीय ही होगा जब तक एडमिन विजेता की घोषणा न कर ले.
निर्णायक मंडल के लिए :
1. अब एडमिन प्रतियोगिता से बाहर है, वे रचनाये लिख सकते है. लेकिन उन्हें चयन हेतु न शामिल किया जाए.
2. कृपया अशुद्धियों को नज़र अंदाज न किया जाए।
धन्यवाद !
इस प्रतियोगिता की विजेता रही सुश्री आभा अग्रवाल जी - बधाई - शुभकामनाएं 


किरण श्रीवास्तव
(नव-वर्ष)
--------------------------

अंग्रेजी का वर्ष नया,
अब तो आने वाला है!
मास दिसम्बर कमर झुका कर,
अब तो जाने वाला है|
जन-जन में उत्साह जगा,
पर ठंड से दुबका जाता है!
सूरज की गर्मी का भी
नहीं पता चल पाता है,
डाली-डाली पत्ते-पत्ते
ठंड से सिकुड़े जातें हैं,
नये साल के जोश में इनको
ठंडक नहीं सुहाती है|
होश गंवाने को फिर इंसा,
मद्यपान अपनातें हैं
झूमते-गिरते आपा खोते
न्यू ईयर मनाते हैं..।

चैत्र शुक्ल-पक्ष प्रतिप्रदा -
हिन्दी नव-वर्ष होता है,
पूजा-पाठ कलश-स्थापन
और जागरण चलता है।
नव-वर्ष हिन्दी की अपने,
होती बात निराली है!
प्रकृति भी स्वागत करतीहै,
चहुंओर रहे हरियाली है!
फूल-फूल और कली-कली,
मानो हंसती-गाती है!
छेड़ तराने कोयल भी,
अपने गीत सुनाती है!
नये-नये पत्ते पेड़ों पर,
खड़े हैं सज-धज कर ऐसे,
महमानों के आने पर
कपड़े बदलें हो जैसे...|

हिन्दी हो या अंग्रेजी
साल तो आता जाता है,
समय चक्र चलता रहता
ठहर नहीं वो पाता है!
इससे लेकर हमें सबक,
आगे बढ़ते जाना है,
चाहा जीवन में जो भी
मुकाम वही अपनाना है!
नये साल में यही कामना -
नहीं कोई दुखियारी हो,
मंगलमय हो सभी के लिए
और सदा शुभकारी हो..!!
----------------------------------------

टिप्पणी: अंग्रेजी वर्ष हो या हिन्दी वर्ष दोनों ही के कार्य-क्षेत्र अलग और दोनों ही जीवन में महत्वपूर्ण है। अंग्रेजी नववर्ष में कड़ाके की ठंड उत्साह को क्षीण तो करते ही हैं , पाश्चात्य रहन-सहन ,आचरण हमारे संस्कार को भी धराशायी कर देतें हैं ...। हिन्दी नववर्ष -हमारी परम्पराएं धार्मिकता हमारे संस्कार को जीवन्त तो करती ही है ,वहींप्रकृति भी मानों हमारे साथ दिल खोल कर स्वागत को तैयार खड़ी रहती है।


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~नववर्ष - मेरा तुम्हारा~

पाश्चत्य नववर्ष में
सर्दी की ठिठुरन लिए
मदिरा का सेवन कर
मदहोश हो थिरकते रहते
अश्लीलता की करते नुमाइश
अर्धरात्रि में तमोगुण संग
नववर्ष का आरम्भ होता
तामसिक प्रवृति का फिर
जहाँ तहाँ प्रदर्शन होता
कैसा विचित्र है
विदेशियों का यह त्यौहार

वेदों में अंकित है युगादि का सत्य
चंद्रमा की कला का है ये प्रथम दिवस
ब्रह्मा ने इसी दिन कर सृष्टि का निर्माण
नक्षत्रो का देकर उपहार
सतयुग का किया था प्रारम्भ
चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रथमा
ही अपने नववर्ष का है शुभारम्भ
भारतीय संस्कृति का
प्रकृति से है गहरा नाता
नववर्ष भी नही इससे अछूता
पतझड़ का असर कम होता जाता
वसंत ऋतू का फिर आगमन होता
पेड़ पौधे पल्लवित होते
पुष्प नववर्ष का स्वागत करते
शालिवाहन की वीरता का प्रतीक
शक संवत बना साक्षी है
शैल्पुत्री प्रकृति का दूसरा रूप
कर अराधना उसकी
नवरात्र की होती शुरआत
विक्रमादित्य ने फहरा विजय पताका
राज्यभिषेक भी इसी दिन करवाया था
फिर मंगल कार्यो की गणना का आधार
विक्रम संवत को ही बनाया था
इस शुभ दिन कर बाली का वध
राम ने उसकी प्रजा को मुक्ति दिलाई थी
इस नवबेला में उर्जा शक्ति का होता प्रसार
नई फसलो संग उत्साह उमंग का होता विस्तार
और हम अपनी धर्म संस्कृति छोड़
न जाने क्यों विदेशी संस्कार अपनाते
अपनी प्रथा परम्पराओ का लेकर ज्ञान
स्वीकार कर, करो तुम सम्मान

टिप्पणी: किसी भी त्यौहार पर्व [ अन्य देशो के ] बारे में जानना अच्छी बात है या उनकी खुशी में शामिल होना भी अच्छा है लेकिन अपनी परम्पराव संस्कृति को भूल कर, बिसरा कर, छोड़कर नही...


नैनी ग्रोवर
~ नया साल~

देख मुँह लाल दूजे का,
पीट पीट के अपना मत करो,
मान अपनी परम्पराओं का,
अजी कुछ तो समझा करो...
बहके कदम, भोंडे कपड़े,
मुंह में सिगरेट दबाये,
भारत में ये नया साल मनाने,
ये हिप्पी कहाँ से आये...?
माँ बन गई मम्मी जीते जी,
और पिता हो गए डैड..
चाचा चाची बने अंकल आंटी,
बुध्दि हो गई मेड...
हाय ब्रो हाय सिस ने सारा,
कुनबा बिगाड़ डाला,
अपने हाथों हमने,
अपनी भाषा का चमन उजाड़ डाला...
अब नए साल के इंतज़ार में,
सारे पगला रहे हैं,
डेबिट और क्रेडिट कार्ड के,
जलवे दिखा रहे हैं...
जम के पियेंगे रात भर,
हुड़दंग मचाएंगे,
नए साल के पहले दिन,
माँ से फिर सर दबवायेंगे...
अरे छोड़ो यूँ नया साल मनाना,
किसी काम ना आएगा,
बैठो संग परिवार, खाओ पियो,
खुशियों की लहर लाएगा...
जैसी होगी शुरुआत साल की,
वैसा ही मिलेगा फल,
उठ सुबह सवेरे ले नाम प्रभु का,
और काम पे अपने चल...!

टिप्पणी.. आज के मौहाल पे छाये पश्चिम साये को दूर करें,, और अपनी परम्पराएँ समझना ही जीवन जीने का स्वच्छ और निर्मल मार्ग है ।


अलका गुप्ता
~अंतर नव वर्ष का ~
~~~~~~~~~

भावनाएँ उल्लास मय !
सृष्टि संग उमड़ प्रवाहित ॥
संचरित प्रकृति नवांकुर...
अनायास हँसे प्रत्फुटित ॥

नव वर्ष पदार्पण संवत्...
गुनगुना चैत्र मंगल कलश !
प्रसार मातु आँचल तले
आगाज उंमिलन अलस !!

तब मुस्कान भानु रस पिउ..
हरितिमा चंचल फागु घुलित ।
उछले... रंग...वेग..संवेग...
आए..नव-वर्ष... संकलित ॥

ठिठुरने अहसास जब लगें
चादर मॆं वर्फ की सर्द हो ।
आतुर सी लगे प्रकृति...
छिपा पांख..पंख जर्द हो ॥

हैपी न्यू ईयर बोल जब
अंतराल सुप्त बोने लगे ।
झरे पात पंगु वृक्ष शीत...
दुबक हर कोण सोने लगे ॥


टिप्पणी: हिन्दी नव संवत्सर एवं इंग्लिश सन के नव वर्ष के आगमन पर प्रकृति का भारत मॆं हम जो अंतर महसूस करते हैं बस उसी कॊ व्यक्त कर पाने का प्रयास किया है


मीनाक्षी कपूर मीनू
~ नव आगमन ~
--------
दिसम्बर माह की ठिठुरन में
" अंग्रेज़ी नव वर्ष " दिवस आया
सबके मुख पर खुशियां छायी
पीने पिलाने का दौर चलाया

अंग्रेजी ने रंग दिया तनमन
शोर शराबा चले संग संग
मनस्वी ,,भूल अपनी संस्कृति
सब ने बदले अपने रंग ढँग

आज भू ले हम भारत वासी
हिंदी पावन 'नव वर्ष बेला '
प्रकृति का संदेश न समझे
घर होटल में लगता है मेला

चैत्र मास के शुक्ल पक्ष को
अंकुरण हिन्दी नव बेला का
तन मन प्रफुल्लित उमंग भरा
प्राकृतिक सौंदर्य का मेला सा

खुशियां लाएं 'दो दिवस' मनाएं
हिन्दी को तो न ठुकराएँ
ये तो अपना मातृ दिवस है
इसके संग संग सब चलाये

भारत है तो इण्डिया अच्छा है
संस्कृति है तो फैशन अच्छा है
मनस्वी,, बुज़ुर्गों का गर रखें मान
तो पीना पिलाना भी अच्छा है

बिना राग द्वेष के मिल के खाएं
नव वर्ष रूप में हैप्पी न्यू ईयर मनाएं

टिप्पणी: अपनी भारतीयता को जीवंत रखते हुए सभी त्यौहार मनाने चाहिए क्योंकि भारत की पहचान ही है कि विभिन्नता को एक सूत्र में बाँधना। यहाँ अनेकता में एकता है मगर अपनी संस्कृति को भूलते हुए नहीं बल्कि इसका मान बढ़ाते हुए सभी त्योहारो को, दिवस को मनाना चाहिए ताकि भारतीय सबके साथ कदम से कदम मिला करआगे बढ़ सकें और अपनी भारतीयता की पहचान दे सके।



Madan Mohan Thapliyal 'शैल'
~आभास नव वर्ष के आगमन का~


( नव वर्ष की शुभकामनाएं )

जब डालियों पर हो फूलों की बहार
तितलियाँ मंडराएं झूम-झूम कर-
धरणी करे अद्भुत श्रृंगार -
सारंग छौने घूमें, स्वच्छंद -
हिमगिरि की बयार बहे मंद-मंद -
आम की मंजरी पर हो मधुप गुंजार
निर्झर झरनों की अनिमिष प्रीत -

प्रकृति सजती नव दुल्हन सी -
मन्थर गति वाले हिमनद का संगीत -
हो प्रफुल्लित कोयल गाए गीत
हिमनद सिकोड़ते अपनी बाहों को-
सुरभित करते बन कंदराओं को
ठिठुरती सर्दी कहती निज घर जाती
लिए दिए का धर्म निभाती
घने दरख़्तों की झीनी ओट से
झांकती रवि किरणें -
धरती को नमन करती और कहतीं
कुछ नया है होने वाला
जब धरा का कण-कण हो हर्षित
समझो नव वर्ष है आने वाला
चैत्र मास, मधुमास है आने वाला
ऐसी हो जहाँ की पुण्य धरा
क्यों न हो हर्षित जनमानस
क्यों न बजे नव वर्ष का संगीत
स्वागत हे मधुमास तुम्हारा
नव वर्ष का खुशी से गाएँ गीत!!!!

सारा विश्व नव वर्ष का
प्रथम दिन कहता जिसको
ठिठुरन भरी सर्दी चहुंओर
जनवरी मास कहते उसको
चारों ओर बर्फ़ की सफेद चादर
कितना सुख, कितना आदर
किसकी खुशी, किसका रंग
जाड़े से होता सब बदरंग
जीव जन्तु भी छिप जाते
ले आश्रय धरती का
पर्ण विहीन होते बृक्ष
निर्जीव सा लगता सारा मधुबन
कैसा हर्ष, कैसा स्वागत
कैसा नव वर्ष का आगमन
मदहोश हो, सब हैं थिरकते
नूतन वर्ष की जै-जैकार हैं करते
अर्द्ध रात्रि से पौ फटने तक
धमाचौकड़ी और हुड़दंग
नव वर्ष का अनोखा स्वागत और रंग!!!!!!

टिप्पणी: सभी देशवासियों को नव वर्ष की ढेर सारी शुभकामनाएं, भारत एक कृषि प्रधान देश है और इसकी संस्कृति युगों से प्रकृति की उपासक रही है,चाहे वर्ष का प्रथम दिन हो चाहे आखिरी, खुशी नित नये रंग में पल्लवित होती है.


डॉली अग्रवाल
~नया साल - एक ख्याल ~

कुछ अंग्रेजो का नही
कुछ हिंदी का नही
हर वो लम्हा नया साल है
जहाँ जीने का सवाल है !!

किसी नन्हें की इस दुनिया में आँखे खोलना शायद नया साल है ,
किसी मरते हुऐ का ज़िन्दगी जीना शायद नया साल है ,
दर्द को भूल कर सुख का आभास शायद नया साल है ,
उदय होते सूरज का ढल जाना शायद नया साल है ,
खिल के फूल डाली से उतर जाना शायद नया साल है ,
सपनो का साकार हो जाना शायद नया साल है ,
बीते वर्ष का अंत हो जाना शायद नया साल है !

वक्त को थामना मुश्किल है
वक्त के साथ चलना मुश्किल है
कुछ पल और जी लो ज़िन्दगी के
बीते वक्त का लौटना मुश्किल है !!

टिप्पणी: में जो भी लिखती हू वो मैच नही होता चित्र से ! मेरी सोच इससे आगे जाती नही , जो लिखा बस लिख दिया ! आप सबको पढ़ कर मन की बात लिखी !


Ajai Agarwal आभा अग्रवाल
~मंगलमय नव वर्ष --
============
चैत्र शुक्ला प्रतिपदा ,
अवतरण तिथि
आदि पुरुष श्री ''राम '' की
लो आया नव वर्ष
लाव लश्कर संग ----
पतझड़ का हो रहा अंत
दिगम्बर हुई डालों पे
झाँक रहे नव द्रुम मनोहर
बांज बुरांस अशोक
गुलमोहर फूले
रक्तवसना नववधू प्रकृति
सुगन्धित समीर से आरक्त ,
खेत पहने सोना चांदी की चूनर ,
बासन्ती साड़ी पे- रंगों भरी
पिचकारी की फुलकारी
गदराई गेहूं की बाली ,
बौराई अमराई ,
पलाश दहके ,टेसू महके
कोयलिया कुहुके
नील व्योम का नीला निस्वन
कलियाँ करती जादू टोना
मानो उत्सव का आवाह्न
देख श्रृंगार ऋतुराज का
भर अंजुरी फूलों की
रति उतरी करने आरती --
मंगल कलश पराग के ढुलके
भँवरें गुनगुन गान सुनाएँ
लो नव वर्ष है आया
चैत्र शुक्ला प्रतिपदा -
धरती पे आये --
राम चन्द्र संग चारों भाई
प्रकृति भी दे रही बधाई
नव सृजन -नव कलेवर
नव उत्सव ,यही है विक्रमी संवत
अवतरण तिथि
श्री ''राम '' की
और लो नव वर्ष आया
लाव लश्कर संग आया ------
आयी जनवरी ,शीत भारी ,
ओढ़ कुहरे की रजाई ,
शिथिल जगती लेती जम्हाई
पेड़ दिगम्बर रूप धारें ,
फाल इसको कहते सारे
आलस औ तम --सूर्य हारा
हड्डियां तक कँपकपायें
पशु-पक्षी सब कसमसाये
न सृजन ना ही है उत्सव
अलाव को सब घेर बैठे।
धवल हिम की सर्द साड़ी
ज्यूँ कुँवारी विधवा हुई हो ,
सर्द अहसासों में डूबी
संगमरमर की ऋचा सी
स्वप्न बुनती जा रही हो ,
वेदनाओं की ऋचायें
स्वयं को समझा रही हो
इस समय को उत्सव बनायें
उदासियों के श्वेत घेरे
सर्द अहसासों के फेरे
डस न ले इंसान को।
मौन मन की वाटिका में ,
कुछ पुष्प बातों के बिखेरें ,
आगमन है शीत का --
हम विजन में मंगल उतारें
शरद की इस ऋतु में ,
नव वर्ष के गीत गायें
आज झूमें ,खिलखिलायें ,
उंघती सी इन छलकती प्यालियों में
प्राण अपने हम उड़ेलें
अर नया इक गीत गायें
उंघती सी इस ऋतु में
फाल की इन डालियों में
धवल हिम की चादरों संग
पच्छिम का कोई गीत गायें
हिम ढकी इन वादियों के
मरमरी कोमल बदन के
बांकपन को - भर नजर हम आज चूमे ,
एक अल्हड़ बांकपन औ
सर्दी भरा अहसास लेकर
पच्छिम का न्यू ईयर मनाएं
शरद की चांदनी की
सेज में हम गुनगुनायें।
आज हम न्यू ईयर मनाएं ॥ ----


टिप्पणी: विक्रमी संवत का नव वर्ष ,प्रकृति के नव सृजन का समय --चैत्र मास -और कलेंडर का नव वर्ष जनवरी यानी शीत से कँपकँपाती प्रकृति ,एक में प्रकृति का उत्फुल आनन्द , श्रृंगार करे हुए ऋतुराज की आरती उतारने आयी नववधू के रूप में प्रकृति और एक में धवल हिम की साडी पहने तप करती नव यौवना तपस्विनी --दोनों पावन ,दोनों निर्मल --एक काम--सृजन का प्रतीक ,एक शिव के लिए तप करती अपर्णा का प्रतीक ---मनाइये दोनों को --सहजता से --दोनों अपने स्थानों की सभ्यता के प्रतीक हैं ----आभा ॥


कुसुम शर्मा
~नववर्ष का करे अभिनन्दन ~
-------------------
नव वर्ष का करे अभिनन्दन
ख़ुशियों से भरे सबका जीवन
पुलकित हो धरती का कण कण
ऐसा हो नव वर्ष का आगमन !!

विश्व की बात निराली
छाई कही पर सूरज की लाली
कही पर चंदा की उजयाली
कही पूर्व तो कही है पश्चिम
इनकी संस्कृति भी है भिन्न भिन्न

पश्चिम की बात निराली
इनकी संस्कृति भी है प्यारी
अँधियारे से है यहाँ उजियारा
पतझड़ मे भी दीपों की यहाँ माला

करके हुड़दंग चाहे नव वर्ष मानाते है
पर जाने वाले साल की अच्छाई को अपनाते है !

यहाँ सर्द ऋतु है आई चारों ओर वर्फ है छाई !
प्रकृति ने भी इसका साथ दिया है
सफ़ेद चादर बिछा कर नववर्ष का स्वागत किया है
तभी तो जनवरी नाम दिया है !
रात के १२बजते ही सभी खुशी से नाचते है
हैपी न्यू ईयर कह कर नववर्ष मानाते है !!

पूर्व की बात निराली
यहाँ सदा सूरज की उजयाली

नव कोपल है खिल रहे
गगन और धरती मिल रहे
नव पुष्प है खिल रहे
जिसमे भँवर गुंजन कर रहे

शंख की ध्वनि छाई चारों ओर
मचा नवरात्र की पूजा पाठ का शोर
हर वर्ष हरियाली लगाते है
ऐसे पूर्व मे नववर्ष मनाते है

है चैत्र का महिना नवरात्र का आरम्भ
पूजा पाठ से करे नववर्ष का आरम्भ !!

टिप्पणी :- सभी नववर्ष का स्वागत अपने अपने तरीक़े से मनाते है पश्चिम मे नववर्ष जनवरी से शुरू होता है 
वहाँ दिसम्बर मे ३१ की रात के १२ बजते ही नववर्ष आरम्भ हो जाता है लोग नाचकर इसका स्वागत करते है 
इसे अंग्रेज़ी का नव वर्ष कहते है !!पूर्व मे नववर्ष चैत्र मास यानी कि मार्च मे अारम्भ होता है हिन्दू कैलेंडर के हिसाब से ---इस समय चन्द्रमा की कलायें बढ़ती है नवरात्र का आरम्भ इसी समय होता है चारों ओर पूजा पाठ होता है और इस समय नववर्ष का आगमन शुभ माना जाता है इसलिए हिन्दू वर्ष से नववर्ष का आरम्भ चैत्र मे होता है 



प्रभा मित्तल
!!नूतन वर्षाभिनन्दन !!

सौर, चंद्र, नक्षत्र, सावन और अधिमास
इनके मेल से बना विक्रम संवत खास।
यहीं से शुरु हुए बारह महीने बरस के,
हफ्ते में दिन सात और तीस का मास।

सृष्टि की रचना का प्रथम दिवस
सूरज की पहली किरण जन्मी
यहीं से सतयुग का उदय हुआ
विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया
प्रभु राम-राज्याभिषेक इसी दिन
काल गणना का प्रारम्भ और
रात से अब दिन भी बड़ा हुआ।

​सूर्य का मेष राशि में प्रवेश
चैत्रमास का शुक्ल पक्ष और
जब तिथि हो प्रतिपदा
नवरात्रि का प्रथम दिवस
कर नए साल की शुरुआत
नवसंवत्सर ​कहलाता है।

आया वसंत हरियाली छाई
चहुँ ओर खुशहाली आई
मौसम ने भी ली अँगड़ाई
वृक्ष लताएँ फूलों से लदकर
नव पल्लव खिलने को आतुर
मंद समीरण मादक बनकर
नए साल का स्वागत करती
नटी प्रकृति भी मुसकाई !

दुनियाभर में इसी माह
काम-काज का तय होता है
नया रूप और लेखा-जोखा।
कह लो चाहे चैत्र या मार्च
कुछ तो है इसमें बात खास।

यौं तो देश-देश की बात है
अपनी संस्कृति अपना कायदा
यहाँ रात है वहाँ भोर हुई
दिन और रात का अन्तर है

जब पतझड़ की उदासी फैली
न आध्यात्मिक न वैज्ञानिक
अकारण पश्चिम की नकल में
क्यों अपने सूर्योदय को भूलें?
31 दिसम्बर आधी रात अंधेरी
सर्दी में ठिठुर-ठिठुर कर
नए साल के स्वागत में
क्यों अंग्रेजी में जश्न मनाएँ?
सोचो....
हम अपनी रीति क्यों छोड़ें?

हम भी भोर का स्वागत करें
मंगल कलश स्थापित करें
घर- घर होवें मंगलाचार
द्वार-द्वार तोरण बंदनवार।
नए-नए परिधान पहन कर
बड़ों को प्रणाम करें छोटों से
स्नेह-सिक्त हो गले मिलें
यथा योग्य अभिवादन कर
जी भर खुशियों से इठलाएँ।

अंग्रेज़ी का हो हल्ला या
शक्ति-भक्ति का वंदन
नए बरस का नया दिन है
सभी रहें प्रसन्न-वदन औ
रखें अपना उत्साहित मन।

धन-धान्य और समृद्धि लेकर
हर साल नया आता है
गु़ज़रे वक़्त का अँधेरा लेकर
जीवन में सुबह का उजाला और
मन में उत्साह नया भर जाता है
पिछला भूल कर आगे बढ़ें....
करें नव वर्ष का अभिनन्दन !!
नूतन वर्षाभिनन्दन !!
हैप्पी न्यू ईयर !!


टिप्पणी: (नव वर्ष मनाने के उत्साह में हमें अपनी संस्कृति नहीं भूलनी चाहिए।पश्चिम की सभ्यता हमारी नहीं है..वे लोग अपना कायदा अपनाते हैं तो हम भी अपनी सभ्यता भूलकर उनका अन्धानुकरण न करें।)




सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Monday, November 21, 2016

तकब १४ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता #14]

#तकब१४ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता #14]
मित्रो लीजिये अगली प्रतियोगिता आपके सम्मुख है. नियम निम्नलिखित है 
१. दिए गए चित्रों में सामंजस्य के साथ कम से कम १० पंक्तियों की काव्य रचना शीर्षक सहित होनी अनिवार्य है [ हर प्रतियोगी को एक ही रचना लिखने की अनुमति है]. 
- यह हिन्दी को समर्पित मंच है तो हिन्दी के शब्दों का ही प्रयोग करिए जहाँ तक संभव हो. चयन में इसे महत्व दिया जाएगा.
[एक निवेदन- टाइपिंग के कारण शब्द गलत न पोस्ट हों यह ध्यान रखिये. अपनी रचना को पोस्ट करने से पहले एक दो बार अवश्य पढ़े]
२. रचना के अंत में कम से कम दो पंक्तियाँ लिखनी है जिसमे आपने रचना में उदृत भाव के विषय में सोच को स्थान देना है. 
३. प्रतियोगिता में आपके भाव अपने और नए होने चाहिए. 
४. प्रतियोगिता ११ नवंबर २०१६ की रात्रि को समाप्त होगी.
५. अन्य रचनाओं को पसंद कीजिये, कोई अन्य बात न लिखी जाए, हाँ कोई शंका/प्रश्न हो तो लिखिए जिसे समाधान होते ही हटा लीजियेगा.
६. आपकी रचित रचना को कहीं सांझा न कीजिये जब तक प्रतियोगिता समाप्त न हो या उसकी विद्धिवत घोषणा न हो तथा ब्लॉग में प्रकशित न हो.
विशेष : यह समूह सभी सदस्य हेतू है और जो निर्णायक दल के सदस्य है वे भी इस प्रतियोगिता में शामिल है हाँ वे अपनी रचना को नही चुन सकते लेकिन अन्य सदस्य चुन सकते है. सभी का चयन गोपनीय ही होगा जब तक एडमिन विजेता की घोषणा न कर ले.
निर्णायक मंडल के लिए : 
1. अब एडमिन प्रतियोगिता से बाहर है, वे रचनाये लिख सकते है. लेकिन उन्हें चयन हेतु न शामिल किया जाए.
2. कृपया अशुद्धियों को नज़र अंदाज न किया जाए।
धन्यवाद !

तकब 14  के विजेता है श्री मदनमोहन थपलियाल 'शैल' जी - हार्दिक  बधाई  इस परिवार की ओर से 

बालकृष्ण डी ध्यानी
~शून्य पर मेरी ऐ कविता~


शून्य पर मेरी ऐ कविता
अपने पर हो जैसे रचित सरिता
हर उद्गम का स्थान है जो
प्रथमता पद का प्राण है वो
शून्य पर मेरी ऐ कविता ..............

एक गोल से पल्लवित होती
कृष्णधवल के संग रंग रोपण करती
तरह तरह के वो स्तर पर जाती
अपने को जंचती और परखती
शून्य पर मेरी ऐ कविता ..............

शून्य आसमान है वो निहारती
कैसे कैसे वो आभा जगाती
शून्य से बस अब अलख जगी है
जैसे वो मेरी कोई बिछड़ी सखी है
शून्य पर मेरी ऐ कविता ..............

जब कुछ नहीं था तब भी थी वो
जब सब कुछ है तब भी है वो
रातों में चमकते वो सितारे जैसी
अंधियारे मन की वो उजियारे जैसी
शून्य पर मेरी ऐ कविता ..............

संख्यों की संरचना है वो
मेरे अंदर की एक गणना है वो
अमूमन इकाई की वो शुरुवात
मेरे साथ आप को भी इससे हो जाएगा प्यार
शून्य पर मेरी ऐ कविता ..............

टिप्पणी : कविता की अलख भी शून्य से उभरती है और अपने ,हृदय के पटल दिमाग के कक्ष से उभरते हुये शून्य रूपी कागज के शून्य भावों में उभरकर एक नया भाव उपजा कर जाती है उसी तरह शून्य पर मेरी ऐ कविता अपने को परखने का एक माध्यम बने बस यही हेतु है 



नैनी ग्रोवर 
~शून्य~


शून्य से उपजा मानव,
शून्य से ही धरा,
शून्य है ब्रह्मांड का रूप,
शून्य में ही, सब भरा...
निराकार से आकार बना,
आकार से हुआ साकार,
साकार से फिर उपजा,
सृष्टि का सुंदर पारावार...
एक सामान रहता है सदा,
ना घटता है ना बढ़ता,
शून्य जीवन की परिभाषा है,
नित नई अपिलाषाएँ गढ़ता..
शून्य से ही मिली गणना,
जिससे सारा संसार चले,
शून्य मन से ही उपजे प्रेम,
जिससे हमारा परिवार चले..
भरे हुए में कैसे भरे कोई,
शून्य हो तो बात बने,
शून्य मन से पूजो तो,
पथ्थर भी प्रतिपाल बने...!!


टिप्पणी:- शून्य का मतलब ज़ीरो भी है और खाली भी.. मैंने यहाँ दोनों को सांझा सोचा है..!




डॉली अग्रवाल 
~शून्य नही थी में ~

जीते थे मुझ में कुछ ख़्वाब
कुछ एहसास और कुछ धड़कने भी
नाकार दिया था तुमने मेरा वजूद
शून्य बना छोड़ दिया
में भी जीवांत थी
जीना चाहती थी
जुड़ना चाहती थी
दशमलव भी कबूल किया था
क्योकि 1 ( एक ) साथ जुड़ा था
पर गणितीय ज्ञान तुमसे जुड़ा था
तुम आज भी एक ही हो
काश शून्य जोड़ा होता
तो
आज लाख बना होता !!

टिप्पणी : शून्य की भी किसमत क्या -- संख्या से आगे जुड़े तो वजूद नही पीछे जुड़े तो लाख बने !




प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~ शून्य - अनंत ~

शून्य
में गणित से कहीं अधिक आध्यत्म है
शून्य
ही वैदिक काल से अनंत की संकल्पना है
शून्य
कोई अविष्कार नहीं, यह एक खोज है
शून्य
सदियों से हमारी संस्कृति का हिस्सा है
शून्य
कही बना कहानी तो कही बना किस्सा है
शून्य
कहीं भरा और कहीं नज़र आता खाली है
शून्य
ही शुरआत है और यही अंत भी है
शून्य
में ही छुपा प्राणी जगत का सत्य है
शून्य
ही ब्रह्मांड में देता समय को गति है
शून्य
ही समग्र का क्रांति का ध्वजाहक है
शून्य
ही कालचक्र के नियमो का आधार है
शून्य
ही परमार्थ एवं मुक्ति का द्वार है
शून्य
ही आदि है एवं अनंत भी है
शून्य
ही शून्य है एवं शून्य ही पूर्ण है

टिप्पणी :
ईशोपनिषद में कहा गया है
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः॥
ॐ वह (परब्रह्म) पूर्ण है और यह (कार्यब्रह्म) भी पूर्ण है; क्योंकि पूर्ण से पूर्ण की ही उत्पत्ति होती है। तथा [प्रलयकाल मे] पूर्ण [कार्यब्रह्म] का पूर्णत्व लेकर (अपने मे लीन करके) पूर्ण [परब्रह्म] ही बचा रहता है. त्रिविध ताप की शांति हो 'पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते' का भावार्थ है "शून्य" के समान 'अनंत से अनंत घटाने पर भी अनंत ही शेष रहता है'





Shalini Mehta 
~शून्य सहज नही ~

शून्य सहज नही
शून्य वहम भी नही
शून्य शोध नही
शून्य ठोस भी नही
शून्य मोक्ष नही
शून्य कोश भी नही
शून्य सरल से तरल होता भाव है
शून्य व्याख्या नही; विश्वास है
शून्य मिट्टी से हयूमस
हयूमस से पादप
पादप से वृक्ष
वृक्ष से हरीतिमा
हरियाली से जीव
जीव से नभ
नभ मे मेघ
मेघ मे वर्षा
वर्षा मे प्रकृति
प्रकृति की गोद मे कुलांचे मारता शून्य

टिप्पणी : (प्रतियोगिता हेतु नही लिखी गई उपरोक्त पंक्तियाँ; क्योंकि रूक नही पाये भाव प्रतिबिम्ब  बड़थ्वाल जी को पढते हुए इसीलिए लिख दिया )




ब्रह्माणी वीणा हिन्दी साहित्यकार
~मेरी अवधारणा~
🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
शून्य के प्रति ,
मेरी अवधारणा है
हम परमात्मा नहीं हैं
उनका सिर्फ अंश हैं छाया हैं
एक विवेक शून्य बालक
अतः शून्य से ही प्रारंभ,
मेरी अबोध जीवन यात्रा
मैं गुब्बारा व सिर्फ पतंग हूँ और डोर ?
,भगवान व नियति के हाथ में
शून्य से ही हम प्रगति करते हैं
वो भी कर्म व भाग्य के द्वारा
शून्य को गणात्मक आधार मानते है
किन्तु बिना 1संख्या ( ईश्वर ) के बिना
शून्य सिर्फ शून्य है
कोई अस्तित्व नहीं
धूल ,धरा ,नभ ,जल व मानव -मन
सब अपनी स्थिति में,
यदि परम पिता की दिव्य चेतना
इन सभी शून्य को,
रूपांतरण व जीवंत ना करें /
शून्य रह जाएंगे /
********************

टिप्पणी: प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल जी की भावना का स्वागत है मैं भी शून्य को जीवन की सृजनात्मक शक्ति मानती हूँ सिर्फ परमात्मा से अनुप्राणित ,,,,धन्यवाद





किरण श्रीवास्तव
 "अस्तित्व"

शून्य से ही बना शरीर,
शून्य से विस्तार है!
कर्म शुरू भी शून्य से,
शून्य से अवतार है।।

उतार-चढ़ाव है जीवन में,
नहीं कही ठहराव है!
ठहर जाये जीवन तो फिर,
शून्य से शुरूआत है ।।

भागे जब आगे-आगे तब,
शून्य वजूद हो जाता है!
नतमस्तक हो जाये पीछे,
भाव समझ आ जाता है।।

एकाकीअस्तित्व नहीं ...,
मिलकर ही निर्माण है!
मिलकर के ही राष्ट्र बने,
फिर बनता देश जहां है।।

टिप्पणी- गणितीय शून्य और शून्य(खाली) दोनों को परिभाषित करने की कोशिश की है....।



कुसुम शर्मा 
~शून्य~
----
विश्व का आधार भी और अंत भी है शून्य,
है अपने मे पूर्ण भी और अपूर्ण भी है शून्य ,
हुआ है समय का आरम्भ भी और अंत भी इससे
होता नही अस्तित्व जो इसका तो कैसा होता ये शून्य

किसी को रंक तो किसी को राजा बनाता है ये शून्य
लगे आगे तो क़िस्मत बदल दे लगे पीछे तो क़िस्मत पलट दे
कहने को तो है शुन्य पर चमत्कार है शून्य

होती नही गणना इसके बिना पूरी
इसी ने बाँधी है इस सृष्टि की घूरी
यही वेदों का मूलधार
यही यज्ञों का सूत्रधार
यही आत्मा है यही परमात्मा है
यही अगोचर और अगम है
न यह महान है, न ह्रस्व है, न लघु है,
न दीर्घ है, न यह लाल है, न हरा है,
न मजीठ, न पीला और काला ही है।
यह वर्णवहीन और आकृतिविहीन है!

होता नही यह तो होती नही गणना
तो पता कैसे चलता रावण के १० सर
और कौरवों के १०० पुत्रों की गणना !!

टिप्पणी :- शून्य अपने ही पूर्ण है कुछ न हो कर भी सब कुछ है वेदों का मूलधार है यज्ञों का सूत्रधार है यह किसी की भी क़िस्मत पलट सकता है न इसका कोई आकार है न ही वर्ण इसके बिना अंकों की संख्या पूरी नही होती यही नही होता तो हम गणित को कैसे जान पाते न ही हमे पता चलता रावण के १० सिर और कौरवों के १०० पुत्रों के बारे मे विश्व के अंगिनत तारो के विषय मे यानी की ये नही तो सृष्टि का कोई आधार नही !!




Madan Mohan Thapliyal
 🎀🎀🎀🎀 मैं शून्य हूँ  🎀🎀🎀🎀
( समग्रता )
 🎀🎀🎀🎀

मैं शून्य हूँ -
मुझसे पहले न कोई था-
और न कभी होगा.
पूर्ण सत्य भी मैं -
पूर्ण ब्रह्म भी मैं -
चराचर जगत का नियन्ता भी मैं -
ब्रह्मांड का उद्गम भी मैं -
विस्तार भी मैं.
साकार भी मैं -
निराकार भी मैं.
मैं किसी के बन्धन में नहीं -
मैंने किसी को बांधा नहीं -
मैं स्वच्छंद हूँ -
सर्वत्र हूँ .
अचेतन औ चैतन्य भी मैं -
वेद-वेदांत का ज्ञान भी मैं -
ॠषि मुनियों का ध्यान भी मैं -
विद्या विशारद भी मैं -
संज्ञाशून्य भी मैं -
ज्ञान भी मैं, अज्ञान भी मैं -
हर वस्तु का मूल्यांकन भी मैं -
गणित भी मैं, गणितज्ञ भी मैं -
सिद्धांत भी मैं, सूक्ति भी मैं -
हर तंत्र,मंत्र का आरम्भ भी मैं -
समाधान भी मैं -
उत्पति भी मैं, प्रलय भी मैं -
जीवन भी मैं, मोक्ष भी मैं -
प्रत्यक्ष भी मैं, परोक्ष भी मैं -
जीवन का सूत्रधार भी मैं -
सर्वोपरि मैं, चिरनिद्रा भी मैं.
मेरे करते ही सब शुरू होता है -
और अन्त भी होता है-
मैं अजर हूँ, अमर हूँ!!!!
******

टिप्पणी: सम्पूर्ण सृष्टि को चलाने वाला शून्य ही है, शून्य सबकुछ है, शून्य के बगैर कोई कल्पना भी नहीं कर सकता है.




Prerna Mittal
~ अनंत~
*****

कैसी यह बेरहम ज़िंदगी
शून्य से शुरू शून्य पर ख़त्म
बिना बताए, बिना पूछे मिल जाती
क्या इसका कोई मतलब नहीं

लाया कोई हमें इस संसार में क्योंकर ?
क्या मन बहला रहा ईश्वर, खिलौने बना-बनाकर ?
क्या उद्देश्य इतना ही, मनोरंजन हो उसका ?
अरे रुको ! या कदाचित् इससे कुछ ज़्यादा ?

शून्य बढ़ा देता है मूल्य, दस गुना, फिर और दस गुना
कहीं चाहता यही तो नहीं, सो हमारा यह जीवन बुना
बनें अपने युग के आर्यभट, बनाए नित नए कीर्तिमान
अपने साहस, बुद्धि और त्याग से करें समाज का नवनिर्माण
कर जाएँ समाज के लिए कुछ ऐसा
जो किसी ने कभी ना किया हो वैसा
देख रहा है वह, कौन बढ़ा पाता है शून्य को कितने गुना
क्या पीछे छोड़ जाएगी उसकी संतान, अपने क़दमों के निशाँ ?

टिप्पणी : व्यक्ति का जीवन केवल कीड़े-मकोड़ों की तरह जीने के लिए नहीं बल्कि कुछ कर जाने के लिए होता है । जिस तरह शून्य का कोई अंत नहीं उसी तरह करसक आदमी मरकर भी अमर हो जाता है ।





सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Thursday, October 20, 2016

#तकब१३ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता 13



#तकब १३ (तस्वीर क्या बोले - प्रतियोगिता 13)
इस बार चित्र पर आप अपने भाव भारत के प्रधानमंत्री श्री मोदी जी की कूटनीति, राजनीति और सोच पर लिखे। 
- काव्य की किसी भी विधा में हो, 10 पंक्तियाँ, शीर्षक सहित, स्वरचित हो और देवनागरो लिपि में हो। 
- 12, अक्टूबर 2016 इस प्रतियोगिता में अपनी रचना भेजने का अंतिम दिन है। आप अपनी रचनाये अपनी दीवार या कही तभी प्रेषित करे जब समाप्ति के बाद विजेता और ब्लॉग में पोस्ट होने की घोषणा हो जाये।
शुभकामनाये
(एडमिन की रचनाये प्रतियोगिता के लिए शामिल नही होंगी - धन्यवाद )

इस बार विजेता है सुश्री  किरण श्रीवात्स्व जी .. बधाई  एवं  शुभकामनाएं 

रोहिणी शैलेन्द्र नेगी 
~मार्ग-दर्शक~
********
चलो ले चलूँ तुम्हें डगर उस,
मिले जहाँ सम्मान, रहें ख़ुश,
विश्व-पटल अंकित कर रेखा,
ध्वजा वहाँ जहाँ कभी न देखा,

मैं निर्भिग्य सदा सेवक बन,
प्रधानता का परिचय दूँगा,
सर्व-प्रथम सुख तुमसे मेरा,
दूर अज्ञान समस्त करूँगा,

विडम्बनाएें फैला कर कुछ,
हैं अराजक तत्व समझते,
शोषित-कुपित रहें जनता जो,
सिर-आँखों पर उनको रखते,

मेरा प्रण मैं साथ सदैव,
सभी के संग-प्रसंग रहूँगा,
विजय-घोष का डंका बन कर,
विश्वाधार अनन्त बनूँगा ।।



किरण श्रीवास्तव 
~युग पुरूष~
=====================

नमो तुम्हें शत् शत् नमन
दिया सभी को चैन अमन..।
जीते तूने सबके जज्बात,
करके सबसे "मन की बात"।
किया सदा सही नेतृत्व,
सच तुमसे सब ही हैं तृप्त ।

देश के वीर जवानों को
तूने ऐसा मान दिया,
सीमा पर अभियान चलाकर,
शहादत का परिणाम दिया ।
देकर श्रद्धांजलि वीरों को
ऐसा सच्चा सम्मान दिया।

उस माता को है, नमन हमारा,
जिसने तुमको जन्म दिया ।
देश भक्ति का भाव दिया,
रग- रग मे उत्साह दिया,
आदर प्रेम सहिष्णुता का,
ऐसा खाटी संस्कार दिया।

खलबल मची राजनीति में
फिर भी आंच ना आयेगा
सत्ता का लालच है जिनको
फिर वो पलटी खायेगा।
जो भी बड़े विरोधी है
उनको समझो मनोरोगी हैं....।

जग जननी भारत माता भी
तुम जैसो पर वारी हैं ।
भारत माता की खातिर,
जनता भी सब कुछ हारी है ।
सबको अब है यही दरकार ,
हर बार मोदी सरकार...!!


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~नेतृत्व~

संघ का स्वयंसेवक
संस्कृति का संवाहक
भारत माँ का सच्चा साधक
श्रेष्ठ भारत का सपना लिए
संस्कारो का बना प्रचारक

पाकर माँ का आशीर्वाद
भारत माँ की सेवा करने चला
हर वर्ग का रख ख्याल
नागरिक कर्तव्य का भेद समझाया
जन योजनाओं की कर शुरआत
सांझा करता मन की बात

देकर मात विपक्ष को
दुश्मनों को कर अकेला
कूटनीति की बदल परिभाषा
राजनीति का बना बड़ा खिलाड़ी
कर कर्म बना जनता का सेवक
विश्व गुरु बने भारत
चला है वो लेकर केवल लक्ष्य एक

कर भ्रमण दुनिया का
शांति का सन्देश पहुँचाया
नीति राष्ट्र हित की लेकर
अपना लोहा मनवाया
मित्र राष्ट्रों को लेकर साथ
सबका साथ सबका विशवास पाया

कर त्याग गौतम सा, संसद में शीश नवाया
देश विदेश में भारत की बनी नई पहचान
तिरंगे संग ‘मोदी’ का परचम लहराया
गर्व है हमें, जो भारत ने ऐसा नेतृत्व पाया
जनता की आस और विश्वास का नाता गहराया

जय भारत ......


ब्रह्माणी वीणा हिन्दी साहित्यकार 
*गीतिका *
=======
~मोदी का अपना व्यक्तित्व~
*********************
🍭🍭🍭🍭🍭🍭🍭🍭🍭🍭🍭
********************************
देश कर्णधार बनकर ,,,, ,वादों को निभाया मैंने
बुझा था दीप जागरण का,,,,,उसे जलाया मैंने /
~~~~~
सब ओर थीं आॅधियां,जाति,धर्मअथिकार की,
जन गण में एकता का,पाठ पढ़ाया हमने /
~~~~~~~~
जिंदगी में सदा, आशीर्वाद रहा है अपनी माॅ का ,
उनके ही चरणों में, देश गौरव व जन्नत पाया मैंने /
~~~~~~~~
चिंता नहीं मुझको, ,,,,,,संसदीय दल विरोधियों की
जब घिरा काश्मीर,पाक दुश्मन कोभगाया हमने
~~~~~~~~~
मैं संघ सेवक हूँ, निस्वार्थ समर्पित भारत माता का,
राष्ट्र सर्वोपरि"नीति लेकर सदैव लोहा मनवाया मैंने
~~~~~~~~~~
हिन्दी मातृभाषा, स्वाभिमान व पहचान है हिन्द की
शपथ लेते हेतु, भाषा हिन्दी ही अपनाया हमने /
~~~~~~~~~~
भारत विश्व गुरु बने ,फहराए देश का ध्वज- तिरंगा ,
दिल में यही आकांक्षा है,यही ख्वाहिश जताया मैंने
~~~~~~~~
जय हिन्द ,जय हिन्दी, जय जवान ,
वंदे मातरम् ,,,,,

संदर्भ संदेश
========
प्रस्तुत रचना में मोदी की अपनी मुखरित कर्तव्य गाथा है वे राष्ट्र के प्रधानमंत्री के साथ साथ निस्वार्थ देश भक्त ,संघ सेवक, सफल राजनीतिज्ञ के रूप में, ,देश के गौरव पूर्ण पटल पर अवतरित हुए हैं, ,,वे
अप्रतिम है कुशल कर्णधार है भारत स्वदेश के, ,,,,,,,,,जय हिन्द जय जवान



बालकृष्ण डी ध्यानी 
*****************
कुछ तो बात अलग है

कुछ तो बात अलग है
चले जिधर भी तू चले तेरे संग संग जग है

निर्मल गंगा पल पल बहती जाती
अविरल गंगा कल कल अपना मार्ग स्वयं बनाती
लेकर सारा शांतिकुंज अपने साथ चला तू
तीन रंगों को अब अपने रंग में रंग ने चला तू

कुछ तो बात अलग है
तुझ से अब हम हैं अब हम से तू है

आठ दिशायें अब बोल पड़ी है
चुप थी अब तक वो अपना मुंह खोल पड़ी हैं
भुजाओं को तेरे देने अपने वो सारे बल को
देखा तुझे और वो सारी दौड़ पड़ी है

कुछ तो बात अलग है
मेरे भारत भाग्य की तू एक किरण है

कुछ तो बात अलग है

टिप्पणी : बस प्रेम है हमे इस भारत के प्रधान सेवक से


नैनी ग्रोवर 
~ नई राह~

बाद युगों इक,
नई राह मिली है,
स्वच्छ भारत की,
नई चाह मिली है..
पकड़ के जिसे,
हम चले सरहद की और,
हौंसलों को,
वो मजबूत बाहं मिली है..
वीर सैनिकों को दिया,
इक इशारा जो तुमने,
मिटटी में मिला आतंक वहीं,
जहाँ पनाह मिली है..
जतला दिया दुनिया को,
अब और ना सहेगा भारत,
नई रणनीति की हमें,
इक नई सलाह मिली है...!!


गोपेश दशोरा 
-हर-हर मोदी...


है नरों में इन्द्र यह,
साबित भी इसने कर डाला,
जो भी आया इसके सम्मुख,
एक बार तो इसने धो डाला।
बिन बोले यह हर काम करे,
दुश्मन से भी ना तनिक डरे,
जो कहता है वो करता है,
वचनों से अपने नहीं फिरे।
चाणक्य का अवतार है यह,
राजनीति का महागुरु,
जब से आया है सत्ता में,
परिवर्तन का दौर हुआ शुरू।
देश के सब नेताओं को,
नीति इनसे ही सिखलाई।
विश्व पटल पर इसने ही,
भारत की नव छवि दिखलाई।
कितना विरोध भी इसका हो,
नहीं ध्यान किसी पर देता है।
कर्मों से देता है उत्तर,
संसार देखता रहता है।
हर-हर मोदी, घर-घर मोदी,
का नारा जब से सफल हुआ।
देश हुआ समृद्ध वहीं,
दुनिया के सम्मुख सबल हुआ।
विश्व शक्तियां अब तो यहां
आगे चल कर हाथ बढ़ाती है।
क्या करना, कैसे करना है?
अपनी नीति बतलाती है।
मोदी ऐसे ही बने रहो,
भारत को आगे जाना है।
भारत माँ के सच्चे लाल हो तुम,
अब तो सकल विश्व ने माना है।


टिप्पणीः पहली बार एक ऐसा नेता को देखा है जिसमें हिम्मत है सच को सच और झूठ को झूठ कहने की, और दुश्मनों को उनकी भाषा में जवाब देने की। अब लगता है कि भारत का अच्छा समय आने वाला है।


Sunita Pushpraj Pandey 
मोदीनामा
कुछ तो बात है तुममे मोदी हर हर मोदी नही घर घर तुम सा मोदी चाहिये
बापू के बाद तुमने ही साफ सफाई की क्रांति फैलाई
घर घर सौचालय बनवा तुमने नेक काम किया गररजे भी तुम ही बरसे भी तुम भी
डिजिटल इंडिया का स्वपन तुम्हारा देखते देखते साकार हुआ
सर्जिकल स्ट्राइक करवा लाखो मुँह पर ताले जड़ डाले ।


मीनाक्षी कपूर मीनू 
मैं और तुम बने * हम *

मैं ...........
मैं नहीं तुम हो
तुम नहीं किसी से कम हो
तुम से ही निकला
मैं ..............
बैठ धरा पर चाय पीते पिलाते
कदम तुम सब संग आगे बढ़ाते
आज मैं.........
हूँ जहाँ ,,तुमने ही तो भेजा है
आओ ....उठो चलो सँग मेरे
आज तुम्ही तो हो अंग मेरे
देश को आगे बढ़ाना है
भ्रष्टाचार को मिटाना है
आंतक को दूर भगाना है
मैं ... ........
को सब संग मिलाना है
आज है ज़रूरत
हमें एक होने की....
मिलजुल के हर एक
दुःख को सहने की
देश के कोने कोने में
छिपे आतंक को
पकड़ बाहर निकालेंगे
मनस्वी ,,,
अपने भारत को स्वच्छ
और डिज़िटल बनाएंगे .....
मैं ...और तुम ..
रिश्ता पवित्र पुराना है
आओ उठो... चलो
मैं और तुम से
*हम *बनाना है ,,,
*हम*हो कर ही नतमस्तक
करेंगे हम सब को
*भारत मोदी* बन
*मोदी*
कहलायेगा तब तो ,,,,,,,,, , :)


कुसुम शर्मा 
~है भारत माँ का सच्चा लाल~
*******************
है भारत का सच्चा लाल
तभी तो है उसकी शेर सी चाल
बड़े वेग से बढ़ता जाए
कहे काम जो करता जाए
देश बिदेश मे डंका बजाया
अपनी भाषा का मान बढ़ाया
योग का प्रचार किया जब
विश्व को योग दिवस दिया तब
हर क्षेत्र को आगे बढ़ाया
नारी का तुम ने स्थर बढ़ाया
दुश्मन देश के छक्के छुड़ाये
अंतकवादी को वही गिराये
जो आज तक हुआ नही
वो तुम ने कर के दिखलाया
सर्जिकल स्टाइक जैसे मिशन
तुम ने सफलता से करवाया
मृत सैनिकों का मान बनवाया
सहते तुम रहते तीखे व्यंग्य
विपक्ष हर दम तुम्हारे कामों से दंग
तुम हो भारत माँ के सच्चे वीर
कभी ख़ाली न जाये तुम्हारे तीर

टिप्पणी :- भारत मे बहुत सालों बाद एक ऐसा नेता हुआ है जिसने अपने देश का नाम विदेशों मे जा कर भी ऊँचा किया हमारी मात्र भाषा को विदेश मे भी मान दिलाया जो मिटने लगी थी उसे पूर्ण रूप से जीवित करके उसको उसका स्थान दिलाया ----योग के बारे मे बता कर विश्व भर मे योग दिवस मनवाया ----हर क्षेत्र को उन्नति की दिशा दी --हर क्षेत्र मे नारी को प्राथमिकता दी ---विपक्ष चाहे कुछ भी कहता रहे वह अपना काम करते रहते है ----अतंकवाद को ख़त्म करने के लिए तुमने सर्जिकल स्टाइक जैसा मिशन किया जो पूर्ण रूप से सफल रहा ---यह ऐसा कार्य था जो कभी किसी ने नही सोचा था कि हम भी ऐसा कर सकते है -----जिससे दुश्मन भी चक्करा गया और उसकी सच्चाई सारी दुनिया के आगे आ गई ----


प्रभा मित्तल 
~~~~कर्तव्यनिष्ठा~~~

मनुष्यमात्र के लिए तुम प्रेरणा के मूल स्रोत,
वचनबद्ध औ कर्म भाव से सर्वथा ओत-प्रोत।
तुम हिमालय सम उज्ज्वल उन्नत दृढ़ बली,
सीमा पर सजग सैनिक,तुम अपनी कर्मस्थली।
मन की बात की जन-जन से,स्नेह की धारा बही,
दुःख-सुख सुन उनका,प्रांत-प्रांत की खबर मिली।
स्वस्थ तन हो स्वस्थ मन हो,रहे निर्धन न कोई,
स्वच्छ हो घर-बाहर हमारा,न सुनें कहीं बेटी रोई।
दुश्मन को ललकारा है पोक हमारा, कश्मीर न देंगे
जंग हुई तो तुम ही नहीं सँभलोगे, हम संभाल लेंगे।
भारत भूमि हो या जननी वो सदा रहे मातृ-भक्त,
माँ की आँखों के तारे बन राष्ट्र को बना रहे सशक्त।
भ्रष्टाचार खत्म हो और काले धन पर रोक लगे,
सेवा औ सर्व-धर्म समभाव से बापू की राह चले।
प्रज्वलित हैं आशा के दीपक अच्छे दिन लौटेंगे
प्रधानमंत्री मोदी जी के सपने अवश्य ही सच होंगे।
सत्यमेव जयते,सत्यमेव जयते,सत्यमेव जयते!!

टिप्पणी: हमारे प्रधान मंत्री मोदी जी की कर्तव्यनिष्ठा पर किसी को संदेह नहीं।कुछ तो बात है इस व्यक्तित्व में जो विरोधी शक्तियाँ भी इस व्यक्ति को नहीं झुका पाईं।

सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Saturday, September 24, 2016

#तकब१२ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता तकब 12




#तकब१२ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता #12]
मित्रो लीजिये अगली प्रतियोगिता आपके सम्मुख है. नियम निम्नलिखित है 
१. दिए गए चित्रों में सामंजस्य के साथ कम से कम १० पंक्तियों की काव्य रचना शीर्षक 
सहित होनी अनिवार्य है [ हर प्रतियोगी को एक ही रचना लिखने की अनुमति है]. 
- यह हिन्दी को समर्पित मंच है तो हिन्दी के शब्दों का ही प्रयोग करिए जहाँ तक संभव हो. चयन में इसे महत्व दिया जाएगा.
[एक निवेदन- टाइपिंग के कारण शब्द गलत न पोस्ट हों यह ध्यान रखिये. अपनी रचना को पोस्ट करने से पहले एक दो बार अवश्य पढ़े]
२. रचना के अंत में कम से कम दो पंक्तियाँ लिखनी है जिसमे आपने रचना में उदृत भाव के विषय में सोच को स्थान देना है.
३. प्रतियोगिता में आपके भाव अपने और नए होने चाहिए.
४. प्रतियोगिता २२ सितम्बर २०१६ की रात्रि को समाप्त होगी.
५. अन्य रचनाओं को पसंद कीजिये, कोई अन्य बात न लिखी जाए, हाँ कोई शंका/प्रश्न हो तो लिखिए जिसे समाधान होते ही हटा लीजियेगा.
६. आपकी रचित रचना को कहीं सांझा न कीजिये जब तक प्रतियोगिता समाप्त न हो या उसकी विद्धिवत घोषणा न हो तथा ब्लॉग में प्रकशित न हो.
विशेष : यह समूह सभी सदस्य हेतू है और जो निर्णायक दल के सदस्य है वे भी इस प्रतियोगिता में शामिल है हाँ वे अपनी रचना को नही चुन सकते लेकिन अन्य सदस्य चुन सकते है. सभी का चयन गोपनीय ही होगा जब तक एडमिन विजेता की घोषणा न कर ले.
निर्णायक मंडल के लिए :
1. अब एडमिन प्रतियोगिता से बाहर है, वे रचनाये लिख सकते है. लेकिन उन्हें चयन हेतु न शामिल किया जाए.
2. कृपया अशुद्धियों को नज़र अंदाज न किया जाए।
धन्यवाद !
इस बार की विजेता है सुश्री वीणा ब्रहमाणी जी - शुभकामनायें 
राज मालपाणी ..
{राष्ट्र भाषा हिंदी}

हिंदी भारतवर्ष में ,पाई है मातु सम मान
यही हमारी अस्मिता और यही है पहचान
[ इसे पढ़ा था और इसके आधार पर कविता को सजाया ]

हिन्दी भाषा कितनी सुन्दर, है ये कितनी आसान
हिन्द देश की हिन्दी संस्कृति, है ये सबसे महान

हिन्दी राष्ट्र की अस्मिता , हिन्दी वतन की आन
हिन्दी सरस, सुधारस, है अशक्त तन में प्रान

हिन्दी सूत, सखी, श्याम-सी, है इसका वरदान
चीर-भारती,चक्षु सूर, एकता की अखण्ड कमान

हिंदी को कबीरा ने अपनाया, दिया मीराबाई ने मान
आज़ादी के शहीदों ने, दिया इस हिन्दी को सम्मान

हिन्दी चरित्र है भारत का, नैतिकता की है परिभाषा
हिन्दी सबका स्वाभिमान, यही सबकी है अभिलाषा

अंग्रेज़ी सभी के पास थी , थी मेरे पास हिंदी
जिसके पास जो थी, उसने उसी में लिख दी

___________" जय हिंद - जय हिंदी "____________




ब्रह्माणी वीणा हिन्दी साहित्यकार 

देव नागरी हिन्दी मातृ भाषा

देव सुता, कवि -मानस- हंसिनि ,लोकहुं लोक लुभावत हिंदी /
मातु समान महान सुजानहि , मोद प्रमोद लुटावत हिंदी /
मोहन की मुरली सम लागति ,गान सुगान सुनावत हिंदी /
सूर कबीर यथा रसखानहुॅ ,छंद कवित्त सिखावत हिंदी //
*************************
आखर- आखर कंचन जैसन ,लेख सुलेख रचावत हिंदी /
मातु पिता सम लागति प्रेमिल ,नेह -सुधा बरसावत हिंदी /
देशज भाषहि नेक अनेकहि,देवन -नागरि भावत हिंदी /
भारत में महिमा गरिमा अति, देश विदेशन छावत हिंदी //
*************************

संदर्भ चित्र संदेश 
===========
मेरा भाव हिन्दी दिवस पर ,,,हिन्दी की महिमा पर केंद्रित है वो माँ के समान प्यारी है अपनी मातृभाषा की लिपि माध्यम अक्षर= क ख ग सोने के समान मूल्यवान है जय हो हिन्दी,,,



नैनी ग्रोवर 
~मुझे जब हिंदी मिली~

चली जा रही थी मैं,
अपने में गुम,
बिन किसी उद्देश्य के..
जाने कैसी भटकन थी,
स्वयं भी समझ ना पाई,
टूटे-फूटे भावों को,
जोड़ने की अभिलाषा,
परन्तु छोड़ ना पाई..
टूकड़े-टुकड़े जोड़,
मैं भाव सजाने लगी,
फिर भी,
एक मरुथल सी प्यास,
मुझमे समाने लगी..
भावों से दूर,
मैं स्वयं को खड़ा पाती थी,
जब शब्दों की कमी,
मुझको सताती थी..
मझधार में डूबी-डूबी,
कलम लग रही थी,
कागज की आँखों में भी,
नमी लग रही थी...
सौतेली सी लगती थीं,
लिखी हुईं लकीरें,
जैसे बेरंग सी,
बना दीं मैंने तस्वीरें..
एक दिन सह्रदय मित्र ने,
"हिंदी" से परिचय करवाया,
भावों और शब्दों का,
तालमेल समझाया..
आने लगा समझ उद्देश्य,
कलम भी रंग में आई,
भावों ने भी जागकर,
खूब ली अंगड़ाई..
धन्यवाद प्रतिबिम्ब जी,
आपको कोटि-कोटि मेरा,
अब कोरे कागज़ पे लिखूंगी,
मैं रोज़ नया सवेरा..
हिंदी है पहचान हमारी,
हिंदी ही है ज्ञान,
हिंदी से ही जुड़े हैं हमसब,
जय हिंदी, जय-हिंदुस्तान...!!



टिप्पणी: हिंदी ने मुझे मेरी पहचान दी, शत शत नमन मेरी मातृ भाषा को..



अलका गुप्ता 
~~हिंदीगर्व हमारा ~~


मातृ-भाषा...हमारी...तुम्हारी...हिंदी |
शर्मिंदा..नहीं...है...आज हमारी..हिंदी |
समझ रहा विश्व ध्वनि विज्ञान अवतरित ये...
देवनागरी...संस्कारित...प्यारी....हिंदी ||

स्वाभिमान है आत्म ज्ञान हिंदी गर्व हमारा |
हिंदी..हैं .हम वतन...हिन्दुस्तान रव हमारा }
जन-जन की भाषा समझें वह हर भाव हमारा |
गुंजित है...ज्ञान-विज्ञान..संस्कार..पर्व हमारा ||

व्यर्थ गाते गीत हम क्यूँ विवश विप्र गुलामो के आगे |
तन मन बसे गुलामी..तोड़ न पाएँ ये..बंधन के..धागे |
ये सावन के अंधे..हैं..असली हरियाली को क्या जाने...
सिखे सिखाए श्वान हैं जो कम हियर..गो देयर पे भागे ||



नोट-जबकि हम और समस्त विश्व यह समझ चुका है कि हिंदी हर प्रकार से एक सुगम्य ग्राह्य और वैज्ञानिक भाषा है जिसकी अति प्राचीन देवनागरी लिपि है ... जिस पर हमें गर्व होना चाहिए ..पर अपनी ही मातृभूमी पर हिंदी का प्रचार प्रसार करना पड़ रहा है ...यह गुलाम मानसिकता में जकड़े लोग दुसरो की भाषा पर अपने को अभिजात्य समझ रहे हैं |


गोपेश दशोरा 
~अपनी हिन्दी~

भारत माँ के भाल की बिन्दी
कितनी प्यारी अपनी हिन्दी,
कितना प्यारा लगता है जब,
कोई अपना बोले हिन्दी।
हिन्दु, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई,
जैन, पारसी या हो सिन्धी
धर्म कर्म सब अलग है सबके,
पर सब में एका करती हिन्दी।
छोटे- बड़े का भेद है इसमें,
है कितनी व्यवहारिक हिन्दी।
है अनेको भाषा जग में,
सबसे मीठी लगती हिन्दी।
रोला, छप्पय, कवित्त, सोरठा,
छन्दो से इठलाई हिन्दी।
उपमा, यमक, अनुप्रास, उत्प्रेक्षा
अलंकारों से शरमाई हिन्दी
मात्र भाषा इसे ना समझो,
ईष्वर का वरदान है हिन्दी।
गर्व करों महसूस सभी तब,
जब-जब मुख से निकले हिन्दी।

टिप्पणीः हमारी मातृभाषा जो आज मात्र भाषा बन कर रह गयी है। लेकिन वास्तव में हिन्दी जैसी कोई भाषा नहीं है। और यह बात आज की नई पीढ़ी को समझनी होगी।


किरण श्रीवास्तव 
( मैं हिन्दी हूँ)
===================

नहीं केवल एकभाषा हूँ,
मैं देश की परिभाषा हूँ।
सबने मुझको मान दिया,
मातृभाषा का सम्मान दिया ...।

मुझमें ही तो संत बसे हैं,
कबीर रहीम और पंत बसे हैं।
आभार सभी कृतिकारों का,
भारत के राज दुलारों का ।

वर्चस्व हमेशा बना रहे,
कोशिश तुम करतेही रहना।
चहुंओर उपयोग रहे अपना,
एक राष्ट्र बनाना तुम ऐसा ।

मुझसे ही पहचान तुम्हारा,
मुझपर ये एहसान तुम्हारा ।
औरों को भी मान मिले ,
ऐसा हो कर्तव्य तुम्हारा ।

भारत का मैं हूँ गहना ,
सुख- दु:ख भी है ,मुझको सहना ।
फिर भी माथे की बिंदी हूँ,
हां मैं ही तो हिन्दी हूं...!!!!

===================
टिप्पणी--
हिंदी हमारी मातृभाषा है,श्रेष्ठ है फिर भी इसका उपयोग अन्य क्षेत्रों में कम है।आज विदेशी भाषा का बोलबाला है । वैसे हर भाषा का अपना अलग महत्व है।जानकारी होना जरूरी है, लेकिन अपनी मां तो आखिर अपनी ही मां होती है।इसके महत्व को जानें, इसे दिल से स्वीकार करे । इसके विकास में अग्रसर रहें।चहुंओर प्रयोग हो इसका । ताकि गर्व से कह सके हम हिंदी हैं हम हिन्दूस्तानी हैं.....।



प्रभा मित्तल
~~~हिन्दी मेरी पहचान~~~

हिन्दी मेरी भाषा है
हिन्दी मेरा मान है
हिन्द वतन है मेरा
हिन्दी ही पहचान है।

मेरी माता है हिन्दी,सो
हिन्दी आसां लगती है
हिन्दी में सपने आते हैं
सोच में हिन्दी भाती है

वैसे तो मेरे आज़ाद देश में
हर प्रान्त की अपनी भाषा है।
यहाँ हर जन - मानस में बसी
हिन्दी एकता की परिभाषा है।

पावन संस्कृत की लाडली
हिन्दी मधु रस की गोली है,
फिर भी क्यों हर जुबान पर
यहाँ अंग्रेजी की ही बोली है।

बच्चों की शिक्षा अंग्रेज़ी
शुभ सुबह भी होती अंग्रेज़ी,
प्रणाम - नमस्ते बुढ़ा गए,
हाय-बाय में रहती अंग्रेजी।

अम्मा बाबू जी के घर में
मॉम डैड अब रहते हैं,
दीदी - भईया को भी सब
सिस - ब्रो ही कहते हैं।

अक्सर दुःख होता है मन में,
आज़ादी तो अंग्रेजी ले गई।
भाषा के अल्प-प्रयोग से,माँ
हिन्दी बेड़ियों से जूझ रही।

साल में एक दिन श्राद्ध जैसे
हम हिन्दी दिवस मनाते हैें।
हर दिन काम करें इसपर तो
राष्ट्र-भाषा दिवस मनाएँगे।

प्रण करें सभी मिलजुल कर
प्यारी हिन्दी को अपनाएँगे,
देश-विदेश में चर्चित भाषा को
राष्ट्रभाषा का गौरव दिलवाएँगे।

(हर देश की अपनी भाषा होती है,तो हम अपनी भाषा की उपेक्षा क्यों कर रहे हैं? हम सब प्रण करें कि हिन्दी को अपनाकर इसे राष्ट्रभाषा का गौरव दिलवाएँगे।)



प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~एक दिवस नहीं~

जन्म से मेरा इसका नाता
सुनता, पढ़ता, लिखता आया
मातृभाषा कह इसे अपनाया
मातृभूमि की पहचान बनाया
हम एक दिवस पर क्यों सिमट जाएँ?

मन्त्र मुग्ध करने वाली मेरी हिन्दी
स्वर व्यंजन से सुशोभित मेरी हिन्दी
संस्कृत से जन्मी संस्कारित मेरी हिन्दी
भारत की संस्कृति का आधार मेरी हिन्दी
हम एक दिवस पर क्यों सिमट जाएँ?

अपनी भाषा को पिछड़ा कहते
पर भाषा को खुशी से अपनाते
राज की हम इसे भाषा कहते
राष्ट्रभाषा करने हेतु क्यों नही लड़ते
हम एक दिवस पर क्यों सिमट जाएँ?

सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Wednesday, August 24, 2016

#तकब११ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता #11]







#तकब११ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता #11]
मित्रो लीजिये अगली प्रतियोगिता आपके सम्मुख है. नियम निम्नलिखित है 
१. दिए गए चित्रों में सामंजस्य के साथ कम से कम १० पंक्तियों की काव्य रचना शीर्षक 
सहित होनी अनिवार्य है [ हर प्रतियोगी को एक ही रचना लिखने की अनुमति है]. 
- यह हिन्दी को समर्पित मंच है तो हिन्दी के शब्दों का ही प्रयोग करिए जहाँ तक संभव हो. 
चयन में इसे महत्व दिया जाएगा.
[एक निवेदन- टाइपिंग के कारण शब्द गलत न पोस्ट हों यह ध्यान रखिये. अपनी रचना को
पोस्ट करने से पहले एक दो बार अवश्य पढ़े]
२. रचना के अंत में कम से कम दो पंक्तियाँ लिखनी है जिसमे आपने रचना में उदृत भाव 
के विषय में सोच को स्थान देना है. 
३. प्रतियोगिता में आपके भाव अपने और नए होने चाहिए. 
४. प्रतियोगिता २० अगस्त २०१६ की रात्रि को समाप्त होगी.
५. अन्य रचनाओं को पसंद कीजिये, कोई अन्य बात न लिखी जाए, हाँ कोई शंका/प्रश्न हो 
तो लिखिए जिसे समाधान होते ही हटा लीजियेगा.
६. आपकी रचित रचना को कहीं सांझा न कीजिये जब तक प्रतियोगिता समाप्त न हो या 
उसकी विद्धिवत घोषणा न हो तथा ब्लॉग में प्रकशित न हो.
विशेष : यह समूह सभी सदस्य हेतू है और जो निर्णायक दल के सदस्य है वे भी इस 
प्रतियोगिता में शामिल है हाँ वे अपनी रचना को नही चुन सकते लेकिन अन्य सदस्य चुन 
सकते है. सभी का चयन गोपनीय ही होगा जब तक एडमिन विजेता की घोषणा न कर ले.
निर्णायक मंडल के लिए : 
1. अब एडमिन प्रतियोगिता से बाहर है, वे रचनाये लिख सकते है. लेकिन उन्हें चयन हेतु न 
शामिल किया जाए.
2. कृपया अशुद्धियों को नज़र अंदाज न किया जाए.



इस बार की विजेता है  सुश्री आभा अग्रवाल  - बधाई  एवं शुभकामनाएं 

Meena Prajapati 
~पृथ्वी के रंग~

मुझमें बहुत कम रंगत हैं
पर! मेरी दुनिया रंगीन है
यहाँ हरे, लाल, पीले
नीले, सतरंगी सभी जन हैं
ये मेरे अपने हैं इसलिए ही,
मुझे कुरेदते हैं, मसलते हैं
चढ़ते हैं, खोदते हैं
सभी रंग बहुत खुश हैं
अपने लाल आयतो में
मैंने तो इंसान बनाये थे
मन्दिर, मस्जिद, द्वारा नहीं
तुम समझदार व्यक्ति थे
बेज़ुबान को मारने
वाले हैवान नहीं
मुझे घेरो मत हाथों से
धर्म, जाति-पाति के
गहने ना पहनाओ
रंगत, खुशियाँ बांटो
फूल ,पाती,तलैया
मेरे हर अंग को
नोच खा लिया है
मेरा बलात्कार हुआ है
मुझे फाड़ दिया है
गाय और सूअर जैसे
नहीं सह पा रही हूँ
तेरा कुरेदना और फाड़ना
मेरा दम घुट रहा है
मैं पृथ्वी और मेरा
रंग ढल रहा है
हौले हौले।

टिपण्णी:- उपरोक्त पंक्तियाँ लिखते समय मुझे इस तस्वीर के रंगों ने बहुत प्रभावित किया और पृथ्वी को घेर कर खड़े लोग मुझे परेशान करने लगें। अपनी इसी परेशानी को मैंने अपनी कविता में लिखनी की कोशिश की है।





Prerna Mittal 
~वसुधैव कुटुंबकम~
~~~~~~~~~~

वसुधैव कुटुंबकम का आज तक, जिसका जैसे मन चाहा, उसने मतलब लगाया,
ज़ी टी.वी. ने भी इसे, अपना प्रचार वाक्य बनाकर ख़ूब नाम कमाया ।

महाउपनिषद में प्रथम उल्लेख, वसुधैव कुटुंबकम का,
ऊँच-नीच भेदभाव से ऊपर प्रयोजन था एकता का।
आर्यन थे इसके प्रवक्ता,
हमारी संस्कृति के निर्माता ।
धरती थी उस समय अभिशापित,
ऊँच-नीच जात-पात से कलुषित ।
बुद्ध, महावीर स्वामी ने सामंजस्य बिठाया,
सारे विश्व को समानता का पाठ पढ़ाया ।

ख़्वाब अखंड भारत का देखा चंद्रगुप्त मौर्य ने,
सिकंदर महान भी चला विश्व पर विजय करने ।
शायद यही था तात्पर्य इनके लिए वसुधैव कुटुंबकम का,
बनाएँ पूर्ण धरा को एक कुनबा करके साम्राज्य स्वयं का ।

चौदहवीं सदी में मंगोलों ने मचाई बहुत धूम,
साम, दाम, दंड, भेद सब अपनाया घूम-घूम ।
पन्द्रहवीं सदी में कोलंबस ने ढूँढा अमेरिका,
परिवार को खोजना ही रहा होगा उद्देश्य उसका ।

बाद में मुग़लों ने सबको मुसलमान बनाया,
वसुधैव कुटुंबकम का नया मतलब समझाया ।
अंग्रेज़ों ने भी किया, सम्पूर्ण दुनिया पर राज,
पूरी वसुधा को क़ुटुंब बनाया, सर पर पहना ताज ।

आख़िरकार कम्प्यूटर-इंटरनेट ने किया स्वप्न पूरा पूर्वजों का,
कभी सोचा ना होगा ऐसा, करते समय सृजन वेदों का ।
पृथ्वी बन गई अब, क़ुटुंब सच में,
सिमट गई, हस्त में पकड़े मोबाइल में ।

सहकर्मी, मित्र और पड़ोसी अब परिचितों से आँखें चुराते हैं,
पोकीमोन की खोज में अजनबियों को दोस्त बनाते हैं ।
अब है आदमी को ख़बर, पूरे जगत की,
सुध ना है केवल, अपने घर के जन की ।

टिप्पणी: यह चित्र एकता और भाईचारे का संदेश दे रहा है । जिसे हमारी संस्कृति में हमेशा प्राथमिकता दी गई है । उसमें दिए गए वसुधैव कुटुंबकम के संदेश की मैंने इतिहास और आज के संदर्भ में अपने दृष्टिकोण से विवेचना करने की कोशिश की है ।




Sunita Pushpraj Pandey 
****दुनिया ****


दुनियाभर के लोग
अलग - अलग रूप, अलग - अलग रंग
जीतने को दुनिया कर रहे मानवता का खून
कहाँ रहे जीसस अब कहाँ गये संत रविदास
न रहे अब वैसे पीर फकीर
जो करते इंसानियत का गुणगान
सुख शांती कायम रखने को
कभी उठा करती थी तलवार
अब रक्त पिपासा बन
सत्ता के मद में मचा रही संहार।

टिप्पणी - बहुत कष्ट होता है मानवता का खून बहते




नैनी ग्रोवर
~ सोलह आने सच ~


दाता ने दी धरती,
और अम्बर नीला नीला,
चाँद सितारे बना के उसने,
दिखा दी अपनी लीला..
फिर बनाए आदम और हुव्वा,
दिया धरती पे भेज,
बसने लगी फिर ये दुनियाँ,
ज्यूँ सूरज का तेज...
बना लिए फिर मानव ने,
भिन्न भिन्न ये भेस,
दे दिए, नाम धरती को,
देश और विदेश..
कोई नही पराया जग में,
बात है सोलह आने सच,
इसलिए कहा सन्तों ने,
नफरत से तू बच...
पहरावा पहचान मात्र है,
ज्यूँ सूरत अलग अलग है,
पर खून है सबमे एक ही जैसा,
ज्यूँ जोत से ज्योति ना विलग है...
रंग बिरंगी इस दुनिया में,
प्यार ही प्यार बरसा दो,
ऐ नीली छतरी वाले,
मानव को ये बात ज़रा समझा दो...!!

टिप्पणी : इंसान से इंसान की बेरुखी, और जात पात का भेदभाव,





Kiran Srivastava
(हमारी पृथ्वी)
==================

रंग बिरंगे देश यहाँ पर
अलग -अलग सी भाषा है,
अलग-अलग है रंग रूप
पर एक ही परिभाषा है।

रीति रिवाज संस्कृति का
अगता अद्भुत मेला है,
सभी त्योहार दिलों में बसतें है
सभी रूप अलबेला है।

हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई
मिल-जुल कर हमें रहना है,
इसकी रक्षा की खातिर
कुछ भी कर गुजरना है।

आओ मिलकर करें संकल्प
मिल-जुल करके रहेंगे अब,
आंच न आने देंगे इस पर
इसकी रक्षा करेंगे सब..!!!!

===================
टिप्पणी- ईश्वर प्रदत दुनियां बहुत खूबसूरत है।विभिन्नताओं के होते हुए भी इसकी कला ,संस्कृति रीति रिवाज मन को मोह लेतें हैं इन सभी धरोहरों की रक्षा के साथ साथ पृथ्वीकी रक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है।




कुसुम शर्मा 
~इंसानियत भूल गया इंसान~
---------------------


छा रहा संसार में
आतंक का ज़ोर है ।
चारों ओर
त्राहि त्राहि का शोर है !
मानवता क्यो
भूल गया इंसान
उसके सर चढ़ा
जानवर का
क्या ख़ून है !

जो खेलते थे कभी
रंगो की होली
वही खेल रहे अब
ख़ूनों की होली
क्यो आपस मे
बड़ा ये बैर है
किसने चलाया
ये खेल है

कोई कहता है
हम हिन्दू
कोई कहता
मुस्लबान है
कोई सिख तो
कोई ईसाई
सभी लड़ रहे
धर्म के नाम पर
क्या बचा
यहाँ पर इन्सान है

कोई मज़हब या धर्म
नही सीखाता
आपस मे बैर रखना

छोड कर राह नफरत की
प्रेम से जीना सीख लो
ये धरती है हमारी
इसे प्रेम से सींच लो
जाति धर्म को छोड कर
इंसान होना सीख लो !!

टिप्पणी :- आजकल धर्म के नाम पर अतंक सारे संसार मे छाया हुआ है एक इन्सान दूसरे इन्सान को मार रहा है जैसे वह इंसान नही कोई जानवर हो । वह आपस मे धर्म के नाम पर लड़ते रहते है कोई भी धर्म हमे नफरत करवाना नही सिखाता न ही वह कहता है कि एक दूसरे को मारो ! ये संसार हमारा घर है इसे हमे प्रेम से सजाना चाहिए, हम किस जाति या धर्म के है यह बाद की बात है सबसे पहले हम इन्सान है इस बात ध्यान रखना चाहिए ।



Madan Mohan Thapliyal शैल
वसुधा औ मानव
************

जब मैं न था माते-
तेरा अकूत भंडार था -
न कोई सीमा न बन्धन -
मात्र विस्तार ही विस्तार था .
झरनों की रंगत -
पक्षियों का कलरव -
फल - फूलों से लदी डालियां -
अद्भुत अपूर्व तेरा श्रृंगार था .
मणि- माणिक , हीरे- जवाहरातों से सुसज्जित -
रंगोली सी सजी धरणी -
रंग- बिरंगी तितलियों की चपलता -
आलौकिक तेरा परिधान था .
वैभव की थी नहीं कमी -
सब कुछ था भरा - भरा -
स्नेह पूरित था सब -
न कहीं किसी का तिरस्कार था .
मैं आया परिभाषित करने -
इस भंडार को-
माया - मोह ने जकड़ा-
जगा दिया अहंकार को.
शक्ल सूरत को लगा पूजने -
दिशा भ्रमित होने लगा -
न मिला विस्तार कोई -
सीमाओं में बाँध के रख दिया अपने आप को .
संत, पैगंबरों को बाँटा -
ऋषि - मुनियों औ अवतारों को बाँटा -
मन्दिर, मस्जिद की दे दुहाई -
उलझा दिया अपने आप को .
तेरी ममता को लगा भूलने -
भौतिक सुविधाओं में लगा झूलने -
निज स्वार्थ को कर पोषित -
छिन्न - भिन्न कर दिया तेरे प्यार को .
कर सुधार भूल अपनी -
छोड़ ए सारा क्रंदन -
लगा माथे पर तिलक माटी का -
रंगोली ली सी सजी, धरा को कर नमन .....

टिप्पणी  - धरती और मनुष्य का जन्म जन्मों का संबन्ध है. भौतिक सुखों की होड़ छोड़कर हमें पृथ्वी के अस्तित्व को क़ायम रखने में मानवता का परिचय देना चाहिए..





कौशल उप्रेती
~लिखना~

दिल में जो आये वो पैगाम लिखना
हमने सहर लिखा.. तुम शाम लिखना

कुछ इस तरह से दिलों के रंज भुला
मेरे हिस्से कि धूप भी अपने नाम लिखना

कलम जमाने से रख के रूबरू
महके जो हर खिजां में वो बाम लिखना

मन को फैला के दुनियाँ से बड़ा
कभी काबा तो कभी चार-धाम लिखना

कौशल इस तरह अपनाना खुद को
दिल कि बात दिल से बे-लगाम लिखना

टिप्पणी : हम सब एक हैं चाहे किसी भी जात धर्म से हैं, धरती सबकी है और सब धरती के... वसुधैव कुटुम्बकम्...




प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ......
~विश्व शांति~

परम धरम श्रुति विदित अहिंसा।
पर निंदा सम अध न गरीसा।। [मानसकार ]

विश्व शांति के लिए हर राष्ट्र को
अहिंसा का सही अर्थ समझना होगा
तन, मन, कर्म, वचन और वाणी से
किसी प्राणी को नुकसान न पहुँचाना होगा
यही तो हमारे संस्कार में समाहित है
'अहिंसा परमो धर्मं' को स्वीकारना होगा
साम्प्रदायिक और असाम्प्रदायिक के तर्क वितर्क से
बहार निकल सर्वधर्म संभाव को अपनाना होगा
राजनीति से नही कूटनीति का उपयोग कर
धर्मनिरपेक्ष शब्द को हमें अपनाना होगा
भारत मे परपरागत सब धर्मो का सम्मान है
यहे हमें मानना और विश्व को सिखाना होगा
'वसुधैव कुटुम्बकम' का देकर सबको विचार
शान्ति और सुरक्षा की अभिवृद्धि का प्रयास करना होगा

टिप्पणी: विश्व शांति और सुरक्षा आज हर राष्ट्र का उत्तरदायित्व है और भारत इसमें प्रमुख भूमिका निभा सकता है।



Ajai Agarwal
Ajai Agarwal धरती माँ का पुनः संस्थापन
=================
स्वप्नाभिलाषी तुम कहो ,
मैं तो यही बस मानती हूँ ,
हाथ तुम हाथों में दे दो ,
कारवां बनना ; नियति है ,
प्यार के दो शब्द बोलो
गाँठ उर की खोल देंगे
ध्येय ; हो कल्याण सबका !
लक्ष्य ,ये लेकर चलेंगे ,
अहिंसा धर्म परम् है
इसी से, मानवता बचेगी
विश्व जीवन ज्योति जागे
सृष्टि को यौवन मिले
हर रंग हर बिम्ब की
सृष्टि को सौगात देदें
आज हम सौगन्ध ये लें
हाथ में ले हाथ सबका ,
छोड़ के धर्मों के पहरे ,
तोड़ के जाती के बन्धन
एक हो धरती को बचाएं
कुछ तुम त्यागो ,कुछ मैं छोडूं
सुविधाओं को कम करें अर
शस्यश्यामल धरती माँ का
हम करें पुनः संस्थापन -
हम करें पुनः संस्थापन

टिप्पणी ---सुविधाओं और लालच के जंजाल से ,हिंसा की जकड़ से ,देश धर्म जाती रंगों के बन्धन से मुक्ति पाएंगे तभी धरती को सजा पाएंगे उसका पुनः संस्थापन कर पाएंगे और इसके लिए केवल दिल में प्यार की आवश्यकता है ---

सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Tuesday, August 9, 2016

‪#‎तकब१०‬ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता #10]



‪#‎तकब१०‬ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता #10]
मित्रो लीजिये अगली प्रतियोगिता आपके सम्मुख है. नियम निम्नलिखित है 
१. दिए गए चित्र पर कम से कम १० पंक्तियों की काव्य रचना शीर्षक सहित होनी अनिवार्य है [ हर प्रतियोगी को एक ही रचना लिखने की अनुमति है]. 
- यह हिन्दी को समर्पित मंच है तो हिन्दी के शब्दों का ही प्रयोग करिए जहाँ तक संभव हो. चयन में इसे महत्व दिया जाएगा.
[एक निवेदन- टाइपिंग के कारण शब्द गलत न पोस्ट हों यह ध्यान रखिये. अपनी रचना को पोस्ट करने से पहले एक दो बार अवश्य पढ़े]
२. रचना के अंत में कम से कम दो पंक्तियाँ लिखनी है जिसमे आपने रचना में उदृत भाव के विषय में सोच को स्थान देना है.
३. प्रतियोगिता में आपके भाव अपने और नए होने चाहिए.
४. प्रतियोगिता ७ अगस्त २०१६ की रात्रि को समाप्त होगी.
५. अन्य रचनाओं को पसंद कीजिये, कोई अन्य बात न लिखी जाए, हाँ कोई शंका/प्रश्न हो तो लिखिए जिसे समाधान होते ही हटा लीजियेगा.
६. आपकी रचित रचना को कहीं सांझा न कीजिये जब तक प्रतियोगिता समाप्त न हो और उसकी विद्धिवत घोषणा न हो एवं ब्लॉग में प्रकशित न हो.
विशेष : यह समूह सभी सदस्य हेतू है और जो निर्णायक दल के सदस्य है वे भी इस प्रतियोगिता में शामिल है हाँ वे अपनी रचना को नही चुन सकते लेकिन अन्य सदस्य चुन सकते है. सभी का चयन गोपनीय ही होगा जब तक एडमिन विजेता की घोषणा न कर ले.
निर्णायक मंडल के लिए :
1. अब एडमिन प्रतियोगिता से बाहर है, वे रचनाये लिख सकते है. लेकिन उन्हें चयन हेतु न शामिल किया जाए.
2. कृपया अशुद्धियों को नज़र अंदाज न किया जाए.



इस तकब #10 की विजेता है  सुश्री अलका  गुप्ता जी - हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं 


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
~ पापा ~

जीवन को आधार देता
आपका वर्चस्व
समर्पित परिवार के लिए
आपका सर्वस्व

आप के हाथों में
देकर अंगुली चलना मुझे आया
जीवन मार्ग को कर अग्रसित
आपने जीना मुझे सिखलाया
सुख दुःख को समेट कर
हार जीत का भेद समझाया
दायित्व निभा कर अपना
परिवार का महत्व बताया
देकर शिक्षा धर्म कर्म की
पाप पुण्य का रहस्य समझाया
बन कर कठोर कभी
मुझे कर्तव्य का बोध कराया
बन कर गुरु मेरे
गलत सही का अंतर बतलाया
सच झूठ के जाल में
नफा नुकसान मुझे दिखलाया
टूट कर, फिर खड़े होकर
हौसले से परिचय करवाया

आज साथ नही फिर भी
मेरे मार्गदर्शक बन
राह मुझे दिखलाते हो
बन आशीर्वाद आपका स्नेह
गमो से लड़ता, खुशी को जीता हूँ
याद नही साथ हो
पापा आप आज भी यहीं कहीं हो
आप सदा मेरे साथ हो


टिप्पणी: जीवन में पिता का स्थान माँ के समकक्ष ही होता है बस माँ की ममता दिख जाती है और पिता एक गुरु तुल्य जीवन का मार्ग प्रशस्त करता है....पिता को समर्पित कुछ भाव



Kiran Srivastava 
"जीवन की डगर"
==================

अंगुली थामें
कदम बढ़ाना,
धीरे धीरे
चलते जाना,
चलते चलते
दौड़ लगाना,
अपने मंजिल
को है पाना...!!!

डगमगा जाए
अगर पांव तो,
असफल हो
जाए दांव तो,
मत घिरना
अवसाद से,
चिंता और
तनाव से,
राहों के ये
बाधक है,
जीवन के
अवरोधक हैं....,!!!!

धैर्य बनाए
रखना तुम,
और न पीछे
हटना तुम,
चलते रहना
बढ़ते रहना,
हिम्मत से
लेना तुम काम,
जीवन होगा
तभी आसान......!!!!!

==================
टिप्पणी: जीवन के राहों में बहुत सी मुश्किलें आती है। हमें बहुत ज्यादा हताश या निराश नहीं होना चाहिए।


Prerna Mittal
~परवरिश~

बच्चा रोते हुए इस संसार में आता,
अपने प्यारेपन से सबको लुभाता,
मात-पिता की आँखों का तारा बन जाता,
कभी नख़रे दिखाता और कभी रूठ जाता,
तो कभी लाड़ में आकर सिर पर चढ़ जाता,
और सबको अपनी उँगलियों पर नचाता ।
उसकी एक मुस्कराहट पर न्योछावर हो जाते,
नज़र उतारते, पैसे वारकर नौकरों में बाँटे जाते ।

उँगली पकड़ पिता की वह चलना सीखता,
लड़खड़ाते क़दमों को ज़मीं पर रखना सीखता ।
सब चाहते ऊँचाइयों को छुएँ, वाहवाही करे जमाना,
पर पिता होता ख़ुशी से अभिभूत, गर्व से तनता सीना ।
जब बेटा उसका, उससे ज़्यादा प्रसिद्धि पाता,
और पिता, पुत्र के नाम से पहचाना जाता ।

परवरिश बालक की होती नहीं आसान,
जुड़ा इससे हँसना, रोना, दुःख और मुस्कान,
कभी पड़ता बच्चों के साथ बच्चा बनना,
तो कभी कान पकड़, देना नैतिक ज्ञान ।
व्यावहारिकता के साथ दुनियादारी भी सिखाना,
अनुशासन, स्वास्थ्य और स्वच्छता का पाठ पढ़ाना ।

यह है एक ऐसा उत्तरदायित्व,
बनाना है एक महान व्यक्तित्व ।
जो अपने पैरों पर खड़ा हो सके,
सिर उठाकर अपना वह जी सके ।
ना हो हृदय में बैर, प्राणी के लिए संवेदना हो ।
शोषण का करे विरोध, स्वत्व से ना समझौता हो !

टिप्पणी: सही परवरिश ही बच्चे, परिवार, समाज व देश के भविष्य का आधार है । यह एक ऐसी ज़िम्मेदारी है जिसे निभाने में अपनी और बच्चे दोनों की ख़ुशी, उदासी, क्रोध, प्रेम तथा अनेक भावनाओं के बीच सामंजस्य बिठाते हुए सही निर्णय लेना पड़ता है । यह कभी-कभी अत्यंत कठिन होता है ।


Meena Prjapati 
~प्लास्टिक~

प्लास्टिक मजबूत होती है
इसका अंत नहीं होता
रिश्तों का बंधन भी
मजबूत होता है
जिसकी कसावट
टूटती नहीं हैं
प्लास्टिक हंस्ता,
खेलता, रोता
सब होता है
पापा की डांट
की तरह
जमाकर ऊँगली
खींचकर ले जाना
जैसे प्लास्टिक से
वस्तुएं खींची जाती हैं
उसमें तन्यता
अधातवर्धन्यता गुण होते हैं
रिश्ते बड़े वैज्ञानिक होते हैं
इनमें सभी रिएक्शन होते हैं

टिप्पणी: इस तस्वीर में दी गई गोटियां मेरे दिमाग में प्लास्टिक को दिखाती हैं। इसी वजह से मेरी कविता का नाम प्लास्टिक है और मेरे हिसाब से प्लास्टिक और रिश्तों का जोड़ मजबूत होता है जिसे मैने कविता के रूप में रखा है।



नैनी ग्रोवर
 ~ पगडंडी ~

जीवन की
जिस पगडंडी पर
तुमने,
मेरा हाथ थाम
चलना सिखाया
मेरे पाँव
उसी पे चलते रहे,
कभी उदास
कभी मुस्कुराते
लम्हों को संग लिए
कभी कांटे मिले
कभी फूल
कभी मजबूत बनी
कभी कर बैठी भूल,
परन्तु, फिर भी
निरन्तर चली
जाने कब
तुम हाथ छुड़ा गये
और बस,
एक तस्वीर में
समा गये,
ये पगडंडी,
फिर भी,
समाप्त ना हुई,
और मेरे
छाले पड़े पाँव
चलते ही जाते हैं
इसपर,
निरन्तर
निरन्तर ...!!

टिप्पणी: गोटियों को मैंने लम्हों के रूप में देखा । और जीवन की पगडंडी में शामिल किया


गोपेश दशोरा
~ पीढ़ी का अन्तर~


क्यूं नहीं समझते हो पापा,
मेरा भी अपना जीवन है।
मेरे भी तो कुछ सपने है
घर के बाहर कुछ अपने है।
इतना बड़ा हो गया हूं कि,
भला बुरा सब समझ सकूं।
माना थोड़ी सी मुश्किल है,
पर बिना मदद के सम्भल सकूं।
उंगली थामी थी बचपन में,
अब छोड़ नहीं क्यूं देते हो।
पिंजरे में बांध रखा हमको,
क्यूं ना तुम उड़ने देते हो।
यह पीढ़ी-पीढ़ी का अन्तर है,
कभी समझ नहीं तुम पाओंगे।
ना साथ हमारा अगर दिया,
तो तन्हा ही रह जाओगे।
सुन बेटे की यह बात सभी,
माँ-पापा, थोड़े घबराए।
क्या इसीलिए ही सींचा था,
अपने आंगन के पौधे को?
जो बड़ा हुआ तो छाह नहीं,
फल मिले, जो मानो शर्तों को।
काट के अपना पेट जिसे,
दो वख्त खिलाया करते थे।
वो बेटा आँख दिखता है,
जिसे हाथों में सुलाया करते थे।
तू भी कल बाप बनेगा तब,
क्या इस सब से बच पाएगा।
जितना हमने है सहा यहांँ,
तू तनिक नहीं सह पाएगा।
माना तेरे कुछ सपने है,
पर मेरा सपना तो तू ही है।
माना तेरे कुछ अपने है,
पर मेरा अपना तो तू ही है।
मेरे सपने बस टूट गये,
मेरे अपने भी छूट गये।
जिनकी खातिर खुद को झोंक दिया,
वो ही हमसे मुंह मोड गये।
फिर भी,
बेटा, बस तू खुश रहे सदा,
और चाह नहीं कुछ है हमको,
अब घर में रहे या वृद्धाश्रम,
और कितना जीना है हमको।

टिप्पणी: जब माता-पिता अपने बच्चे को उंगली पकड चलना सिखाते है तब एक ही बात मन में होती है कि जब कल वे वृद्ध हो जाएगें तो उनके बच्चे उनका सहारा बनेंगे। लेकिन समय का पासा क्या लेकर आता है यह कोई नहीं जानता।



डॉली अग्रवाल 
~पिता~

मुझे वो अपना नाम देता है
सुकूँ के सुबह शाम देता है
पिता है वो मेरा ...
मेरे साथ ही जन्म लेता है !
भगवान है वो जमी पर मेरा
हर ख़ुशी मेरे नाम करता है
ऊँगली पकड़ सम्भालता है
माथे पे दे प्यार का बोसा
रोज मुझे संवारता है ...
पिता है वो मेरा , मेरे साथ ही जन्म लेता है !

टिप्पणी :माँ और पिता को परिभाषित करना वश में नही मेरे ! एक छोटा सा प्रयास मात्र !


प्रभा मित्तल
~~ये गोटियाँ~~
~~~~~~~~~~~

ये केवल दो गोटियाँ नहीं
हैं जीवन के अनिवार्य अंग।
मात-पिता दुःख सहकर भी
भरते हैं खुशियों के रंग।

एक जब धमकाता है
दूजा गले लगाता है
दुलरा कर,बहलाकर
चलना भी सिखलाता है।

ये जीवन की सौगात हैं
व्यक्तित्व की पहचान हैं
इन से ही देह में रक्त है।
नहीं! तो मानव अशक्त है।

आशीष साथ हो जब इनका
पथरीली पगडण्डी भी
मखमल सी बन जाती है
संसार चक्र में पिसकर भी
हम ऊँचा उठते जाते हैं।

टिप्पणी: गोटियों  को गोटियाँ नहीं बल्कि माता-पिता का रूप देकर उन्हें जीवन का अनिवार्य अंग माना है।


अलका गुप्ता
~ तस्वीर के दो पहलू ~

हर तस्वीर के दो पहलू होते हैं
सकारात्मक है तो... नकारात्मक भी है !
आज का शिशु...बालक
कल पिता बनेगा
जब कि चल रहें हैं दोनों ही
साथ होते हैं...फ़िर भी..
कोई बचपन देखता है...
और...कोई बुढ़ापा !
एक ही तस्वीर के हैं दो पहलू
यदि आज कोई मृत हुआ तो..
जन्म तो निश्चित ही हुआ होगा
किसी ने मृत्यु गाई तो...
किसी ने जीवन गाथा...
बस उसी तरह से...
जिस तरह से पासे मॆं
अंकित अंक...जो कभी
हर्ष का कारण बनते हैं...
और कभी विषाद का !
लेकिन जो तस्वीर हम देखना चाहते हैं....
वह नज़र वह इशारे तभी
हम देख सकते हैं जबकि
वह ईश हमें दिखलाये.
मतलब साफ है...
यहाँ एक तस्वीर के हम
बेशक ...
मोहताज हों मगर...
तस्वीर का प्रतिबिम्ब
हमारे भावों का मोहताज है
और हम उस ईश्वर की
बख्शी हुई नज़र के !!!

टिपण्णी: बस यूँ ही हाथ फोन पर चलते रहें तस्वीर कॊ देख कर भाव मचलते रहें...जो भी लिखाया उस खुदा ने लिखाया मेरा कोई कसूर नही....न ही कोई कारीगरी !


कुसुम शर्मा
~कुसुम शर्मा छूटते रिश्ते~
---------
हाथ पकड़ कर चलना सिखाया
अच्छे बुरे का भेद बताया
दुख मे जिसने सदा सम्भाला
मात पिता का रिश्ता निराला
जिनकी छाया मे बड़े हुये
हर ज़िद मे उनसे अंडे रहे
पूरी होने पर गले लगे
उनकी डाँट प्यार से बड़े हुए
अपनी कामयाबी के मद मे
आज क्यो उनको भूल गये
वृद्धाश्रम बनाकर
उनकी सेवा से मुक्त हुए
जिन्होंने हमारी खुशी के लिए
अपने हर सुख त्याग दिये
आज हमने वृद्ध अवस्था मे
उनको ही त्याग दिया
कल ये दिन फिर लौट के आयेगा
जो बनाये वृद्धाश्रम हमने
वो ही हमारा घर कहलायेगा !!

टिप्पणी 
पिता की अंगली पकड़ कर हम चलना सीखते है उनकी छाया मे बड़े होते है और बड़े होने पर हम जब उन्हे हमारी अवश्कता होती है तो हम उनको वृद्धाश्रम मे छोड आते है और ये भूल जाते है कि जो हम बो रहे है वही काटेंगे जिन्होंने हमारी खुशी के लिए दुख उठाये हम आज फिर अपनी झूठी खुशी के लिए फिर से उन्हे दुख दे रहे है !!




सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Wednesday, August 3, 2016

तकब खुला मंच #3



तकब खुला मंच #3
समूह का यह तीसरा खुला मंच है. माह के अंतिम सप्ताह में प्रतियोगिता नही होगी. यह एक खुला मंच होगा चर्चा, परिचर्चा, समीक्षा हेतु. इस खुले मंच में हम एक युवा प्रतिभावान रचनाकार को आमंत्रित करेंगे. उनकी कविता के साथ एक चित्र प्रस्तुत करेंगे [ चित्र हम प्रस्तुत करेंगे उनकी रचना पर]. परिचर्चा के दौरान वे ही आपकी रचनाओं की समीक्षा करेंगे - एडमिन किरण प्रतिबिम्ब
इस बार हम आमंत्रित कर रहे है मृदुल भाषी, होनहार, युवा लेखिका कवियत्री , साहित्य प्रेमी मीना प्रजापति जी को। वे अभी दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉक्टर भीम राव अम्बेडकर कॉलेज से हिंदी पत्रकारिता एवं जनसंचार पढ़ रही है। वे अभी तृतीय वर्ष की छात्रा हैं। कवितायेँ लिखने का शौक रखती है। इस मंच के लिए भी इन्होंने इस बार कविता भेजी थी मुझे सन्देश रूप में भेजी थी जिसे मैं न देख पाया न ही शामिल कर पाया। क्षमा के साथ उनकी एक अन्य कविता 'जूड़ा' यहाँ पेश कर रहा हूँ। प्रेषित चित्र केवल आपके लिए है। उनकी कविता पर यह चित्र केंद्रित नही है।
मीना जी को इस परिवार की ओर से हार्दिक बधाई एवम् शुभकामनाएं।
- जूड़ा -
ऐसे लपेटती हूँ उसे
जैसे सारी झुंझलाहट
हाथो की उँगलियों में
लपेट ली हो
खूब कसकर
मसोस देती हूँ जुड़े को
जब खुल जाती हैं
काली स्याह गुस्से की लड़ियाँ
अमेंठती हूँ
समेटती हूँ
खुद को जूड़े की तरह
बार बार खुल जाता है
बिखर जाता है
फिर खुद को शांत कर
उसको समझाती हूँ
तुम हर भाव में
मेरे साथ हो
किलो में नहीं बिकते हो
भावनाओं में बह जाते हो
गुस्से में गुस्सा हो जाते हो
ख़ुशी में खिलखिलाकर
सिमट जाते हो
चिलमिलाती धूप में भी
जूड़ा शिकायत नहीं करता
तुम तो मनचले हो
इसलिये ही
उसे देखते ही
हवाओं मे उड़ जाते हो
मेरी किरकिरी, मिसमिसि
कशमकश, दुविधा
सब जुड़ जाती है
जूड़े के साथ
(आप सभी इस चित्र पर अपने भाव दस पंक्तियों एवं शीर्षक के साथ 1 अगस्त 2016 तक लिख सकते है। मीना जी समय पर उन रचनाओं पर अपनी राय या विचार रखेगी - धन्यवाद )



Kiran Srivastava 
इंतजार
===================
खत ना खबर...
बेबस सी नजर
ढूंढती है तुम्हें,
लौट आओगे,
फिर पास मेरे।
अपलक निहारती
आंखें राहों को...
खिचती चली आतीं हूं
रोज बेबस होकर,
तेरे इंतज़ार में....
मिलने का वादा
जो तुम कर गए
इन वादियों में...!!!
कैसे समझाएं
पागल दिल को....
जो बैठा है
आस लगाए,
कि शायद तुम
फिर आ जाओ,
इसी इंतजार में.....!!!!



डॉली अग्रवाल
इंतजार

इंतजार सिर्फ एक
कोशिश है
इस सच्चाई को
झुठलाने की
कि
वादा करके भी
तुम आओगे नही !
मेरे तुमहारे बीच
एक रौशनी का
फासला
तुमहारे पलट आने
से भी क्या
मिट पायेगा !
इंतजार खत्म नही होता
उम्र और वक्त गुजर जाता है
कोई अपना सा , रूठा सा
बस खो जाता है !!



नैनी ग्रोवर 
खाली वादियाँ

बिरह के पिंजरे में, कैद हुई,
जाने नहीं मेरी पीर कोई,
रिस्ता है लहू, मेरे सपनों का,
ज़रा देखे कलेजा चीर कोई..
पखेरू बन उड़े,
सारे सपने हवाओं में,
घुल गया कजरा,
इन उजरी घटाओं में,
चुभती है निगाहों को,
ये महकी हरियाली,
उतर जाए सीने में,
जैसे के तीर कोई..
खाली-खाली सी,
लगती हैं ये वादियाँ,
देखूँ जिधर भी,
तेरी यादों का ही घुआं,
सर्द मौसम भी,
तपने लगा आजकल,
रंग आसमान भी,
अपना रहा है बदल,
आजा के, आके बंधा जा,
मुझे अब धीर कोई,..!!




Prerna Mittal 
प्रकृति

एक आम, मामूली सी, पहाड़ी सी लड़की,
सीढ़ीनुमा खेतों में बेफ़िक्र घूमती सी लड़की,
देखकर जल जाए कोई, ख़ुशगवार सी लड़की,
पर कुछ ख़ास नहीं, क्यों? आकर्षक सी लड़की ।

हिमालय की वादियाँ ही जिसकी दुनिया,
यहीं पाती वह अपनी सारी ख़ुशियाँ ।
दिन भर माँ का हाथ बँटाती,
रात को उसी के आँचल में सो जाती ।
ना और कुछ चाहा रब से,
ना और कुछ माँगा उससे ।

आज कोई बाबू साहेब आए थे घर में,
दौड़ती खतिरदारी करती अतिथि की क्षण में ।
जाने के बाद उसके मन में कुछ खटक गया,
किसी आशंका से दिल उसका धड़क गया ।

फिर सुना उसने किवाड़ की आड़ से,
बाबा जो बता रहे थे अम्मा को उत्साह से ।
ये हैं दिल्ली में बड़े नामी व्यापारी,
लाडो राज करेगी अब, हमारी ।

दहेज लेना तो दूर वे हमारा क़र्ज़ भी उतारेंगे,
हमारी पल-पल डूबती नैया को पार उतारेंगे ।

उसके पैरों के नीचे से तो ज़मीन ही सरक गई ।
भागते हुए दूर तक पहुँची, आँखें छलक गईं ।
यहाँ फैली हरियाली और हिमाच्छादित पर्वत,
देते उसे असीम शांति, जब भी पड़ती ज़रूरत ।

बैठी ताकती वह चुपचाप अपने अनूठे जहान को,
नहीं चाहती छोड़कर जाना वह इस उद्यान को ।
क्या वह अपना हृदय किसी के समक्ष खोल पाएगी ?
या फिर पिता की आकांक्षाओं पर बलि चढ़ जाएगी ।




प्रभा मित्तल 
~~प्रतीक्षा ~~
~~~~~~~~~~
रोज सोचती हूँ ,पाती आएगी
कहे अनकहे दर्द समेट लाएगी

बैठी तकती हूँ होकर मौन......
बेज़ुबान मगर बोलती सी
हरी -भरी इन वादियों में,
ऊपर से नीचे जाती,
नीचे से ऊपर आती
ये पगडण्डियाँ...
मेरा भी ख़त लाएँगी
बहुत दिनों बाद मुरझाए मन में
मुसकानों की कलियाँ खिल जाएँगी

रोज सोचती हूँ ,पाती आएगी
कहे अनकहे दर्द समेट लाएगी।

इन दरख़्तों के झूमते तन से,
घटाओं के गरजते मन से,
हवा की साँय-साँय और
बरसते कुहासे की धुंध में
नहाई इन वादियों से
रोज पूछती हूँ
स्वप्नों की स्वर लहरी, क्या
सचमुच, आकर मुझे जगाएगी -
मान औ मनुहार की सौगंध खिलाएगी।

रोज सोचती हूँ ,पाती आएगी
कहे अनकहे दर्द समेट लाएगी।




प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
-इंतज़ार-

प्रेम का संसार बड़ा है मेरा
तुझ में ही बसा है जग सारा

रोम रोम पुकारता है जब तुम्हें
अहसासों में खो जाता तन मन मेरा

यह मेरा ख़्वाब ही सही
पर लगता है मेरे मन को प्यारा

रुठने मनाने का मौसम आया नहीं
और दूरियां बिगाड़ रही खेल सारा

हर पल मेरा गुजरे बाहों में तेरी
बस इंतज़ार है मुझे जब वक्त हो हमारा

[ मीना  जी आपका  हार्दिक  धन्यवाद  'तस्वीर क्या बोले'  समूह  परिवार  की  ओर  से, भविष्य  के  लिए  शुभकामनाएं ]

सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Sunday, July 31, 2016

#‎तकब९‬ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता #9 ]



‪#‎तकब९‬ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता #9]
मित्रो लीजिये अगली प्रतियोगिता आपके सम्मुख है. नियम निम्नलिखित है 
१. दिए गए चित्र पर कम से कम १० पंक्तियों की काव्य रचना शीर्षक सहित होनी अनिवार्य है [ हर प्रतियोगी को एक ही रचना लिखने की अनुमति है]. 
- यह हिन्दी को समर्पित मंच है तो हिन्दी के शब्दों का ही प्रयोग करिए जहाँ तक संभव हो. चयन में इसे महत्व दिया जाएगा.
[एक निवेदन- टाइपिंग के कारण शब्द गलत न पोस्ट हों यह ध्यान रखिये. अपनी रचना को पोस्ट करने से पहले एक दो बार अवश्य पढ़े]
२. रचना के अंत में कम से कम दो पंक्तियाँ लिखनी है जिसमे आपने रचना में उदृत भाव के विषय में सोच को स्थान देना है. 
३. प्रतियोगिता में आपके भाव अपने और नए होने चाहिए. 
४. प्रतियोगिता २३ जुलाई २०१६ की रात्रि को समाप्त होगी.
५. अन्य रचनाओं को पसंद कीजिये, कोई अन्य बात न लिखी जाए, हाँ कोई शंका/प्रश्न हो तो लिखिए जिसे समाधान होते ही हटा लीजियेगा.
६. आपकी रचित रचना को कहीं सांझा न कीजिये जब तक प्रतियोगिता समाप्त न हो और उसकी विद्धिवत घोषणा न हो एवं ब्लॉग में प्रकशित न हो.
विशेष : यह समूह सभी सदस्य हेतू है और जो निर्णायक दल के सदस्य है वे भी इस प्रतियोगिता में शामिल है हाँ वे अपनी रचना को नही चुन सकते लेकिन अन्य सदस्य चुन सकते है. सभी का चयन गोपनीय ही होगा जब तक एडमिन विजेता की घोषणा न कर ले.
निर्णायक मंडल के लिए : 
1. अब एडमिन प्रतियोगिता से बाहर है, वे रचनाये लिख सकते है. लेकिन उन्हें चयन हेतु न शामिल किया जाए.
2. कृपया अशुद्धियों को नज़र अंदाज न किया जाए.


इस बार विजेता रही "सुश्री प्रेरणा मित्तल जी" -  बधाई एवं शुभकामनाएं 



अलका गुप्ता

~~~~~~~~~~~~~
~~~जीवन चक्र~~~
~~~~~~~~~~~~~
था पड़ा फर्श पर
उठा प्रयास कर
हुआ फिर..अग्रसर
खड़ा हुआ...तन कर
कर्म...अधीन हो
झुकने लगा सर
हो कर जर-जर
गिर गया वह सर
फिर धरा पर...
बना राख..और..
जल कर ...
माटी का था
माटी में मिला
वह त्रिण सा
तन का..तिनका
चोला वह आत्मा का
आत्मा अजर अविनाशी |
रहेगा..घूमता
पुनः पुनः ..इस ..
सृष्टि में ...
चक्र सा वह...
घूम कर ||


टिप्पणी: जीवन चक्र..का वर्णन समझा रही हैं चित्र की तीलियाँ उसी परआधारित मेरी यह पंक्तियाँ लिखने का प्रयास रहा है |



Kiran Srivastava 
"जीवन चरण"
===================
धरती पर मानव आता है
अक्षम अपनें को पाता है,
कोशिश करके धीरे-धीरे
फिर घुटनों पर चल पाताहै ,

और जीवन चलता जाता है...।

फिर बारी चलने की आती
हर कदम सहारे की पड़ती,
गिर-गिर कर फिर जीवन में
वो सम्भलना सीख जाता है,

और जीवन चलता जाता है...।

अब बारी दौड़ लगानें की
शिक्षा संस्कार अपनानें की,
पढ़लिख कर जीवन में फिर
वो अपने मुकाम को पाता है,

और जीवन चलता जाता है....।

कमर तोड़ मेहनत करके
फिर मानव थकता जाता है,
लड़ते लड़ते वह जीवन से
अपना हर फर्ज निभाता है,

और जीवन चलता जाता है...।

जीवन का अंतिम पड़ाव
जर-जर शरीर कांपता पांव,
मिट्टी से बना शरीर एक दिन
पंचतत्व विलीन हो जाता है,

और जीवन चलता जाता है...।

===================
टिप्पणी- जन्म के बाद मनुष्य विभिन्न अवस्थाओं को पार करते हुए पुन:मृत्यु को प्राप्त करता है। चित्र में तीलियों के माध्यम से भी यही दर्शाया गया है।यह चक्र निरन्तर चलता रहता है।



गोपेश दशोरा 
~अमूल्य जीवन~

मानव जीवन तूने पाया,
पाकर भी तू क्या कर पाया?
जन्म लिया और बड़ा हुआ,
अपने पैरा पर खड़ा हुआ,
चला गया एक रोज बस,
औरों के कन्धे चढ़ा हुआ।
इस जीवन का क्या मतलब है,
तू समझ नहीं पाया इसको,
किसकी खातिर तू जिया यहाँ
क्यूं याद करे कोई तुझको।
अपनों के लिए सब जीते है,
सपनों के लिए सब जीते है,
औरों के लिए जो जीते है,
जीवन को वो ही जीते है।
कुछ कर्म यहां तू कर ऐसा,
मानव जीवन बदनाम ना हो,
आए, भोगे और चले गये,
पशु तुल्य सा काम ना हो।
यह तिनके सा मानव जीवन,
एक दिन ऐसे ढह जाएगा,
जिस पर तुझको अभिमान बहुत,
सब यहीं धरा रह जाएगा।
ऐ मनुज! जीवन बस इतना है,
हर चीज पे तू अधिकार ना कर
एक तीली कर देगी राख तुझे,
इस देह पे तू अभिमान ना कर।

टिप्पणीः जन्म से मृत्यु तक का सफर इन तीलियों में नजर आता है। पर क्या यह सफर ही जीवन की सच्चाई है? क्या इसीलिए विधाता ने हमें धरती पर भेजा है? इन्हीं भावों को शब्दों का रूप दिया है।




नैनी ग्रोवर 
~जीवन का सार~

सारे जीवन सार,
इक ही तस्वीर में कह गए,
थरथरा उठी कलम,
और हम भौंचके रह गए...

जन्म से मरण तक,
घूमा समय का पहिया,
जैसे आए, वैसे गए,
किया कुछ भी नही भैया,
लूटते रहे एक दूजे को,
यूँ बनके उच्चके रह गए..

कुछ ऐसे फंसे माया में,
के ठगनी ने ठग लिया,
बेच दी उसको अच्छाइयां,
और झूठा जग लिया,
कर्मों की दुकानदारी में,
हम तो बड़े कच्चे रह गए..

याद आया कभी मोक्ष तो,
भागे आश्रमों में,
बन्द कर आँखे, ज्ञान पाने,
इंसान के कदमों में,
बहल गये, जिसने बहलाया,
बस बनके बच्चे रह गए...

थरथरा उठी कलम,
और हम भौंचके रह गये..!!

टिप्पणी;, जन्म से मृत्यु तक का सफर सब जानते ही हैं परंतु आखिरी तीली ( अंजाम ) देख कर दिल फिर भी काँप जाता है, और जीवन भर कर किये कर्म याद आने लगते हैं ।


बालकृष्ण डी ध्यानी
~बस राख हो जाना और कुछ नहीं~


बस राख हो जाना और कुछ नहीं
जीवन है बस ये (और कुछ नहीं) ..... ३

किस का बस चला है
कौन यंहा पर रहा है
चलते हैं मिटने को सब
एक के बाद एक (ये सब को पता है) ..... २

लड़ते हैं फिर भी सब हैं झगड़ते
ना जाने किस बात पर सब क्यूं अकड़ते
ना जाने क्या खोया है यंहा पर क्या है खोजते
अब तक ना इस को ( कोई समझा है) ... २

जीवन चक्र है ये बस चलता रहा
रुकने का मतलब बस यंहा पर अलविदा है
कहानी है बस ये सबको सुनानी
आती जाती है ये बस (साँसों की रवानगी ) .... २

बस राख हो जाना और कुछ नहीं। ...........

टिप्पणी : जीवन के भेद को अब तक ना कोई समझ पाया है ना जान पाया है फिर भी लगे रहते ना जाने किस के लिये और क्यों सब के सब


Prerna Mittal 
~आवर्तन~

प्रभात से रात तक की यात्रा के विभिन्न चरण ।
देते जीवन की अवस्थाओं का विस्तृत विवरण ।

रात्रि के अंक से भोर की तरह जन्म लेता है लाल
लालिमा देखकर, माँ उसकी हो जाती है निहाल ।
घर भर में उसकी किलकारियाँ ऐसे गूँजती
प्रातः कलरव करती हों, चिड़ियाँ जैसे कूकतीं ।

उषा जिस तरह समाँ गई सुबह के पसरे आँचल में
बालक बढ़ रहा, घुटलियों चलता, रेंगता आँगन में ।
सवेरे ने करवाया स्फूर्ति व ताज़गी का अहसास
मासूम अठखेलियाँ उसकी, हृदय में भरती मिठास ।

आकाशचोटी पर अब सूर्य है चमक रहा
किशोरवय बालक का चेहरा है दमक रहा ।
रवि की सतरंगी रश्मियाँ जैसे ख़ुशी से झूम रहीं
नई आकांक्षाएँ, उमंगे उसके मन में भी झूल रहीं ।

दोपहर की कड़ी धूप है चारों दिशाओं में फैली,
अब दायित्वों से परिपूर्ण है उसकी भारी झोली ।
उष्णता के आवेश से जग है समस्त जल रहा ।
संघर्षों के बीच में से है पथ उसका निकल रहा ।

इस सुहावनी शाम की चहल-पहल में एक अजीब सी शांति है ।
खट्टे-मीठे अनुभवों की सौग़ात, परिपक्वता की कांति है ।
संध्या पहरा देती चौखट पर, लेकिन प्रविष्टि की चाहत में अंधकार है मँडरा रहा ।
पल-पल झुकती कमर के साथ हर पाप-पुण्य का लेखा-जोखा है याद आ रहा ।

निशा की धुँध चहुँओर, पसरी हुई है नीरवता।
चिरनिद्रा द्वारा, सांसारिक बंधनों से स्वच्छंदता
आरंभ ही दबी ज़ुबान में, अंजाम तय कर देता है ।
सुनता है हर शख़्स पर समझने से इंकार करता है ।

टिप्पणी : रात और दिन के चक्र से जीवन चक्र की समानता बताने की कोशिश की है । जिस तरह हर रात की सुबह निश्चित है और सुबह का अंत भी तय है । उसी प्रकार जन्म के बाद मृत्यु और फिर पुनर्जन्म का चक्र चलता रहता है ।


डॉली अग्रवाल 
~मन कस्तूरी~

तृष्णाओं की इस नगरी में
जिसका ओर ना कोई छोर
उम्र की चौखट पे
गिर के उठा , उठ के गिरा
ये तेरा --- ये मेरा
दुनिया दो दिन का रैन बसेरा
मिट्टी का तन था
सोने का मन था
मिट्टी में मिलता गया
फिर हाथ मलता तू रह गया
मुठ्ठी बांधे आया जग में
हाथ पसारे चल दिया
तेरे मेरे के खेल में
खुद को गवा कर चल दिया !!

टिपणी --- मिट्टी की काया फिर भी इंसान भरमाया


कुसुम शर्मा 
~नफ़रत~
-------------

कपट वो करता रहा
इर्ष्या की अग्न मे जलता रहा
बन कर अपना
अपनो को छलता रहा
नफ़रत का बारूद
हर किसी को वो
छल से देता रहा
जता कर झूठा प्रेम
प्रेम को छलता रहा
भर दिया उसने
एक दूसरे के
मन मे बैर
सुलगा कर
नफरत की तिल्ली
तमाशा वो देखने लगा
भस्म करके भाई चारा
कपट मुस्कान भरने लगा
जला कर घर प्रेम का
नफ़रत का बोया बीज
धर्म और जाति की
खींच दी लकीर !
क्या मिला उसको
जो उसने किया
जला कर
एक माचिस की तिल्ली
भस्म घर प्रेम का किया !!

टिप्पणी :- नफरत की आग लगा कर धर्म और जाति के ठेकेदार अपने स्वार्थ की सिद्धी करते है लोगो के मन मे एक दूसरे के प्रति भेदभाव भर कर अपना उल्लू सीधा करते है लोग इनके चक्कर मे आ कर एक दूसरे से लड़ने लगते है नफरत रूपी माचिस की तिल्ली सब कुछ जला कर राख कर देती है और ये अपने कार्य मे सफल हो जाते है !!


Madan Mohan Thapliyal शैल 
~मैं ( मानव )~


ए मैं ही तो हूँ -
ए मेरे ही अलग - अलग रूप हैं -
पंचतत्वों से निर्मित -
शैशव से जरा तक, यों कहूँ जन्म से मृत्यु तक-
जिन्दगी को हथेली पर लेकर घूम रहा हूँ -
एक जलते दिए की तरह-
जो कभी फड़फड़ाता है -
कभी अँधेरे को चीरता है -
कभी हौसला और हिम्मत बढ़ाता है -
उम्र बढ़ रही है, तेल सूख रहा है -
मैं अपने में ही खोया हूँ, भविष्य से अंजान -
शैशव - हर सुख का भंडार -
बालपन - अंतर्ज्ञान से भ्रमित -
युवा - भौतिक सुखों की चाह -
प्रौढ़ माया का पुतला, अंधी दौड़ -
जोड़ - तोड़ में, सर्वस्व न्योछावर -
सत्य से बे खबर -
यहाँ सब कुछ उधार का है -
चुकता तो करना ही पड़ेगा -
खाली हाथ आया था, खाली हाथ जाना पड़ेगा -
सूरज अस्ताचल की ओर गतिमान -
सारे सुख वैभव आँखों से ओझल -
सब तिरोहित , यहां तक कि रिश्ते नाते भी -
जब झुकना था, झुका नहीं, रुकना था रुका नहीं -
समय बलवान है -
उसके आगे कहाँ किसकी चलती है -
झुकना ही पड़ा, मर्जी से नहीं, अपने कर्म से -
इन्द्रियों ने खुद को समेट लिया -
सब कुछ घट रहा है, घिसटना जारी है -
बचपन में भी घुटनों के बल घिसटता था -
तब और आज में बड़ा अन्तर है -
तब ऊपर उठने की चाह थी -
अब ऊपर जाने की -
ए शोर कैसा -
शरीर धीरे - धीरे शिथिल हो रहा है -
भास्कर भी अपने तेज को समेट रहा है -
सब निश्चल खड़े हैं -
माया मोह सब शांत -
धर्म, तीर्थ, श्री, ऐश्वर्य ,जाति, रुतबा -
सब शरीर का साथ छोड़ रहे हैं -
सब यहीं रह जाएगा -
ज्ञान का उदय और अस्त एक साथ -
मैं किंकर्तव्य- विमूढ़ -
शायद बुलावा आ गया -
सब चलेंगे श्मशान तक -
आगे का रास्ता 'आत्मा' को तय करना है -
एक हिचकी और सब खत्म -
देह पंचतत्व में विलीन -
शेष यादें ---
अलविदा .
नोट - समस्त जीवों में मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो चैतन्य होकर काफी हद तक जीवन की परिभाषा से परिचित है लेकिन माया से वशीभूत वह अपने कल से अपरिचित हो जाता है, फलस्वरूप वह अपने कर्तव्य का निर्वाह ठीक से नहीं कर पाता. मृत्यु शाश्वत सत्य है या यों कहें कि अगले जीवन की तैयारी है इसलिए मृत्यु की विदाई भी सुखद होनी चाहिए.



Ajai Agarwal
 ''रुदन में आनंद के क्षण ''
===================

अलि ; है मुझे अहसास इसका -
जन्म-जन्मांतर से सदा ही -
तू रहा है साथ मेरे !
रुदन में आनन्द के क्षण
मूक से फिर मुखर होना
बालपन की रुनझुनों में
ममता बना था , साथ मेरे ,
तू रहा है साथ मेरे !
अनुराग हर वय का है अपना
स्वप्न का व्यवसाय जीवन
उन्नति , गती जब , हो गयी
पिता सा संबल बना ,
तू रहा तब साथ मेरे !
शत-शत कामनाओं के अंधड़
आपाधापी , कलरव लगे जब
हर लक्ष्य हर ध्येय में भी
तू ही तो था साथ मेरे !
कंटकों का रूप लेकर
गन्तव्य के वो पथ जो आये
पग ने मंजिल ढूंढ ही ली ,
तू सदा था साथ मेरे !
पूछती अब मैं स्वयं से -
चिर-पिपासित हृदय क्यूँ ये ?
क्या यही पाथेय मेरा ?
क्यों तुझे न जान पायी ?
क्यों नहीं पहचान पायी
तू तो सदा था साथ मेरे !
गोधूलि की बेला सुहानी -
लाल सुनहरे रंगों से सज्जित
आँचल , दिशाओं ने है ओढ़ा
कज्जल निशा के आगमन का
है यही संदेश मुझको
तू अभी भी साथ मेरे !
अलि ! यूँ ही रहना साथ मेरे !
जब चढ़ूँ मैं ज्वाल रथ पे
वह्नि हो प्रचण्ड जाये ,
चिंगारियों से सेज जगमग ।
ज्यूँ ; बादलों के बीच बिजली
अलि ! बादलों से झांकना तू ;
मेघ के अश्रु में ढलकर
चिर -पिपासित हृदय को तू
मिलन का उत्सव बनना !
अलि! तू मेरे ही साथ रहना !
तू रहा है साथ मेरे !
पितुमात , प्रियतम और बच्चे
अन्य सारे रिश्ते नाते ;
प्रवृत्तियां - दायित्व -जीवन
बस एक कम्पन एक थिरकन
सांस बनके मिट्टी के तन में
तू रहा है साथ मेरे ,
क्यूँ जांनने में देर करदी ?
क्यों मैं न तुझे , पहचान पायी ?
गर तुझे पहचान जाती
संगीत हो जीवन ये जाता
मैं जरा कुछ संवर जाती
प्यार की मूरत हो जाती
अलि ; अब तुझे मैं जानती हूँ
तू सदा था साथ मेरे
मेरी साँसों में छिपा था !
जीवन मेरा तुझको समर्पित
ध्येय ये ; तुझको मैं जानूं।। आभा।। ......

टिप्पणी........ जन्म के रुदन के आनंद से लेकर मृत्यु के संगीत तक ---इस चित्र में जीवन की हर अवस्था को दिखाया गया है --काश हम भी इस सत्य को समझें जीवन चंद सालों का ही मेला है --अंतिम लक्ष्य उस परमात्मा को पाना ही है जो हमारे साथ ही है हर पल सांस के रूप में ---साधना अभ्यास ,विवेक ,हित -अनहित ,शक्ति , साधक ,साधना विक्षेप ,स्वानुभूति ,प्रकाश आह्लाद सब कुछ ईश्वर को अर्पण कर दें तो '' त्येन त्यक्तेन भुञ्जिथ :'' की आनन्दानुभूति होगी और ''मा गृध:'' का अर्थ बोध होगा --लोभ लालच आसक्ति मिटेगी जिंदगी प्यार का गीत बन जायेगी -----जन्म और ज्वालरथ के सजने ,यानि मृत्यु के रुदन में आनन्दानुभूति ही होगी --''नवानिगृह्णातिनरोपराणी '' की मानिंद ।




Sunita Pushpraj Pandey 
~जीवन यात्रा~

लिखना है मंथन कर रही हूँ खुद का
परिभाषित करना है जीवन का सारांश
यू तो कह दूँ चंद शब्दों में
कि बचपन खेल में खोया,
जवानी चैन से सोया,
बुढ़ापा देख कर रोया!
पर कहना आसान है जीवन की गाथा
सबके लिए जीये ताउम्र
जब हसरत से देखा किसी को
लोगों ने मुहँ फेर लिए परीक्षाएं देते रहे
पास होते रहे न वजीफा मिला न कोई इनाम
बस दूसरों की मुस्कान को ही अपनी संतुष्टि मान
खुश हो लिये।

टिप्पणी - जीवन का वृतांत लिखना था पर जो उम्र भर दूसरों के हिसाब से चला हो वो क्या लिखेगा


प्रभा मित्तल 
--जीवन-संघर्ष--
-------------------------------------

क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर,
पञ्च तत्व से मिलकर बना शरीर।
अद्भुत है प्रकृति
नटी का क्रम भी।
सींचा मन से
अंगुल-अंगुल कर पाला
कर पूरी रखवाली।
घर-आँगन अब
गूँज रही किलकारी।

अपनी क्रीड़ाओं से
जग को हौले से महकाता
मोह पाश में बाँध
शिशु शैशव से
आगे बढ़ता जाता।

सपनों को पूरा करने में
एड़ी से चोटी तक जोर लगाता।
आशा और निराशा के झूले में
अकसर हिचकोले खाता।

यहीं से होता शुरु
जीवन का खेला
आगे बढ़ने की खातिर
संघर्षों का मेला।
मैंने देखा है बहुत करीब से
ढोती साँसों को
बदहवास और अकेला।

आज नहीं लिख पा रही मेैं
जीवन-चक्र की कथा
जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत।
जरूरी नहीं जी जाए मानव
सारी अवस्थाएँ,जीवन की
क्योंकि, उसका तो
हो जाता है...कभी भी अंत।

टिप्पणी : (जीवन आजीवन एक संघर्ष ही है ।)


सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/