Friday, July 19, 2019

तकब – ३/१९




मित्रो नमस्कार !
सुबह का सूरज नई उम्मीद और आशा को लेकर उदय होता है. व्यक्तिगत, सामाजिक या राजनितिक सुबह के भाव से उपजी आपकी रचना निम्नलिखित शर्तों के साथ इस प्रतियोगिता में शामिल कीजिये.
नियम :
१. इस चित्र पर उभरे हुए आपके भाव जिसे शीर्षक व् एक टिप्पणी [ आपके शब्दों का कारण व् सृजन के पीछे की सोच ] के साथ लिखना है.
२. किसी भी काव्य विधा में कम से कम १०- १२ और अधिकतम २४ पंक्तियों में आपको अपने भावों को रखना है. अगर आप किसी नई विधा में लिख रहे हैं तो अवश्य उसका उल्लेख करे.
३. कृपया किसी भी सदस्य की रचना पर टिप्पणी रूप में अपनी टिप्पणी न लिखे. यदि आप पोस्ट के संबंध में कोई बात पूछना चाहते है तो अवश्य पूछे लेकिन समाधान के बाद टिप्पणी को हटा लिया जायेगा.
४. निर्णायक मंडल के सदस्य केवल प्रोत्साहन रूप में लिख सकते है और आशा है वे प्रोत्साहन हेतु अवश्य अपने भाव समय से पूर्व प्रेषित करेंगे.
५. आप अपनी रचना को परिणाम घोषित होने व ब्लॉग में पोस्ट होने के बाद ही आप अन्य स्थानों पर पोस्ट कर सकते है.
६. रचना पोस्ट करने की अंतिम तारीख २१ जून २०१९ है.
७. शुभकामनाएं !!!!

इस प्रतियोगिता की विजेता है सुश्री अल्का गुप्ता 

प्रजापति शेष
युग सहस्र योजन पर भानु

मेने संकेतों में बतलाया था,
उसे तुमने झुठलाया है |
बाल पवन ने रवि खाया था,
तुमने पाखंड बताया है |
यह प्रकृति का खेल है,
तुमने प्रपंच बताया है|
मेरी वाणी साकार करने,
यह दृश्य उभर आया है|
यह तो प्रतीक मात्र है
जिसे गीतों में गाया है|
तुम करते रहो शौध,
हमने जो पहले पाया है||

टिप्पणी: हमारी कथाओं में बाल हनुमान ने क्षुधापूर्ति हेतु सूर्य को भक्षण करने का प्रयास किया था,जिसको कुछ विधर्मी काल्पनिक बता कर परिहास करते हैं,लेकिन जब इस तरह के परिदृश्य उभर कर आते है तब लगता है कि प्रकृति हमारी कथाओं का समर्थन करते हुए प्रमाणित करती है कि, सब कुछ सम्भव और सत्य है जो हमारे ग्रन्थों में लिखा हुआ है।


आभा अग्रवाल Ajai Agarwal
सनातनी टोटम
--------------
एक बार की बात ,सुलाकर बजरंगी को
माँ अंजनी चलीं नदी में पानी लेने
माँ को हुआ बिलम्ब इधर था बालक जागा
हुआ भूख से व्यथित ,कुटिया से बाहर आया
आसमान में लाल- लाल सूरज उगता देखा !
वेग भूख का बहुत ,बालक ने उसको फल समझा
उड़ चला लाल अंजना का ,सूरज को खाने
पिता पवन चले वेग से बालक को, सूरज तक पंहुचाने
सूरज को उठा झट से बजरंगबली ने मुहं में डाला
हाहाकार मचा जगती में ,पर था अभी वहां इक फल काला
था राहु वो जो डोल रहा था सूरज के पीछे
लपका बालक काले फल पे ,जान बचा के राहु भागा
दिया संदेशा देवराज इंद्र को वो घबराया। ऐरावत पे चढ़ के आया
बालक ने देखा अरे एक और सफेद फल आया
चलूँ इसे भी खाऊं बजरंगबली का मन ललचाया
घबराहट में छूट गया वज्र इंद्र के हाथों से -
मूर्छित हुआ नन्हा बालक ठुड्डी टूटी ,पवन क्रोध में आया -
वायु हो गयी बंद ,साँसे सबकी अटकीं ,देवराज मूढ़ावस्था में -
ब्रह्मा विष्णु शिव सभी दौड़े आये सारी सृष्टि अटकी
क्रोधित पवन आज सृष्टि को कौन बचाये
करें पवन से विनती -हे देव -करो- क्षमा,अब सांसें दे दो
हम सब ने मिल बालक को अवध्य किया ,अब क्रोद्ध उगल दो
मेरा पुत्र चिरंजीवी होगा , पवन मुस्क्याये
सनसन चली हवा -प्राण फिर सबने पाए
ठुड्डी हुई कुछ टेढ़ी बजरंगबली- हनुमत कहलाये
छोड़ दिया सूरज को ऐरावत में बैठे घर आये।।

टिप्पणी: इस चित्र को देख लगा बादल और सूर्य करोड़ों वर्ष पुरानी घटना का मंचन कर रहे हैं -जिस सनातन को हम पिछड़ा बताते हैं उसके चिरंजीवी देव आज से करोड़ों वर्ष पहले सूर्य पे पहुंच चुके थे जिसकी आज का विज्ञान कल्पना भी नहीं कर सकता।


ब्रह्माणी वीणा हिन्दी साहित्यकार
भारत भाग्य का सूर्य
*************
{मनहरण घनाक्षरी में,,चित्र अभिव्यक्ति का प्रयास
8+8+7 वर्णो की लयात्मक तुकांत के साथ}

सुखद लालिमा संग,,,मन में भरे उमंग,
निकला है स्वदेश का,निराला नया सूर्य !
मिटा के देश-कालिमा,छाई लाल मधुरिमा,
जाति पाति को मिटा,,दमका नया सूर्य !
उदित मोदी राज में,नई आश-विश्वास में,
देश को उल्लास देता,चमका नया सूर्य !
प्रभाती सा खिलेगा,भारत-भाग्य चमकेगा,
हँसेंगे "कमल" दल, निकला नया सूर्य !!
*********************************
टिप्पणी: हमने इस सुखद भोर को नए राजनैतिक परिदृश्य की कल्पना में अभिव्यक्ति किया है चुनावी माहौल कालिमा लिए था देश विघटन के कागार पर था ,,,कमल प्रतीक चिन्ह ने वास्तविक हिंद को हिंदुस्तान बनाकर जन मन को खिली सुहानी भोर की तरह आनंदित कर दिया,,,जय श्री राम


Mita Chakraborty
अरुणिम आभा 


उदित होता है आदित्य
ले कर प्रतिदिन नयी आशा
हर कर तीमीर को
किरणें देती नित नया संदेशा
रूकता नही किसी अड़चन से
छोड़ता नही अपनी धूरी को
चलता ही रहता है अपने पथ पर
मानता नही किसी मजबूरी को
रात घनेरी हो चाहे
हो घनघोर काली घटा
गरज बरस कर खूब
छा जाती है फिर रश्मि की छटा ।

टिप्पणी: सूरज की किरणों को कोई भी बाधा रोक नही सकती, उसे उदित होने से कोई रोक नही सकता ।


मदन मोहन"शैल"
(प्रोत्साहन हेतु)
आस का सूरज
---------
बड़ी आस के बाद उगा है आज का सूरज
है आस , इसके तेज का निरंतर विस्तार हो
हर राह हो निष्कलंक तेरे आगमन से
फिर कभी इस भू -भाग पर कलुषित अंधेरा न हो
बहुत क्षुब्ध है धरा आततायियों के पदचाप से
हो कुछ ऐसा जतन, धरा के गुणधर्म का न अवसान हो
नग्न नृत्य करने को उन्मुक्त है आज जमाना
लगे अंकुश, दग्ध हृदय की शांति का कुछ तो निदान हो
दुधमुंहे बालिकाओं का न हो घृणित कत्ल अब
हो खात्मा दरिंदगी का , तेरा कुछ ऐसा विधान हो
राजकाज का रक्तरंजित है चेहरा आज
हो करिश्मा, किसी को किसी की मौत का न गुमान हो
मिट रही है संस्कृति अपनों के ही कुतर्क से
न झुके शर्म से सर , कुत्सित भावनाओं पर विराम हो
इक जगी है आस तेरे आगमन से भोर से सांझ तक
निर्विवाद हो राज तेरा , जिसकी कभी न शाम हो
हर कण धरा का हो तृप्त तेरे निस्वार्थ कर्म से
चारों दिशाओं में मात्र तेरा गुणगान हो


टिप्पणी : सूर्य आशा का प्रतीक है । यदि किसी मनुष्य के अंदर सूरज के समान निश्कलंक तेज हो और दूसरे का हित सर्वोपरि हो तो उसकी सराहना होनी चाहिए।



नैनी ग्रोवर
खेल


इक दूजे को ढूँढ़ते, सूरज और बादल,
कभी बादल ने ली अंगड़ाई,
कभी सूरज ने दिखाई झलकी...
सूख-दुख इसी समान हैं,
ये बता रहे हमको,
खेल जीवन को जीने का,
सिखला रहे हमको,
हो कुछ भी होठों पे रखो,
मुस्कान हल्की-हल्की...
चाहे कुछ ही पल का साथ हो ये,
फिर भी सुंदर है ये नज़ारा,
जैसे राह में कोई मिल गया हो,
बचपन का मित्र हमारा,
भर जायें आंखें देख कर उसको,
भले हो सूरत, समय ने बदली...!

टिप्पणी: सृष्टि के इस चित्र से मुझे तो यही समझ आया, भले ही कम समय को किसी से मिलो पर ऐसे मिलो के जीवन भर ना भूलें, चाहे राह अलग अलग ही क्यों ना हो ।



रुचि बहुगुणा उनियाल
अनथक यात्रा

जल थल नभ में फैली है चहुंओर उजियार
कण कण में किरणें मेरी दें जीवन संचार
आशा और निराशा जीवन की अमिट कहानी
मानव मन में प्रतिपल होता है इसका व्यापार
नवजीवन को हर क्षण में ऊष्ण वसन देता हूँ
सारी ही सृष्टि से है मुझे प्रेम ही प्रेम अपार
चलते ही जाना है अनथक मंजिल की ओर
मेरी इसी सीख से बढ़े दिवस निशा ये संसार

टिप्पणी : इस तस्वीर को देखकर मुझे यही विचार आया कि संसार प्रतिपल चलायमान है और उसकी प्रथम प्रेरणा स्वयं सूर्यनारायण हैं
 


बलदाऊ गोस्वामी
काले बादल
___________
वह देखो दूर क्षितीज पर
काले घने बादल के कुछ टूकड़े
छाये हैं
जो ड़रा रहे हैं हमे
मगर इन बादलों के टूकड़ों के पीछे
सूर्य उग रहा है
जो टूकड़ों के बीच से
अपना प्रकाश फैला रहा है
अभी उसका प्रकाश हम तक
नही पहूँच पा रहा है पूरी तरह से
अभी कुछ देर में
टूकड़ों से उपर उठ कर
फैलायेगा चारों ओर प्रकाश
फिर जन - जीवन में
गूँज उठेगी
गीतों की सुंदर स्वर लहरियाँ ।
सच कहता हूँ बन्धू
तुम ड़रो मत
मौसम परिवर्तन होने वाला है ।


टिप्पणी: काले घने बादल मनुष्य पर मुसीबत के समान है । किन्तु बादलों के पीछे से सूर्य का उगना आशामय प्रतित हो रहा है । सूर्य के किरण को देख कर लगता है कि हमें काले घने बादलों से नही डरना चाहिऐ ।


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
नया सूरज
{प्रोत्साहन हेतु}
जनता ने लोकतंत्र के यज्ञ में देकर आहुति
नव भारत के निर्माण का संकल्प था लिया
थी राष्ट्रभक्ति से ओत प्रोत भावना सबकी
सबका साथ सबका विकास थी सोच सबकी
देखो फिर नया सूरज नभ पर है उदय हुआ
जन मन की आशाओं का ज्यों है मान हुआ
हर वर्ग - क्षेत्र का, नेतृत्व को पूरा साथ मिला
भारतवर्ष को फिर कर्मठ मोदी सा नेता मिला
साथ हमें इस नेता का, सजग रहकर देना होगा
कर हाथ मजबूत उनका दायित्व भी निभाना होगा
घर,बिजली,पानी,सडक पर हो जब सबका अधिकार
श्रेष्ठ भारत की कल्पना फिर होगी हमारी साकार

टिप्पणी: इस बार व्यस्तता के कारण देर से लिख पाया. चित्र को देखा तो भारत का ख्याल आया, ख्याल आया तो नव नर्वाचित सरकार का ध्यान आया - भारत के लिए इस खुशखबरी को और सबसे मूलभूत चाह इस सरकार से संक्षेप में लिखने का प्रयास किया


किरण श्रीवास्तव
प्रकाश

जब-जब संकट
गहराता है,
अपना वजूद
दिखलाता है,
जन-मानस को
भयभीत करता
अपनाअधिपत्य
जमाता है...!!!
तब-तब
अवतारी आता है,
फिर पाप कहाँ
टिक पाता है,
तिमिर दूर कर
जन-जीवन का
चहुंओर प्रकाश
फैलाता है.....!!!!

टिप्पणी: अच्छाई पर बुराई हावी हो सकती है लेकिन, जीत नहीं सकती.....।



अलका गुप्ता 'भारती'
नव जीवन की नयी बिसात 


करवट ले नव परिवर्तन की पुनः बजाती बीन ।
झाँके अरुण अरुणिमा आँजे बदरी नदिया झीन ॥
लें अंगड़ाई नभ कर भानु रश्मि दिये बिखेर ।
टूट गये सुप्त सारे शिथिल से कजियारे घेर ॥
करे उर्मि संग कल कल नदिया चंचलता विलास ।
लहकती अमराई हरी भरी अंबियन मिठास ॥
फिर बिछी भोर संग नव जीवन की नयी बिसात ।
हँसे खड़ खड़ धुन धरा ये मतवाले पीत पात ॥
छक कर बहकी सुरभित गंध मटियाली बौराए ।
बतियाँ बांचे चहके पंछी कुल-कुल पगुराए ॥
साँझ सकारे सी पनिहारिन नव उम्मीदी आस ।
उड़ जाएँगे दुख कुहासे पकड़ बयारी रास ॥
जीवन ज्योति जगमग जागे दूर हों बाधाएँ ।
होके अस्त तम की चादर कलुषित सब काराएं ॥

टिप्पणी: परिवर्तन प्रकृति का नियम है । हर रात्रि के अंत के पश्चात हर नई सुबह मन में एक नया उत्साह जगाती है एक नई आस जगाती है । समस्त सृष्टि इसी नियम के तहत चलती प्रतीत होती है ।



कुसुम शर्मा
नई सुबह नई आस

कोहरा अंधकार का हट जायेगा
नई किरण लेकर जब
नया सवेरा आयेगा
नई उमंग और तरंग से
ये जग फिर महक जायेगा
जब उदित होकर सूरज
अपनी किरणें बिखरायेगा !!
पंछियों की गूँज हो
या कलियों का खिलना !
भँवरों का गुंजन हो
या फूलो का महकना !
नई तरंग से प्रकृति का
अंग अंग खिल जायेगा
जब उदित होकर सूरज
अपनी किरणें बिखरायेगा !!
शिशु के रूदन से
बच्चों के शोर से
बड़ों की डाँट से
सूना आगंन फिर चहक जायेगा
जब उदित होकर सूरज
अपनी किरणें बिखरायेगा !!
कल कल करके नदियाँ का बहना
झर झर करके झरनो का गिरना
ठंडी हवा का झोंका जब खेत को छू कर जायेगा !
यह दृश्य देखकर किसान मुस्कुरायेगा !
जब उदित होकर सूरज अपनी किरणें बिखरायेगा !!
कण कण प्रकृति का खिल जायेगा
जब उदित होकर सूरज
अपनी किरणें बिखरायेगा !!

टिप्पणी: कहते है न कि नया सवेरा अपने साथ नई चेतना और नई आस लेकर सब के जीवन मे आता है सूरज के निकलते ही अंधकार मिट जाता है और प्रकाश चारों तरफ़ छा जाता है !!





प्रभा मित्तल
~~आशा का सवेरा~~

देखो,
जग आलोकित करने को
असंख्य रश्मियाँ संग लिए
भानु बदली से झाँक रहा।
सागर की लहरें नाच रहीं
जल कुतूहल में थिरक रहा।
सुना, कहीं सवेरा हुआ है !
सुनो,
देवों ने भेजा है तुमको
धरणी की त्रास मिटाने,
जाति-पाँति का भेद भूलकर
समता का राज्य बिछाने,
आर्तजन निबल के उर में
दैवी विश्वास जमाने।
जन - जन के मानस में
आशाओं का दीप जलाने।
इस समाज में फैले गहन-
अहंकार की तमिस्त्रा
का अब करो अंत,ताकि
अनीति भीति से दूर रहे
हर प्राणी बालक वृंद।
सच हो .. सवेरा नया हुआ है।

टिप्पणी: आज की आशाओं का सूरज सुरक्षा की बाँहें फैलाकर इस समाज में फैले अनाचार, अनीति,कुरीति के अंधकार को दूर करे,बस कुछ ऐसी ही अपेक्षाएँ लिए मन के भाव।

सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

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