Tuesday, April 2, 2013

02 अप्रैल 2013 का चित्र और भाव





दीपक अरोड़ा 
रफ्ता-रफ्ता मोमबत्ती की तरह,
पिघलता चला गया मैं।
धीमे-धीमे उसके प्यार में,
यूं सुलगता चला गया मैं...


Jayvardhan Kandpal 
इक तेरा सफर पर चलते जाना.
इक मोमबत्ती का जलते जाना.
इक का मंजिल पाके रौशन होना,
इक का मंजिल पाके बुझते जाना.


Suman Thapliyal 
रोज नए रंग बदलती है ज़िन्दगी
गम और ख़ुशी के बीच में ढलती है ज़िन्दगी
साँसों की महफ़िलों में रोशनी के लिए
यूँ मोम के मानिंद पिघलती है ज़िन्दगी .


Govind Prasad Bahuguna 
जलना और पिघलना दो विरोधी भाव हैं
दुर्जन जलता है और सज्जन पिघलता है
अपनों के ऐश्वर्य से दुर्जन का जलना
दूसरों के दुःख से सज्जन का पिघलना
जीवन की विसंगति साथ साथ चलती है
जैसे अँधेरे में मोमबती जलती है


बलदाऊ गोस्वामी 
अंधकार में जलती दीपक,फूलवारी में महकती फूल।
मानष को इशारा करती,इनके गुणों को मत भूल।।
मधुमक्खीयां जिसको नि:स्वार्थ किए तैयार,कहलाया मधुखोया।
इस धरा पर मोम बनकर,सारे जग में प्रकाश फैलाया।।
आओ सीखे हम कुछ नया,प्रकाश फैला है जहाँ।
गोस्वामी दीपक की तरह जले हम,अंधकार फैला है वहाँ।।


किरण आर्य 
मोमबत्ती की लौ सी सुलगती जिंदगी
कतरा कतरा मोम सी पिघलती जिंदगी
सत्कर्मो की राह है जब चलती जिंदगी
खुद जलकर रोशन जहां करती है जिंदगी

अंधेरों में ग़म के रोशन सी है जिंदगी
आंख के कोरो से बहती नदियाँ सी जिंदगी
कभी सेहरा की वीरानी भी है जिंदगी
कभी कलकल बहती नदियाँ भी है जिंदगी

मोमबत्ती की लौ सी सुलगती जिंदगी
कतरा कतरा मोम सी पिघलती जिंदगी
सत्कर्मो की राह है जब चलती जिंदगी
खुद जलकर रोशन जहां करती है जिंदगी

लौ पर पतंगे सी कुर्बान होती विकल जिंदगी
सत्कर्मो की जो राह चले सार्थक वहीँ जिंदगी
मोम के मानिंद पिघल जहां जो रोशन करे
सही मायने में जीने के लायक है वहीँ जिंदगी

मोमबत्ती की लौ सी सुलगती जिंदगी
कतरा कतरा मोम सी पिघलती जिंदगी
सत्कर्मो की राह है जब चलती जिंदगी
खुद जलकर रोशन जहां करती है जिंदगी


अलका गुप्ता 
शमा ! तू क्यूँ जल रही
आज अकेली ?
मूक आंसू बहाती,
तन जलाती ,
क्यूँ बुझाती पहेली ?
तेरे वो दीवाने ..
परवाने कहाँ हैं ?
क्यूँ ढल रही तू ?
अभी वो तो जवां हैं ।
इसे ! परवाने की ...
या तेरी ही -
बेबफाई समझूँ !
या इश्क में तेरा जलना ,
उसकी रुसवाई समझूँ !!


भगवान सिंह जयाड़ा 
मिटाने दुनियाँ के तम को ,
मैं हर पल जलती रहती हूँ ,
जला कर जोत प्रकाश की ,
खुद सदा पिघलती रहती हूँ ,
परवाना है सच्चा साथी मेरा ,
जो आखिर तक साथ देता है ,
मेरे बजूद के आखिरी बक्त तक ,
खुद जल कर भष्म हो जाता है ,
समा परवाने की दास्ताँ यह ,
दोस्ती की सीख हमें सिखाता ,
खुद जलें तो कोई बात नहीं ,
दूसरों को तो प्रकाश दिखाता ,


बालकृष्ण डी ध्यानी 
प्रेम प्रतीक्षा

साथ मेरे वो कब से
ज्योत प्रेम प्रतीक्षा की
जलती और वो बुझती रही

लपटों के दुःख सुख में
हवा के जोर रुख को
अकेले अकेले वो सहती रही

रात निगोड़ी मेरे साथ
मध्यम मध्यम सी जलती रही
यांदों लकीरों को संग-संग वो खींचती रही

अपने आप से वो
ऐ कहती रही और सुनती रही
मोम है की वो पिघलती रही

चाँद और अँधेरा
का मन में ऐसा पहरा लगा
वो रोशनी बन मन जलती रही

साथ मेरे वो कब से
ज्योत प्रेम प्रतीक्षा की
जलती और वो बुझती रही


डॉ. सरोज गुप्ता 
मैं जलूं तू खुश हो जाए

भरा दुनिया में तम है
मिटा भीतर में तम है !

जलकर राख हो जाऊं
रोशन तू,क्या इसमें गम है !

पिघले सत्ता जले मोमबत्ती
बुझेगी नहीं बहुत इसमें दम है !

दिवाली पर जल रही सदियों से
पिघलेंगे राम उम्मीद इसमें कम है !

जलकर बंधन निभाये एक धागा
क्या मानवता की लौ में दम है !


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~मोम और धागा ~
हमारे प्रेम का
कोई सानी नही
अपने लिए हम
एक दूजे में
समाये रहते है
लेकिन
दूसरे को रोशन
करने की खातिर
एक जलता है
एक पिघलता है
दर्द सहकर भी
दूसरो के अँधेरे
हर लेते है
यही तो
हमारे प्यार ने
हमें सिखाया है
दूसरो के लिए
जीना ही
असली जीना है


नैनी ग्रोवर 
जला के दिल, रौशनी जहाँ को दी मैंने,
ताउम्र, जल जल के यूँही ही गवाँ दी मैंने ..

आज कहते हो ज़रुरत नहीं, मेरी तुमको,
राह चमकीली अंधेरों में, तुम्हें यहाँ दी मैंने ... !!


सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

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